भगवान शिव और ब्रह्मा जी का परमपिता परमेश्वर से सम्वाद


PARAMPITA PARMESHWAR

भगवान शिव और ब्रह्मा जी का परमपिता परमेश्वर से सम्वाद

मालावती की चीत्कार सुनकर वहाँ उपस्थित सभी का ह्रदय दहल उठा | प्राणों से भी अधिक प्रिय उसके पति उपबृहड़ ने भगवान कृष्ण के नाम का उच्चारण करते हुए अपना शरीर त्याग दिया था | यह ह्रदय विदारक दृश्य देख कर उसके श्वसुर (उपबृहड़ के पिता) गंधर्वराज ने भी सपत्नीक योग विद्या द्वारा अपने प्राण त्याग दिए थे |

मालावती अधीर हो चुकी थी | करुण विलाप करती हुई मालावती ने भगवान विष्णु, शिव, ब्रह्म, धर्मराज आदि सभी की स्तुति करके अपने पति के प्राण वापस कर देने के लिए प्रार्थना करते हुए उनसे कहा- “मुझे इंद्र पद या मोक्ष की कामना नहीं, अमरत्व भी मुझे नहीं चाहिए | आप केवल मुझे मेरे पति को लौटा दे |

धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष- इन चारों पदार्थों को प्राप्त कराने वाले मेरे श्रेष्ठ देवता मेरे पतिदेव ही हैं | अतः आप मुझ पर दया करें | हे करुणामय ! आप मेरे पति का प्राण शीघ्र लौटा दे” | इसके बाद अपने पति उपबृहड़ के रूप गुणों का बखान करती हुई मालावती अचानक क्रुद्ध होकर ब्रह्मा, विष्णु, महेश और धर्म आदि समस्त देवताओं को शाप देने के लिए उद्यत हो गई |

उसी समय ब्रह्मा जी और महेश्वर के साथ संपूर्ण देव समुदाय कौशिकी नदी के तट पर मालावती के सामने उपस्थित हो गया | भयभीत देवतागण ब्रह्मा जी के पीछे हाँथ बांधे खड़े थे लेकिन उन्हें भगवान विष्णु से, इस आसन्न शाप-संकट से छुटकारा पाने का आश्वासन मिल चुका था | देवताओं ने अप्रतिम सुन्दरी साध्वी मालावती के तेज को देखा, वह अपने पति का शव अपनी गोद में उठाये करुण विलाप कर रही थी |

उसी समय अचानक से श्वेत वस्त्र पहने हुए, दंड, छत्र, उठाये और उज्जवल तिलक धारण किए तथा हाथ में एक बड़ी सी पोथी लिए मुस्कुराता हुआ एक तेजस्वी ब्राह्मण कुमार उन देवताओं के बीच प्रकट हुआ और उनकी अनुमति से उनके बीच बैठता हुआ मालावती से बोला- “तुम्हारी गोद में यह मृत शरीर किसका है? जीवित सुंदरी के समीप शव का क्या प्रयोजन है?”

विलाप करती हुई मालावती ने देवताओं तथा ब्राह्मण कुमार से अत्यंत विनम्रता पूर्वक कहा “मैं चित्ररथ की पुत्री हूं | यह मेरे प्राणों से भी अधिक प्रिय पति उपबृहड़ का शव है | मैंने अपने इन पतिदेव के साथ एक लाख दिव्य वर्षों तक सुरम्य स्थलों पर स्वच्छंद विहार किया है | द्विजेंद्र ! मेरे पति ने अकस्मात ब्रह्मा जी के श्राप से अपने प्राणों का त्याग किया है |

लेकिन आप जानते हैं कि साध्वी स्त्रियों का प्राण उनके प्राणपति के चरणों में ही बसता है | अतः मैं अत्यंत दुखी हो कर, विलाप करती हुई देवताओं से अपने पति के प्राणों की भीख मांगती हूं | देव समुदाय समर्थ है | मुझे मेरा प्राणपति लौटा दें, यह मैं देवताओं से बार-बार याचना कर रही हूं किंतु यदि मेरे पति के प्राण नहीं लौटाए गए, तो मैं इन्हें स्त्री वध का ही पाप नहीं, दुर्निवार शाप दे सकती हूं |”

