मृत्यु के बाद अपनों का प्राकट्य, एक रहस्यमय अनुभव


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मृत्यु के बाद अपनों का प्राकट्य, एक रहस्यमय अनुभव

मरने के बाद किसी प्राणी का सूक्ष्म शरीर अपने प्रेमी या जिसमें उसका चित्त लगा रहता है, अक्सर उसके पास पहुंच जाता है | कभी-कभी तो मृत्यु को प्राप्त हुआ वह प्राणी अपनी अशरीरी उपस्थिति का अहसास करा देता है और कभी-कभी चाह कर भी ऐसा कर पाने में बिलकुल असमर्थ होता है | ज़िन्दगी भर कुकर्म किये हुए मनुष्य, मरने के बाद बहुत ही असहाय स्थिति में होते हैं |

कभी-कभी तो उनसे ठीक से खड़ा भी नहीं हुआ जाता | कुछ भयंकर किस्म के प्राणी उन्हें लगभग घसीटते हुए ले जाते हैं | उस समय उन्हें अपने द्वारा किये गए, ज़िदगी भर के सारे कुकर्मों पर अत्यधिक पछतावा हो रहा होता है | इन सब के विपरीत अच्छे स्वभाव और अच्छे कर्म वाले मनुष्यों के साथ दिव्य अनुभवों की एक श्रृंखला सी शुरू हो जाती है |

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अक्सर ऐसा देखा गया है कि मृत्यु के उपरांत भी कुछ लोगों ने अपने संदेशों को उन तक पहुंचा दिया है जिन तक वे संदेशों को पहुँचाना चाहते थे | ऐसी ही एक घटना राकेश चौधरी जी के साथ घटी | आज से सत्तर वर्ष पूर्व घटी उस घटना के संस्मरण में वे लिखते हैं कि “मेरे पिताजी का जब स्वर्गवास हुआ तो मैं उस समय वाराणसी में सन्मार्ग में कार्य करता था |

उस समय तक मेरी पढाई-लिखाई पूरी हो चुकी थी | पिताजी का मेरे ऊपर अधिक स्नेह था | इस अधिक स्नेह होने के कई कारण थे | सन 1948 के मार्च महीने की घटना थी जब उनकी हृदय की गति अचानक रुक जाने के कारण वे सहसा मृत्यु को प्राप्त हुए | उनकी मृत्यु का समाचार मिलने पर मै बहुत उद्वेलित हो गया था |

मैं छुट्टी ले कर कार्यालय से अपने निवास स्थान चला आया और दिन भर उदासीन होकर बैठा रहा और आंसू बहाता रहा | पर शाम को अचानक मेरे बड़े भाई साहब मेरे पास पहुंचे | उनको देखते ही मेरे मन में एक क्षीण से आशा उभरी लेकिन उनके मुख से भी पिता जी की मृत्यु का समाचार सुनकर मैं रोने लगा | मैं उस विपत्ति का समाचार सुनने को तैयार नहीं था |

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अंत में अपने कर्तव्य को निभाने मैं मणिकर्णिका घाट पहुंचा | पिताजी का शव वहां आ चुका था | उनके अंतिम समय, मै उनका दर्शन ना कर सका | उनका चित्त मुझे देखने के लिए लालायित था | मेरा दिल बैठा जा रहा था | मेरे घर से रेलवे स्टेशन और तार घर भी बहुत दूर थे | पिताजी का प्रातः 5:00 बजे देहांत हुआ था, अतः घर के लोगों ने शव को काशी ले आना ही उचित समझा था |

मणिकर्णिका घाट पर जब मैं पिताजी के शव में आग लगाने के लिए प्रदक्षिणा करने लगा तो मुझे एकदम से प्रतीत हुआ कि पिताजी स्पष्ट कह रहे हैं “देखो, घबराना नहीं; अपने भाइयों और परिवार को भली-भांति संभालना | तुम्हारे भाइयों को किसी प्रकार का दुख ना हो” | यह सुनकर मैं थोड़ी देर तक स्तब्ध हो कर वही खड़ा रहा | उस समय अत्यधिक दुखी होने की वजह से मै कुछ विशेष रुप से समझ नहीं सका |

पिताजी मरने के पूर्व पूरी तरह स्वस्थ थे | उस दिन शमशान पर चिता के पास मैंने जो अनुभव किया और सुना वह मै कभी ज़िन्दगी भर नहीं भूल सकता” |

इसी प्रकार से एक दूसरी घटना में एक संभ्रांत व्यक्ति ने अचानक अपने सामने जागृत अवस्था में अपने वृद्ध भाई को, जो कि पुलिस विभाग में एक अधिकारी था, खादी वर्दी में देखा | उसका चेहरा पीला पड़ चुका था तथा वह उससे विदा ले रहा था |

भाई के पूछने पर उसने कहा कि “मुझे गोली लगी है” | भाई ने फिर पूछा “कहां गोली लगी है?” इस पर उसने बताया “फेफड़े में” | अभी उसका भाई कुछ और पूछ पाता इससे पहले वह छाया गायब हो गई | सबसे बड़ी बात इस तरह बात करने वाला भाई स्वप्न नहीं देख रहा था, बल्कि पूरी तरह से जग रहा था | भौचक्के हो कर उस व्यक्ति अपनी घड़ी की ओर देखा उस समय घड़ी में भोर के 4:10 हुए थे |

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दो दिन बाद उन्हें समाचार मिला कि उनके भाई, छाया दिखने वाली रात को 11:00 और 12:00 के मध्य, अपना कर्तव्य निभाते हुए, एक बदमाश से मुठभेड़ के दौरान शहीद हो गए |