हेलेना ब्लावाट्स्की के रहस्यमयी जीवन की कुछ अनकही कहानियाँ


हेलेना ब्लावाट्स्की के रहस्यमयी जीवन की कुछ अनकही कहानियाँ
हेलेना ब्लावाट्स्की के रहस्यमयी जीवन की कुछ अनकही कहानियाँ

सहस्त्राब्दियों से संसार का पूर्वी क्षेत्र आध्यात्म विद्या (ब्रह्म विद्या) के विशारदों का केंद्र रहा है | ऐसे ब्रह्म विद्या के जिज्ञासुओं के लिए भारत हमेशा से आकर्षण का केंद्र रहा है | ऐसी ही एक ब्रह्म विद्या विशारद थी मैडम हेलेना पैट्रोवना ब्लावाट्स्की (Madam Helena Petrovna Blavatsky) जिन्होंने विश्व-प्रसिद्ध थियोसोफिकल सोसाइटी (Theosophical Society) की स्थापना की |

12 अगस्त 1831 को दक्षिण रूस के यूक्रेन में स्थित एकाटरीनों स्लाव में, रशियन फौज के एक प्रतिष्ठित उच्चाधिकारी, कर्नल पीटर वान के परिवार में हेलेना पैट्रोवना का जन्म हुआ था । हेलेना जब 11 वर्ष की थी तभी उनकी मां, जो की एक प्रसिद्ध उपन्यासकार थी, दिवंगत हो गई थीं । इसलिए वे बचपन में अपने नाना प्रिवी काउंसिलर आद्रे-डि-फादेयेव तथा नानी हेलेना पावलोवना की देखरेख में पली थीं ।

बचपन से ही हेलेना की मनःशक्तियां एवं उनका पारलौकिक ज्ञान अद्भुत ढंग से विकसित होने लगे थे । इन विषयों में उनकी अत्यधिक रूचि ने उनकी शिक्षा-दीक्षा को भी प्रभावित किया | ऐसा कहा जाता है कि हेलेना को चार वर्ष की आयु से ही देवात्माओं का सहयोग प्राप्त होने लगा था | वह उनकी सहायता से इस प्रकार के कार्य कर डालती थीं, जो साधारण लोग करने की सोच भी नहीं सकते थे |

1849 में, केवल 18 वर्ष की ही आयु में उन्होंने अपने से काफी बड़ी आयु के सरकारी उच्चाधिकारी निकिफोर ब्लावाट्स्की से विवाह कर लिया था | उनके इस अचानक से लिए गए निर्णय उनके अभिवावक थोड़ा परेशान थे लेकिन उन्होंने इसका विरोध नहीं किया |

लेकिन हेलेना किसी और ही दुनिया से आई थी | उन्हें वासनामय और विलासितापूर्ण वैवाहिक जीवन पसंद नहीं आया । हर समय आध्यात्मिक चिंतन एवं ब्रह्मांड के गूढ़ रहस्यों के बारे में मनन-चिंतन करने वाली किशोरी हेलेना पैट्रोवना यद्यपि सुन्दर थीं लेकिन अपने पति की इच्छाओं के विपरीत सांसारिक सुखों में बिलकुल भी रूचि न लेने वाली थी |

इसका नतीजा पति-पत्नी की कलह के रूप में सामने आया जिसके फलस्वरूप विवाह के तुंरत बाद ही वो, पति को हमेशा के लिए छोड़ कर पिता के घर लौट आयीं | अपनी बेटी द्वारा जल्दीबाजी में किए गए विवाह और उसके तुरंत बाद पति से संबंध-विच्छेद उनके पिता को अच्छा नहीं लगा ।

लेकिन अपनी माँ को खो चुकी अपनी पुत्री को वे बहुत प्यार करते थे और उसे खुश रखने में कोई कसर बाकी नहीं रखते थे इसलिए पुत्री ने जब यह इच्छा व्यक्त की कि अब वह कभी दुबारा विवाह नहीं करेगी और अब वह अपनी इच्छानुसार अध्यात्म चिंतन व अपने में ब्रह्मज्ञान का विकास करेगी तथा ब्रह्मांड के अव्यक्त गूढ़ रहस्यों की खोज व अध्ययन करेगी, तो उसके पिता को उसे अनुमति देनी ही पड़ी |

