शिवपुराण, पद्मपुराण, ब्रह्मवैवर्त पुराण, लिंगपुराण, स्कन्दपुराण व अन्य पुराणों में उपलब्ध भगवान् गणेश के प्राकट्य की कहानियां

शिवपुराण, पद्मपुराण, ब्रह्मवैवर्त पुराण, लिंगपुराण, स्कन्दपुराण व अन्य पुराणों में उपलब्ध भगवान् गणेश के प्राकट्य की कहानियांब्रह्माण्ड से परे क्षीरसागर (Milky way) में शेष शय्या पर लेटे हुए श्रीनारायण और उनके चरण पखारती देवी लक्ष्मी को छोड़कर सभी देवता प्रत्येक कल्प की समाप्ति पर नारायण में ही समाहित हो जाते हैं और नये कल्प के संधिकाल मे पुनः प्रकट होकर सृष्टि की रचना, पालन तथा संहार में अपने-अपने धर्म का निर्वहन करते हैं ।

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इसी सिद्धान्त के अनुसार श्रीगणेश जी भी प्रत्येक कल्प में प्रकट होकर लीला करते हैं, यह रहस्य शिवपुराण में स्वयं ब्रह्मा जी ने नारद जी को बताया है । ब्रह्मवैवर्तपुराण में भी आया है कि एक बार श्रीकृष्ण ने वृद्ध ब्राह्मण के रूप में माता पार्वती के समक्ष उपस्थित होकर उनकी स्तुति की और उन्हें बताया कि-हे देवी ! श्रीकृष्ण स्वयं प्रत्येक कल्प में आपके पुत्ररूप मे अवतीर्ण होते आये हैं ।

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कुछ पौराणिक ग्रंथों के अनुसार श्रीगणेश जी आदिदेवता हैं । उनकी आदिकाल से उपासना एवं महिमा के कई प्रमाण वेदों, पुराणों तथा अन्य ग्रन्थों में उपलब्ध हैं, जैसे यह वैदिक ग्रन्थ की उक्ति है कि ‘हे, गणों के बीच रहने वाले सर्वश्रेष्ठ गणपति ! हम आपका आवाहन करते हैं । हे प्रियों के बीच रहने वाले प्रियपति ! हम आपका आवाहन करते हैं ।

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हे निधियों के बीच सर्वश्रेष्ठ निधिपति, हम आपका आवाहन करते हैं । हे जगत् को बसाने वाले ! आप हमारे हों । आप समस्त जगत् को गर्भ में धारण करते हैं, पैदा (प्रकट) करते हैं । आपकी इस क्षमता को हम भली प्रकार जानें’ ।

इसी तरह का वर्णन ऋग्वेद (2।23।1)-में भी मिलता है, जिसमें श्रीगणेश का आवाहन किया गया है । गणपत्यथर्वशीर्षोपनिषद् (6)-में वर्णित है कि श्रीगणेश सर्वदेवमय हैं । यथा-अर्थात् तुम ब्रह्मा हो, तुम विष्णु हो, तुम रूद्र हो, तुम इन्द्र हो, तुम अग्नि हो, तुम वायु हो, तुम सूर्य हो, तुम चन्द्रमा हो, सगुण ब्रह्म हो, तुम निर्गुण त्रिपाद भूः, भुवः स्वः एवं प्रणव हो ।

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मंगलदाता उमा-महेशसुत, कुमार कार्तिकेय के भ्राता, देवी सिद्धि एवं बुद्धि के स्वामी, क्षेम और लाभ के पिता हो’ | बुद्धिविधाता श्रीगणेश की प्राकट्य कथाएँ तथा लीलाएँ भी अदभुत एवं अलौकिक हैं । विभिन्न कल्पों में उनका प्राकट्य एक अपूर्व विलक्षणता लिये हुए है ।

विभिन्नता लिये हुए इन कथाओं में संदेह नहीं करनी चाहिये बल्कि कल्प भेद से उनके रहस्यों को समझने का प्रयास करना चाहिए | सदा यह भावना रहे कि श्रीगणेश, श्रीकृष्ण, श्रीमहादेव आदि एक ही परम तत्त्व के, विभिन्न लीलाओं के अनुसार साकार रूप हैं । यहाँ विभिन्न पुराणों में उपलब्ध भगवान् श्रीगणेश की प्राकट्यकथाएँ निम्नानुसार संक्षेप में वर्णित की जा रही हैं-

