मधु-कैटभ के वध की कथा

मधु-कैटभ के वध की कथास्वारोचिष मन्वन्तर के समय की बात है। चैत्र वंश में सुरथ नाम के एक वीर राजा थे , जो राजा विरथ के पराक्रमी पुत्र थे। राजा विरथ बहुत ही दानी, धार्मिक और सत्यवादी राजा थे। राजा सुरथ के पिता विरथ की मृत्यु के बाद राज्य के शासन की बागडोर उनके हाथों में आ गई । वह योग्यतापूर्वक प्रजा का पालन और राज्य का संचालन करने लगे। एक बार नौ राजाओं ने पूरी तैयारी के साथ राजा सुरथ की राजधानी कोलापुरी को चारों ओर से घेर लिया।

राजा सुरथ ने बड़ी वीरता से अपनी शत्रुओं का सामना किया, किंतु उनकी संख्या न्यून होने के कारण संयोगवश इन्हें पराजित होना पड़ा। शत्रुओं ने सुरथ के राज्य को अपने अधिकार में लेकर उन्हें कोलापुरी से निकाल दिया। राजा अपने दूसरे नगर में शत्रुओं को खदेड़ने के लिये सेना का संगठन करने लगे, किंतु उनके मंत्री आदि ने इनके साथ विश्वासघात कर दिया । वे क्षुद्र स्वार्थ की पूर्ति के लिये शत्रुओं से जा मिले जिसकी वजह से उनके शत्रुओं ने उन पर आक्रमण कर के उन्हें वहां से भी भगा दिया।

विवश होकर सुरथ को वन में शरण लेना पड़ा जहाँ वन में उन्होंने मेधा मुनि का आश्रम देखा। मेधा मुनि के तप के प्रभाव से वहां के सभी हिंसक जीव अपनी हिंसा – वृत्ति को छोड़ कर परस्पर भाई चारे के भाव से रहते थे। मुनि के सुशासित शिष्य आश्रम की शोभा में चार चाँद लगा रहे थे। राजा सुरथ को वह आश्रम बहुत अच्छा लगा; अतः वह उस आश्रम में चले गये। मुनिवर मेधा ने मीठे वचन, आसन, जल और भोजन से राजा का सुंदर आतिथ्य किया जहाँ राजा ने अपने कुछ दिन व्यतीत किये ।

एक दिन वह अपने दुर्भाग्य पर दुःखी हो कर चिंतन कर रहे थे। उस समय वह मोह से आविष्ट होकर बहुत दुःखी हो रहे थे की ठीक उसी समय उनके पास समाधि नामक एक वैश्य आ पहुंचा, जो बहुत उदास था। राजा ने उससे पूछा ‘भाई! तुम कौन हो ? बहुत ही दुःखी दिखायी दे रहे हो, अपने दुःख का कारण तो बताओ।’ वैश्य ने कहा  ‘हे राजन्! मैं धनाढय कुल में उत्पन्न समाधि नाम का वैश्य हूँ। मुझे अपने ही पुत्रों और स्त्री आदि ने धन के लोभ से मुझे घर से निकाल दिया है।

मै  विवश होकर यहां चला आया हूँ; किंतु यहां आने पर भी पुत्र आदि का स्नेह मुझे पीड़ित कर रहा है। मै यही सोचता हूं कि वे किस तरह रह रहे होंगे ? मेरी बड़ी इच्छा होती है कि काश कोई यह कह दे कि वे सब सकुशल हैं। उनका कुशल समाचार न पाने से मुझे रूलाई आ रही है।’ राजा ने पूछा ‘जिन लोगों ने शत्रुता का व्यवहार किया, धन छीन लिया और घर से बाहर निकाल दिया, उनके प्रति तुम्हारा इतना स्नेह क्यों हो रहा है’? वैश्य ने उत्तर दिया-‘आपके इस प्रश्न का उत्तर मेरे पास नहीं है।

आपका कहना यथार्थ है कि जो मेरे प्रति शत्रुता कर रहे हैं, उनके प्रति मुझे स्नेह नहीं करना चाहिये। उनकी आसक्ति त्याग कर भगवान की ओर लगना चाहिये; किंतु उलटे मेरा चित्त उधर ही लगा हुआ है, इसका क्या कारण है, यह मैं नहीं जानता। मेरे मन में साथ ही यह भी जानने की इच्छा है कि उधर से मेरा मन किस प्रकार हट जाय, इसके लिये मै क्या करूँ यह मुझे समझ नहीं आ रहा है।’ इस प्रश्न का उत्तर न राजा सुरथ के पास था और न वैश्य के पास।

