उत्तर प्रदेश में परकाया प्रवेश की एक अद्भुत घटना


उत्तर प्रदेश में परकाया प्रवेश की एक अद्भुत घटना
उत्तर प्रदेश में परकाया प्रवेश की एक अद्भुत घटना

परकाया प्रवेश हमेशा यौगिक क्रियाओं द्वारा ही संपन्न नहीं होती बल्कि कभी-कभी कुछ अद्भुत घटनाओं के प्रसंग में भी परकाया प्रवेश होते देखा गया है | उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले में घटी यह घटना सन 1958 की है जिसे वहां के स्थानीय समाचार पत्रों के अलावा नवभारत टाइम्स आदि अखबारों ने प्रकाशित किया |

घटना के अनुसार आज से लगभग सत्तर वर्ष पहले, जिला मुजफ्फरनगर के गांव रसूलपुर जाटान में चौधरी श्री गिरधारी सिंह जाट, जिनके पिता श्री राजाराम सिंह जाट थे, को एक पुत्र पैदा हुआ, जिस का शुभ नाम उन्होंने जसवीर रखा | चौधरी साहब बड़े स्नेह से उसका लालन-पालन कर रहे थे, उनके ज़िगर का टुकड़ा था वह | लेकिन होनी को कुछ और ही मंज़ूर था |

जिस समय उनका वह लड़का जसवीर लगभग साढ़े तीन वर्ष का था तो अकस्मात बीमार पड़ गया | उसको चेचक निकल आई थी | बहुत इलाज कराया गया पर कुछ लाभ नहीं हुआ | अंत में लड़का चेचक की बीमारी में मृत्यु को प्राप्त हो गया |

उस दिन रात अधिक हो जाने से सभी लोगों ने यह निश्चय किया कि प्रातः काल ही इसे अंतिम संस्कार के लिए ले जाना उचित होगा | जसवीर के मृतक शरीर को ढँक कर छोड़ दिया गया | जिला मुजफ्फरनगर के ही एक दूसरे गांव बहेड़ी के निकट रोहना मिल में चौधरी शंकर लाल का एक लड़का शोभाराम त्यागी था | जिसकी आयु थी उस वक़्त लगभग 23-24 वर्ष |

शोभाराम त्यागी का विवाह हो चुका था | उसकी दो लडकियाँ और एक लड़का था | उसी रात एक बरात निकट के एक गाँव से जिला मुजफ्फरनगर की ओर जा रही थी | उस बारात में शोभाराम त्यागी भी था | शोभाराम अपनी खुद की घोड़ागाड़ी हांक कर लिए जा रहा था |

अचानक शोभाराम त्यागी अपनी घोड़ागाड़ी से गिरा और पहिया उसकी गर्दन पर उतर गयी | गंभीर रूप से घायल होने की वजह से उसके नाक, मुँह से रक्त बहने लगा और पूरा शरीर लहूलुहान हो गया | वहां जितने लोग उसकी तरफ़ के थे सबको बड़ी चिंता हो गयी, शोभाराम अपनी चेतना खो बैठा था | सभी मिल कर उसे बेहोशी की हालत में ही घोड़ागाड़ी से रोहना मिल के अस्पताल ले गए |

उसी रात को लगभग ११ बजे के आस-पास शोभाराम का समय पूरा हो गया और उसकी ईहलीला समाप्त हो गयी | सबने मिल कर वही पर उसका अंतिम संस्कार कर दिया | शोभाराम के मरने की घटना ठीक उसी दिन, उसी समय की है जिस दिन रसूल पुर जाटान गांव में श्री गिरधारी सिंह जाट का लड़का जसवीर चेचक के बिमारी से रात्रि को मर गया था |

उधर अगले दिन सुबह जब सब लोग जसवीर के शव को उठा कर अंतिम संस्कार के लिए ले जाने लगे तब सबको देख कर बहुत आश्चर्य और प्रसन्नता हुई की जसवीर के मृत पड़े हुए शरीर में आकस्मात जीवन का संचार हो गया | वह हिल-ढुल रहा था और थोड़ी ही देर में वह अपने पूरे होश में आ चुका था |