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पद्मपुराण में वर्णित कथा के अनुसार

इस पुराण के सृष्टिखण्ड में श्रीगणेश को देवी पार्वती एवं त्रैलोक्यतारिणी भगवती गंगा का पुत्र बताया गया है । इसमें वर्णित कथा के अनुसार शिव-पार्वती विवाह के बाद एक दिन देवी पार्वती गंगा जी के निकट तट पर बैठकर स्नानपूर्व अपनी सखियों से सुगन्धित औषधियों से निर्मित उबटन लगवा रही थीं ।

बैठे-बैठे देवी ने अपने शरीर से पृथ्वी पर गिरे अनुलेप को एकत्रकर एक पुरूष-आकृति बनाकर उसे हस्तिमुख (हांथी का मुखाकृति) प्रदान कर दिया । इस विचित्र गजमुख आकृति को देवी पार्वती ने गंगा जी में डाल दिया । पुण्यसलिला गंगा जी ने भी लीलावाश उसे सजीव (प्राणवान) बनाकर एक स्वस्थ सुन्दर बालक का रूप दे दिया ।

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यह देख स्नेहवश माता पार्वती ने उसे जल से निकाल कर ‘पुत्र’ सम्बोधित किया एवं अपनी गोद में लेकर वे उसे पुत्रवत् दुलार करने लगीं । इसी समय भगवती गंगा जी भी, जो पार्वती जी की सहेली हैं, प्रकट हुईं और वे भी उस अपूर्व सुन्दर बालक को ‘पुत्र’ कहकर दुलारने लगी । इस विलक्षण दृश्य को निहारने आकाश में देवसमूह एकत्र हो गया ।

स्वयं लोक पितामह ब्रह्मा जी ने बालक को आशीर्वाद प्रदान कर गणों के अधिपति घोषित कर दिया । देवगण भी वहाँ उपस्थित हो देवी पार्वती और सुरसरि के पुत्र की वंदना करने लगे और ‘श्रीगणेश’ तथा ‘गांगेय’ नाम से बालक को विभूषित कर आशिष् प्रदान कर वे देवलोक को प्रस्थान कर गये । इस प्रकार पद्यपुराण में वर्णित है कि स्वयं माता पार्वती ने गणेश जी को गजमुख बनाय एवं पुण्यसलिला गंगा ने उन्हें सजीव किया अर्थात जीवन प्रदान किया ।

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शिवपुराण में वर्णित कथा के अनुसार

शिवपुराण में वर्णित कथा का सार इस प्रकार है | एक बार भगवती पार्वती जी ने शिवजी के गण नन्दी के द्वारा उनकी आज्ञा-पालन में त्रुटि से खिन्न होकर अपनी प्रिय सहेलियों जया और विजया के सुझाव पर स्वयं के मंगलमय पावनतम शरीर के उबटन से एक चेतन पुरूष (बालक रूप में) निर्मित कर उसे सम्पूर्ण शुभ गुणों से संयुक्त कर दिया |

इस प्रकार से वह बालक सभी शुभ लक्षणों से संयुक्त था । उसके अंग-प्रत्यंग दोषरहित एवं सुन्दर थे । उसका शरीर विशाल, परम शोभायमान एवं महान् बल-पराक्रम से सम्पन्न था ।

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ऐसी सुन्दर रचना कर देवी ने बालक को सुन्दर वस्त्रों एवं अलंकारों से सुशोभित कर आशीर्वाद दिया एवं कहा-तुम मेरे परम प्रिय पुत्र हो, तुम्हें केवल मेरे ही आदेश का पालन करना है, अन्य किसी का नहीं । तुम मेरे द्वारपाल होकर मेरी आज्ञा के बिना किसी को भीतर महल में प्रवेश मत करने देना । फिर प्यार-दुलारकर माता पार्वती, अपने पुत्र को एक छड़ी देकर सखियों के साथ महल में स्नानार्थ चली गयीं ।

