ध्रुव कौन थे, भगवान श्री हरी विष्णु की उन पर कृपा कैसे हुई, और अंत समय में उन्होंने पृथ्वी से ब्रह्माण्ड के केंद्र तक की दूरी कैसे तय की

ध्रुव कौन थे, भगवान श्री हरी विष्णु की उन पर कृपा कैसे हुईब्रह्मा जी के पुत्र स्वायम्भुव मनु और शतरूपा के अत्यन्त प्रतापी पुत्र उत्तानपाद की दो पत्नियाँ थीं । उनमें से उनकी छोटी पत्नी सुरूचि पर महाराज का अत्यधिक प्रेम था । उससे उनको जो पुत्र हुआ, उस का नाम उत्तम था । महाराज की बड़ी रानी सुनीति के पुत्र का नाम था ध्रुव ।

एक दिन की बात है । छोटी रानी सुरूचि का पुत्र उत्तम अपने पिता की गोद में बैठा हुआ था । उसी समय ध्रुव ने भी पिता की गोद में बैठना चाहा, लेकिन उसे अपने पिता की ओर से वह प्यार और दुलार नहीं मिला | इस पर वहीं बैठी हुई पति प्रेम-गर्विता सुरूचि ने ध्रुव का तिरस्कार करते हुए द्वेषपूर्ण स्वर में उससे कहा “बेटा ध्रुव ! तू भी यद्यपि राजा का पुत्र है, लेकिन फिर भी इतने से ही तुझे राजसिंहासन पर बैठने का अधिकार नहीं है ।

अपने पिता की गोद और इस राजसिंहासन पर बैठने के लिये तुम्हें मेरे उदर से जन्म लेना चाहिये था । यदि तू अपनी यह इच्छा पूरी करना चाहता है तो परम पुरूष श्री नारायण को प्रसन्न कर उनकी कृपा से मेरी कोख से जन्म ले । इसका अधिकारी तो मेरा पुत्र ‘उत्तम’ ही है, समझा” ।

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उस समय पिता के दुलार से वंचित ध्रुव सुरूचि की कटूक्ति सुनकर तिलमिला उठे । क्रोध और दुःख से उनके होंठ काँपने लगे । उनकी आँखों में आँसू भर आये । रोते हुए वे अपनी माँ के पास पहुँचे । सुरूचि द्वारा किये गये अपने पुत्र के अपमान से व्यथित अपने प्राणप्रिय पुत्र ध्रुव को सुबुकियाँ भरते देखकर माता सुनीति का हृदय दुःख से भर गया । उनकी आँखों से भी झर-झर आँसू बहने लगे ।

वे ध्रुव को अपनी गोद में बैठाकर उसके सिर पर हाथ फेरते हुए समझाने लगीं “बेटा ! तू व्याकुल मत हो । रोना छोड़ दे । इस पृथ्वी पर जन्म लेने पर पूर्वजन्म के शुभाशुभ कर्मों के फल ही सुख-दुःख के रूप में प्राप्त होते हैं । पूर्व जन्म के पुण्य कर्मों के कारण ही सुरूचि में तुम्हारे पिता का अधिक प्रेम है और पुण्यरहित होने के कारण ही मैं केवल उनकी भार्या (भरण करने योग्य) हूँ । इसी प्रकार उत्तम भी अपने पूर्व के शुभ कर्मों के कारण पिता का प्यार-दुलार पा रहा हू और तू मन्द भाग्य होने के कारण ही उस सुख से वंचित है” ।

कुछ क्षण रूक कर आंसू पोंछते हुए माता सुनीति ने कहा “बेटा ! तू सुशील, पुण्यात्मा और प्राणि मात्र का शुभचिन्तक बन । इससे समस्त सम्पत्तियाँ और ऐश्वर्य सुलभ होते हैं । एक बात सुरूचि ने तुझसे सौतेली माँ होकर भी अत्यन्त उत्तम कही है | वह यह कि ईष्र्या-द्वेष छोड़कर तू श्री भगवान् विष्णु की आराधना आरम्भ कर दे ।

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तुम्हारे प्रपितामह ब्रह्मा जी उन्हीं परम पुरूष की आराधना से ब्रह्मा हुए और तुम्हारे पितामह स्वायम्भुव मनु उन्हीं अशरण-शरण प्रभु की बड़ी-बड़ी दक्षिणाओं वाले यज्ञों के द्वारा अनन्य भाव से आराधना कर अत्यन्त दुर्लभ लौकिक-अलौकिक सुख प्राप्त कर सके थे । तुम भी उन्हीं कमलदल-लोचन श्री हरि की शरण ग्रहण करो । उनके अतिरिक्त महान दुःखों से त्राण देने वाला अन्य कोई नहीं है” ।

“माँ ! मुझे आज्ञा दो” | ध्रुव ने अपनी माता के चरणों पर अपना मस्तक रखकर प्रार्थना की । “निश्चय ही मैं अब परम पुरूष परमात्मा से अप्राप्य वस्तु प्राप्त करूँगा । तू बस प्रसन्न मन से मुझे आशिष दे” । “मेरे तन, मन और प्राण की सारी आशिष तेरे लिये है, बेटा !”, आँखों से बहते आँसू पोंछती हुई माता सुनीति ने अधीर होकर कहा ।

“पर बेटा ! अभी तू निरा बालक है । तेरी आयु गृह-त्याग के लिए उपयुक्त नहीं । तू घर में ही रहकर दान-धर्म आदि पुण्यकर्म और क्षीराब्धिशायी महाविष्णु की प्रीतिपूर्वक उपासना कर । समय पर प्रभु-प्राप्ति के लिये गृह त्याग भी कर लेना । अभी तो कहीं जाने की बात सोचना भी उचित नहीं है” ।

“माँ ! तू बिल्कुल ठीक कहती है” । ध्रुव बोले । “किंतु मेरा हृदय छटपटा रहा है । उन अनंत प्रभु के पास जाने में अब एक क्षण का विलम्ब भी मुझे सहन नहीं हो रहा । मुझे राजसिंहासन नहीं चाहिये । मैं अलभ्य-लाभ के लिये करूणामय स्वामी के चरणों में अवश्य जाऊँगा । तू मुझे दयाकर आज्ञा दे दे” । “सर्वान्तर्यामी, सर्वसमर्थ, करूणावरूणालय तुम्हारा कल्याण करें, बेटा !”

