भूतिया डाकबंगले के प्रेत की रहस्यमय कहानी


भूतिया डाकबंगले के प्रेत की रहस्यमय कहानी
भूतिया डाकबंगले के प्रेत की रहस्यमय कहानी

किसी समय पश्चिमी अफ्रीका का नाइजीरिया, अंग्रेजों का उपनिवेश हुआ करता था | अब हाँलाकि वहां आज़ादी है लेकिन उस समय वह अंग्रेजों के पूर्ण नियंत्रण में था | यद्यपि आज भी वहाँ स्थाई रूप से बसे हुए गोरे अंग्रेज़ ही प्रभावशाली हैं लेकिन फिर भी वहां पूर्ण स्वतन्त्रता है |

वो साल था 1930 का जब अंग्रेज सरकार ने फ्रैंक हीव्स (Frank Hives) नामक अंग्रेज अफसर को वहां का कमिश्नर बना कर भेजा | वहाँ फ्रैंक को जिस प्रकार की प्रेत लीला के दर्शन हुए वो किसी के लिए भी रौंगटे खड़े कर देने वाले थे |

फ्रैंक ने अपने साथ घटित होने वाली भूतिया घटना को प्रकाशित भी करवाया | उसके ये संस्मरण आपको, स्वयं उसके द्वारा लिखित पुस्तक “JU-JU AND JUSTICE IN NIGERIA” में या फिर “Glimpses Into Infinity as seen by Frank Hives” में पढने को मिल जायेंगे | यह दोनों पुस्तकें इन्टरनेट पर उपलब्ध है |

हुआ यूं कि फ्रैंक वहाँ किसी सरकारी काम से इसुइन्गु नामक स्थान पर गया | वहां एक पुराना टूटा-फूटा सा डाकबंगला था | उसे वहाँ एक रात रुकना था सो उसने उसी डाकबंगले में रुकने का निश्चय किया | नाइजीरिया के उस क्षेत्र में और उसके आस-पास इसुओरगु कबीले के आदिवासी रहते थे | वे उस डाकबंगले के प्रेतग्रस्त होने के बारे में अच्छे से जानते थे |

जब उन्हें पता चला कि नया आया अंग्रेज अफसर आज की रात उसी डाकबंगले में रुकने वाला है तो उन्होंने पूरी कोशिश की उसे समझाने की कि यहाँ रात गुजारना खतरे से खाली नहीं होगा, जान का खतरा हो सकता है, भयंकर शैतानी आत्मा का निवास है यहाँ, वगैरह-वगैरह | जवाब में फ्रैंक केवल हँसा |

उसे आदिवासियों का भोलापन अच्छा लगा क्योंकि उन आदिवासियों ने उसे अपने यहाँ कबीले में रुकने का निमंत्रण दिया था | अपने आप को रोकने की तमाम कोशिश के बावज़ूद, उनके समझाने पर फ्रैंक हँसता ही रहा | अंत में फ्रैंक ने उनसे कहा कि “तुम्हारे गंदे घरों की अपेक्षा मै तुम्हारे उस भूत के साथ खुले डाकबंगले में रहना ज्यादा पसंद करूंगा” | इतना कहकर फ्रैंक कुर्सी से उठ गया |

उन आदिवासियों ने उस खँडहर रुपी डाकबंगले की सफाई कर दी, खाने-पीने के सारे इन्तेजाम जुटा दिए लेकिन फ्रैंक के साथ वहाँ रात को रुकने को कोई तैयार नहीं हुआ | अंततः उसने अकेले ही वहाँ रात गुजारने का निश्चय किया | थका होने की वजह से फ्रैंक तुरंत ही सो गया |

आधी रात तक वो गहरी नीन्द में सोया | फिर उसके बाद रात में ही किसी समय उसकी मच्छरदानी किसी ने खींच कर फेंक दी | फ्रैंक हड़बड़ा कर उठ बैठा | इधर-उधर देखने पर कोई नज़र नहीं आया लेकिन बहुत तेज़ दुर्गन्ध वहां फ़ैल रही थी | फ्रैंक बिस्तर से उठा लेकिन उसे बदबू का कोई कारण नहीं दिखाई दे रहा था |