उसी समय त्रिलोकीनाथ त्रिकालदर्शी शिव वहाँ उपस्थित हुए और भवन के अन्दर जाने लगे । बालक ने उन्हें विनयपूर्वक रोका, पहले तो महादेव चौंके पर फिर महादेव भी हठ कर गये । परिणामतः शक्तिपुत्र के साथ भयंकर युद्ध हुआ पिनाकधारी का | लेकिन इस युद्ध में भगवान शिव के धनुष पिनाक ने भी उन्हें विजय नहीं दिलाई |

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इन सब से क्रुद्ध हो कर भगवान शिव ने अपने तीक्ष्णतम शस्त्र शूल के प्रहार से उस नन्हें बालक का शीश भंग (सर धड़ से अलग कर दिया) कर दिया । जैसे ही यह समाचार भगवती पार्वती को मिला वह क्रोध से फुफकारते हुए गरजती हुई बाहर की ओर भागी । सभी लोकों में हाहाकार मच गया । पूरे ब्रह्माण्ड में किसी अनहोनी की आशंका से घबराए हुए समस्त देवताओं द्वारा परमेश्वरी शिवप्रिया गिरिजा की स्तुति की जाने लगी ।

अत्यंत क्रुद्ध भगवती ने केवल अपने पुत्र के जीवित होने पर विनाश रोकने की बात कही । भगवान् शिव, स्थिति की गम्भीरता समझ चुके थे | उन्होंने तुरंत अपने गणों को आज्ञा दी | पशुपतिनाथ शिव की आज्ञा से एक दाँत वाले गजबालक का शीश लाकर पार्वती नन्दन के मृत शरीर से जोड़ दिया गया एवं उसे प्राणवान् बनाया गया ।

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श्रीनारायण एवं शिव सहित सभी देवताओं ने गजमुख बालक का पूजन-अर्चन कर उसे आशीर्वाद प्रदान किया । इन सब उद्योगों से जगदीश्वरी प्रसन्न हुईं और अपने बालक को गोद में लेकर दुलार करने लगीं । श्रीनारायण ने बालक को गणेश, गजानन, गणपति, एकदन्त-जैसे नामों से सम्बोधित कर अग्रपूजा का आशीर्वाद दिया ।

देवाधिदेव महादेव ने बालक को पुत्रवत् स्वीकार कर अपने गणों का अध्यक्ष नियुक्त कर कहा-हे गणेश्वर! तू भाद्रपद मास के शुक्लपक्ष की चतुर्थी शुभ तिथि को शुभ चन्द्रोदय होने पर उत्पन्न हुआ है । जिस समय गिरिजा के सुन्दर चित्त से तेरा रूप प्रकट हुआ, उस समय रात्रि का प्रथम पहर बीत रहा था, इसलिये उसी तिथि में तेरा उत्तम व्रत करना चाहिये ।

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यह व्रत सर्वसिद्धिप्रद होगा । सभी वर्णों द्वारा, विशेषकर स्त्रियों को, यह चतुर्थी व्रत अवश्य करना चाहिये । इससे सभी वांछित अभिलाषाएँ पूर्ण होंगी । यह आशिष् भगवान् शिव ने श्रीगणेश को देकर पुत्रवत दुलार किया । यहाँ वर्णित यह कथा शिवपुराण के कुमार खण्ड में वर्णित कथा का सारांशमात्र है ।

ब्रह्मवैवर्तपुराण में वर्णित प्राकट्यकथा के अनुसार

ब्रह्मवैवर्त पुराण में गणपति खण्ड के तेरह अध्यायों में श्रीगणेश जी की मंगलमयी प्राकट्यकथा वर्णित है । संक्षेप में कथासार इस प्रकार है | एक समय की बात है देवी पार्वती ने अपने पति सदाशिव से एक उत्तम पुत्र पाने की अभिलाषा व्यक्त की । देवाधिदेव महादेव ने देवी को पुण्यकव्रत का अनुष्ठान करने का परामर्श दिया एवं कहा कि इस पुण्यकव्रत के प्रभाव से तुम्हें स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण पुत्ररूप में प्राप्त होंगे ।