घर लौटने के बाद कुछ ही दिनों में वह धीरे-धीरे बिल्कुल स्वस्थ हो गया | उस समय तो सभी ने यही समझा कि जसवीर जिंदा हो गया है | जसवीर के शरीर से गया हुआ ‘जीव’ पुनः लौट आया, पर वास्तव में ऐसा कुछ हुआ नहीं था |

बाद में सब को यह जानकर बड़ा भारी आश्चर्य हुआ की जसवीर का मृत शरीर तो वास्तव में जिंदा हो गया है पर उसमें जसवीर की आत्मा नहीं है | बात दरअसल यह हुई थी कि ज़िन्दा होने वाला शरीर तो जसवीर का ही था लेकिन आत्मा उसमे शोभाराम त्यागी की घुस बैठी थी |

बालक जसवीर के मृत शरीर में शोभाराम त्यागी का आत्मा घुस जाने पर उसको अपने पिछले जन्म की सारी बातें याद रही | अपने छोटे बालक जसवीर के शरीर में एक युवा पुरुष की आत्मा को इस प्रकार से घुसा हुआ देखकर गाँव तथा परिवार के लोगों को बड़ा दुःख हो रहा था |

उधर अपने आप को एक छोटे बालक के शरीर में प्रविष्ट हुआ देखकर शोभाराम अत्यंत दुखी हो रहा था | उसे अपने घर-परिवार की बहुत याद आ रही थी | उसने उस घर में खाना खाने से इंकार कर दिया | अब तो (जसवीर के) घर वालों को बड़ी चिंता हुई | उन्होंने यह सोच कर कि यदि इसने कुछ नहीं खाया पिया तो भूखा प्यासा मर जाएगा, उसको समझा बुझा कर उसके खाने पीने का अलग से पवित्रता पूर्वक प्रबंध कर दिया |

वर्षों तक उसका खाना-पीना अलग रहा | उसके खान-पान में पवित्रता का बड़ा ही ध्यान रखा जाता | इन सबके बाद भी वह बड़ा ही उदास सा रहा करता था | इसी तरह से चार वर्ष बीत गए | एक दिन जसवीर की मां राजकली उसे अपने साथ लेकर अपने मायके चली |

रास्ते में वह स्थान पढ़ता था जहां शोभाराम की अपनी घोड़ागाड़ी से गिरकर मृत्यु हुई थी | उस जगह से दो रास्ते जाते थे | एक तो शोभाराम के गांव बहेड़ी को जाता था और दूसरा रास्ता, उसके मायके, ग्राम परई को जाता था |

जसवीर लड़के ने अपनी मां से कहा “मां ! मैं जब शोभाराम था, तब मैं यहीं पर अपनी घोड़ागाड़ी से गिरा था और हमारे घर का रास्ता उधर (बहेड़ी ग्राम की ओर संकेत करके कहा) की तरफ है” | लेकिन मां बच्चे की बात को यूंही झूठी समझकर उसका हाथ पकड़ कर अपने मायके परई गाँव की तरफ चल दी |

इसी तरह से दिन बीतते गए | सन 1958 का मार्च का महीना चल रहा था | एक दिन केन कोऑपरेटिव सोसाइटी का एक कामदार, जगन्नाथ प्रसाद, जो की ग्राम बहेड़ी का निवासी था, अपने किसी काम से, उसी गाँव रसूलपुर जाटान में गया | वहीं पर वह गिरधारी सिंह जाट का लड़का जसवीर अपने हमउम्र बच्चों के साथ खेल रहा था |

अपने सामने से गुजरते हुए उस बहेड़ी निवासी कामदार जगन्नाथ को जब जसवीर ने देखा तो उसे तुरंत पहचान लिया | उसने जगन्नाथ को जोर से आवाज देकर पुकारा “ओ जगन्नाथ !” | जगन्नाथ ने चौकन्ना हो कर इधर देखा कि मुझे यहां कौन जानता है, पर उसे वहां अपना कोई परिचित व्यक्ति दिखाई नहीं दिया | फिर वह वहाँ से आगे चल दिया |

