श्री सनकादि मुनि कौन हैं, उनके श्राप से हिरण्यकशिपु, हिरण्याक्ष, रावण, कुम्भकर्ण और शिशुपाल आदि जैसे राक्षस कैसे पैदा हुए


श्री सनकादि मुनि कौन हैं, उनके श्राप से हिरण्यकशिपु, हिरण्याक्ष, रावण, कुम्भकर्ण और शिशुपाल आदि जैसे राक्षस कैसे पैदा हुएजगतपिता परमेश्वर के अध्यक्षता में प्रकृति द्वारा रची गयी सृष्टि के प्रारम्भ में लोकपितामह ब्रह्मा ने विविध लोकों को रचने की इच्छा से तपस्या (उद्योग) की । लोकस्रष्टा के उस अखण्ड तप से प्रसन्न होकर विश्वाधार परमप्रभु ने ‘तप’ अर्थवाले ‘सन’ नाम से युक्त होकर सनक, सनन्दन, सनातन और सनत्कुमार-इन चार निविृत्ति परायण ऊध्र्वरेता मुनियों के रूप में (ब्रह्मा जी के मानस पुत्र के रूप में) अवतार ग्रहण किया ।

ये चारो ब्रह्मर्षि अपने प्राकट्य-काल से ही मोक्षमार्ग-परायण, ध्यान में तल्लीन रहने वाले, नित्यसिद्ध एवं नित्य विरक्त थे । लेकिन इन नित्य ब्रह्माचारियों से भी ब्रह्माजी के सृष्टि-विस्तार की आशा पूरी नहीं हो सकी । देवताओं के पूर्वज और लोकस्रष्टा ब्रह्मा जी के आदि मानसपुत्र सनकादि मुनियों के मन में कहीं किंचित् मात्र आसक्ति नहीं थी । वे प्रायः आकाश मार्ग से विचरण किया करते थे ।

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एक बार उन दिव्य मुनियों के मन में बैकुण्ठ लोक में साक्षात विराजित भगवान् के दर्शन की लालसा उत्पन्न हुई | वे उसी इच्छा से श्रीभगवान् के श्रेष्ठ वैकुण्ठ धाम में पहुँचे । वहाँ, बैकुण्ठ लोक में, सभी शुद्ध-सत्त्वमय चतुर्भुज के समान श्रेष्ठ रहते हैं ।

सनकादि मुनिगण भगवददर्शन की लालसा से वैकुण्ठ की दुर्लभ, दिव्य दर्शनीय वस्तुओं की उपेक्षा करते हुए छठी ड्योढ़ी (Sixth Dimension) के आगे बढ़ ही रहे थे कि भगवान् के पार्षद जय और विजय ने उन पांच वर्ष के बालक जैसे दीखने वाले दिगम्बर तेजस्वी कुमारों की हँसी उड़ाते हुए तथा अपनी शक्ति का प्रयोग करते हुए उन्हें आगे बढ़ने से रोक दिया ।

भगवददर्शन में व्यवधान उत्पन्न होने के कारण सनकादि मुनियों को क्रोध आ गया | उन श्रेष्ठ मुनियों ने उन्हें (पार्षद जय और विजय को) दैत्यकुल में जन्म लेने का शाप दे दिया । अपने प्राणप्रिय एवं अपने से अभिन्न सनकादि कुमारों के अनादर का संवाद मिलते ही वैकुण्ठनाथ श्रीहरि तत्काल वहाँ उपस्थित हो गये ।

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उस समय भगवान् की अदभुत, अलौकिक एवं दिव्य सौन्दर्यराशि के दर्शन कर सर्वथा विरक्त सनकादि कुमार भी स्तब्ध हो गये । सब कुछ थम गया था | वे चारो अपलक नेत्रों से प्रभु की ओर देखने लगे । उनके हृदय में आनन्द का महासागर उमड़-घुमड़ रहा था ।

उन्होंने वनमालाधारी लक्ष्मीपति भगवान् श्रीविष्णु की स्तुति करते हुए उन्होंने कहा-‘विपुलकीर्ति प्रभो! आपने हमारे सामने जो यह मनोहर रूप प्रकट किया है, उससे हमारे नत्रों को बड़ा ही सुख मिला है; विषयासक्त अजितेन्द्रिय पुरूषों के लिये इसका दृष्टिगोचर होना अत्यन्त ही कठिन है । आप साक्षात् भगवान् हैं और इस प्रकार स्पष्टतया हमारे नेत्रों के सामने प्रकट हुए हैं । हम आपको प्रणाम करते हैं ।’

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‘ब्राह्मणों की पवित्र चरण-रज को मैं अपने मुकुट पर धारण करता हूँ ।’ श्रीभगवान् ने अपनी संगीतमय एवं अत्यन्त मधुर वाणी में कहा । ‘जय-विजय ने मेरा अभिप्राय न समझकर आप लोगों को अपमान किया है । इस कारण आपने इन्हें दण्ड देकर सर्वथा उचित ही किया है ।’

लोकों के उद्धार के लिए लोक-पर्यटन करने वाले, सरलता एवं करूणा की प्रतिमूर्ति सनकादि कुमारों ने श्रीभगवान् की सारगर्भित मधुर वाणी का मर्म समझ लिया | उन्होंने उनसे अत्यन्त विनीत स्वर में कहा-‘हे सर्वेश्वर! इन द्वारपालों को आप जैसा उचित समझे, वैसा दण्ड दें अथवा पुरस्कार रूप में इनकी वृत्ति बढ़ा दें-हम निष्कपट भाव से सब प्रकार आपसे सहमत हैं ।