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माता सुनीति बोलीं “बेटा ! मैं तुम्हें भगवान् श्री विष्णु की आराधना से नहीं रोकती । यदि मैं ऐसी चेष्टा करूँ तो मेरी जीभ सैकड़ों टुकड़े होकर गिर पड़े, क्योंकि श्री भगवान् की आराधना से सम्पूर्ण असम्भव भी सम्भव हो जाता है” ।

माता सुनीति ने ध्रुव की दृढ़ निष्ठा देखकर नील कमलों की माला पहनाकर उसे अपनी गोद में ले लिया और उसके सिर पर हाथ फेरकर अनुमति देते हुए कहा “बेटा ! जा, कण-कण में व्याप्त श्री हरि तुम्हरा सर्वविध मंगल करें । तू उनकी कृपा प्राप्त कर” । माता सुनीति की आँखों से आँसू झर रहे थे और दृढ़निश्चयी ध्रुव अपने पिता के नगर से निकल पड़े ।

प्रभु की ओर अग्रसर होने वाले भक्तों को देवर्षि नारद जी का सहयोग और उनकी सहायता तत्काल सुलभ होती है । थोड़ा-सा भी अपना मान-भंग न सह सकने वाले नन्हे-से क्षत्रिय-बालक को परम पुरूष परमेश्वर की आराधना का निश्चय कर वन-गमन करते देख देवर्षि तत्काल वहाँ पहुँच गये ।

उन्होंने ध्रुव के मस्तक पर अपना पापनाशक, मंगलमय वरद कमल हस्त फेरते हुए स्नेहसिक्त स्वर में कहा “बेटा! तुम्हारी आयु बहुत छोटी है और परब्रह्म परमात्मा की प्राप्ति अत्यन्त दुष्कर है । योगीन्द्र-मुनीन्द्र तथा देवताओं को भी उनका दर्शन बड़ी कठिनता से प्राप्त होता है । इसलिए तुम अपनी जन्मदायिनी जननी की आज्ञा मानकर घर लौट जाओ । वहाँ योगाभ्यास एवं शुभ कर्मों के द्वारा संतोषजनक जीवन व्यतीत करो । बड़े होने पर प्रभु प्राप्ति के लिये तप करना, अभी जाओ”।

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“ब्राह्मण ! आपका उपदेश बड़ा सुन्दर है” । अत्यन्त विनयपूर्वक ध्रवु ने देवर्षि से निवेदन किया । “मैं क्षत्रिय कुलोत्पन्न बालक हूँ । माता सुरूचि की कटूक्ति मेरे हृदय में टूटी हुई बर्छी की नोक की भाँति रिस रही है । मैं छटपटा रहा हूँ । मैं त्रैलोक्य-दुर्लभ पद की प्राप्ति के लिये कटिबद्ध हूँ । मेरे पूर्वजों ने जो नहीं पाया है, वह श्रेष्ठ पद मुझे अभीष्ट है । आप कमल योनि ब्रह्मा के पवित्र पुत्र हैं और जगत के अशेषमंगल के लिये वीणा बजाते, हरिगुण गाते त्रैलोक्य में विचरण किया करते हैं । आप मुझ पर भी दया करें और उन सुर-नर-मुनिवन्दित परब्रह्म परमात्मा की प्राप्ति का मार्ग बतायें । आपके श्री चरण कमलों में मेरी यही प्रार्थना है” ।

“बेटा ! तुम्हारी माता सुनीति ने जो तुम्हें मार्ग बताया है, वही भगवान् वासुदेव की प्राप्ति का एकमात्र उपाय है” । ध्रुव की बातों से अत्यन्त प्रसन्न होकर देवर्षि नारद ने अत्यन्त प्यार से ध्रुव को बताया “बेटा ! तुम्हारा कल्याण होगा, अब तुम श्री यमुना जी के तटवर्ती परम पवित्र मधुवन में जाओ, वहाँ श्री हरि का नित्य निवास है” ।

“वहाँ कालिन्दी के निर्मल जल में त्रिकाल स्नान कर, नित्य कर्मों से निवृत्त हो, आसन बिछाकर बैठना और प्राणायाम के द्वारा इन्द्रियों के दोषों को दूर कर के मन से परम पुरूष परमात्मा का इस प्रकार ध्यान करना “वे दया समुद्र नवजलधर-वपु, मंद-मंद मुस्करा रहे हैं । उनके श्री अंगों से आनन्द और प्रेम-सुधा की वर्षा हो रही है । उन भुवन मोहन प्रभु की नासिका, भौंहें, कपोल, अधर-पल्लव, दंतपंक्तियाँ-सभी परम सुन्दर और दिव्य हैं । उनके वक्ष पर श्री वत्स का चिन्ह है ।

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उनके कम्बुकण्ठ में अत्यन्त सुगन्धित वन माला पड़ी हुई है और उससे दिव्यातिदिव्य मधुर सुगन्ध निकल रही है । उस सुगन्ध से हमारे तन-मन प्राण आनंद-सिंधु में सराबोर होते जा रहे हैं । उनकी चार भुजाएँ हैं, जिनमें शंख, चक्र, गदा और पद्म सुशोभित हैं । श्री अंगों पर किरीट, कुण्डल, केयूर और कंकणादि आभूषण सुशोभित हैं ।

परम दिव्य, श्यामल घन-तुल्य मंगलमय श्री विग्रह पर पीताम्बर अत्यन्त शोभा पा रहा है । कटि प्रदेश में सुवर्ण की करधनी सुशोभित है, जिससे अदभुत प्रकाश छिटक रहा है । देव-ऋषिवन्दित कमल-सरीखे चरणों में अदभुत सुवर्णमय पैंजनी शोभा दे रही है ।

मानस-पूजा करने वाले भक्तों के हृदयरूपी कमल की कर्णिका पर वे भक्त वत्सल प्रभु अपने नखमणि मण्डित मनोहर पादारविन्दों को स्थापित कर विराजते हैं । वे प्रभु हमारी ओर अत्यन्त कृपापूर्ण दृष्टि से निहार रहे हैं, मंद-मंद हँस रहे हैं । इस प्रकार श्री भगवान् का ध्यान करते रहने से मन उनकी सौन्दर्य-सुधा में डूब जाता है” ।