देवी पार्वती को व्रत का विधि-विधान बताकर, अपने गणों को सम्पूर्ण व्यवस्था का भार सौंप सदाशिव ने समस्त देवताओं, ऋषि-मुनियों आदि को कैलाश पर्वत पर आमन्त्रित कर दिया । देवी पार्वती ने, पूरे मनोयोग से इस परमोत्तम व्रत के सम्पूर्ण कर्तव्यों को वर्षपर्यन्त प्रतिदिन विधि-विधान से पूर्णकर व्रत का उद्यापन किया ।

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इसके फलस्वरूप गोलोकनाथ साक्षात् परब्रह्म श्रीकृष्ण उन्हें सर्वांग-मनोहर शिशु रूप में प्राप्त हुए । कैलाश पर्वत पर इस अवसर पर विलक्षण उत्सव मनाया गया, जिसमें श्रीनारायण, श्रीब्रह्मा आदि समस्त देवता सपरिवार सम्मिलित हुए एवं उन्होंने शिशु को अनेक उपहार तथा शुभ आशिष् प्रदान किये । इस अवसर पर शनिदेव भी वहाँ उपस्थित थे, पर उन्होंने न तो शिशु को निहारा, न अपना आशिष् दिया ।

भगवती पार्वती के पूछने पर उन्होंने पत्नी द्वारा शाप दिये जाने का वृत्तान्त बताकर कहा-देवि ! मेरे देखने मात्र से इस सुन्दर शिशु का अनिष्ट हो सकता है । माता पार्वती ने स्नहेपूर्वक शनिदेव को आश्वस्त करते हुए कहा कि कर्मभोगफल तो ईश्वरेच्छा के अधीन होते हैं, अतः आप निःसंकोच मेरे पुत्र को देखिये एवं आशिष् प्रदान करिए |

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परिणामतः शनि की दृष्टिमात्र पड़ते ही शिशु का मस्तक धड़ से पृथक् होकर आकाश में विलीन हो गया और गोलोक में जाकर अपने अभीष्ट परात्पर श्रीकृष्ण में प्रविष्ट हो गया । यह देख कर स्तब्ध पार्वती घोर विलाप करने लगीं । सम्पूर्ण कैलाश मे हाहाकार मच गया ।

तभी वहाँ उपस्थित श्रीविष्णु गरूड़ पर सवार हो पुष्पभद्रा नदी के तट से उत्तर की ओर सिर किये एक गज का मस्तक ले आये और पार्वतीसुत के धड़ पर सुन्दरता से जोड़कर उसे प्राणवान् कर दिया । तदुपरान्त अचेत माता पार्वती को उनका प्राणवान शिशु उनकी गोद में दे दिया एवं कहा-है देवि ! महर्षि कश्यप के शाप से शिवपुत्र का शीश-भंग होना एक प्रारब्ध था, इसमें शनिदेव का कोई दोष नहीं है ।

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कैलाश पर्वत में पुनः उल्लास का वातावरण बन गया । भगवान विष्णु ने बालक को विघ्नेश, गणेश, हेरम्ब, गजानन आदि नामों की उपाधियाँ दी ।
वहाँ उपस्थित त्रिदेवों सहित सभी देवी-देवताओं, ऋषि-मुनियों आदि ने गजानन का एक 32 अक्षरों के मंत्र से पूजन किया | यह मंत्र सम्पूर्ण मनोकामनाओं को पूर्णकर अन्त में मोक्ष प्रदान करने वाला है ।

इसके बाद श्रीविष्णु जी ने ‘गणेशस्तोत्रम्’ द्वारा श्रीगजानन गणेश की सुन्दर स्तुति की, जिसका कुछ अंश यहाँ प्रस्तुत है-अर्थात् आप सभी देवों में श्रेष्ठ, सिद्धों और योगियों के गुरू, सर्वस्वरूप, सर्वेश्वर, ज्ञानराशिस्वरूप, अव्यक्त, अविनाशी, नित्य, सत्य, आत्मस्वरूप, वायु के समान अत्यन्त निर्लेप, क्षतरहित और सबके साक्षी हैं ।

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आप संसार सागर से पार होने के लिये परम दुर्लभ मायारूपी नौका के कर्णधारस्वरूप और भक्तों पर अनुग्रह करने वाले हैं । आप श्रेष्ठ, वरणीय, वरदाता एवं वरदानियों के भी ईश्वर हैं । आप सिद्ध, सिद्धिस्वरूप, सिद्धिदाता एवं सिद्धि के साधन हैं ।