अचानक से वह दुर्गन्ध इतनी तेज़ हुई कि वहां रुकना बर्दाश्त के बाहर हो गया | इतने में एक तेज़ हवा का झोका आया और बंगले की खिड़कियों के शीशे खड़कने लगे मानो कोई उन्हें खड़का रहा था | फ्रैंक ने लिखा कि उसके सामने उसकी चाय की कप प्लेट किसी ने पलट कर टेबल से ज़मीन पर गिरा दी |

उसे भारी शरीर वाले किसी व्यक्ति के चलने की आवाजें सुनाई पड़ रही थी, मानो कोई भीमकाय आकृति का प्राणी इधर-उधर टहल रहा हो | फ्रैंक ने तकिये के नीचे रखे रिवाल्वर को उठाया, गोलियां भरी और बाहर बारामदे की ओर सतर्क क़दमों से बढ़ा |

उधर बारामदे के एकमात्र खम्भे पर टंगी पुराने लैंप की मद्धिम रौशनी, ऊपर खले आसमान से आते चन्द्रमा के प्रकाश से प्रतिस्पर्धा कर रही थी कि कौन ज्यादे चमक बिखेर रहा था | उसी मद्धिम प्रकाश में फ्रैंक हीव्स ने अपने से कोई सौ गज की दूरी पर एक भीमकाय मानवाकृति (?) को धीमे-धीमे चहलकदमी करते देखा |

उसके हाँथ और पैर लम्बे थे लेकिन चेहरा घुटा हुआ और कंधे से मिला हुआ लग रहा था ऐसा लग रहा था मानो गर्दन हो ही न | फ्रैंक अभी भी नहीं समझ पा रहा था कि वो क्या चीज थी | उसके पैरों के ज़मीन पर पड़ने से अच्छी खासी धमक पैदा हो रही थी जो फ्रैंक को साफ़ सुनाई पड़ रही थी | थोड़ी देर तक स्तब्ध खड़े रहने के बाद फ्रैंक ने उसे आवाज दी लेकिन इसका उस आकृति पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा |

बदहवासी में अफसर ने उस पर गोलियाँ दाग दीं | गोलियों का असर ये हुआ कि वो डरावनी आकृति फ्रैंक के करीब आने लगी | थोड़ा और करीब आने पर अब फ्रैंक उसे देख सकता था | बैठी हुई नाक, बड़े-बड़े नथुने, खुले हुए मोटे होंठ, गंजा सिर, स्थिर पुतलियाँ, गड्ढों में धसे हुए झुर्रियों वाले गाल, एक बड़े ही भयानक चेहरे का निर्माण कर रहे थे |

वह आकृति करीब आठ फीट की रही होगी | थोड़ा और करीब आ कर वह आकृति रुक गयी | अब उनके बीच केवल पांच फीट की दूरी रह गयी थी | उसके मुंह से एक हलकी सी गुर्राहट जैसी आवाज निकल रही थी जो शायद उसके सांस लेने की आवाज थी | अंग्रेज अफसर के पैरों पर मानो मनो बोझ पड़ गया हो, वह एकदम मूर्तिवत सुन्न हो कर खड़ा था |

वह यह भी नहीं सोच पा रहा था कि यह कौन है और क्या कर रहा है | गला पूरी तरह सूख जाने पर भी उसे होंठों पर जीभ फेरने का भान नहीं रहा | अचानक वह आकृति थोड़ा पीछे हटी और ठीक पीछे गड़े हुए सत्रह फीट ऊंचे खम्भे पर चढ़ने लगी |

आकृति के थोड़ा पीछे हटते ही अफसर को होश आया और होश सँभालते ही उसने उस डरावनी आकृति पर ताबड़तोड़ फायर कर दिया | लेकिन सारी गोलियां आर-पार निकल गयीं | कुछ ही सेकंड्स के बाद वह आकृति भी खम्भे पर चढ़े हुए ही ग़ायब हो गयी | डरा हुआ फ्रैंक बेतहाशा बाहर की तरफ भागा लेकिन बंगले से बाहर कुछ ही दूरी पर एक चीख़ के साथ गिर कर बेहोश हो गया |

उधर उन आदिवासियों को इस बात का अंदाज़ा था कि आज की रात अंग्रेज अफसर पर भारी बीतने वाली थी इसलिए कुछ साहसी नौजवानों की एक टीम डाकबंगले के बाहर खड़ी जाग रही थी | अफसर की चीख़ सुनते ही वो सक्रीय हो गए | वे उधर की तरफ दौड़े जिधर आवाज आई थी | थोड़ी देर की खोजबीन के बाद वे उस अंग्रेज अफसर को अपने कबीले में ले कर आये |