अतः दोनों मेधा मुनि के सामने उपस्थित हो गए । दोनों की समस्या एक ही थी। दोनों स्वजनों द्वारा उपेक्षित थे, फिर भी दोनों उन्हीं की ममता से दुःख पा रहे थे। मुनि ने कहा ‘भगवान विष्णु की योग निद्रा रूपी जो महामाया हैं, उन्हीं के द्वारा यह सारा संसार मोहित हो रहा है। वह ज्ञानियों के चित्त को भी बलपूर्वक् खींच कर मोह में डाल दिया करती है; किंतु विद्यारूप से वह ही मुक्ति भी प्रदान करती हैं। उनकी शरण में जाने से ही मोह से छुटकारा मिल सकता है।’

राजा ने पूछा “ये महामाया कौन हैं? उनका आविर्भाव कैसे हुआ? उनके चरित कौन-कौन हैं”? मुनि बोले “सुनो, प्रलय काल का समय था। एकार्णव के जल में सब कुछ डूबा हुआ था। शेष शय्या पर भगवान विष्णु योग निद्रा का आश्रय लेकर शयन कर रहे थे। उस समय उनके कानों के मैल से मधु और कैटभ नाम के दो असुर उत्पन्न हुए। वह दोनों ब्रह्मा जी को तप में लीन देख उन्हें परेशान करने लगे । जिससे  तंग आ कर ब्रम्हा जी उन दोनों से बचने का उपाय सोचने लगे अतः वह झट उस शक्ति की स्तुति करने लगे, जो विष्णु भगवान को सुला रही थी।

उन्होंने माता शक्ति से विष्णु भगवान को जगाने और असुरों को मोहित करने के लिये प्रार्थना की। ब्रह्मा जी की स्तुति से प्रसन्न होकर महामाया प्रकट हो गयीं। ये ही महामाया महाकाली नाम से प्रसिद्ध हैं। ये भगवान विष्णु की योग निद्रा हैं। ये तमोगुण की अधिष्ठात्री देवी हैं। इनका आविर्भाव भगवान विष्णु के नेत्र, मुख, नासिका, बाहु, हृदय और वक्षःस्थल से हुआ था। योग निद्रा से मुक्त होते ही भगवान विष्णु शय्या से उठ कर बैठ  गए।

उनकी दृष्टि जब दोनोें असुरों पर पड़ी तब वे दोनों ब्रह्मा जी को खाने के लिये तैयार थे। भगवान विष्णु ने उन्हें रोका और उनके बीच लगभग पांच हजार वर्ष तक युद्ध होता रहा; किंतु वे दोनों हारते नहीं दीख रहे थे। तब महामाया ने उन दोनों को मोहित कर दिया और उन दोनों की  बुद्धि बदल गयी। वे सोचने लगे कि ‘हम दोनों मिल कर जी-जान से लड़ रहे हैं और यह अकेला है, फिर भी हार नहीं रहा है।’ इस तरह उन दोनों की बुद्धि में प्रतिस्पर्धा के बदले भगवान विष्णु के प्रति ‘श्रद्धा’ उत्पन्न हो गयी।

उन दोनों ने प्रसन्न होकर तब विष्णु से कहा “हम दोनों तुम्हारे पराक्रम से प्रसन्न हो गए हैं। अब तुम हमसे उचित वर मांग लो।” भगवान विष्णु ने कहा “यदि तुम वर देना ही चाहते हो तो यह वर दो कि तुम दोनों मेरे हाथों मारे जाओ।” दैत्यों को अब अपनी भूल मालूम पड़ गई; किंतु उन्होंने चालाकी से काम लिया। उन्होंने देखा कि यहां कहीं स्थल तो नहीं है। सब जगह पानी ही पानी है अतः कहा “तथास्तु, किन्तु तुम हमें ऐसी जगह पर मार पाओगे, जहां जल न हो।”

उन्होंने सोचा था कि यहां कहीं पृथ्वी तो है ही नहीं , तो हम दोनों को ये मारेगा कैसे? तब तक इन्हें वह दोनों ही दबोच लेंगे। भगवती महामाया शक्ति तो ‘श्रद्धा’ के साथ-साथ ‘बुद्धि’ रूप में भी स्थित हैं अतः वह भगवान विष्णु की बुद्धि में स्थित हो गयीं , जिससे उन्होंने उन्हें अपनी विशाल जाँघों पर पटक कर उनके मस्तक काट गिराये क्योंकि जांघों पर तो जल नहीं था। इस तरह ब्रह्मा जी की स्तुति से संतुष्ट हुई महाकाली , जो तमोगुण की अधिष्ठात्री देवी योग निद्रारूपा हैं, प्रकट हुई थीं और मधु-कैटभ के वध का कारण बनी थीं ।