जब भगवान स्वयम मांगने आये राजा बलि से


जब भगवान स्वयम मांगने आये राजा बलि सेसूक्ष्म जगत में हलचल तेज़ हो गयी थी | सब कुछ उलट-पुलट हो रहा था | ऐसा लग रहा था मानो कुछ अविस्मर्णीय अकल्पनीय होने वाला था | वर्षों से ब्रह्माण्डीय शक्तियों का सञ्चालन अपने हाँथ में रखने वाले देवताओं का पराभव हो गया था देवमाता अदिति अपने पुत्रों के पराभव से अत्यन्त खिन्न थीं ।

दैत्यों के महान राजा बलि पहले तो एक भीषण युद्ध में इन्द्र के दिव्य तत्वों से बने वज्र के प्रहार से क्षत-विक्षत हो गए, लेकिन दैत्यों के गुरु और ब्रह्माण्ड के महानतम वैज्ञानिकों में से एक शुक्राचार्य जी की संजीवनी-विद्या से उनका पुनरुज्जीवन हुआ ।

उसके बाद शुक्राचार्य ने दैत्यराज बलि को अद्भुत शस्त्रास्त्रों से सुसज्जित किया (जिनकी काट तीनों लोकों में किसी के पास नहीं थी), दिव्य तेज से उपबृंहित किया, फिर राजा बलि विविध लोक-लोकान्तरों को जीतकर राजा इन्द्र हो गए । सौ अश्वमेध यज्ञ करने वाले ही इन्द्र होते हैं, परंतु राजा बलि उसके पहले ही इन्द्र हो गए, फिर उसके बाद उन्होंने सौ अश्वमेध यज्ञ करने की तैयारी की ।

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उधर देवमाता अदिति ने भी परमेश्वर की आराधना की । उनके तप से भगवान् विष्णु प्रसन्न हो गये और उनके पास आये, बोले “वरदान माँगो” | अदिति ने कहा “प्रभु आप तो सर्वान्तर्यामी हैं, आप तो सब जानते ही हैं” ।

भगवान् ने कहा “हाँ ! जैसे तुम्हारे पुत्रों का पराभव हुआ है वैसे ही दैत्यों के भी प्रभुत्व का नाश हो, यही चाहती हो न तुम । लेकिन इस समय ऐसा होना असम्भव है । राजा बलि बड़ा प्रतापी है, ब्राह्मणनिष्ठ है । ब्राह्मणों का उस पर विशेष अनुग्रह है । भृगुवंशियों ने उसको सबल बना रखा है, अनन्त तेज से युक्त कर रखा है । परंतु हम तुम्हारा अभिप्राय पूरा करेंगे, भिक्षा माँगेंगे” ।

अदिति के चेहरे पर प्रश्नवाचक भाव छोड़ते हुए भगवान अंतर्ध्यान हुए |भगवान् वामन का प्रादुर्भाव हुआ । उन्हें ब्रह्मचर्य व्रत में दीक्षित किया गया । भगवती राजराजेश्वरी उमा ने स्वयं उनको भिक्षा प्रदान की । वनस्पतियों ने भी दण्ड-कौपीन आदि देकर भिन्न-भिन्न ढंग से उनका सम्मान किया । अब भगवान् वामन चले अपने उददेश्य को पूर्ण करने के लिये ।

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वे राजा बलि की विशाल यज्ञशाला में पहुँचे । उनके शरीर से अद्भुत ब्रह्मतेज निकल रहा था | सभी उनके तेज से पराभूत हो गये । राजा बलि ने बड़ा सम्मान करते हुए उनका स्वागत-सत्कार किया और विधिवत उनका पूजन करने के बाद कहा “ब्रह्मन ! विप्रदेव ! आज्ञा कीजिये । आपकी क्या सेवा करूँ? आप जो भी कहेंगे, वैसा ही होगा” ।

अपनी अर्धोन्मीलित नेत्रों के साथ भगवान् वामन ने भी उनकी बड़ी प्रशंसा की “राजन् ! आपके कुल की बड़ी महिमा है । यह कुल सदैव ही उदार हृदय, सदाचारी और सच्चरित्र रहा है । आपके पूर्वज राजा विरोचन के पास तो देवताओं ने आकर आयु माँगी । सम्राट विरोचन ने यह जानते हुए भी कि ये हमारे शत्रु हैं, उन्हें अपनी आयु दे दी ।