हेलेना के सामने अपने शोध कार्यों को आगे बढ़ाने में कोई आर्थिक समस्या नहीं थी क्योंकि अपने पिता की इकलौती पुत्री होने के नाते पिता की सारी संपत्ति उसके लिए पर्याप्त थी जिससे वह आजीवन अपना निर्वाह कर सकती थीं इसके अलावा उनके नाना-नानी भी काफी धनी प्रतिष्ठित लोग थे ।

ब्रह्माण्डीय ज्ञान और ब्रह्मविद्या में अत्यधिक रूचि होने के नाते हेलेना भारतवर्ष की तरफ आकर्षित हुईं | सन 1852 में, तेईस वर्ष की अवस्था में वे पहली बार भारत आई और यहां थोड़े दिन रुकीं | उस दौरान उनका सामना पहली बार भारतवर्ष की सनातन ऋषि परंपरा वाले ब्रह्मज्ञान से हुआ | अब तक उन्हें समझ आ चुका था कि उनकी ज्ञान पिपासा कहीं से मिट सकती थी तो वह था भारतवर्ष |

लेकिन भारतीय मौसम से सामन्जस्य न बिठा पाने के कारण जल्दी ही उन्हें लौटना पड़ा | सन 1855 के दिसंबर में, जापान से वापसी के दौरान वो दोबारा भारत आयीं और लगभग दो वर्ष तक यहाँ रुक कर उन्होंने पूरे देश का भ्रमण किया और यहाँ की आध्यात्मिक ऊंचाइयों एवं धर्मग्रंथों के बारे में जानकारी प्राप्त की थी |

Helena Petrovna Blavatskyतीसरी बार हेलेना सन 1868 में 37 वर्ष की परिपक्व आयु में भारत एवं तिब्बत की यात्रा पर आईं तो उन्हें यहाँ कुछ विचित्र अनुभव हुए । अशरीरी आत्मायें एवं उनका संसार, सूक्ष्म जगत के विचित्र लोक, इन सब का उन्होंने अनुभव किया और फिर यहां से वापस चली गयीं |

वो दिन था 8 सितंबर 1875 का जब उन्होंने अपने अन्दर उमड़-घुमड़ रहे विचारों के बादल को मूर्त रूप देने के लिए, न्यूयार्क (अमेरिका) में अपने सहयोगी कर्नल ऑलकॉटके साथ, थियोसॉफिकल सोसाइटी का गठन किया | इस सोसाइटी के गठन करने के तीन साल बाद वे 1878 के अंत में चौथी बार भारत आयीं |

इस बार उनके साथ उनके सहयोगी कर्नल ऑलकॉट भी थे | भारत से वे कितना प्रभावित थीं इसका अंदाज़ा इसी से लग जाता है कि इस बार उन्होंने अपनी थियोसॉफिकल सोसाइटी का अंतर्राष्ट्रीय कार्यालय भारत के मुंबई में खोला | मुंबई में सोसाइटी का अंतर्राष्ट्रीय कार्यालय स्थापित कर उसके प्रचार-प्रसार के लिए ‘द थियोसॉफिट’ नाम की एक पत्रिका का प्रकाशन भी शुरू किया |

लेकिन चार साल बाद 19 दिंसबर, 1882 में उन्होंने थियोसॉफिकल सोसाइटी का अंतर्राष्ट्रीय कार्यालय मुंबई से चेन्नई में स्थानांतरित कर दिया | उसके बाद सोसाइटी का व्यापक प्रचार-प्रसार शुरू कर दिया और भारत के विभिन्न स्थानों में वे उसकी शाखाएं खोलती चली गयीं |

32 वर्षों तक पूरे विश्व का भ्रमण करके उन्होंने भारत को ही थियोसॉफिकल सोसाइटी का प्रमुख केंद्र बनाने के लिए अपने मनोनुकूल उपयुक्त पाया | यह उनके द्वारा भारत के मूल्यांकन एवं भारत के प्रति उनकी श्रद्धा-भक्ति का एक ज्वलंत प्रमाण है |

कुल मिलकर दस वर्ष तक हेलेना भारतवर्ष में रहीं | एक बार जब वह लन्दन में थीं तो कर्नल हैनरी आल्काट उनसे मिलने आये | उस समय वो सिलाई मशीन से एक कपड़ा सिल रही थीं और रह-रहकर कुर्सी पर अपना पैर पटक रही थीं |