लड़के जस्सी ने फिर से पुकारा “अरे ओ जगन्नाथ! यहां सुन, मैं तुझे बुला रहा हूं” | जगन्नाथ यह सुनकर उसके पास आया तो जसवीर ने जगन्नाथ से राम राम की |

उसने जगन्नाथ से कहा “जगन्नाथ! तू मुझे मेरे गांव बहेड़ी ले चल” जगन्नाथ ने उसे पहले कभी देखा नहीं था और ना ही उसे जानता था, इसलिए जगन्नाथ ने उससे पूछा “तू है कौन और किसका लड़का है ?” इस पर जसवीर ने जगन्नाथ को अपनी प्रारंभ से लेकर अब तक की सारी घटना विस्तार से सुना दी | जगन्नाथ ने आश्चर्यचकित होकर पूछा “लेकिन तू, फिर यहां पर कैसे आ गया”?

तो उत्तर में जसवीर ने कहा “गिर कर मरने के बाद मुझे एक सुरंग जैसी खाली जगह मिली जहाँ से प्रकाश निकल रहा था, मै उसी में प्रवेश कर गया…मुझे नहीं पता था मेरे साथ ऐसा कुछ होगा” | उस समय जगन्नाथ ने उसे बहेड़ी ले जाने से इनकार कर दिया | लेकिन जब जगन्नाथ अपने गांव बहेड़ी गया तो उसने पूरी की पूरी घटना गांव वालों को सुनाई |

उस गांव में जिसने भी ऐसा सुना, वह आश्चर्यचकित रह गया | लड़के (शोभाराम) के ताऊ चाचा आदि सभी घरवाले गांव रसूलपुर जाटान गए | वहाँ लड़के जसवीर ने तुरंत सब को पहचान लिया और सब को नाम ले लेकर राम-राम किया | लड़के (शोभाराम) के संबंधियों ने उससे अनेक प्रश्न किए | उसने बड़े इत्मिनान से सबका संतोषजनक उत्तर दिया |

बहेड़ी से आने वाले उन ग्रामीणों में से एक व्यक्ति ने जो कि उस रात उसी घोड़ागाड़ी में सवार था, जिसमे से गिरकर शोभाराम की मृत्यु हुई थी, बालक जसवीर से पूछा “मेरा नाम क्या है?” जसवीर ने कहा “मैं तुम्हारा नाम तो भूल गया हूं, लेकिन मुझे इतना अवश्य याद है कि जिस समय मै गाड़ी से गिरा था तो तुमने ही मुझे उस समय अपनी गोद में लिटा रखा था” |

यह सुनकर वह ग्रामीण आश्चर्यचकित हो गया | उसने सबके सामने यह स्वीकार किया कि वास्तव में मैंने ही इसे घोड़ागाड़ी से गिरने पर अपनी गोद में लिटा रखा था | वह जसवीर लड़के को लेकर बहेड़ी ग्राम में गए तो ‘रोहाना मिल्स’ स्टेशन पर जाकर जसवीर से आगे आगे चलने को कहा गया | लड़का सीधा अपने घर पर आ गया |

उसने सबको यथोचित नाम ले लेकर पुकारा और सबको राम-राम किया | उसने उस समय यह भी हठ किया कि “अब से मै अपने घर यानी यहीं पर रहूंगा | मैं वापस नहीं जाऊंगा” | उसने वहां सब को पहचाना और सारी बातें ठीक-ठीक बतायीं |

लेकिन लड़के के हठ पर दोनों परिवारों में यह समझौता हुआ कि जसवीर थोड़े-थोड़े समय के लिए दोनों परिवारों में रहेगा | तब से जसवीर दोनों जगह रहता था, कभी अपने पहले जन्म के घर अपने बाल बच्चों में बहेड़ी चला जाता, तो कभी रसूलपुर जाटान गांव में आ जाता |

ज़िन्दगी के खेल भी बड़े निराले होते हैं | समझ में ही नहीं आता कि हम इसे खेल रहे हैं या ज़िन्दगी हमारे साथ खेल रही है | लेकिन इस खेल को ‘खेल’ समझ कर ही खेलने वाला कलाकार है |





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