काकभुशुंडी जी एवं कालियानाग के पूर्व जन्म की कथा


काकभुशुंडीएक बार विदेह नरेश बहुलाश्व की राजसभा में देवर्षि नारद पहुंचे | बहुत दिनों से उनके मन में उत्कंठा थी सो उसे उन्होंने नारद जी से पूछ लिया | उन्होंने पूछा कि “देवर्षि ! भगवान के चरण रज की महिमा अपार है | भगवान के राम आदि अवतारों में उनके संस्पर्श से अहिल्यादी का तत्काल ही उद्धार हुआ |

योगी जन भी उनके सानिध्य के लिए तरसते हैं, तो फिर मुझे यह बताइये कि कालिया नाग का ऐसा क्या पुण्य था जो भगवान घंटों उनके सिरों पर नृत्य करते रहे | कालिया नाग के मस्तक पर दिव्य मणियाँ सुशोभित थीं जिनके स्पर्श से भगवान के कमल सदृश्य चरणों के तलवे (रक्त से) और भी लाल हो गए होंगे, वे संपूर्ण कलाओं के आदि प्रवर्तक भगवान उनके मस्तक पर नृत्य करने लगे, ऐसा सौभाग्य उन्हें कैसे मिला” |

नारद जी ने कहा “बहुत प्राचीन बात है, पहले स्वायंभुव मनु के मन्वंतर में वेदशिरा नाम के एक मुनि विंध्याचल के एक भाग में तपस्या कर रहे थे | कुछ दिनों बाद उन्हीं के बगल में तप करने की इच्छा से अश्वशिरा मुनि भी आ गए |

इस पर वेदशिरा मुनि को अच्छा नहीं लगा, उन्होंने क्रोध में सांप जैसे फुंफकारते हुए अश्वशिरा मुनि से कहा “ब्राह्मण देव ! क्या सारे विश्व में आपको तपस्या के लिए कहीं और स्थान ही नहीं मिल रहा है जो आप यहाँ आ गए | आप यहां तप करें यह ठीक नहीं होगा क्योंकि इससे मेरा एकांत भंग होगा” | इस पर अश्वशिरा भी बिगड़ गए और कहने लगे “मुनिश्रेष्ठ ! यह सारी भूमि महा विष्णु भगवान नारायण माधव की है और इसीलिए इसका नाम भी माधवी है |

यह कोई आपके या मेरे पूर्वजों की भूमि नहीं है | इससे पूर्व के समय में, पता नहीं कितने ऋषियों ने यहां तप किया होगा | यह सब जानते हुए भी आप व्यर्थ ही सर्प की तरह फुफकार रहे हैं यहाँ | आपको तो सांप ही होकर रहना चाहिए | जाइए आप सर्प हो जाइए और भगवान विष्णु के वाहन गरुण से आपका हमेशा भय होगा” |

क्रोधावेश में वेदशिरा मुनि कांपने लगे | इसी क्रोधावेश में उन्होंने अश्वशिरा मुनि से कहा कि “तुम तो मानो इसी दुरभिप्राय से ही घुमते हुए यहाँ आए थे | छोटी-छोटी बातों पर इतना क्रोध तथा तपोनाश का यह उद्यम, तुम्हारा यह व्यवहार तो कौवे जैसा है | इसलिए इस धरा पर तुम शब्द कोलाहल करने में कौवे जैसे हो, अतः जाओ अब तुम कौवे जैसे ही हो जाओ” |

उच्च चेतनात्मक स्तर की आत्माएं होकर, क्रोधावेश में अपना-अपना ही नाश करने में तत्पर उन दोनों मुनियों की बुरी स्थिति देखकर दयालु भगवान वहाँ तुरंत प्रकट हो गए | अपने सामने परमेश्वर को देखकर वे दोनों मुनि उनके चरणों में गिर गए | उन्हें अपनी भूलों का भयंकर पछतावा हो रहा था | आँखों में ग्लानि के अश्रु थे |

परमेश्वर ने उन्हें समझाया और सांत्वना दी | उन्होंने वेदशिरा मुनि को अगले जन्म में कालिया नाग होकर स्वचरण लाभ का तथा अश्वशिरा मुनि को काकभुशुंडी होने का आश्वासन दिया | इसके बाद अश्वशिरा मुनि नील पर्वत पर साक्षात् योगीराज काकभुशंडि के रूप में जन्मे, जिन्होंने महात्मा गरुड़ को रामायण की कथा सुनाई थी | और वेदशिरा मुनि का उद्धार उन्होंने भगवान कृष्ण के अवतार रूप में किया था |

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