आपके पूर्वज हिरण्याक्ष, हिरण्यकशिपु का तो क्या कहना? इस प्रकार उन्होंने अनेकविध प्रशंसाओं का पुल बाँध दिया । उनकी संगीत घोलती हुई वाणी से अपने कुल की प्रशंसा सुनकर राजा बलि बड़े प्रसन्न हुए और गदगद हो कर बोले “महाराज, आप जो कुछ कह रहे हैं, सब ठीक है, परंतु अब आप आज्ञा तो दीजिये हमें” । भगवान् वामन ने कहा “कुछ नहीं, सन्यासी को केवल तीन पग धरती चाहिये” ।

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यूं तो सम्राट बलि तीक्ष्ण बुद्धि के स्वामी थे लेकिन जहाँ साक्षात् परमेश्वर खड़े हों वहां मष्तिष्क नहीं ह्रदय काम करने लगता है | राजा बलि मुस्कुराए, उन्होंने कहा “आप बड़े बुद्धिमान् हैं, पर स्वार्थ के प्रति अबुध भी । प्रशंसा के पुल तो बाँध दिये, फिर भी मुझसे माँगा भी तो केवल तीन पग भूमि? अरे, हमसे द्वीप माँग लेते, तीनों लोक माँग लेते, हम सहर्ष आपकी ईच्छा पूरी करते” ।

उन्होंने पुनः कहा “ब्राह्मण कुमार ! आपकी बातें तो वृद्धों-जैसी हैं, परंतु प्रतीत होता है कि बुद्धि अभी भी बच्चों की-सी है । आखिर अभी तो आप बालक-जैसे ही हैं न, इसी से अपना हानि-लाभ नहीं समझ पा रहे हैं? मैं तीनों लाकों का एकमात्र अधिपति हूँ । अतः द्वीप-का-द्वीप दे सकता हूँ । फिर जो मुझे अपनी वाणी से प्रसन्न कर ले और मुझसे केवल तीन पग भूमि माँगे-वह भी क्या बुद्धिमान् कहा जा सकता है?

ब्रह्मचारी जी, जो एक बार कुछ माँगने के लिये मेरे पास आ गया, उसे फिर कभी किसी से कुछ माँगने की आवश्यकता नहीं पड़नी चाहिये, अतः एक बार पुनः आपसे कहता हूँ, अपनी जीविका चलाने के लिये आपको जितनी भूमि आवश्यक हो, उतनी मुझसे माँग लीजिये, मै आपकी इच्छा पूरी करने के लिए तत्पर हूँ” ।

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अपनी अर्धोन्मीलित नेत्रों के साथ, अपने चेहरे पर सदैव शान्त, सौम्य और एकरस प्रसन्न भाव लिए हुए भगवान् वामन ने कहा “राजन् ! जिस ब्राह्मण में संतोष नहीं है, वह नष्ट हो जाता है । संतुष्ट महीपति निन्दनीय है और असंतुष्ट ब्राह्मण ! अगर हम तीन पग धरती से संतुष्ट नहीं होंगे, तो अनन्त धन-धान्य से पूर्ण त्रैलोक्य प्राप्तकर भी संतुष्ट नहीं हो सकेंगे” ।

दैत्यों के गुरु शुक्राचार्य जी सब सुन रहे थे । सोच रहे थे यह सब क्या तमाशा हो रहा है यहाँ? तब तक यज्ञ के पूर्व द्वार पर एक ऋग्वेदी ब्राह्मण ने चेतावनी भरे स्वर में कुछ कहा | संभवतः उसने किसी प्रकार के अनिष्ट होने की चेतावनी देने की चेष्टा की |