देवर्षि नारद ने अत्यन्त कृपापूर्वक ध्रुव को आगे बताया “ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय-यह भगवान् वासुदेव का परम पवित्र एवं परम गुहृा मंत्र है । इसका ध्यान के साथ जप चलता रहे । जल, पुष्प, पुष्पमाला, मूल और फलादि सभी सामग्रियाँ और तुलसी आदि प्रभु-पूजा के जिन-जिन उपचारों का विधान किया गया है, उन्हें मंत्रमूर्ति वासुदेव को इस द्वादशाक्षर मंत्र से ही अर्पित करना” |

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देवर्षि नारद के इस उपदेश को ध्यानपूर्वक सुनने के बाद सुनीति कुमार ध्रुव ने उनकी परिक्रमा कर उनके चरणों में प्रणाम किया । इसके बाद श्री नारद जी के आदेशानुसार वे परम पवित्र मधुवन के लिये चल पड़े । विष्णु पुराण में आता है कि उत्तानपादनन्दन ध्रुव अपनी माता सुनीति से विदा हो कर जब नगर के बाहर उपवन में पहुँचे तो वहाँ उन्होंने पहले से ही सात कृष्ण मृग-चर्म के आसनों पर बैठे सप्तर्षियों को देखकर उनके चरणों मेंअत्यन्त श्रद्धापूर्वक प्रणाम किया ।

ध्रुव ने अपनी व्यथा सुनाते हुए उनसे उसके निवारण का उपाय पूछा । “तुमने क्या सोचा है और हम तुम्हारी किस प्रकार से सहायता करें?” सप्तर्षियों ने नन्हें से ध्रुव में क्षात्र तेज देखकर कहा । “तुम निस्संकोच अपने मन की बात हमसे कह दो” । “मुझे राज्य और धन आदि किसी भी वस्तु की इच्छा नहीं है” ध्रुव ने उनसे अपना अभीष्ट व्यक्त किया ।

“मैं तो केवल एक उसी स्थान को चाहता हूँ, जिसे अब तक न तो कभी किसी ने पहले पाया हो और न ही भोगा हो । आप मुझे कृपा कर के यही बता दें कि क्या करने से वह अग्रगण्य स्थान मुझे प्राप्त हो सकता है?” वहाँ उपस्थित महर्षि मरीचि, अत्रि और अगिंरा के बाद महर्षि पुलस्त्य ने कहा “जो परब्रह्म, परम धाम और जो सबसे बड़े श्रेष्ठ हैं, उन हरि की आराधना करने से मनुष्य अति दुर्लभ मोक्ष पद को भी प्राप्त कर लेता है” ।

महर्षि पुलह और क्रतु ने भी जनार्दन को प्रसन्न करने के लिये उनकी आराधना उपदेश दिया । अन्त में वसिष्ठ जी ने कहा “ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय-इस द्वादशाक्षर मंत्र का जप करना चाहिये तुम्हे । तुम्हारे पितामह स्वायम्भुव मनु ने भी इसी मंत्र का जप करके अपना अभीष्ट प्राप्त किया था । तुम भी इसी मंत्र का जप करते हुए श्री गोविन्द को प्रसन्न करो, और उनकी कृपा प्राप्त कर लो” ।

इस प्रकार वहाँ उपस्थित ऋषियों के उपदेश सुनकर ध्रुव ने उनके चरणों में प्रणाम किया और उनका आशीर्वाद ले कर कालिन्दीकूल स्थित पवित्रतम मधुवन की यात्रा आरम्भ की । सुनीति पुत्र ध्रुव मधुवन पहुँचे । उन्होंने श्री यमुना जी को प्रणाम कर स्नान किया और रात्रि में उपवास कर प्रातःकाल पुनः स्नान कर ऋषियों के उपदेश के अनुसार श्री नारायण की आराधना आरम्भ कर दी ।

उन्होने उपासना-काल में एक मास तक प्रति तीसरे दिन शरीर-निर्वाह के लिये कैथ और बेर का फल लिया, दूसर मास में छः-छः दिन के बाद वे सूखे घास और पत्ते खाकर भक्त वत्सल प्रभु की उपासना करते रहे । तीसरे मास में वे नवें दिन केवल जल पीकर भजन में लगे रहे । चौथे महीने बारह दिनों के अंतर से केवल वायु पीकर परमात्मा के ध्यान और भजन में लगे रहे ।

पाँचवें मास मे सुनीति पुत्र ध्रुव श्वास रोक कर एक पैर पर खड़े हो हृदय स्थित भगवान् वासुदेव का चिंतन करने लगे । उनकी चित्तवृत्तियाँ सर्वथा शांत एवं स्थिर होकर कमल-नयन प्रभु में ही लीन हो गयी थीं । ध्रुव के द्वारा सम्पूर्ण तत्वों के आधार पर ब्रह्म की धारणा किये जाने पर त्रैलाोक्य काँप उठा । कहा जाता है कि ध्रुव के एक पैर पर खड़े होने से उनके पैर के अँगूठे के महान भार से दबकर आधी धरती एक ओर झुक गयी ।

उनके इन्द्रिय एवं प्राणों को रोक कर अनन्य बुद्धि से पर ब्रह्म परामात्मा का ध्यान करने एवं उनकी समष्टि प्राण से अभिन्नता हो जाने के कारण जीवन मात्र का श्वास-प्रश्वास रूक गया । फलतः लोक और लोकपाल-सभी व्याकुल हो गये । समूचे ब्रह्माण्ड में अफरा-तफरी मच गयी | फिर तो देवाधिप इन्द्र के साथ कूष्माण्ड नाम की अर्ध दैवीय जाति के योद्धाओं ने अनेक भयानक रूपों से ध्रुव का ध्यान भंग करना प्रारम्भ किया ।

