रहस्यमयी षन्मुखी मुद्रा के, योग साधना में चमत्कार


षन्मुखी मुद्रायोग साधना में वैसे तो प्राणायाम का अत्यधिक महत्व है लेकिन ध्यान साधना में मुद्राओं की महत्ता को नकारा नहीं जा सकता | बिना मुद्राओं के यौगिक साधनायें वैसे ही हैं जैसे बिना पंख के पक्षीगण | इन रहस्यमयी मुद्राओं के निरंतर अभ्यास से चमत्कारिक परिणाम देखने को मिल सकते हैं |

आज के इस घोर उपभोक्तावादी युग में अगर किसी को, आत्मकल्याणार्थ या पर कल्याण हेतु, यौगिक और आध्यात्मिक साधनाओं में रूचि उत्पन्न होती है तो उसे उसके पूर्वजन्म के शुभ कर्मों के परिणाम स्वरुप माना जा सकता है | किसी भी सामान्य व्यक्ति के लिए ध्यान साधना, सर्व-प्रथम और सर्व-सुलभ सोपान है, आध्यात्मिक उन्नति के पथ पर अग्रसर होने के लिए |

जिस प्रकार से हर महान कार्य के प्रारम्भ में बड़ी-बड़ी बाधाएं आती हैं लेकिन अगर धैर्यपूर्वक उनसे जूझते हुए पुरुषार्थी उनका सामना करता है और उन्हें दूर करते हुए अंत तक जाता है तो सफलता उसके चरण पखारती है उसी प्रकार से ध्यान साधना को प्रारम्भ करते समय और उसके बाद भी कई कठिनाइयाँ आ सकती हैं लेकिन साधक को उससे घबराना नहीं चाहिए बल्कि धैर्य पूर्वक निरंतर उनका अभ्यास करते रहना चाहिए |

सिद्धासन या पद्मासन में बैठते हुए, मेरुदंड को एकदम सीधा रखना और चेहरे को सीधे सामने की ओर, पूरे शरीर के साथ स्थिर रखते हुए, अविचलित भाव से अपने अभीष्ट का ध्यान करना ही ध्यान साधना का उचित तरीका है |

बहुत से लोग सिद्धासन या पद्मासन में नहीं बैठ पाते तो उन्हें ध्यान साधना के लिए सुखासन (जिस आसन में वो सुखपूर्वक देर तक बैठ सकें) पर बैठना चाहिए | इस पूरी प्रक्रिया में ‘शरीर का स्थिर रहना और विचलित ना होना’ काफ़ी महत्वपूर्ण है |

प्राचीन मुनियों का कथन है कि किसी भी आसन को अगर साढ़े सात घड़ी (लगभग तीन घन्टे) तक, बिना विचलित हुए (अभ्यास पूर्वक) करने में सफलता प्राप्त कर ली जाय तो वो आसन आपके लिए सिद्ध हो जाता है |

किसी आसन के सिद्ध होने पर, उस आसन में स्थित हो कर जिन कार्यों को करने का प्रावधान है, उन कार्यों के सफल होने की सौ प्रतिशत सम्भावना होती है | स्पष्ट रूप से अनुमान लगाया जा सकता है कि सिद्धासन के सिद्ध होने पर कौन से चमत्कारिक परिणाम उपस्थित हो सकते हैं |

इस प्रकार से प्रयत्न पूर्वक ऐसे ध्यान करना चाहिए कि शरीर विचलित ना हो | ध्यान साधना में विभिन्न मुद्राओं जैसे, ज्ञान मुद्रा, पृथ्वी मुद्रा, सूर्य-मुद्रा आदि के अलग-अलग प्रावधान है और तदनुसार उनके प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष फल भी हैं | अल्प काल में ही मन को स्थिर करने और चित्त को विश्रांति प्रदान करने वाली रहस्यमयी ‘षन्मुखी मुद्रा’, ध्यान साधना में अत्यंत उपयोगी है |

षन्मुखी मुद्रा: षन्मुखी मुद्रा में दोनों अंगूठों से दोनों कानो को, दोनों तर्जनी अँगुलियों से दोनों आँखों को, दोनों मध्यमा अँगुलियों से नाक के दोनों छिद्रों को और दोनों अनामिका तथा कनिष्ठिका से मुख के दोनों होंठो को बंद करके रखना चाहिए |

