क्या वो प्रेतात्मा थी


क्या वो प्रेतात्मा थीमिस्टर मिगोलन स्वीडन में होलैंड के एम्बेसडर थे | एक अच्छे ओहदे वाली नौकरी और सुन्दर सुशील पत्नी के साथ फर्स्ट क्लास की सुविधाओं वाला जीवन जी रहे थे मिस्टर मिगोलन | किसी समय बुरे दिन देखने वाले मिगोलन ने अपने ही देश के एक धनपति से 25 हज़ार पौंड का उधार लिया था कभी |

रक़म बड़ी थी लेकिन मिगोलन उन लोगों में से थे जो गलतियाँ दोहराने में यकीन नहीं रखते थे | जीवन में स्थिरता आते ही उन्होंने हॉलैंड जाकर उस क़र्ज़ को चुका दिया और उस धनपति से उसकी रसीद ले ली |

मिगोलन ने यह बात अपनी पत्नी से बतायी भी और उन्हें वो जगह भी दिखाई जहाँ उन्होंने रसीद को संभाल कर रखा था लेकिन…ये बात कोई महत्वपूर्ण नहीं थी, कम-से-कम मिसेज मिगोलन के लिए तो उतना मायने नहीं ही रखती थी, अब कभी बुरे दिन देखें हो मैडम ने तब तो इसका महत्व समझें ! लेकिन ज़िन्दगी के फेरे कब किसके समझ में आयें हैं |

मैडम के बुरे दिन आने वाले थे और उनको इसका अंदाज़ा तक नहीं था | ज़िन्दगी के सुहावने पलों को मानो पंख लगा होता है, कब गुजर जाते हैं पता ही नहीं चलता | अचानक एक रोड एक्सीडेंट में मिगोलन चल बसे | चोट अधिक नहीं लगी थी (या शायद समझ में नहीं आई) लेकिन मिगोलन ठीक नहीं हो सके और चल बसे |

युवावस्था में ही इतना गहरा आघात लगने से बिलकुल बदहवास सी हो गयी थी मिसेज मिगोलन लेकिन परिजन और आत्मीयजन उनको ढाढस बंधाने में लगे हुए थे | समय हर घाव का मलहम होता है, बशर्ते की घहराई हुई विपदा गुजर चुकी हो लेकिन यहाँ तो समय ने अपना नया रंग-रूप दिखाना अभी शुरू किया था |

नई मुसीबत उस उद्योगपति का रूप लेकर आयी जिसने मिगोलन को उधार दिया था | औपचारिक शिष्टाचार की रस्म निभाने के बाद उसने मिगोलन की पत्नी से अपना पुराना धन (25 हज़ार पौंड ) माँगा जो उसने मिगोलन को उधार दिया था | मिसेज मिगोलन के पैरों तले ज़मीन खिसक गयी |

उसे पता था कि सामने वाला धोखाधड़ी पर उतर आया था क्योंकि मिगोलन ने उसे रसीद दिखाई थी पैसा लौटाने की, लेकिन वो रसीद..पता नहीं अब कहाँ होगी | उसे अपने ऊपर क्रोध आ रहा था, क्यों नहीं उसने उस समय ध्यान दिया जब मिगोलन उससे रसीद के बारे में बता रहा था |

मिगोलन की पत्नी ने परिजनों के सामने उस अजनबी को समझाया कि उसके पति ने वो सारा उधार चुका दिया था जिसकी वो बात कर रहा था | उसने उस रसीद के बारे में भी कहा जो मिगोलन ने कहीं संभाल कर रखा था |

इन सब के जवाब में उस अज़नबी ने केवल इतना कहा कि अगर ऐसा है तो वो रसीद मुझे दिखा दीजिये मैं चुपचाप चला जाऊँगा | समस्या ये थी कि उस महिला को बिलकुल भी अंदाज़ा नहीं था कि उसके पति ने वो रसीद कहाँ रखी थी या शायद वो रसीद खो चुकी थी…हाँ ऐसा ही होगा, वो रसीद शायद खो चुकी थी |

यूँ, अपने आप से बातें करते हुए, वो रात को बिस्तर पर जाने से पहले मन बना चुकी थी कि कल, कहीं न कहीं से वो पैसे का इन्तेजाम करेगी और पैसे उसके मुंह पर मारेगी और दुबारा कभी उसकी शक्ल नहीं देखेगी | उस रात वो बहुत रोई | उस अबला की बातों पर कोई यकीन नहीं कर रहा था, जब वह समझा रही थी | सभी उसे सहानुभूति की नज़रों से देखे जा रहे थे | उनकी नज़रे उसे अन्दर तक बेध रही थी |

रोते-रोते कब वो होश खो बैठी उसे पता नहीं चला | वातावरण एकदम शांत था | कमरे के अन्दर चलने वाली सामान्य हवायें भी स्तब्ध थी | मिसेज मिगोलन को लगा कि जैसे उनके बिस्तर के सामने कोई खड़ा है | ये दिन का समय था या रात का उन्हें इसका भी अंदाज़ा नहीं लग पा रह था | अचानक उन्होंने देखा कि जो अजनबी उनके सामने खड़ा था वो मिगोलन ही था |

वो उसे अपने पीछे आने का इशारा कर रहा था | मिसेज मिगोलन यंत्रवत उसके पीछे चल रही थी | थोड़ी दूर चलने पर मिगोलन ने कमरे में कहीं से वो रसीद निकाली और उसे अपनी पत्नी को दे दिया | एक झटके से मिसेज मिगोलन की नींद टूटी | उसका पहला ध्यान अपने दाहिने हाँथ पर गया जिसमे एक कागज़ का टुकड़ा फंसा था | ये वही रसीद थी जिसे वो खो चुकी मान रही थी |

हर्षातिरेक में उसे समझ नहीं आ रहा था कि अभी-अभी उसने जो कुछ देखा वह स्वप्न था या सत्य लेकिन उस पूरे घटनाक्रम के अंत समय का अनुभव एकदम जीवंत याद था जिसमे वह बहुत खुश थी | उसके शरीर में थरथराहट थी, ख़ुशी के मारे शरीर का एक-एक रोआ खड़ा था मानो कोई अदृश्य ऊर्जा उसमे समा गयी हो | लेकिन ये ख़ुशी उस कागज़ के टुकड़े के मिलने की नहीं थी बल्कि मृत्यु के बाद उस शाश्वत जीवन के अखंड सत्ता के अनुभव की थी जिसके बारे उसने केवल सुना था |

प्रस्तुत घटनाक्रम लाइफ आफ्टर डेथ पर शोध करने वालों के लिए एक रिसर्च मटेरियल हो सकता है लेकिन हम भारतीयों के लिए ये हमारे जीवन का अभिन्न हिस्सा है क्योंकि हमें पता है कि मृत्यु अंत नहीं है बल्कि ये तो शुरुआत है…एक नई शुरुआत |

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