परमेश्वर के पृथ्वी पर अवतार लेने की अवधारणा एवं उनका विज्ञान


परमेश्वर के अवतार की अवधारणा एवं उनका विज्ञान
परमेश्वर के पृथ्वी पर अवतार लेने की अवधारणा एवं उनका विज्ञान

परमपिता परमेश्वर नित्य हैं, शाश्वत हैं । इस दृष्य जगत में अपनी इच्छानुसार प्रकट होते हैं और फिर अपने धाम में प्रस्थान कर जाते हैं । उनके वे धाम मायातीत और चिन्मय हैं । उनमें प्रभु विभिन्न रूपों में, उन रूपों के अनुरूप पार्षदों एवं परिकरों के साथ विराजते और नाना प्रकार की लीला करते हैं । उन अनन्त प्रभु के अनन्त धाम हैं | शास्त्रों में प्रमुख धामों का ही वर्णन है । अनंत लोकों के अनुरूप उनके अनंत धाम हैं | वे अनेक होकर भी एक हैं, अभिन्न हैं ।

उन अनंत प्रभु का स्वरूप सत्-चित्-आनन्दरूप है । सत् का मतलब है-जिसका कभी अभाव न हो ‘नाभावो विद्यते सतः’ । सत् का अभाव नहीं होता, वह त्रिकालाबाधित है अर्थात वह निरन्तर रहता है, अतः भगवान सद्रूप हैं | ‘चित्’ का अर्थ है प्रकाश अर्थात जो अनन्त प्रकाश से प्रकाशित है, ज्ञानस्वरूप हैं | तथा जो आनन्द के सागर है अर्थात वे पूर्णानंद है । उनके आनन्द के एक कण से पूरा संसार आह्लादित होता है । इस प्रकार से वे सच्चिदानन्दस्वरूप हैं । इसी स्वरूप में वे निराकार और साकार दोनों हैं ।

बहुत से लोगों को यह संदेह होता है कि जो परम तत्व हैं, निर्विकार है, निर्णुण और निराकार है, वह सगुण एवं साकार कैसे हो सकता है और भला क्यों होगा? इसका उत्तर यह है कि भगवान सर्वव्यापक, सर्वान्तर्यामी और सर्वसमर्थ हैं । इस संसार का सृजन वे ही करते हैं ।

यह जगत् उन्हीं का लीला-विलास ही है । जो संसार की सृष्टि कर सकता है, क्या वह स्वयं शरीर धारण नहीं कर सकता? अतः निर्गुण निराकार का सगुण-साकार होना कोई अस्वाभाविक नहीं है । इसीलिये हमारे ग्रन्थ और ऋषि-महर्षि कहते हैं कि निर्विकार, निराकार, निरंजन और शुद्ध चैतन्य ब्रहम, जगत् के कल्याण और हित-साधन के लिए स्वेच्छा से सगुण-साकार रूप में इस धरती पर अवतीर्ण होते हैं ।

वैसे तो समूची सृष्टि ही परमात्मा का रूप है अर्थात् स्वयं परमात्मा ही संसार के रूप में व्यक्त हैं । परब्रह्म परमात्मा पूर्ण चैतन्यस्वरूप है, जो सोलह कलाओं से परिपूर्ण हैं | विश्व के सभी प्राणियों में जो चेतना है, वह भगवान की कलाओं से ही व्यक्त होती है, जैसे राम और कृष्ण पूर्ण कलाओं से युक्त होने के कारण परमेश्वर के पूर्णावतार है ।

सृष्टि के सभी प्राणी ईश्वर के ही अंश हैं, इसलिए अविनाशी हैं, परंतु ईश्वर की कला के कम-अधिक होने के कारण इन जीवों की शक्ति, क्षमता और प्रभाव में अन्तर होता है ।

पूरे जगत में उद्भिज, स्वदेज, अण्डज, पिण्डज और जरायुज- ये पांच प्रकार के जीव है, जिनकी चेतना (शक्ति) का तारतम्य परमात्मा की कलाओं से व्यक्त होता है । जैसे-जैसे इन जीवों की चेतना विकसित होती जाती है वह ईश्वर की इन कलाओं को धारण करता जाता है |

जमीन से उत्पन्न होने वाली वृक्षादि वनस्पति पदार्थो में भी आहार-ग्रहण, निद्रा तथा स्नेह-द्वेष के प्रभाव को ग्रहण करने की क्षमता होती है । लेकिन यहां केवल चेतना के अन्नमय कोष का विकास (विस्तार) है । वे उद्भिज्ज (वृक्ष, वनस्पति आदि प्राणी), ईश्वर की एक कला से युक्त हैं |