फ्रैंक अभी भी बेहोश था | तक़रीबन छह से सात घंटे बाद दिन के उजाले में जब उसे होश आया तो उसने अपने आस-पास आदिवासियों को पाया | चौबीस घंटे में ही फ्रैंक सामान्य हो चुका था |

अगले दिन उसने कबीले के कुछ पुराने बुजुर्गों के साथ उनकी टूटी-फूटी भाषा में बात की और उनसे उस डाकबंगले के इतिहास के बारे में पूछा तो उन्होंने बताया कि आज जहाँ ये डाकबंगला खड़ा है वहाँ पहले एक टीला हुआ करता था | उसी टीले पर इसुओरगु के देवता जूजू की पूजा होती थी और वहां जानवरों और मनुष्यों की बलि दी जाती थी |

अंग्रेज जब आये तो उन्होंने उस स्थान की अनगढ़ मूर्तियों को उठवाकर एक ओर फिंकवा दिया और वहाँ होने वाली नरबली बंद करा दी और उस टीले को समतल करवा कर वहां डाकबंगला बनवा दिया | इस पर उन आदिवासी कबीलों का देवपुरोहित बहुत नाराज़ हुआ और अंग्रेजों के चले जाने पर पूरे कबीले वालों को इकठ्ठा कर के बोला कि “इस डाकबंगले को जला दो और फिर से वहां देवता की पूजा प्रारंभ करो” |

लेकिन अंग्रेजों के भय से भयभीत कबीले वाले इसके लिए तैयार नहीं हुए | अपनी पूरी कोशिश करने पर भी कामयाब न होने पर निराश व हताश उस पुजारी ने उस डाकबंगले की तरफ ऊँगली दिखाकर उन कबीले वालों से कहा कि “आज तुम लोग भय से मेरी बात नहीं मान रहे हो लेकिन एक दिन यह डाकबंगला जलेगा और इसको जलाकर राख करने वाला भी कोई अंग्रेज ही होगा” |

यह कहकर वह पुरोहित क्रोध से उन्मत्त हुआ पागलों की तरह बड़बड़ाता और मन्त्र पढ़ता हुआ उस डाकबंगले के चारो तरफ चक्कर लगाता रहा और अंत में एक रस्सी से उसी बरामदे में स्थित एक लैंप लगे हुए खम्भे से लटक कर आत्महत्या कर ली |

आदिवासी कबीले के उन बुजुर्गों ने फ्रैंक को बताया की तभी से उस पुरोहित का प्रेत डाकबंगले के भीतर रहता है और कोई उधर जाने की हिम्मत नहीं करता है | उनमे से एक बुजुर्ग ने फ्रैंक को बताया कि इससे पहले भी एक अंग्रेज अफसर आया था और जिद करके रात उस डाकबंगले में रुका भी लेकिन उसे भी उस प्रेत ने रात भर रुकने नहीं दिया और उसने भी किसी तरह भाग कर अपनी जान बचाई |

फ्रैंक के उत्सुकता से पूछते जाने पर उन्होंने थोड़ा विस्तार से बताया कि वहां ठहरने वाले अफ़सर आधी रात के बाद एक विचित्र प्रकार की भीषण दुर्गन्ध वहाँ के प्रत्येक कमरे से निकलती हुई महसूस करते हैं | और इस भीषण गर्मी वाले क्षेत्र में जहाँ रात को भी लोग पसीने से तरबतर रहते वहीँ बंगले में रात को कंपकंपाने वाली ठण्ड पड़ती है | बाहर हवा बिलकुल भी बंद क्यों न हो लेकिन बंगले के अन्दर आंधी तूफ़ान भी उठते रहते हैं, जिसकी आवाजे कभी-कभी वे बाहर तक सुनते हैं |

अंग्रेज अफ़सर फ्रैंक हीव्स ने सारी बातों की जानकारी पूरे विस्तार से प्राप्त की और जब उसे उस भूतिया डाकबंगले के प्रेतग्रस्त होने का पूरा विश्वास हो गया तो, भविष्य में किसी और अफ़सर पर कोई संकट न आये, इसलिए उसने अपने सामने उस भूतिया डाकबंगले में आग लगवा दी और उन सबके सामने वह डाकबंगला जल कर राख़ हो गया | धुंए के गुबार में उठ रहे लम्हों में शान्ति थी…एक मुक्ति की शान्ति |

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