देवर्षि नारद पूर्वजन्म में कौन थे


Narad Muniपुराणों में देवर्षि नारद जी से सम्बंधित ढेरों आख्यान हैं | इसी से पता चलता है कि प्राचीन धार्मिक एवं सांस्कृतिक ग्रंथों में इनका कितना अधिक महत्व है | भगवान विष्णु के अनन्य भक्त देवर्षि नारद जी पूरे ब्रह्माण्ड में स्वच्छंद विचरते हैं | वे त्रिकालज्ञ हैं |

ऊर्ध्व लोक, भू-लोक एवं अधोलोकों में कालचक्र कैसे घूमता इसका उन्हें सर्वथा ज्ञान है | लेकिन नारद जी कौन हैं, ये पूर्वजन्म में, यानी इससे पूर्व के कल्प में क्या थे, इससे सम्बंधित भी जानकारी कुछ पुराण ग्रंथों में दी हुई है |

अकेले श्रीमद भागवत ग्रंथ में ही नारद जी के कई पूर्व जन्मों का वर्णन आया है | भागवत के सातवें स्कंध के पन्द्रहवें अध्याय में वह कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर से कहते हैं कि “मैं पूर्व के महाकल्प में एक गंधर्व था | उस समय मेरा नाम उपबह्रण था और सारे गंधर्व गण मेरा बड़ा सम्मान करते थे |

देवसभा में भी मुझे काफी ऊँचा सम्मान प्राप्त था | मैं देखने में बहुत ही मनोहर था तथा मेरे शरीर से सदा एक प्रकार की दिव्य सुगंध निकलती रहती थी जो मेरे आस-पास उपस्थित भद्रजनों को आह्लादित करती रहती थी |

एक बार एक देव सत्र में मुझे ईश्वर की महिमागान के लिए बुलाया गया | पर मै वहां सुन्दरियों व अप्सराओं के साथ निम्न कोटि के संसारी गीतों को गाते हुए पहुंचा | इस से उस देवसभा में बैठे प्रजापति रुष्ट हो गए | उन्होंने मुझे धिक्कारा |

मुझे अपने ऊपर ग्लानि का अनुभव हो रहा था लेकिन रुष्ट हुए प्रजापतियों ने मुझे शूद्र योनि में जन्म लेने का श्राप दे दिया था | उन लोगों के श्राप के कारण मैं धरती पर, भू-लोक में दासी पुत्र के रूप में जन्मा |”

नारद जी ने युधिष्ठिर से आगे कहा “ शूद्र के घर जन्म लेने के बाद भी, भगवान की कृपा से इस जन्म में मेरे साथ, बालक रूप में ही कुछ ऐसा संयोग बन गया कि मैं दिव्य चतुर्मास में एक जगह ठहरे हुए महात्माओं की सेवा में लग गया |

मैं बालोचित चंडाल स्वभाव से सर्वथा दूर रहकर उन महात्माओं की सेवा में लगा रहा | मेरे विनम्र स्वभाव और भक्ति-भाव से की गयी सेवा से वे मुनि जन बहुत प्रसन्न हो गए |

इस प्रकार से उनकी सेवा करने, उन्हें उत्कृष्ट भोजन कराने तथा उनके संपर्क से मुझे उनके साथ सत्संग करने के लाभ मिला | उनके सम्मुख बैठकर उनसे नित्य वैराग्य युक्त, श्रेष्ठ ज्ञान की बातें तथा हरि कथा सुनते सुनते मेरा हृदय शुद्ध हो गया |

चातुर्मास के अंत में चलने के समय उन्होंने मुझपर शक्तिपात किया | उन्होंने मुझे उस दिव्य ज्ञान का उपदेश दिया, जिससे यह सम्पूर्ण चराचर जगत मायामय एवं उसके बाद भगवत रूप दिखने लग जाता है” |

नारद जी ने आगे कहा “कुछ दिनों के बाद सर्प-दंश से मेरी माता की मृत्यु हो गई | मुझे इस संसार से पूर्ण विरक्ति हो चुकी थी | मैंने घर छोड़ दिया | मैं चलते-चलते एक सघन वन में पहुंचा | वहाँ पहुंचकर एक पीपल-वृक्ष के नीचे बैठकर, मै भगवान का ध्यान करने लगा |

थोड़े ही समय में मेरा ध्यान जम गया तथा साक्षात् प्रभु के पल भर के लिए मुझे दर्शन हुए | फिर आकाशवाणी हुई कि अब तुम शीघ्र ही ब्रह्मा जी के पुत्र रुप से उत्पन्न होकर मेरा सदा दर्शन कर सकोगे | मेरे शरीर का रोम-रोम रोमांचित हो चुका था |

दैव-योग से कुछ ही महीनों बाद मेरे वर्तमान जन्म का अंत हुआ | शरीर छूटने के बाद मैंने प्रभु के पार्षद के रूप में देह धारण की | फिर कल्पान्त तक मै प्रभु का पार्षद बनकर उसी देह में रहा |

कल्पांत में जब प्रलय का समय आया तो मैं ब्रह्मा जी के हृदय में प्रवेश कर गया | फिर आई सहस्त्र चतुर्युगी जितने काल की ब्रह्मरात्रि (ब्रह्मा जी की रात्रि) | उस सहस्त्र चतुर्युग काल के बीतने के बाद पुनः सृष्टि के आरंभ में मरीची आदि ऋषियों के साथ ब्रह्मा जी की गोद से मै प्रकट हुआ |

मुझे भगवान के द्वारा यह वीणा भी प्राप्त हुई, जिसके सहारे में अनवरत हरि नाम यश का कीर्तन करता सर्वत्र अव्याहत गति से भी चलता रहता हूँ | थोड़े बहुत अंतर के साथ, देवर्षि नारद जी के पूर्वजन्म की ये कथा कुछ अन्य पुराण ग्रंथों में भी दी गयी है |

 

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