“निश्चय ही देवता कर्म फल देने में तत्पर रहते हैं” | तेजस्वी ब्राह्मण कुमार ने मालावती से कहा- “लेकिन उस में थोड़ा समय लगता है | जैसे बीज बो देने पर उसका फल तुरंत नहीं बल्कि कुछ देर से मिलता है उसी प्रकार कर्मफल भी देर से मिलता है | मनुष्य के कर्मों का फल निश्चय ही उसे प्राप्त होता है |

ब्रह्मा, विष्णु, महेश, सूर्य, धर्म एवं दुर्गा आदि देवताओं की भक्ति एवं उपासना से अनेक फल प्राप्त होते हैं | श्री कृष्ण की भक्ति एवं अर्चना से तो भक्तों के पितृ एवं मातृ कुल की सैकड़ों पीढ़ियां तर जाती हैं |

श्री कृष्ण भक्तों से पाप दूर भगाते हैं, तुम्हारे पति की मृत्यु किस रोग से हुई है”? ब्राम्हण कुमार ने आगे कहा “मैं चिकित्सक भी हूं, तुम मुझे बताओ, सात दिवस तक मरे हुए प्राणियों को जीवन दान देने में, मै समर्थ भी हूं | मैं जरा, मृत्यु, यम, काल तथा व्याधियों को बांधकर तुम्हारे सम्मुख उपस्थित कर सकता हूं |

योग एवं रोग से देह त्याग करने वाले को जीवित करने की सामर्थ्य भी मुझ में है | तुम्हारे पति ने किस प्रकार शरीर त्याग किया है, बस, इतना मुझे बतला दो |” अब मालावती समेत वहाँ उपस्थित देवतागण भी चौंके |

“आपने मेरे स्वामी को पुनर्जीवन देने का वचन दिया है |” अत्यंत प्रसन्नता एवं आश्चर्य के साथ मालावती ने कहा “सत्य पुरुषों की वाणी कभी मिथ्या नहीं होती | अतः अब मेरे पति के पुनः जीवित हो जाने में मुझे कोई संदेह नहीं रहा | किंतु इसके पूर्व, मैं आपसे कुछ कहना चाहती हूँ |

द्विजेंद्र ! आप कृपापूर्वक काल, यम और मृत्यु कन्याओं को मेरे सामने बुला दीजिए | आप ऐसा करने में समर्थ हैं |” ब्राह्मण वेशधारी परमात्मा के प्रभाव से यम, मृत्यु कन्या और काल सभी वहाँ क्षण मात्र में उपस्थित हो गए | मालावती ने मन-ही-मन परमेश्वर का ध्यान और उनको प्रणाम किया फिर वहाँ उपस्थित धर्मराज से कहा “धर्मनिष्ठ धर्मराज ! असमय में ही आप मेरे प्राणनाथ को कैसे लिए जा रहे हैं?”

“समय पूरा हुए बिना तथा परमेश्वर की आज्ञा के बिना किसी की मृत्यु नहीं होती |” यमराज ने बड़े प्रेम से उत्तर दिया “मैं, काल, मृत्युकन्या तथा अत्यंत दुर्जय व्याधियां, आयु पूर्ण होने पर ही ‘ईश्वर की आज्ञा से’ जीव को उसके शरीर से अलग कर ले जाती है | यह मृत्यु कन्या विचारवान है | तुम उससे पूछ सकती हो कि वह किस कारण से जीव को प्राप्त होती है |”

“हे सखी !” मालावती ने वहाँ उपस्थित मृत्यु कन्या की ओर देखा | वह अत्यंत भयंकर, काली तथा लाल वस्त्र पहने हुए थी | उसके 6 भुजाएं थी वह मंद मंद मुस्कुरा रही थी | वह महासती थी | अपने पति काल के बाएं भाग में अपने 64 पुत्रों के साथ खड़ी मालावती की ओर देख रही थी |

मालावती ने बड़े ही प्यार से उससे पूछा “तुम स्त्री होने के कारण पति वियोग की पीड़ा से परिचित हो | मेरे जीवित रहते मेरे प्राण नाथ का प्राण हरण क्यों कर रही हो?”