आल्काट को उनका यह व्यवहार थोड़ा अजीब लग रहा था | उन्होंने हेलेना से पैर पटकने का कारण पूछा तो उन्होंने कर्नल से कहा कि एक छोटी प्रेतात्मा बार-बार मेरे कपड़े खींच रही है और मुझसे कह रही है कि मुझे भी कोई कुछ काम दे दो | कर्नल ने दो पलों तक सोचा फिर व्यंग किया कि “उसे आप अपना कपड़ा सिलने का काम क्यों नहीं दे देतीं?” हेलेना ने अपना काम रोक दिया और बिना उनकी तरफ देखे कहा “अच्छी बात है” |

इसके बाद उन्होंने कपड़े समेट कर आलमारी में रख दिए और कर्नल से बातें करने लगीं | थोड़ी देर बाद जब कर्नल चलने लगे तो किसी कारणवश हेलेना ने अपनी आलमारी खोली, वहाँ उनके सभी कपड़े सिले पड़े थे, जिसे उन्होंने कर्नल को भी दिखाया |

उसी दौरान एक बार हेलेना अपने सम्बन्धियों से मिलने अपने देश रूस में गयीं | वहाँ उनके चचेरे भाइयों एवं रिश्तेदारों तक उनके विलक्षण कार्यों की चर्चा पहुँच चुकी थी, लेकिन उनके भाई अपनी बड़ी बहन के पारलौकिक कामों पर विश्वास नहीं करते थे |

एक दिन ऐसे ही बातचीत के दौरान हेलेना ब्लैवेट्स्की ने अपने एक छोटे भाई को, रसोईं से एक हल्की सी मेज उठा लाने को कहा । उस समय वहाँ सभी मौजूद थे | उनका छोटा भाई एक छोटी मेज ले आया | फिर उन्होंने सबके सामने उससे कहा कि अब इसे जहाँ से लाये थे वहीं रख आओ | उनके भाई ने पूरी ताकत लगाई पर वह इतनी भारी हो गई कि टस से मस न हुई |

इस पर वहां उपस्थित घर के अन्य लोग भी आ गये और सब मिलकर उस मेज को उठाने लगे । इतने के बाद भी वह मेज अपनी जगह से हिली तक नहीं | जब सब लोग अपनी सारी कोशिश करके हार गये और अपनी-अपनी जगह जा कर बैठ गए तो हेलेना ने मुस्करा कर कहा “चलो भाई लोग ! अब सब लोग मेज को छोड़ दो” |

इतना कहकर वे अपने भाई से बोली, “अब मेरे साथियों ने उस मेज को पहले जैसा कर दिया है और मेज फिर पहले की तरह हल्की हो गई । जाओ और उसे उठाकर रख आओ” |

उनके सारे भाई और रिश्तेदार भौचक्के होकर उनको देख रहे थे, मेज वाकई उनके भाई के एक हाँथ से उठ गयी थी | श्रीमती हेलेना ब्लैवेटस्की अक्सर कहा करती थीं कि कुल सात दूसरे लोक की उच्च आत्मायें थीं जो ऐसे कार्यों में समय-समय पर उनकी सहायता किया करती थीं | बढ़ती उम्र के साथ हेलेना की व्यस्तता भी बढ़ती चली जा रही थी | जिसका उनके स्वास्थ्य पर बुरा असर भी पड़ रहा था |

सन 1885 के प्रारंभ में वे गम्भीर रूप से बीमार हो गयीं | उस समय वो चेन्नई में थीं | कुछ दिनों बाद फरवरी में इलाज कराने के लिए उन्हें यूरोप के लिए निकलना पड़ा | यह उनकी भारत से अंतिम विदाई थी । भारत के अलावा उन्हें ब्रिटेन में प्रवास करना अच्छा लगता था इसलिए यूरोप में थियोसॉफिकल सोसाइटी का काम आगे बढ़ाते हुए उन्होंने लंदन को अपना अंतिम पड़ाव बनाया |

वहां ‘ब्लावाट्स्की लॉज’ नाम से अपना आवास बना कर, 1857 के सितंबर से ही उन्होंने अपनी दूसरी मासिक पत्रिका ‘लूसिफर’ (Lucifer) का प्रकाशन शुरू कर दिया था |

सन 1888 में ‘दि सीक्रेट डॉक्ट्रिन’ (The Secret Doctrine) नामक उनका 1500 पृष्ठों का ग्रंथ लंदन से प्रकाशित हुआ | यह विशाल ग्रन्थ आज भी अपने डिजिटल रूप में कई प्रसिद्ध वेबसाइट पर उपलब्ध है | 8 मई 1891 को हेलेना पैट्रोवना ब्लावाट्स्की ने लंदन में अपनी अंतिम सांस लीं और अपने महाप्रयाण के लिए निकल पड़ीं ।

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