स्वेदज (पसीने से उत्पन्न होने वाले प्राणी जैसे जूँ, मक्खी इत्यादि) जीव, जिनमें प्राणमय कोष का भी विकास (विस्तार) है अर्थात् ये सक्रिय जीव हैं, ये ईश्वर की दो कला से युक्त हैं । इसी प्रकार से अण्डज (अण्डे से उत्पन्न होने वाले प्राणी जैसे पक्षी, सर्प इत्यादि) प्राणी ईश्वर की तीन कला से युक्त हैं, जिनमें मनोमय कोष का भी विकास (विस्तार) है । ये अण्डज प्राणी संकल्प विकल्प भी करते है ।

पिंडज प्राणी (विभिन्न प्रकार के पशु) ईश्वर की चार कला से युक्त होते हैं | इन पिण्डजों में विज्ञानमय कोष का भी प्राकट्य होता है । ये प्राणी बुद्धि का भी उपयोग करते देखे गए हैं |

जरायुज प्राणी केवल मनुष्य होते हैं, जिनमे आनन्दमय कोष भी विकसित होता है । पाँच कलाओं से युक्त केवल मनुष्य ही अपने आनन्द की अनुभूति को हास्यादि भावों द्वारा व्यक्त कर सकता है और बिना दैहिक चेष्टा के आनन्द का अनुभव कर सकता है । इससे निम्न कलाओं वाले या निम्न चेतनात्मक स्तर वाले प्राणियों में यह क्षमता नहीं होती है, वे या तो शांत रहेंगें या दैहिक गतिविधियों से अपने आनंद को व्यक्त करेंगें ।

मनुष्य योनि कर्मयोनि है, इसी योनि में जीव अपने शुभ-अशुभ कर्मों के अनुसार पाप-पुण्य का भागी बनता है । उसे अपने कृतत्व का अभिमान रहता है (कि यह मैंने किया है) । पांचवीं कला के बाद चेतना की जिन भूमियों में विकास (विस्तार) होता है वे हैं-भावना, प्रज्ञा और बोध | इन तीनों कलाओं का तारतम्य मनुष्य में बना रहता है | इसलिए मनुष्य में पांच से आठ कला तक चेतना की अभिव्यक्ति या विस्तार हो सकता है ।

सामान्य मनुष्यों में जो निम्न कोटि के मनुष्य होते हैं तथा वन्य मानवों में चेतना पांच कला तक ही विकसित होती है । वास्तव में सभ्य सुसंस्कृत तथा संवेदनशील मनुष्य में चेतना छः कलाओं से युक्त होती है । भावना ईश्वर की छठी कला है |

सामान्य मनुष्यों की अपेक्षा समाज में जो विशिष्ट प्रतिभावान मनुष्य है वे प्रज्ञावान होते हैं | वे किसी भी ज्ञान, विज्ञान तथा तथ्यों को तेजी से ग्रहण करते हैं और उनसे मिलने पर वे विशिष्ट तथा असाधारण नज़र आते हैं | इनकी चेतना, ईश्वर की सातवीं कला, ‘प्रज्ञा’ के क्षेत्र में भी विस्तृत होती है |

इन सब के साथ ऐसे महापुरुष जिन्हें ईश्वर का बोध हो चुका होता है, वे ईश्वर की आठ कला से युक्त होते हैं । मै किसी का नाम नहीं लूँगा लेकिन पाठक अनुमान लगा सकते हैं ऐसे महापुरुषों का जिनका नाम इतिहास में अंकित है | ऐसे महापुरुष कभी-कभार ही इस धरती पर दिखाई देते हैं लेकिन इनका मिलना किसी सौभाग्य से कम नहीं होता |

पार्थिव शरीर, ईश्वर की आठ कला से अधिक का प्राकट्य सह नहीं सकती । वैसे आठ कला के प्राकट्य से ही पार्थिव देह में दिव्यता आ जाती है । देव स्तर के प्राणियों (देवी-देवताओं) की चेतना में नौ कला का विकास हाता है ।

नौवीं कला तत्वबोध की होती है | विभिन्न शक्तियों से युक्त ये देवी-देवता जड़ तत्वों से बने संसार पर पूर्ण नियंत्रण रखते हैं | वस्तुतः ये देवी-देवता वो शक्तियाँ ही हैं जो प्रकृति के जड़ तत्वों पर नियंत्रण रखती हैं | नौ कला का विकास दिव्य देह में ही हो पाता है |

नरसिंह अवतार विशिष्ट अवसरों पर विशिष्ट कार्यों के लिए परमेश्वर के जो अवतार हाते है वे दस या ग्यारह कलाओं से युक्त होते हैं । ऐसे अवतार अचानक से प्रकट हो जाते हैं और जिस कार्य के लिये प्रकट हुए हैं उसको पूरा करके तिरोहित हो जाते हैं | मत्स्य, कूर्म, वराह, नृसिंह आदि तथा भक्तों को दर्शन देने अथवा उन्हें वरदान देने के लिये जो अवतार होते हैं, वे इसी प्रकार के अवतार होते हैं ।