“आदरणीय देवी !” मृत्यु कन्या ने बड़े ही स्नेह से उत्तर दिया “बहुत पहले ही विधाता ने इस कर्म के लिए मेरी सृष्टि की | तीव्र इच्छा होने पर और कठोर तप करके भी मैं इस कार्य को छोड़ सकने में समर्थ ना हो सकी | काल की प्रेरणा से ही मै तथा मेरे पुत्र व्याधिगण किसी प्राणी का स्पर्श करते हैं | अतः मैं तथा मेरे पुत्र निर्दोष हैं | इस संबंध में तुम धर्मज्ञ काल से पूछ लो | फिर जैसा उचित हो करना |”

परमेश्वर के सनातन अंश, कर्मों के साक्षी, धर्म स्वरूप, कालदेव ! काल का प्रचंड तेज, उग्र स्वरूप, छह मुख, 16 भुजाएं, 6 पैर तथा लाल दहकते हुए वस्त्रों से आवृत्त काले रंगों को देखकर मालावती एक बार सहम गयी | उनके हाँथों में अक्षमाला थी जिससे उनके मुख परमेश्वर का नाम जप रहे थे | मालावती ने अपने सामने व्याधि समूहों को भी देखा, जो अत्यंत दुर्बल और बूढ़े होने पर भी अपनी माता का दूध पीते दिख रहे थे |

मालावती ने काल से पूछा “आप सर्वज्ञ हैं, मेरे जीते जी मेरे स्वामी को क्यों लिए जा रहे हैं?” “देवी मालावती !” काल ने बड़े ही शांति से उत्तर दिया “मुझमें, यमराज में, मृत्यु कन्या तथा व्याधियों में तनिक भी सामर्थ नहीं कि हम कुछ कर सकें | हम सब सदा ईश्वर की आज्ञा से अपने कर्तव्य पालन में तत्पर रहते हैं |

समूची सृष्टि एवं देव समुदाय तथा माया को भी मोहित करने वाली माया जिनके द्वारा निर्मित है, जिनके भ्रू- संचालन से देव, यक्ष, किन्नर, विद्याधर आदि जीवन धारण करते हैं; सूर्य प्रकाशित है, वायु बहती हैं, वसुधा क्षमाशील है और वेद जिनकी ‘नेति नेति’ कहकर स्तुति करते हैं, वे श्री कृष्ण ही सर्वेश्वर हैं |

वह कालों के भी काल तथा परब्रह्म परमेश्वर है | संपूर्ण अलौकिक, पारलौकिक सुखों के दाता उन श्री कृष्ण का तुम चिंतन करो, तुम्हारा कल्याण होगा|” “देवी मालावती !” ब्राह्मण कुमार ने उपबृहड़ की पत्नी से कहा “तुमने काल, यम, मृत्यु कन्या तथा व्याधियों को देख लिया |अब तुम्हारे मन में और कुछ संदेह हो तो उसका भी निवारण कर लो |”

“दयालु द्विजेंद्र !” मालवती ने अत्यंत विनयपूर्वक कहा “आप दुखियों पर दया करने वाले हैं | रोग आदि के कारण तथा अन्य कल्याणकारी बातें आप मुझे बताएं |” “रोग का पापों के साथ अत्यंत घनिष्ठ संबंध है” ब्राह्मण कुमार ने बिलकुल शांत भाव से उत्तर दिया |

“पाप ही रोग, बुढ़ापा, दुख एवम भयंकर शोक का कारण है | इसलिए पाप से सदा सावधानी पूर्वक बचते रहना चाहिए | किंतु उत्तम आचरण एवं व्यवहार तथा धर्माचरण संपन्न जीवन जीने से पाप की छाया भी समीप नहीं आती | ऐसे परुषों के समीप जरा एवं दुर्जय रोग समूह नहीं जा पाते | देवी ! तुम्हारे पति के शरीर का अंत किस रोग से हुआ है ? मुझे बताओ, मैं इन्हें जीवित करने का प्रयास करूंगा |

अभी तक वहाँ उपस्थित देवगण, लोकपितामह ब्रह्मा तथा महेश्वर आदि को नहीं समझ में आया कि यह तेजस्वी ब्राह्मण कुमार कौन है | परमेश्वर की माया से सभी मोहित थे वहाँ |

“विपत्ति भी धन्य होती है |” मालावती ने ब्राह्मण वेशधारी परमेश्वर से निवेदन किया “जिसके द्वारा आप जैसे महान आत्माओं का दुर्लभ संग सुलभ हो जाता है | आपकी सारगर्भित वाणी से मेरा बड़ा उपकार हुआ है |”

मालावती ने आगे कहा “मेरे स्वामी ने ब्रह्मा जी के शाप से अपने योगबल से शरीर का त्याग किया है | आप कृपा करके इन्हें शीघ्र जीवित कर दीजिए मैं आप समस्त देवताओं के चरणों में प्रणाम कर पति के साथ घर लौट जाऊंगी |”