साधना पथ पर अग्रसर हुआ योगी यदि वायु को अपने अन्दर खींच कर रोके रखे और षन्मुखी मुद्रा लगाकर ध्यान साधना का बारम्बार अभ्यास करे तो उसे परम ज्योति का शीघ्र ही दर्शन होता है ऐसा प्राचीन आचार्यों का कथन है |

निरंतर अभ्यास के फलस्वरूप यदि बिना किसी कल्पना के, षन्मुखी मुद्रा में बैठते ही दिव्य ज्योति का दर्शन होने लगे तो इसे ईश्वर की वही अविनाशी ज्योति समझना चाहिए जिसके उदय से दिव्य ज्ञान की प्राप्ति होने लगती है | इस तरह के योगाभ्यास सदैव एकांत में करना चाहिए |

षन्मुखी मुद्रा के अभ्यास से शीघ्र ही नाना प्रकार की चित्र-विचित्र ज्योति स्वरुप (रोशनियों) का दर्शन होने लगता है | वो महान प्रकाश जिससे परमात्मा की अपार, अकथनीय महिमा का अनुभव हो वह दीख पड़ता है |

पञ्च तत्वों का आकार-प्रकार उनका वर्ण (रंग) और उनकी लीलाएं भी दिखने लगती हैं | ध्यान साधना में षन्मुखी मुद्रा के अभ्यास से पृथ्वी तत्व का चतुष्कोण पीला वर्ण, जल तत्व का अर्धचन्द्राकार श्वेतवर्ण, अग्नितत्व का त्रिकोण रक्तवर्ण, वायुतत्व का गोलाकार नील-हरित वर्ण और आकाश तत्व का चित्र-विचित्र वर्ण दृष्टिगोचर होता है |

इन्ही पञ्च तत्वों से सृष्टि की उत्पत्ति तथा लय होती है जैसे आकाश से वायु, वायु से अग्नि, अग्नि से जल, और जल से पृथ्वी की उत्पत्ति होती है और पुनः पृथ्वी जल में, जल अग्नि में, अग्नि वायु में और वायु आकाश में लय होता है | फिर ये पञ्च महाभूत अहंकार में, अहंकार महत्तत्व में, महत्तत्व मूल प्रकृति में, मूल प्रकृति महामाया में और महामाया इन सबके आधारभूत परमात्मा में लय हो जाती है |

इसी षन्मुखी मुद्रा के अभ्यास से योगी को अनाहत नाद भी सुनाई पड़ने लगता है | देवाधिदेव महादेव ने चौदह प्रकार के अनाहत नाद के बारे में बताया है, जिनका वर्णन शिव-महापुराण में हुआ है |

षन्मुखी मुद्रा के विषय में प्राचीन मुनियों का कथन है कि यदि साधक ने पूर्व में पापकर्म भी किये हों तो भी षन्मुखी मुद्रा के अभ्यास से उसमे (साधक में) ज्ञान के उदय के साथ-साथ उसके पापों का भी क्षय होने लगता है | यद्यपि उन पापकर्मों के फलों को वो साधक सूक्ष्म स्तर (और कभी-कभी स्थूल शरीर पर भी) पर भोगता रहता है किन्तु दिव्य ज्ञान के उदय होने से वो उनसे विचलित नहीं होता |

पाप और पुण्य कर्मों के फलों को तो भोगना ही पड़ता है | साक्षात परमपिता परमेश्वर की भी कृपा हो जाए और वो आपको अपने सानिध्य का वरदान भी दे दें तो भी आपको अपने कर्मों का अकाउंट क्लियर करना ही पड़ेगा उसके बिना आपकी गति सम्भव नहीं | यद्यपि ऐसा होने पर ‘वो’ आपके कष्टों को भी अपने ऊपर ले लेता है और अंत में जैसे एक पिता अपने शिशु की ऊँगली पकड़ कर, उसे अपने साथ लिए आगे बढ़ता है वैसे ही वो आपके नन्हे हाँथों को थाम कर अपने धाम लिए चलता है |

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