ये विशिष्ट कार्य वो कार्य होते हैं जिन्हें पूरा करना किसी और के वश की बात नहीं होती | परमेश्वर की दसवीं कला ‘काल’ (समय) तत्व और ग्यारहवीं कला ‘महत्तत्व’ है | परमेश्वर अपनी दस या ग्यारह कलाओं के साथ जहां प्रकट होते हैं, वहां स्थूल और सूक्ष्म संसार का भेद नहीं रह जाता |

उनके शरीर पर द्रव्य और ऊर्जा के नियम काम भी नहीं करते अतः उसका (उनकी शरीर का) आकार चाहे जब जैसा बदल सकता है । जैसे भगवान वामन् विराट हो गये थे । उनकी दिव्य देहों में वस्त्राभरण, आयुध आदि भी दिव्य होते हैं ।

यहाँ ‘दिव्य’ का तात्पर्य उन तत्वों से है जिनपर ब्रह्माण्डीय द्रव्य एवं ऊर्जा के नियम काम नहीं करते | होने वाली अवश्यम्भावी भवितव्यता को बदल कर काल के प्रवाह पर अमिट एवं अखंड प्रभाव छोड़ने के लिए ही उनका प्राकट्य होता है |

ग्यारह कला से उपर होने पर प्रभु पूर्णावतार के रूप में प्रकट होते हैं अर्थात बारहवीं कला धारण करते ही प्रभु अपने पूर्ण अवतार के रूप में प्रकट होते है । प्रभु श्री राम, बारह कलाओं के साथ जन्मे परमेश्वर के पूर्णावतार ही थे | परमेश्वर की ये बारहवीं कला उनकी ‘माया’ (शक्ति) ही है |

यह माया ही उन सारी परिस्थितियों को रचती है जिनमे परमेश्वर अपने उन विशिष्ट कार्यों को पूरा करते हैं जिसके लिए वे अपने पूर्णावतार के रूप में जन्म लिए होते हैं | उस सृष्टि (जिसमे परमेश्वर जन्म लिए होते हैं) के सारे लोग, उस दौरान होने वाली अलग-अलग घटनाओं के लिए (उस काल के) विभिन्न पात्रों को उत्तरदायी मानते हैं जबकि पार्श्व में सारी परिस्थितियों को उनकी शक्ति ‘माया’ ही रच रही होती है |

बारहवीं कला के बाद परमेश्वर की तेरहवीं, चौदहवीं और पंद्रहवीं कला, वास्तव में उनकी तीन शक्तियां-इच्छाशक्ति, ज्ञानशक्ति और क्रियाशक्ति ही हैं | तेरहवीं कला इच्छाशक्ति के साथ परमेश्वर ‘आनन्द’ रूप में, चौदहवीं कला ज्ञानशक्ति के साथ ‘ज्ञेय’ रूप में और पंद्रहवीं कला क्रियाशक्ति के साथ ‘सच्चिदानन्द’ रूप में नित्य विद्यमान हैं |

इन तीनो कलाओं के बारे में विस्तृत रूप से जानने के लिए आप यहाँ क्लिक कर सकते हैं

परमेश्वर का सोलहवीं कला के साथ अवतार उनका सम्पूर्णावतार है | यह सोलहवीं कला स्वयं महामाया हैं | परमेश्वर, जो की सर्वशक्तिमान है, का सोलहों कलाओं के साथ अवतार लेना ब्रह्माण्ड की सबसे अद्भुत और दुर्लभतम घटनाओं में से एक है जिसकी व्याख्या करना लगभग असंभव है (कम-से-कम मेरे जैसे अज्ञानी के लिए तो है ही) |

भगवान कृष्ण के रूप में परमेश्वर अपनी सोलहों कलाओं के साथ जन्मे थे | उन्होंने मानव रूप में प्रकट होकर इस धरा को अपनी पूर्ण लीला से आप्लावित किया । प्रत्येक जीव में वही परमात्मा है | जैसे-जैसे जीवात्मा उच्च कलाओं को धारण करता जाता है उसकी चेतना विकसित होती जाती है | किसी कला को धारण करने से तात्पर्य उसको समझने तथा आत्मसात करने से है |

बारहवीं कला को धारण करते ही जीवात्मा परमेश्वर के अविनाशी धाम में प्रवेश करता है, क्योंकि इस मायिक जगत के बंधन को काट कर ही जीवात्मा बारहवीं कला को धारण कर सकता है और उनके अविनाशी धाम में प्रवेश कर सकता है | प्रत्येक कला को धारण करते ही जीवात्मा की चेतना नए आयामों में प्रवेश करती है और समष्टि रुपी उस ब्रह्माण्डीय चेतना के उत्तरोत्तर निकट आती जाती है जो पूरे ब्रह्माण्ड में व्याप्त है |

ये सभी कलाएं ईश्वरीय शक्तियाँ ही हैं जिनके बिना ना तो जड़ और ना ही चेतन जगत में कोई कार्य हो सकता है | स्थूल, सूक्ष्म और कारण जगत में गतियों के लिए इन कलाओं के रहस्य को समझना अनिवार्य है |

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