“देवताओं !” ब्राह्मण वेशधारी परमात्मा ने अपने माया से मोहित देव समुदाय की ओर देखा | उनकी माया से मोहित देवताओं को यह याद ही नहीं रहा कि जब वे मालावती के आसन्न शाप से भयभीत हो कर श्वेत दीप में श्री विष्णु (परमेश्वर) की प्रार्थना कर रहे थे तो वहाँ हुई आकाशवाणी के अनुसार परमेश्वर के वहाँ आने का निश्चित आश्वासन पाकर ही वे सब यहां आए थे |

ब्राह्मण कुमार के वेष में शेषशायी श्री विष्णु ने कहा “उपबृहड़ की पत्नी देवी मालवती शाप देने के लिए प्रस्तुत थी, पर इस समय मैंने इनका क्रोध शांत कर दिया है | अब इनके पति को जीवित करने के लिए क्या करना चाहिए ? और श्री विष्णु क्यों नहीं आये यहाँ ? श्वेत द्वीप में आप लोगों ने श्री हरि की स्तुति की थी, और आकाशवाणी भी हुई थी कि आप लोग चलें, श्री विष्णु भी पीछे आयेंगे |”

ब्राह्मण की बात के बीच में ही लोक पितामह ब्रह्मा जी बोल उठे “मेरे पुत्र नारद ही श्राप के कारण उपबृहड़ नामक गंधर्व के रूप में जन्मे थे |” उन्होंने आगे कहा “और मेरे ही शाप की वजह से उन्होंने योगबल से अपने शरीर का त्याग किया है |

इस पृथ्वी पर उनका जीवन एक लाख युग तक नियत था | इसके बाद वो शूद्र योनि में जन्म लेंगे और उस शरीर के त्याग के बाद फिर से मेरे पुत्र के रूप में प्रतिष्ठित हो जाएंगे | अभी इस धरती पर इनकी आयु के एक सहस्त्र वर्ष अभी शेष हैं |

मैं परमेश्वर की कृपा से देवताओं को श्राप से बचाने के लिए उपबृहड़ को जीवनदान दूंगा |” “वो सब तो ठीक है लेकिन भगवान विष्णु यहाँ क्यों नहीं आए?” ब्राह्मण कुमार ने पुनः प्रश्न किया |

वहाँ उपस्थित ब्रह्मा जी ने कहा “आपका यह प्रश्न ठीक नहीं है ब्राह्मण देव ! वह सर्वात्मा हैं, सर्वज्ञ हैं, सर्वत्र हैं, सर्वकालिक हैं, सर्वव्यापक हैं और सर्वेश्वर हैं | मैं, संहार कारी शिव, कर्मों के साक्षी धर्म, काल, यम, सर्वजननी प्रकृति- सभी जिनसे भयभीत एवं जिनके आज्ञापालन में तत्पर रहते हैं, वे आद्यंत मंगल कर भगवान विष्णु ही सर्वेश्वर हैं |”

“तुम बालक होकर भी अपने तेज से देवताओं को तिरस्कृत कर रहे हो |” अबकी बार भगवान शंकर ने कटाक्ष किया “किंतु सर्वान्तर्यामी, सर्वेश्वर, परमात्मा श्री विष्णु को नहीं जानते यह आश्चर्य की बात है |”

“ब्राह्मण !” महेश्वर आगे बोले “गोलोक धाम में विराजने वाले श्री कृष्ण ही बैकुंठ और श्वेत द्वीप में भी है | मैं उन महिमामय परब्रह्म परमेश्वर श्रीकृष्ण की एक कला मात्र हूं | उनकी महिमा का बखान करना संभव नहीं |” “तुम्हारी बात से मुनियों को मतिभ्रम हो सकता है |”

महेश्वर के शांत होते ही धर्म बोलने लगे “जो विष्णु सबकी अंतरात्मा से प्रत्यक्ष हैं, सर्वत्र विद्यमान हैं, उनके लिए तुम्हारे वचन उचित नहीं हैं | जिस स्थान पर परमेश्वर की निंदा हो वह स्थान अपवित्र हो जाता है |

“आदरणीय देवताओं !” ब्राह्मण कुमार ने मुस्कुराते हुए कहा “मैंने तो यही कहा कि आकाशवाणी के अनुसार श्री विष्णु यहां नहीं पधारे | उनकी निंदा करना मेरा उद्देश्य नहीं | आप सब धर्मात्मा एवं सत्य वक्ता है | लेकिन कृपया मुझे यह बतायें कि अगर विष्णु सर्वत्र और सर्वव्यापक हैं तो आप लोगों ने उनसे वर् की याचना करने के लिए श्वेत द्वीप जाने का कष्ट क्यों किया ?