इसके उपरान्त श्रीविष्णु ने देवी पार्वती को बताया कि आज आपके इस पुत्र की हम त्रिदेवों ने प्रथम पूजा की है । अतः आज से यह प्रथम पूजा का अधिकारी रहेगा । आज भाद्रपद मास के शुक्लपक्ष की चतुर्थी है, आज जो भी पूरे मनोयोग से आपके पुत्र की पूजा-अर्चना करेगा उसके समस्त संकट एवं कष्टों का निवारण हो जायगा और उसे समस्त कार्यकलापों में सिद्धि प्राप्त होगी ।

लिंगपुराण में वर्णित प्राकट्यकथा के अनुसार

एक बार, एक समय, आशुतोष भगवान् शिव एवं श्रीब्रह्मा जी से वरदान प्राप्तकर राक्षस हमेशा देवलोक पर चढ़ाई कर देवताओं को वहाँ से खदेड़ दिया करते थे, इसी से व्यथित देवगण देवर्षि नारद के साथ कैलाश पर्वत पर भगवान् शंकर के पास गये और उनकी स्तुति कर गुणगान करने लगे । अन्तर्यामी कैलाशपति ने प्रसन्न होकर देवताओं से इच्छित वर माँगने को कहा ।

कातर भाव से देवताओं ने राक्षसों से रक्षा की याचना की और कहा-‘प्रभो! असुरों के कार्य में जैसे विघ्न पड़े, वैसा आप करें’ । पार्वतीवल्लभ ने ‘तथास्तु’ कहकर देवताओं को सम्मान सहित विदा किया ।

इसके बाद, अपने ही एक अंश रूप में भगवान् शिव, एक दिन परम तेजस्वी, सुन्दर शरीर वाले गजमुख शिशुरूप में एक हाथ में त्रिशूल तथा दूसरे हाँथ में पाश लेकर भगवती पार्वती के सम्मुख प्रकट हुए और उन्हें माता कहकर दण्डवत् प्रणाम किया । भगवती माता पार्वती ने आश्चयपूर्ण भाव के साथ उस तेजस्वी मनोहर बालक को अपनी गोद में उठा लिया ।

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उसी समय वहाँ भगवान् शिव ने उपस्थित होकर प्रसन्नमुद्रा में देवी पार्वती से कहा-यह तुम्हारा पुत्र है, जो देवताओं की रक्षा हेतु प्रकट हुआ है । भगवती प्रसन्न हो बालक का श्रृंगार करने लगीं और पुत्रवत् दुलार करने लगीं । देवगण प्रसन्न हो आकाश में नृत्य-गान के साथ पुष्पवर्षा करने लगे ।

तब कल्याणकारी शिव ने अपने पुत्र से कहा-हे मेरे पुत्र ! तुम्हारा यह अवतार राक्षसों का नाश करने तथा देवता, ब्राह्मण तथा साधुपुरुषों पर उपकार करने के निमित्त हुआ है । ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्रों द्वारा भी तुम सभी कार्यों की सिद्धि के लिये भक्ष्य-भोज्य एवं शुभ पदार्थों से पूजित होओगे ।

कुछ वास्तविकता ऐन्शिएंट एलियन्स थ्योरी की

तीनों लोकों में जो चन्दन, पुष्प, धूप-दीप आदि के द्वारा तुम्हारी पूजा किये बिना कुछ पाने की चेष्टा करेंगे-चाहे वे देवता हों अथवा अन्य, उन्हें कुछ भी प्राप्त नहीं होगा । इस प्रकार श्रीगणेश, गजानन आदि नामों से श्रृंगारित कर शिवजी ने अपने अवतार हस्तिमुख को प्रथम पूज्य होने का आशीर्वाद दिया । यह लिंगपुराण में वर्णित कथा का सार है ।