शुक्राचार्य जी का माथा ठनका । वे सोचने लगे “कहते हैं कि इतिहास अपने-आपको बार-बार दोहराया करता है । कहीं ऐसा तो नहीं कि तीन पग माँगने वाला यह वामन वटुक विष्णु ही हो?” यह विचार आते ही उन्होंने राजा बलि से कहा “बेटा बलि ! तीन पग न देना, और जो चाहे दे देना । तीन पग देना अनिष्टकारी होगा । ये विष्णु हैं, त्रैलोक्याधिपति हैं, हो सकता है कि तीन पग माँगकर तेरा चराचर विश्व-सर्वस्व हरण कर लें ये” |

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महान ऋषि एवं वैज्ञानिक शुक्राचार्य जी त्रिकालदर्शी हैं । सर्वदेशी हैं, ब्रह्माविद्वरिष्ठ हैं एवं मृत संजीवनी-विद्या के तो वो महान् आचार्य हैं । उस समय वे जो कुछ भी कह रहे थे, ठीक ही कह रहे थे । उनके इस प्रकार से कहने पर, कुछ पलों के लिए पूरी सभा में निस्तब्धता छा गयी |

दैत्यगुरु शुक्राचार्य ने पुनः बलि को सम्बोधित करते हुए कहा “अहो ! कैसा दुर्लभ दृश्य है, स्वयं भगवान् ही अपनी योगमाया से ब्रह्मचारी बनकर बैठे हुए हैं । बलि, ये तुम्हारा राज्य, ऐश्वर्य, लक्ष्मी, तेज और विश्वविख्यात कीर्ति-सब कुछ छीनकर इन्द्र को दे देंगे ।

ये विश्वरूप हैं । तीन पग में तो सारे लोकों को नाप लेंगे । मूर्ख ! तुम अपना सर्वस्व ही विष्णु को दे डालोगे तो तुम्हारा जीवन-निर्वाह कैसे होगा? ये विश्वव्यापक भगवान् एक पग में पृथ्वी लोक और दूसरे पग में समस्त ऊर्ध्व लोकों को माप लेंगे ।

इनके विशाल शरीर से सारा आकाश भर जायगा । तब इनका तीसरा पग कहाँ जायगा? तुम उसे पूरा न कर सकोगे । ऐसी दशा में मैं समझता हूँ कि प्रतिज्ञा करके पूरा न कर पाने के कारण तुम्हें नर्क में ही जाना पड़ेगा, क्योंकि तुम अपनी की हुई प्रतिज्ञा को पूर्ण करने में सर्वथा असमर्थ हो जाओगे”|

प्रतीत हो रहा था, मानो शुक्राचार्य जी होने वाली भवितव्यता को साक्षात देख रहे थे | लेकिन माया द्वारा रचित इस संसार में रहते हुए ईश्वर की लीलाओं को समझ पाना कठिन है, या शायद असंभव है |

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कुछ पलों तक मौन रहने के बाद राजा बलि ने कहा “गुरूदेव, ठीक है । पर आपका शिष्य होकर मै झूठ बोलूँ, अस्वीकार कर दूँ? यदि ये ब्राह्मण देव साक्षात् विष्णु हैं, तब तो ये हमको जीतकर भी हमारा सब कुछ ले लेंगे ।

इन्होंने ब्रह्माण्डीय शक्तियों को वश में करने वाले हिरण्याक्ष को मारा कि नहीं? यह तो हमारा सौभाग्य है, जो ये स्वयं हमसे कुछ माँगने आये हैं । इनका हाथ नीचे होगा और मेरा हाथ ऊपरा होगा” । इस प्रकार कहकर राजा बलि ने वहाँ दृढ़तापूर्वक सत्य का पालन करना ही उचित समझा । दैत्यगुरु श्री शुक्राचार्य जी के बहुत समझाने पर भी उन्होंने सत्य का त्याग नहीं किया ।

राजा बलि के इस प्रकार के व्यवहार से शुक्राचार्य जी नाराज हो गये, उन्होंने बलि को शाप दे दिया, परंतु बलि ने वामन ब्राह्मण कुमार को दान कर दिया । फिर क्या बात थी । वही हुआ जैसा शुक्राचार्य जी ने कहा था | भगवान् ने दो पग में सब कुछ ले लिया, तीसरे पग का दान बाकी रहा ।