यदि अंशी और अंश में भेद नहीं तो श्रेष्ठ पुरुष अंश को छोड़कर पूर्णतम अंश की उपासना क्यों करते हैं? “श्री विष्णु एक देश में रहते हैं” कुछ रुक कर ब्राह्मण कुमार ने पुनः कहा “विधाता, महेश्वर, धर्म तथ दिक्पाल आदि सभी एक देश के ही वासी हैं | ब्राह्मण एवं उनके देवता असंख्य हो सकते हैं लेकिन उन सब के स्वामी सर्वेश्वर श्री कृष्ण ही हैं जिनके अन्दर सब समाहित हैं”|

“देवेश्वर सुरेश !” ब्राह्मण वेशधारी श्री विष्णु ने आगे कहा “उपबृहड़ को शीघ्र जीवित कीजिए | “यहां वाग्युद्ध युद्ध से कोई लाभ नहीं होने वाला है |” यह कहकर ब्राह्मण कुमार मुस्कुराने लगे ! श्री विष्णु की माया से मोहित ब्रह्मादि देवता मालावती के पास पहुंचे | ब्रह्मा जी ने अपने कमंडलु का दिव्य जल शव पर फेंका और उसमे मन का संचार करके उपबृहड़ के शरीर को सुंदर बना दिया |

शिव जी ने ज्ञान, धर्म ने धर्म-ज्ञान और ब्राह्मण ने जीवनदान दिया | कामदेव, वायु, सूर्य और वाणी आदि देवताओं ने अपनी अपनी शक्ति और तेज उस शव में दिए लेकिन शव पूर्व की भांति सोता रहा | उपबृहड़ जीवित ना हो सका | वहाँ उपस्थित प्रत्येक का माथा ठनका |

“देवी मालावती !” ब्रह्मा जी ने मालावती से कहा “तुम शीघ्र ही जल में स्नान करो एवं दो धुले वस्त्र धारण कर परब्रह्म परमेश्वर श्रीकृष्ण की स्तुति करो” | मालावती, विधाता के आदेशानुसार स्नान के बाद श्री कृष्ण की स्तुति करने लगी “हे प्रभु ! आप अलक्ष्य, अनीह, सारभूत तथा मन और वाणी से परे हैं तथापि भक्तों पर अनुग्रह कर दिव्य विग्रह धारण करते और अपनी मंगलमयी लीला से उनका मंगल साधन करते हैं | आप कभी गोप बालकों के साथ क्रीड़ा करते हैं तो कभी गोपियों को सुख देते हैं और कभी गिरिराज को अपनी उंगली पर धारण करते हैं, जिसे गा गा कर भक्त सुखी होते एवं संसार सागर से तरते जाते हैं | आप की स्तुति करने में वेद और सरस्वती भी समर्थ नहीं, फिर मैं शोकातुर आपके गुणों का बखान भला किस प्रकार कर सकती हूं |”

इस प्रकार से स्तुति करने के पश्चात्, अश्रुओं से भरी हुई आँखों के साथ मालावती फिर रोने लगी | सहज करुणाकर श्री कृष्ण द्रवित होकर अपनी शक्तियों सहित उपबृहड़ के शरीर में प्रविष्ट हुए और उपबृहड़ तुरंत अपनी वीणा लिए उठ बैठे |

उन्होंने तुरंत स्नान कर नए वस्त्र धारण किए और सुर समुदाय सहित ब्राह्मण कुमार वेशधारी श्री विष्णु जी के चरणों में प्रणाम किया | देवताओं ने हर्ष के साथ दुंदुभी बजाकर पुष्पवर्षा की और उपबृहड़ तथा मालवती को आशीर्वाद दिया | गंधर्व दंपति ने कुछ देर तक देवताओं के साथ वार्ता की और समस्त देवताओं का अभिवादन करके गंधर्व नगर चले गए | देवताओं का समूह और ब्राह्मण वेशधारी श्री विष्णु भी अपने-अपने धाम की ओर चले |

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