खतरनाक परग्रही प्राणी, एक छलावा या यथार्थ

भयानक राक्षसियाँ आयीं और चीत्कार करने लगीं | उनके कोलाहल एवं चीत्कार से पूरे वातावरण में उपस्थित जन-सामान्य का कलेजा काँप जाता | पर ध्रुव ने उनकी और देखा तक नहीं । फिर शुरू हुआ मायावी दुनिया का खेल | उसी मायावी दुनिया से माया की सुनीति प्रकट हुई और विलाप करते हुए उसने कहा “बेटा ! तू इस भयानक वन में क्या कर रहा है? तेरा कष्ट मुझसे देखा नहीं जा रहा है ।

सौत की कटूक्ति के कारण मुझ अनाथ को छोड़ देना तुझे उचित नहीं है । क्या मैंने इसी दिन के लिये तुम्हें पाला था?” फिर सुनीति बड़े जोर से चिल्लायी “अरे बेटा ! भाग-भाग ! देख, इस निर्जन वन में कितने क्रूर राक्षस भयानक अस्त्र लिये दौड़े चले आ रहे हैं” । यह कह कर वह आकाश में अप्रकट हो गयी ।

फिर कितने ही राक्षस और राक्षसियाँ प्रकट हुए । वे अत्यन्त भयानक थे तथा उनके मुख से आग की ज्वालाएँ निकल रही थीं । पता नहीं किन-किन नरकों से उनकी उत्पत्ति हुई | “मारो-काटो” इस प्रकार वे चिल्ला रहे थे । फिर उस छोटे से बालक को भयाक्रान्त करने के लिये भयानक ऊँट जैसे विचित्र प्राणी, सिंह, मगर और श्रुगाल आदि के मुख वाले राक्षस चीत्कार करने लगे, हृदय को कँपा देने वाले उपद्रव करने लगे |

पर सभी को हतप्रभ करते हुए श्री हरि से एकाकार हुआ ध्रुव का मन तनिक भी विचलित नहीं हुआ । वे नवनीरदवपु श्री विष्णु के ध्यान में ही तन्मय रहे । ध्रुव पर अपनी माया को कोई प्रभाव पड़ता न देख और श्वास-प्रश्वास की गति अवरूद्ध हो जाने हो जाने के कारण भयभीत होकर देवता शरणागत वत्सल श्री हरि के पास पहुँचे और उन्होंने अत्यन्त करूण स्वर में कहा “प्रभो ! ध्रुव की तपस्या से व्याकुल होकर हम आपकी शरण में आये हैं । हमें पता नहीं, वह इन्द्र, सूर्य, कुबेर, वरूण, चन्द्रमा या किस के पद की कामना करता है । आप हम पर प्रसन्न हों, ध्रुव को तप से निवृत्त कर हमें शांति प्रदान कीजिये” ।

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“देवताओ ! मेरे प्रिय भक्त ध्रुव को इन्द्र, सूर्य, वरूण अथवा कुबेर आदि किसी के भी पद की अभिलाषा नहीं है” । श्री भगवान् ने देवताओं को आश्वस्त करते हुए कहा । “उसकी इच्छा मैं पूर्ण करूँगा । आप लोग निश्चिन्त होकर जायँ, मैं जाकर उसे तप से निवत्त करता हूँ” । मायातीत देवाधि देव प्रभु के वचन सुनकर इन्द्रादि देवताओं ने प्रभु के चरण कमलों में प्रणाम किया तथा वे अपने-अपने स्थान को चले गये ।

इधर परम पुरूष श्री भगवान् ध्रुव के तप से प्रसन्न होकर उनके सम्मुख चतुर्भुज रूप में प्रकट हो गये । “सुनीति कुमार ! मैं तुम्हारी तपस्या से अत्यन्त प्रसन्न होकर तुम्हें वर देने आया हूँ” । मंद-मंद मुस्कराते हुए नवघनश्याम चतुर्भुजरूपधारी भगवान् ने ध्रुव से कहा । “तुम इच्छित वर माँगो” । साथ ही, ध्रुव जिस देदीप्यमान मूर्ति का अपने हृदय-कमल में ध्यान कर रहे थे, वह सहसा लुप्त हो गयी ।

तब तो घबरा कर ध्रुव ने अपनी आँखें खोल दीं और उन्होंने अपने सम्मुख किरीट, कुण्डल शंख, चक्र, गदा, शाडंग धनुष और खड्ग धारण किये परम प्रभु को देखा तो वे उनके चरणें में लोट गये । प्रणाम के बाद ध्रुव हाथ जोड़ कर खड़े हो गये । उनका रोम-रोम प्रेम से पुलकित हो रहा था । नेत्रों में प्रेमाश्रु भर गये थे । उनका कण्ठ गद्गद था ।

वे त्रैलोक्य पावन, परम दिव्य, अलौकिक और परम दुर्लभ कल्याणमयी श्री भगवान् की परम सौन्दर्यमयी कृपामयी मूर्ति को अपलक नेत्रों से निहारते हुए उनकी स्तुति करना चाहते थे, पर प्रभु-स्तवन किस प्रकार करें, वे जानते नहीं थे । सर्वान्तर्यामी प्रभु ने करस्थ श्रुति रूप शंख से बालक के कपोल का स्पर्श कर दिया । ध्रुव के मन में हंस वाहिनी सरस्वती प्रकट हो गयीं ।

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उन्हें वेदमयी दिव्य वाणी प्राप्त हो गयी और वे अत्यन्त श्रद्धा-भक्ति से अपने परम अराध्य परम प्रभु का स्तवन करने लगे “सर्वातीत, सर्वात्मन, सर्वशक्ति सम्पन्न, करूणामय, जगदाधार स्वामी ! मैं आपके कल्याणमय, मंगलमयय, सुर-मुनिवन्दित चरण कमलों में प्रणाम करता हूँ” ।

ध्रुव ने प्रभु की स्तुति की । “प्रभो ! आप एक हैं, किंतु अपनी रची हुई सम्पूर्ण सृष्टि के कण-कण में व्याप्त हैं । दयामय स्वामी ! इन्द्रियों से भोगा जाने वाला विषय-सुख तो नरक में भी प्राप्त हो सकता है | ऐसी स्थिति में जो लोग विषय-सुख के लिये लालायित रहते हैं, उसी के लिये रात-दिन प्रयत्नशील रहते हैं और जन्म-जरा-मरण-व्याधि से मुक्त होने के लिये आपके चरणों का अआश्रय नहीं लेते, वे घोर माया से बंधे हुए अत्यन्त अभागे हैं ।