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अथवा हमने आपके इन निरपराध अनुचरों की शाप दिया है, इसके लिये हमें ही उचित दण्ड दें । हमें वह भी सहर्ष स्वीकार होगा ।’ भगवान मुस्कुराए | ‘यह मेरी प्रेरणा से ही हुआ है ।’ श्रीभगवान् ने उन्हें संतुष्ट किया ।

इसके बाद सनकादि मुनियों ने सर्वांगसुन्दर भगवान् विष्णु और उनके धाम का दर्शन किया और प्रभु की परिक्रमा कर उनका गुणगान करते हुए वे चारों कुमार लौट गये । भगवान् के पार्षद जय-विजय इन मुनियों के शाप से तीन जन्मों तक क्रमशः हिरण्यकशिपु-हिरण्याक्ष, रावण-कुम्भकर्ण और शिशुपाल-दन्तवक्त्र हुए ।

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एक समय जब भगवान् सूर्य की भाँति परम तेजस्वी सनकादि मुनि आकाश मार्ग से भगवान के अंशावतार महराज पृथु के समीप पहुँचे, तब उन्होंने अपना अहोभाग्य समझते हुए उनकी सविधि पूजा की । उनका पवित्र चरणोदक अपने माथे पर छिड़का और उन्हें सुवर्ण के सिंहासन पर बैठाकर बद्धाजंलि हो विनयपूर्वक उन मुनियों से निवेदन किया-

‘मंगलमूर्ति मनुीश्वरो! आपके दर्शन तो योगियों को भी दुर्लभ हैं, मुझसे ऐसा क्या पुण्य बना है, जिसके फलस्वरूप आज मुझे स्वतः आपका दर्शन प्राप्त हुआ । ब्रह्माण्ड के इस दृश्य-प्रपंच के कारण महत्तत्त्वादि यद्यपि सर्वगत हैं, तो भी वे सर्वसाक्षी आत्मा को नहीं देख सकते, इसी प्रकार से यद्यपि आप समस्त लोकों में विचरते रहते हैं, तो भी अनधिकारी लोग आपको नहीं देख पाते ।’ फिर अपने सौभाग्य की सराहना करते हुए महराज पृथु ने अत्यन्त आदरपूर्वक उनसे कहा-

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‘आप संसारानल से संतप्त जीवों के परम सुहृद् हैं, इसलिये आपमें विश्वास करके मैं यह पूछना चाहता हूँ कि इस संसार में मनुष्य का किस प्रकार सुगमता से कल्याण हो सकता है?’ भगवान् के अवतार सनकादि मुनियों ने आदिराज पृथु का ऐसा प्रश्न सुनकर उनकी बुद्धि की प्रशंसा की और उन्हें विस्तारपूर्वक कल्याण का उपदेश देते हुए कहा-

‘धन और इन्द्रियों के विषयों का चिन्तन करना मनुष्य के सभी पुरूषार्थों का नाश करने वाला है, क्योंकि इनकी चिन्ता से वह ज्ञान और विज्ञान से भ्रष्ट होकर, इन्ही (इन्द्रिय भोगों) में निरत होता हुआ, वृक्षादि स्थावर योनियों में जन्म पाता है । इसलिये जिसे अज्ञानान्धकार से पार होने की इच्छा हो, उस पुरूष को विषयों में आसक्ति कभी नहीं करनी चाहिये, क्योंकि यह धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति में बड़ी बाधक है ।’

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‘जो लोग मन और इन्द्रिय रूप मगरों से भरे हुए इस संसार-सागर को योगादि दुष्कर साधनों से पार करना चाहते हैं, उनका उस पार पहुँचना कठिन ही है; क्योंकि उन्हें कर्णधार रूप श्रीहरि का आश्रय नहीं है । अतः तुम तो भगवान के आराधनीय चरण-कमलों को नौका बनाकर अनायास ही इस दुस्तर दुःख-समुद्र को पार कर लोगे | भगवान सनकादि के इस अमृतमय उपदेश से आप्यायित होकर आदिराज पृथु ने उनकी स्तुति करते हुए पुनः उनकी श्रृद्धा-भक्तिपूर्वक सविधि पूजा की ।

फिर आया कल्प का अंत | ऋषिगण, कल्पान्त में हुई प्रलय के कारण पिछले कल्प का आत्मज्ञान भूल गये थे । श्री भगवान ने अपने इस अवतार (सनकादी मुनियों के अवतार) में उन्हें यथोचित उपदेश दिया, जिससे उन लोगों ने शीघ्र ही अपने हृदय में उस तत्त्व का साक्षात्कार कर लिया ।
सनकादि मुनि अपने योगबल से अथवा ‘हरिः शरणम्’ मंत्र के जप-प्रभाव से सदा पाँच वर्ष के ही कुमार बने रहते हैं ।

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ये प्रमुख योगवेत्ता, सांख्यज्ञान-विशारद, धर्मशास्त्रों के आचार्य तथा मोक्षधर्म के प्रवर्तक हैं । श्रीनारद जी को इन्होंने श्रीमदभागवत का उपदेश किया था भगवान सनत्कुमार ने ऋषियों के तत्त्वज्ञान-सम्बन्धी प्रश्न के उत्तर में सुविस्तृत उपदेश देते हुए बताया था-‘विद्या के समान कोई नेत्र नहीं है ।

सत्य के समान कोई तप नहीं है । राग के समान कोई दुःख नहीं है और त्याग के समान कोई सुख नहीं है । पापकर्मों से दूर रहना, सदा पुण्यकर्मों का अनुष्ठान करना, श्रेष्ठ पुरूषों के-से बर्ताव और सदाचार का पालन करना-यही सर्वोत्तम कल्याण का साधन है ।’

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