देवी रक्तदन्तिका कौन हैं
देवी भुवनेश्वरी ने हमेशा विविध प्रकार के अवतार – लीलाओं के द्वारा दुष्ट दैत्यों का शर्वनाश करके इस संसार को सदैव ही विनाश से बचाया है। देवी भुवनेश्वरी ने आर्तजनों को हमेशा ही कष्ट से दूर किया है। शुम्भ निशुम्भ …
देवी भुवनेश्वरी ने हमेशा विविध प्रकार के अवतार – लीलाओं के द्वारा दुष्ट दैत्यों का शर्वनाश करके इस संसार को सदैव ही विनाश से बचाया है। देवी भुवनेश्वरी ने आर्तजनों को हमेशा ही कष्ट से दूर किया है। शुम्भ निशुम्भ …
स्वारोचिष मन्वन्तर के समय की बात है। चैत्र वंश में सुरथ नाम के एक वीर राजा थे , जो राजा विरथ के पराक्रमी पुत्र थे। राजा विरथ बहुत ही दानी, धार्मिक और सत्यवादी राजा थे। राजा सुरथ के पिता विरथ …
एक बार जब देवताओं और दैत्यों में भयंकर युद्ध छिड़ गया और देवताओं को इस भीषण युद्ध में विजय प्राप्त हुई । युद्ध को जीतने के बाद देवताओं के हृदय में अहंकार की भावना उत्पन्न होने लगी । सभी देवता …
प्राचीनकाल में महिषासुर नामक एक महा पराक्रमी असुर का जन्म हुआ था , जो रम्भ नामक असुर का पुत्र था एवं दैत्यों का सम्राट था। उसने युद्ध में सभी देवताओं को हराकर इन्द्र के सिंहासन पर अपना अधिकर जमा लिया …
सूर्य अवतार आचार्य निम्बार्क के काल के विषय में बड़ा मतभेद है। इनके भक्त इन्हें द्वापर में पैदा हुआ बताते हैं। इनके कोई-कोई मतानुयायी ईसा की पांचवीं शताब्दी में इनका जन्मकाल बताते हैं। वर्तमान अन्वेषकों के बड़े प्रमाण से इन्हें …
आनंदकन्द भगवान श्री कृष्ण चन्द्र की जन्मभूमि, केलि-क्रीड़ा एवं लीला स्थली होने का गौरव प्राप्त होने से व्रज भूमि भारत वर्ष मे अति पावन है। इस व्रज भूमि में गोपाल कृष्ण की गौचारण-स्थली एवं गोचर भूमि गोवर्धन का अपना विशिष्ट …
इस ब्रम्हाण्ड में भगवान के जो भी अवतार हो चुके हैं या भविष्य में होने वाले है , बड़े-बड़े विद्वानों द्वारा भी उनकी गणना नहीं की जा सकती है। भगवान का रूप सत्य है; वह तीनों कालों में , सभी …
मनुष्य एवं ईश्वर का संबंध पूर्वकाल से ही एक ऐसी मानवीय भूमि पर प्रतिष्ठित है , जहां एक के उत्क्रमण और दूसरे के अवतरण के द्वारा परस्पर आकर्षण होता रहा है। ईश्वर मनुष्य की स्वानुभूतियों से ऊपर इच्छामय , प्रेममय …
श्री गंगा के उत्पत्ति में मूल कारण तपस्या है । भारतीय संस्कृति में तप के महत्व को सर्वाेच्च माना गया है । तप द्वारा अकथनीय ऊर्जा की उत्पत्ति होती है। राजा भागीरथ ने हजारों वर्षों तक तपस्या कर ब्रह्मा जी …
नवनीरद-श्याम, कोटि कन्दर्प लावण्य-लीला धाम, वनमाला विभूषित, पीताम्बरधारी भगवान श्री कृष्ण परब्रह्म परमात्मा हैं। प्रलय के समय स्वरूपा प्रकृति इनमें क्रियाशीला हो जाती है। सृष्टि के अवसर पर परब्रह्म परमात्मा स्वयं दो रूपों में प्रकट हुए-प्रकृति और पुरूष। परब्रह्म परमात्मा …