प्रभो ! आपके आनन्दमय, कल्याणमय, अंनत सौन्दर्य-सम्पन्न नवनीरद वपु के ध्यान, आपके मधुर नामों के जप तथा आपके और आपके भक्तों के पावन चरित्र सुनने में जो सुख प्राप्त होता है, वह सुख निजानन्द ब्रह्म में भी नहीं, जगत में तो कहाँ से प्राप्त होगा? पद्मनाभ प्रभो ! जिनका मन आपके चरण कमलों का भ्रमर बन चुका है, जिनकी जिहृा को आपके नामामृत-पान का चस्का लग गया है, उन आपके प्रेमी भक्तों का संग-लाभ होने पर, सगे-सम्बन्धी, स्त्री-पुत्र, बंधु-बान्धव, घर-द्वार और मित्रादि सभी छूट जाते हैं ।

उन्हें आपके स्वरूप का ध्यान, आपके नाम का जप और आपकी लीला-कथा का श्रवण-मनन-चिन्तन तथा आपके अनुरागी भक्तों के संग के अतिरिक्त और कहीं कुछ अच्छा नहीं लगता । उन्हें अपने शरीर की भी सुधि नहीं रह जाती । दयामय ! आप नित्यमुक्त, शुद्धसत्त्वमय, सर्वज्ञ, परमात्मस्वरूप, निर्विकार, आदिपुरूष, षडैश्वर्य-सम्पन्न तथा तीनों गुणों के अधिपति हैं ।

आप सम्पूर्ण जगत के कारण, अखण्ड, अनादि, अनन्त, आनंदमय, निर्विकार ब्रह्मरूप हैं । मैं आपके शरण में हूँ । परमानन्द मूर्ति प्रभो ! भजन का सच्चा फल आपके चरण कमलों की प्राप्ति है और वे देवदुर्लभ, त्रैलोक्यपूज्य परम पावन चरण कमल मुझे प्राप्त हो चुके हैं । अब मैं उन्हे नहीं छोडूँगा । प्रभु ! ये मंगलमय, त्रैलोक्य पावन चरण कमल सदा-सर्वदा मेरे हृदय धन के रूप में बने रहें । मुझे कभी इनका विछोह न हो ।

मैं पहले यहाँ माता सुरूचि की कटूक्ति से आहत होकर दुर्लभ पद-प्राप्ति की कामना लेकर आया था, किंतु अब मुझे कोई इच्छा नहीं है । अब तो मैं केवल इन चरण कमलों का भ्रमर बनकर रहना चाहता हूँ । मुझे क्षण भर के लिये भी आपकी विस्मृति न हो, यही मै चाहता हूँ । दयामय ! अचिन्त्य शक्ति सम्पन्न परमात्मन ! आप सदा-सर्वदा मेरे बने रहें-बस, मेरी यही कामना है । आप इसकी पूर्ति कर दें, नाथ” !

“बालक ! मेरा दर्शन होने से तेरी तपस्या सफल हो गयी” । श्री भगवान् ने ध्रुव से अत्यन्त स्नेहपूर्वक कहा । “किंतु मेरा दर्शन अव्यर्थ होता है । तुम्हारी लौकिक कामनाओं की पूर्ति भी अवश्य होगी । पूर्व जन्म में तू मुझमें निरन्तर एकाग्रचित्त रखने वाला मातृ-पितृ भक्त, धर्म आचरण-सम्पन्न ब्राह्मण था । कुछ ही दिनों में एक अत्यन्त सुंदर राज पुत्र से तेरी मैत्री हो गयी ।

उसके वैभव को देख कर तुम्हारे मन में भी राज पुत्र होने की कामना उदित हुई, उसी के फलस्वरूप तूने दुर्लभ स्वायम्भुव मनु के वंश में उत्तानपाद के पुत्र के रूप में जन्म लिया । अब अपनी आराधना के फलस्वरूप मैं तुझे त्रैलोक्य-दुर्लभ, सर्वोत्कृष्ट ‘ध्रुव’ (निश्चल)-पद दे रहा हूँ, जो सूर्य, चन्द्र, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र और शनि आदि ग्रहों, सभी नक्षत्रों, सप्तर्षियों और सम्पूर्ण विमानचारी देवगणों से ऊपर है । साथ ही तुझे एक कल्पतक की स्थिति दे रहा हूँ” । “तेरी माता सुनीति भी प्रज्वलित तारे के रूप में तेरे समीप ही एक विमान पर उतने ही दिनों तक रहेगी ।

देवासुर संग्राम के बाद देवताओं के घमण्ड को चूर-चूर करने वाले परब्रह्म परमेश्वर

प्रातः-सायं तेरा गुणगान करने वाले भी पुण्य के भागी होंगे” । श्री भगवान् ने ध्रुव से आगे कहा “तपश्चरण के लिये अपने पिता के वन में जाने के बाद तू राज्य का अधिकारी होगा और अनेक बड़ी-बड़ी दक्षिणाओं वाले यज्ञ करते हुए छत्तीस हजार वर्ष तक पृथ्वी का शासन करेगा और फिर अंत में तू सम्पूर्ण लोकों द्वारा वन्दनीय, अत्यन्त दुर्लभ और परम सुखद मेरे धाम में पहुँच जायगा, जहाँ जाकर फिर इस जगत में कोई लौटकर नहीं आता” ।

सुनीति नन्दन ध्रुव को इस प्रकार वर देकर ध्रुव से पूजित श्री भगवान वासुदेव अपने धाम पधारे, किंतु प्रभु के विछोह से उदास होकर ध्रुव अपने नगर के लिये लौट पड़े । उधर देवर्षि नारद ध्रुव के वन गमन के बाद राजा उत्तानपाद के समीप पहुँचे बोले “राजन् ! तुम कुछ उदास दीख रहे हो । तुम्हारी चिंता का क्या कारण है?” “मैं बड़ा ही स्त्रैण और निष्ठुर हूँ” ।