स्कन्दपुराण में वर्णित कथा के अनुसार

स्कन्दपुराण में वर्णित भगवान् गणेश की प्राकट्य की कथा शिवपुराण में वर्णित कथा के समान ही है । केवल भगवान् शिव जी द्वारा पार्वती नन्दन का शीश भंग किये जाने के बाद वाले प्रसंग में अन्तर है । इस कथा में शिवजी द्वारा द्वाररक्षक शिशु का मस्तक काटा ही गया था उन्हें अपने कि गणों से गजासुर नामक राक्षस के कैलाश पर्वत पर आक्रमण की सूचना प्राप्त होते ही वे उससे युद्ध करने जा पहुँचे ।

क्या वो प्रेतात्मा थी

शिव ने गजासुर को भी शीशविहीन कर दिया । इसी समय नंदी ने देवी पार्वती द्वारा उनके पुत्र के धड़ को लेकर विलाप करने का समाचार शिवजी को बताया । उन्होंने गजासुर का कटा शीश अपने हाथों में उठा लिया और उसे लाकर बालक के धड़ से जोड़कर उसे प्राणवान् कर दिया तथा बालक को पुत्रवत् स्वीकार कर ‘गजानन’ नामकरण किया एवं देवी पार्वती की प्रसन्नता हतु स्वयं गजानन की पूजा कर अग्रपूजा का वर प्रदान किया ।

इस पुराण में भी श्रीगणेश का प्राकट्य भाद्रपदमास शुक्लपक्ष की चतुर्थी होना ही बताया गया है । इस दिन की गयी इनकी आराधना को बहुत महत्त्वपूर्ण बताया गया है । उपरोक्त पुराणों के अतिरिक्त निम्न पुराणों में भी श्रीगणेश की प्राकट्यकथाएँ वर्णित हैं, किंतु उनमें उपर्युक्त कथाएँ ही वर्णित हैं, अतः उन्हें यहाँ केवल अति संक्षेप में वर्णित किया जा रहा है |

ब्रिटेन की दन्तकथाओं का पैशाचिक कुत्ता

मत्स्यपुराण में वर्णित प्राकट्यकथा पद्मपुराण में वर्णित कथा के समान ही है | ‘वक्रतुण्डावतार’ देह, पार्वती और गंगा जी के पुत्र गणेश एवं गांगेय नाम से विख्यात हो प्रथमपूज्य होंगे, यहीं आशय इस पुराण की कथा में भी दर्शाया गया है । वायुपुराण, सौरपुराण एवं ब्रह्मपुराण-इन पुराणों में लिंगपुराण में वर्णित कथा के अनुसार श्रीगणेश को साक्षात् शिव ही दर्शाया गया है ।

गणेशपुराण में श्रीगणेश जी को श्रीविष्णु जी का ही अवतार बताया गया है, जैसा कि ब्रह्मावैवर्तपुराण में वर्णित है । सनातन धर्म के महाग्रंथ महाभारत में उन्हें वेदव्यास द्वारा महाभारत महाकाव्य लिखने हेतु स्मरण करने मात्र से प्रकट होना प्रतिपादित किया गया है । इस प्रकार विभिन्न पुराणों में श्रीगणेश जी की प्राकट्य कथाओं में विविधता होते हुए भी प्रत्येक कल्प में उन्हें शंकरसुवन, भवानीनन्दन ही बताया गया है ।

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श्रीगणेश सभी की आस्था के केन्द्र हैं । विश्वभर में उनके कई मन्दिर हैं, उनकी मूर्ति भी भव्य आकार की अतिमनोहर होती है । भाद्रपदमास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को श्रीगजानन के प्राकट्य के विषय में एक श्लोक प्रसिद्ध है, जिसके अनुसार इस दिन उनकी आराधना से भगवान् श्रीगणेश अपने भक्तों (आराधकों)-को समस्त कार्य-कलापों में सिद्धि प्रदान करते हैं ।

कलियुग में श्रीगणेश ही एकमात्र ऐसे देवता हैं जो दूर्वा, सिन्दूर, चन्दन, पुष्प एवं गुड़-बताशे मात्र से प्रसन्न होकर अपने भक्त की सभी कामनाएँ पूर्ण कर देते हैं । उनकी आराधनामात्र से-विधार्थी को विद्या, धन की इच्छा वाले को धन, पुत्र की कामना वाले को पुत्र एवं मोक्ष चाहने वाले को परमगति प्राप्त होती है ।