भगवान् बोले “तुमने तीन पग भूमि दान करने की प्रतिज्ञा की थी न? परंतु मैंने दो पग में ही तुम्हारा सब कुछ ले लिया, अभी एक पग का दान तो बाकी ही रह गया, अब क्या करोगे?” वामन रूप में आये भगवान् विष्णु की मंशा समझ, उनके पार्षदों ने राजा बलि को अपने बन्धन में ले लिया । राजा बलि के भक्त, सेवक और सैनिक उन पार्षदों से युद्ध करने को उद्यत हुए लेकिन उनके महान् पार्षदों ने सबको खदेड़कर भगा दिया ।

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बलि ने अपने सेवकों को समझाया “भाई ! यह समय युद्ध का नहीं है । काल हमारे प्रतिकूल हैं । इस समय युद्ध मत करो । जो लोग कभी सामने खड़े नहीं होते थे, वे ही आज सामने हैं, जोरों से निनाद कर रहे हैं । कोई बात नहीं” ।

यह सब प्रपंच चलता रहा । तभी वहां ब्रह्मा जी उपस्थित हुए, वो कुछ बोलना चाह ही रहे थे कि इतने में विन्ध्यावली, जो बलि की पत्नी थी, वह बोल पड़ी “भगवन् ! आपने अनन्त ब्रह्माण्डात्मक अधिभौतिक और आध्यात्मिक प्रपंच अपनी क्रीड़ा के लिये बनाया है, खेल खेलने के लिये खिलौना बनाया है ।

दुर्बुद्धियुक्त लोग ही आपके बनाये खिलौने को अपना मान लेते हैं । यह स्वर्ग लोक हमारा, यह धरती हमारी, यह नन्दनवन हमारा-ऐसा मानकर गड़बड़ करते हैं । प्रभु ! कर्तृत्व भी आपके अनुग्रह से ही होता है । अधिष्ठान बिना कर्ता कहाँ से आया? कर्तृत्व का आरोप किसी अधिष्ठान में ही होगा न?”।

ब्रह्मा जी ने कहा “आप समस्त प्राणियों के जीवनदाता हैं, स्वामी हैं, जगत् के रूप में भी आप ही अभिव्यक्त हैं, देवों के देव आप ही तो हैं । इसे छोड़ दीजिये । आपने इसका सर्वस्व ले लिया है, अतः अब यह दण्ड का पात्र नहीं है ।

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इसने अपना सम्पूर्ण भूलोक आपको समर्पित कर दिया है । इसने पुण्य कर्मों से उपार्जित स्वर्गादि लोक-अपना सर्वस्व और आत्मा तक आपको समर्पित कर दिया है । साथ ही ऐसा करते समय यह धैर्य से च्युत बिलकुल भी नहीं हुआ है ।

प्रभु ! जो मनुष्य सच्चे हृदय से कृपणता को छोड़कर आपके चरणों में जल का अर्ध्य देता है और केवल दूर्वा दलों से भी आपकी सच्ची पूजा करता है, उसे भी उत्तम गति की प्राप्ति होती है । फिर बलि ने तो बड़ी प्रसन्नता से, धैर्य और स्थिरतापूर्वक आपको त्रिलोकी का दान कर दिया है, तब यह दुःख का भागी कैसे हो सकता है? भगवान् ऐसे दयालु हैं कि वे भक्ति से दिये हुए एक चुल्लू जल तथा एक तुलसी पत्र द्वारा ही अपनी आत्मा को भक्तों के लिये दे देते हैं” ।

यही सब घटनाओं का क्रम चल रहा था । भगवान् वामन ने बलि से कहा “हमारा तीन पग पूरा नहीं हुआ” । बलि ने कहा “एक बात आपसे पूछूँ !” भगवान् ने कहा “पूछ लो” | बलि ने कहा “महाराज ये बताईये ! कोई खरीदार कपड़ा खरीदने के लिये बाजार की एक दुकान पर गया । कहने लगा-‘हम अपने हाथ से सौ रूपये का एक हाथ रेशम खरीदेंगे । सौदा तय हो गया । मापने लगा तो हाथ लम्बा बढ़ा दिया । क्या यह उचित व्यवहार था?”