बिलखते हुए नरेश ने देवर्षि से कहा । “मेरी दुष्टता के कारण मेरा पाँच वर्ष का अबोध बच्चा गृह त्यागकर वन में चला गया । पता नहीं, वह कैसे है । उसे हिंसक जंतुओें ने खा डाला या उसका क्या हुआ? वह बालक प्रेमवश मेरी गोद में आना चाहता था, किंतु मैंने उसे प्यार नहीं दिया । मेरी पत्नी ने उसे बड़ी कटूक्तियाँ कहीं । यह मेरे ही पाप का परिणाम है, पर अब मेरा हृदय अधीर और अशांत है । मेरे दुःख की सीमा नहीं । मैं क्या करूँ, कहाँ जाऊँ कुछ समझ में नहीं आता” ।

“ध्रुव के रक्षक सर्वसमर्थ हरि हैं, तुम उसकी चिंता मत करो” । श्री नारद जी ने उत्तानपाद को आश्वस्त किया । “वह बालक देव दुर्लभ पद प्राप्त कर सकुशल लौट आयेगा । अत्यन्त यशस्वी होगा ध्रुव!” यह कह कर श्री नारद जी चले गये, पर राजा उत्तानपाद निरन्तर पुत्र की चिंता में ही घुलने लगे । राज कार्य में उनका मन नहीं लग रहा था । उन्हें उनके कर्मों का बहुत पछतावा हो रहा था |

काकभुशुंडी जी एवं कालियानाग के पूर्व जन्म की कथा

“दुलर्भ मणि सम्मुख रहने पर भी मैं काँच ले बैठा” । ध्रुव का मन अत्यन्त दुःखी और उदास था । “भगवान् के सानिध्य के स्थान पर मैंने दुर्लभ पद ले लिया । मैं बड़ा ही मूढ़ और अभागा हूँ” । इस प्रकार सोचते और अपने आराध्य का स्मरण करते हुए वे अपनी राजधानी के समीप पहुँचे । “कुमार ध्रुव नगर के समीप तक आ गयें हैं”-संदेश मिलने पर भी राजा उत्तानपाद को सहसा विश्वास नहीं हुआ, पर देवर्षि नारद के वचनों का स्मरण कर वे अत्यन्त हर्षित हो गये ।

उन्होंने इस सुखद संवाद लाने वाले को, अपनी गर्दन में पड़ा बहुमूल्य हार उतार कर दे दिया । नगर-द्वार-चौराहे-सब सज उठे । मांगलिक वाद्य बजने लगे । प्रजा की प्रसन्नता की सीमा नहीं थी । राजा उत्तानपाद, ध्रुव की माँ सुनीति तथा सुरूचि पुत्र का मुँह देखने के लिये अधीर हो रहे थे । राजा ब्राह्मणों, वंश के वृद्ध मंत्री और बंधुजनों को साथ ले, स्वर्णजटित रथ पर आरूढ़ होकर नगर के बाहर पहुँचे ।

उनके आगे-आगे शंख-दुन्दुभि आदि वाद्य बज रहे थे । सुनीति और सुरूचि उत्तम के साथ पालकियों पर बैठकर वहाँ पहुँची । उपवन के समीप पहुँचते ही महाराज उत्तानपाद ने ध्रुव को देखा और तुरंत रथ से उतर पड़े । उन्होंने अपने बच्चे ध्रुव को छाती से लगा लिया । उनके नेत्र बरस पड़े तथा साँस जोर से चलने लगी । राजा बार-बार अपने बिछुड़े पुत्र के सिर पर हाथ फेर रहे थे । उनके आँसू थमते ही न थे ।

ध्रुव ने पिता के चरणों पर अपना सिर रख दिया । “चिरंजीवी रहो” । ध्रुव ने माता सुरूचि के चरणों पर सिर रखा तो स्नहेवश उन्होंने भी आशीर्वाद दिया । जिस पर भगवान् कृपा करते हैं, उस पर सबकी कृपा स्वतः उमड़ पड़ती है । ध्रुव अपने छोटे भाई उत्तम से गले मिले और जब अपनी माता सुनीति के चरणों पर उन्होंने सिर रखा तब उनकी विचित्र दशा हो गयी ।

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बिछुड़े हुए बछड़े को पाकर जिस प्रकार गाय की प्रसन्नता की सीमा नहीं रहती उसी प्रकार उन्होंने अपने प्यारे बच्चे को वक्ष से लगाया तो सब कुछ भूल गयीं । उन्हें अपने तन और प्राण की भी सुधि नहीं रही । उनके नेत्रों से आँसू और स्तनों से दुग्ध-धारा बहने लगी । “आपने निश्चय ही विश्ववन्द्य हरि की उपासना की है”, पुरवासियों ने महारानी की प्रशंसा करते हुए कहा । “जो आपका खोया हुआ लाल लौट कर आ गया । श्री हरि की आराधना करने वाले तो दुर्जय मृत्यु पर भी विजय प्राप्त कर लेते हैं” ।

ध्रुव के दर्शन से लोगों के नेत्र तृप्त नहीं हो रहे थे । उनके प्रति सभी अपना स्नेह व्यक्त कर रहे थे । उसी समय महाराज उत्तानपाद ध्रुव के साथ उत्तम को भी हाथी पर बैठाकर राजधानी में प्रवेश करने के लिये चल पड़े । मार्ग खूब सजाया गया था और ध्रुव पर प्रजा-परिजन पुष्प, पुष्पमाला एवं मांगलिक द्रव्यों की वर्षा कर रहे थे । इस प्रकार ध्रुव राजभवन में पहुँचे ।

देवर्षि नारद के कथनानुसार महाराज उत्तानपाद ध्रुव का भक्तिपरायण, अत्यन्त तेजस्वी जीवन देखकर मन-ही-मन आश्चर्यचकित हो रहे थे । ध्रुव की तरूणाई एवं उन पर प्रजा की प्रीति तथा अपनी वृद्धावस्था देखकर महाराज उत्तानपाद उन्हें राज्य पर अभिषिक्त कर स्वयं तपश्चर्या के लिये वन में चले गये । पृथ्वी के सम्राट ध्रुव का शासन कैसा रहा होगा, यह सहज ही सोचा जा सकता हैं परम भगवद भक्त नरेश के राज्य में प्रायः बडे़-बड़े यज्ञ हुआ करते थे । सर्वत्र सुख-शांति का अखण्ड साम्राज्य था । सत्य, दया, उपकार, त्याग, तप प्रभूति सर्वत्र दीखते थे । सर्वत्र श्री भगवान् का पूजन, भजन और कीर्तन होता था । मिथ्याचार एवं दुराचार की प्रजा के मन में कल्पना भी नहीं थी ।

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परम प्रतापी वैष्णव नरेश ध्रुव के छत्तीस हज़ार वर्षों के दीर्घ-कालव्यापी शासन में युद्ध का कहीं अवसर नहीं आया, लेकिन एक बार उनका छोटा भाई उत्तम हिंसक पशुओं के शिकार के व्यसन के कारण वन में गया । वहाँ एक बलवान यक्ष ने उसे मार डाला । ममतामयी माँ सुरूचि कुछ लोगों के साथ उसे ढूँढ़ने गयी, पर वहाँ आग लग जाने के कारण वह उसमे जलकर भस्म हो गयी ।

इस समाचार से आहत और कुपित होकर ध्रुव एक विशिष्ट रथ पर सवार होकर यक्षों के देश में जा पहुँचे । वहाँ यक्षों ने पृथ्वी के सम्राट का अभिनन्दन करना तो दूर रहा, अपने मायावी शस्त्रास्त्र सहित वे ध्रुव पर टूट पड़े । यद्यपि वे ध्रुव की बाण-वर्षा से व्याकुल हो गये, फिर भी वहाँ, भांति-भांति के विचित्र रूप वाले यक्षों की संख्या अत्यधिक थी ।

यक्षों ने कुपित होकर एक ही साथ ध्रुव पर इतने परिघ, वज्र, प्रास, त्रिशूल, फरसे, शक्ति, ऋष्टि, भुशुण्डी तथा चित्र-विचित्र तकनीकि वाले भीषण संहारक अस्त्रों और शस्त्रों की वर्षा की, कि वे शस्त्रों से ढक गये । यह दृश्य देखकर अन्तरिक्ष स्थित सिद्धगण व्याकुल हो गये । यक्षगण अपनी विजय का अनुमान कर हर्षोन्माद से गर्जन करने लगे ।

किंतु कुछ ही देर बाद ध्रुव जी उस शस्त्र समूह से इस प्रकार बाहर निकल आये जैसे कुहरे को भेदकर भगवान सूर्य प्रकट होते हैं । फिर ध्रुव ने यक्षों पर इतने तीक्ष्ण शरों की वर्षा की कि यक्षों के अंग-प्रत्यंग कट कर सर्वत्र बिखर गये । बचे-खुचे यक्ष प्राण लेकर भागे । रणभूमि यक्षों से रहित हो गयी, परंतु कुछ ही देर बाद यक्षों ने भयानक माया रची ।

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आकाश में काले बादल घिर आये । बिजली चमकने लगी । उनसे रक्त, कफ, पीब एवं विष्ठा-पूत्रादि की वर्षा होने लगी । ध्रुव को अपनी ओर अनेक हिंसक व्याघ्रादि जन्तु गर्जन करते दौड़कर आते हुए दीखे । उन असुरों की कँपाने वाली माया को देखकर ऋषियों ने वहाँ आकर महाराज ध्रुव को शुभाशीर्वाद प्रदान किया “उत्तानपादनन्दन ध्रुव ! शरणागत-भय-भंजन शाडंगपाणि भगवान् नारायण तुम्हारे शत्रुओं का संहार करें” ।

ऋषियों का वचन सुन कर ध्रुव जी ने आचमन कर, स्वयं श्री नारायण द्वारा निर्मित नारायणास्त्र को अपने धनुष पर चढ़ाकर छोड़ दिया । फिर तो यक्षों की सारी माया क्षणार्द्ध में ही नष्ट हो गयी और वे कट-कट कर गिरने लगे । यक्षों ने कुपित होकर पुनः अपने शस्त्र संभाले, पर ध्रुव के शरों से वे गाजर-मूली की भांति कटने लगे ।

असंख्य यक्षों को तड़प-तड़प कर मृत्यु के मुख में जाते देख कर ध्रुव के पितामह स्वायम्भुव मनु का हृदय द्रवित हो गया । उन्होंने तुरंत वहाँ आकर ध्रुव से कहा “बेटा ! बस करो । क्रोध नरक का द्वार है । तुम्हारी अपने भाई के प्रति प्रीति थी, यह ठीक है, पर एक यक्ष के कारण इतने निर्दोष यक्षों का संहार हमारे कुल की रीति नहीं है | यह उचित नहीं है” ।

स्वायम्भुव मनु ने अपने पौत्र ध्रुव को सीख दी “इस जड़ शरीर को ही आत्मा मान कर इसके लिये पशुओं की भांति प्राणियों की हिंसा करना-यह भगवत्सेवा-परायण साधुजनों का मार्ग नहीं है, सर्वात्मा श्री हरि तो अपने से बड़े पुरूषों के प्रति सहनशीलता, छोटों के प्रति दया, बराबर वालों के साथ मित्रता तथा समस्त जीवों के साथ समता का बर्ताव करने से ही प्रसन्न होते हैं” ।

“बेटा ! तुम्हारे भाई को मारने वाले ये यक्ष नही हैं, क्योंकि प्राणी के जन्म-मृत्यु का कारण तो परमात्मा है । तुम क्रोध को शांत करो, क्योंकि यह कल्याण मार्ग का शत्रु है | क्रोध के वशीभूत हुए पुरूष से सभी लोगों को बड़ा भय होता है, इसलिये जो बुद्धिमान पुरूष ऐसा चाहता है कि मुझसे किसी भी प्राणी को भय न हो और मुझे भी किसी से भय न हो, उसे क्रोध के वश में कभी नहीं होना चाहिये ।