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भगवान् वामन ने कहा “जिस रूप में उसने सौदा तय किया, उसी रूप में उसे सौदा लेना भी चाहिए था । कपड़ा लेते समय उसे हाथ नहीं बढ़ाना चाहिये था” । बलि ने कहा “तो फिर जिस रूप में आपने दान लिया, उसी रूप में अपना तीन पग मापते । कमी पड़ती तो आप हमसे और भी माँग लेते । आपने दान तो लिया छोटे रूप से तथा मापना आरम्भ किया विराट्-रूप से ।

जरा सोचिये, यह कोई न्याय है क्या ? अच्छा, छोड़िये इस बात को और इस प्रश्न का उत्तर दीजिये-धन बड़ा होता है या धनवान् बड़ा होता है?” बलि के प्रश्न के उत्तर में भगवान् को कहना पड़ा “राजन् ! धन बड़ा नहीं होता, धनवान् बड़ा होता है” ।

बलि ने कहा “भगवन् ! धनवान बड़ा होता है धन से, आपको यह मान्य है न?” भगवान् ने कहा “हाँ, हाँ मान्य है” । बलि बोले “तो मैं धनवान् हूँ न? मैं अपने-आपको ही अर्पित कर रहा हूँ, तीसरा पग पूरा करने के लिये । तीसरा पग मेरे सिर पर रखिये और बस, मेरा दान पूरा हो जायगा । अतः दानपूर्ति और सांगता-सिद्धि के लिये मुझ धनवान् के सिर पर ही आपके श्रीचरण प्रतिष्ठित हों” ।

भगवान् के पास इसका कोई उत्तर नहीं था, वो मुस्कुराए । इतने में राजा बलि के पूर्वज, प्रहलाद जी आ गये । प्रहलाद ने वहां भगवान् की स्तुति की । भगवान् ने ब्रह्मा जी और वहाँ उपस्थित सभी से कहा “हमने इस (बलि) का यश दिग्दिगन्त में विकीर्ण-विस्तीर्ण करने के लिये यह सब गड़बड़ किया है, परन्तु इसने कोई गड़बड़ नहीं किया । इसका ढंग बहुत सौम्य है” |

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भागवत में तो नहीं है, परंतु दूसरी जगह यह कथा है कि भगवान् बोले “भाई? तुम्हें क्या दें” | बलि बोले “महाराज ! हमारी जिधर भी दृष्टि जाय, उधर हम आपका ही दर्शन करें, बस यही मेरी इच्छा है” |

कहते हैं, राजा बलि की बैठक में बावन दरवाजे हैं । भगवान् ने सोचा, न जाने किस दरवाजे पर बलि की दृष्टि चली जाये? यही सोचकर बावनों दरवाजों पर शंख, चक्र, गदा, पद्म धारण किये हुए सर्वान्तरात्मा, ब्रह्माण्डनायक भगवान् पहरेदार के रूप में विराजमान हो गये ।

यह अभूतपूर्व और अविस्मर्णीय ब्रह्माण्डीय घटना थी | भगवान् की इस कृपालुता के कारण ही भक्तराज प्रहलाद ने उसी सभा में कहा “महाराज ! लोग कहते हैं कि आप देवताओं के पक्षपाती हैं, परंतु हमको तो लगता है कि आप हम असुरों के पक्षपाती हैं । इन्द्र, कुबेरादि किसी देवता के पहरेदार-द्वारपाल तो आप कभी नहीं बने । परन्तु हम असुरों के आप द्वारपाल भी बन रहे हैं, अद्भुत है यह” ।

राजा बलि आत्मविद थे | वे जानते थे कि आत्मा के लिये अनात्मा है, अनात्मा के लिये आत्मा नहीं है । इसीलिए उन्होंने, अपने द्वारा उपार्जित समस्त धन एवं ऐश्वर्य को और स्वयं को भी भगवान् के प्रति समर्पित कर दिया । हर हालत में आत्मा के अभ्युदय और मोक्ष को चाहने वाले राजा बलि उत्कृष्ट कोटि के भक्त हुए । उनके जैसा दूसरा कोई न हुआ है और ना कोई होगा |





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