बेटा ! यक्षों के इतने संहार से तुमसे कुबेर का अपराध बन गया है । तुम उन्हें यथाशीघ्र संतुष्ट कर लो । भगवान् तुम्हारा मंगल करें” । ध्रुव ने बड़ी श्रद्धा से अपने पितामह मनु के चरणों में प्रणाम किया । इसके बाद मनु जी महर्षियों सहित अपने लोक को चले गये । अपना क्रोध त्याग कर ध्रुव यक्षों के अधिपति कुबेर के समीप गये और उनके सम्मुख हाथ जोड़कर खड़े हो गये ।

“अपने पितामह के सदुपदेश से तुमने वैर भाव का त्याग कर दिया, इससे मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई”, कुबेर ने कहा । “सच तो यह है कि न तो यक्षों ने तुम्हारे भाई का मारा है और न तुमने यक्षों को । सम्पूर्ण जीवों के जन्म और मृत्यु के हेतु तो भगवान् काल हैं । भगवान् तुम्हारा कल्याण करें । तुम मुझसे कोई वर माँग लो” । “श्री हरि की अखण्ड स्मृति बनी रहे ! बस यही मेरी इच्छा है” ध्रुव ने विनयपूर्वक वर माँगा ।

श्री कुबेर ने ध्रुव को अखण्ड भगवत्स्मृति वर दिया और वहाँ से अन्तर्धान हो गये । ध्रुव जी अपनी राजधानी को लौट आये । ध्रुव जी अत्यन्त शीलवान, ब्राह्मण भक्त, दीन वत्सल एवं मर्यादा के रक्षक थे । वे सदा यज्ञादि पावन कर्म एवं भगवच्चिन्तन में लगे रहते थे । उन्होंने देखा, राजकार्य करते छत्तीस हजार वर्ष बीत गये और ये संसार की सारी वस्तुएँ काल के गाल में पड़ी हुई हैं, अतएव अब तो उन्हें अपने आराध्य के भजन में ही दिन व्यतीत करने चाहिये ।

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बस, मन में दृढ़ विचार आते ही उन्होंने अपने पुत्र उत्कल का राज तिलक किया और स्वयं बदरिकाश्रम को चले गये । वहाँ स्नानादि से निवृत्त होकर वे आसन पर बैठे और प्राणायाम द्वारा वायु को वश में कर लिया । फिर वे श्री हरि के ध्यान में तन्मय हो गये । ध्रुव जी प्रेमोन्मत्त होकर भगवान् वासुदेव का ध्यान करते जाते थे । उनका रोम-रोम पुलकित होता और नेत्रों से अश्रु झरते जाते ।

कुछ समय बाद उनका देहाभिमान सर्वथा गल गया । मैं कौन हूँ और कहाँ हूँ, इसकी याद भी उन्हें नहीं रही । अचानक, एक दिन, उन्होंने देखा, जैसे चन्द्रमा उनके सम्मुख उतर रहा हो । समीप आने पर उन्होंने देखा, एक सुंदर विमान था । उससे चारो तरफ प्रकाश छिटक रहा था । उससे दो अत्यन्त श्याम वर्ण चतुर्भुज पार्षद उतरे ।

वे सुन्दर, दिव्य और अप्राकृत तत्वों से बने हुए वस्त्र एवं आभूषणों से अलंकृत थे । उन्हें श्री विष्णु के पार्षद जान कर ध्रुव जी उठकर खड़े हो गये । उन्होंने श्री भगवान् का नाम लेते हुए उन्हें प्रणाम किया और हाथ जोड़े, सिर नीचा किये, श्री भगवान के नाम का जप एवं उनके चरणों का ध्यान करने लगे ।

भगवान् के पार्षद सुनन्द और नन्द ने मुस्कारते हुए ध्रुव के समीप आकर कहा “भक्तवर ध्रुव ! आपका मंगल हो । आपने पाँच वर्ष की आयु में ही तप करके भगवान वासुदेव का दर्शन प्राप्त कर लिया था । हम उन्हीं परम प्रभु के आदेश से आपको उस लोक में ले चलने के लिये आये हैं, जहाँ सप्तर्षि भी नहीं पहुँच सके । केवल नीचे से देखते रहते हैं । इस ब्रह्माण्ड के सम्पूर्ण नक्षत्र मण्डल उसकी परिक्रमा करते हैं । यह श्रेष्ठ विमान पुण्य श्लोक-शिखामणि प्रभु ने आपके लिये भेजा है । आप इस पर बैठ जायँ” ।

ध्रुव ने स्नान और संध्या-वन्दनादि कर्म किया । बदरिकाश्रम के मुनियों को प्रणाम कर उनका आशीर्वाद प्राप्त किया । इसके बाद उक्त श्रेष्ठ विमान की पूजा एवं उसकी परिक्रमा कर प्रभु के पार्षदों का पूजन किया । “मंत्र्यधाम के प्रत्येक प्राणी को मैं स्पर्श करता हूँ” । मूर्तिमान काल को सम्मुख देखकर ध्रुव ने कहा “तुम्हें मेरा स्पर्श प्राप्त हो” । और उसके मस्तक पर पैर रखा और विमान पर आरूढ़ होने लगे ।

“क्या मैं अपनी जन्मदायिनी जननी को छोड़कर एकाकी वैकुण्ठधाम जाऊँगा?” विमान पर चढ़ते ही ध्रुव विचार करने लगे । “वह देखिये” ! सुनन्द और नन्द ने ध्रुव के मन की बात जान कर उनका समाधान करने के लिये कहा । “आपकी परम पूजनीया माता दूसरे विमान पर आगे-आगे जा रही हैं” । ध्रुव ने देखा, दूसरा विमान विद्युत्कान्ति की भांति प्रकाश बिखेरता शून्य में चला जा रहा है ।

ध्रुव सर्वथा निश्चिन्त होकर श्री हरि का स्मरण करते हुए विमान में बैठ गये और वह परमधाम-अविचल धाम के लिये उड़ चला । आकाश में मंगल-संगीत गूँज उठा । यह दिव्य धाम (विष्णुधाम) सब ओर अपने ही प्रकाश से प्रकाशित है, इसी के प्रकाश से तीनों लोक प्रकाशित हैं । इसमें जीवों पर निर्दयता करने वाले पुरूष नहीं जा सकते । यहाँ तो उन्हीं की पहुँच होती है, जो दिन-रात प्राणियों के कल्याण के लिये शुभ कर्म ही करते रहते हैं |