विलक्षण हैं महाभारत के रहस्य

kjuमहाभारत ! नाम सुनते ही ज्यादातर लोगो के मन में एक सनातन धर्मी वृहद् ग्रन्थ की छवि उभरती है | आप उसको अपने दैनिक जीवन में कितना महत्व देते है ये आपकी सोच और प्राथमिकताओ पर निर्भर करता है लेकिन आप में से बहुत कम लोग जानते हैं कि महाभारत में ऐसा बहुत कुछ है जो जान लेने पर आपकी प्रथमिकताये ही बदल जायेंगी |

जिन वस्तुओं को देख और सुन लेने पर आप हाथ जोड़ लेते हैं, मन में आस्था और भक्ति का उदय होता है, और एक छोटी सी प्रार्थना के बाद आप अपने काम में लग जाते हैं वही वस्तुए आज विदेशियों को हैरान की हुई हैं |

वो आँखे फाड़ कर और दिल-ओ-दिमाग खोल कर ये जानने में लगे हैं कि ‘ये आखिर है क्या?’ यूरोप के पुनर्जागरण काल में आई औद्योगिक क्रांति कि वजह सिर्फ भारतीय उपमहाद्वीप से लूटा हुआ धन ही नहीं थी बल्कि यहाँ से लिया गया वैज्ञानिक और तकनिकी ज्ञान भी था जिसका इतिहास में नहीं के बराबर जिक्र हुआ है |

अंग्रेज जब पहले पहल यहाँ पर आये तो यहाँ की समृद्धि से उनकी आँखे चौंध गयी उन्हें लगा कि हम इनसे व्यापार में उतना नहीं कमा पायेंगे क्योकी वो तकनिकी में हमसे काफी पीछे थे |भारत का इस्पात और भारत के सूती एवं रेशमी कपड़े विश्व में सर्वोत्तम क्वालिटी के थे | इन सबके अलावा अंग्रेज भारतीय मसालों और विशालकाय एवं अत्यंत उच्च गुणवत्ता वाले समुद्री जहाजो को भी ललचाई नज़रो से देखते थे |

लेकिन दूर देश से आये अंग्रेजो में सारे व्यापारी एवं लुटेरे नहीं थे बल्कि कुछ विद्वान भी थे ठीक वैसे ही जैसे अलेक्सेंडर के साथ कुछ यूनानी विद्वान भी इस रहस्यमय एवं पावन धरती पर कदम रखे थे |

उन यूरोपीय विद्वानों ने यहाँ के मूल निवासी हिन्दुओ के धर्म ग्रंथो (विशेष रूप से रामायण और महाभारत) में पाया कि वे आज से पांच हज़ार वर्ष पहले न केवल उड़ने वाले बल्कि अन्तर्तारकीय गति करने में सक्षम विमानों का ज़िक्र करते हैं, वे मन की गति से चलने वाले ऐसे विमान का ज़िक्र करते हैं जिसका आकार कितना भी घटाया एवं बढाया जा सकता था |

वे ऐसे विध्वंसक हथियारों का ज़िक्र करते हैं जिनसे एक दो जिला या देश नहीं बल्कि पूरा ब्रह्माण्ड नष्ट किया जा सकता था और सबसे बड़ी बात वो केवल इस पृथ्वी की नहीं बल्कि पूरे ब्रह्माण्ड के आदि और अंत की बात करते हैं |

जबकि उस समय न तो ईसा मसीह थे और न ही रोमन और यूनानी साम्राज्य था (जिनपे वो आज भी गर्व करते हैं) | इतना सब जानने और समझने के बाद जो एक बात उनके समझ में आयी वो ये कि “ये सब कुछ कपोल कल्पित नहीं हो सकता” विशेष रूप से तब जबकि उन तकनीकियों पर चर्चा करने वाले कुछ ग्रन्थ सौभाग्य वश बच गए थे (बर्बर मुस्लिम आक्रान्ताओं से) लेकिन जिनका बाद में कुछ पता नहीं चला |

उदहारण के तौर पर शिवकर बापू जी तलपड़े का १८९५ में पहला रिमोट कंट्रोल से उड़ने वाला विमान बनाना, उसका १५८० फीट तक की ऊंचाई तक उड़ना और फिर उसको सफलता पूर्वक जमीन पर लैंड कराना और दुनिया के सामने भरद्वाज ऋषि कृत “वैमानिक शास्त्र” का ज़िक्र करना और बाद में १९१७ से १९२३ के बीच एक दक्षिण भारतीय विद्वान एस. सुब्बरैया शास्त्री द्वारा वैमानिक शास्त्र के कुछ पन्नो का संकलन एवं अनुवाद करना और फिर लगभग पचास वर्षों बाद एक अंग्रेज़ विद्वान जोसिएर द्वारा १९७३ में विदेश में उसको प्रकाशित कराना वो भी उस पुस्तक की सीमित प्रतियाँ ही छपी जो सामान्य जन के लिए अभी भी दुष्प्राप्य है |

लेकिन सबसे बड़ा सवाल यहाँ ये है कि भारत में ही रचित यंत्र सर्वस्वं और वैमानिक शास्त्र जैसी पुस्तके, जो ज्यादा नहीं आज से डेढ़ सौ साल पहले तक मौजूद थी इस देश में, आज क्यों नहीं उपलब्ध हैं यहाँ ? इसके पीछे दो कारण हैं एक इन सबके पीछे हमारी उदासीनता और दूसरी उनकी गिद्ध दृष्टि | ये सब जानते हैं कि आप अपने कीमती सामान की सुरक्षा नहीं करेंगे तो दूसरे उसको उठा ले जायेंगे ही |

सहस्राब्दियों से इस देश का, इस संस्कृति का गौरव ये ज्ञान ही तो रहा है | और हमें इस गौरव की रक्षा हर हाल में करनी ही होगी और ये तभी हो सकेगा जब हम अपनी ज्ञान प्राप्त करने की तथा उसको बांटने की परंपरा को पुनुरुज्जिवित करेंगे |

इसी क्रम में “रहस्यमय” आपके सामने हमारे प्राचीन ग्रन्थ, महाभारत के रहस्य के विषय में कुछ विस्मय कारी तथ्यों को रख रहा है जिससे आपकी इसकी विशिष्टता का आभास मिल सकेगा | महाभारत का इतिहास हमको ये बताता है कि मूल महाभारत की (जिसका वास्तविक नाम जय-संहिता था) रचना वेदव्यास जी ने साठ लाख श्लोकों (कहीं-कहीं इसे एक करोड़ चौबीस लाख आठ हज़ार चार सौ छियत्तर बताया गया है) में की थी |

उस समय इस महान ग्रन्थ के चार छोटे बड़े संस्करण थे इनमे पहला तीस लाख श्लोकों का था जिसे नारद जी ने देवलोक में देवताओं को सुनाया था | दूसरा संसकरण पंद्रह लाख श्लोकों का था जिसको देवल और असित ऋषि ने पितृलोक में पित्र गणों को सुनाया था |

तीसरा संस्करण चौदह लाख श्लोको का था जिसे शुकदेव जी ने गन्धर्वो, यक्षों आदि की सुनाया था | और शेष एक लाख श्लोकों के चौथे संस्करण का प्रचार एवं प्रसार मनुष्य लोक में हुआ जिसे वैशम्पायन जी ने जन्मेजय तथा अन्य ऋषि गणों को सुनाया था |

ऐसा कहा जाता है कि यह “जय” नामक इतिहास है अतः विजय की इच्छा रखने वालों को इसे अवश्य सुनना चाहिए | वर्तमान समय में जो महाभारत हमारे सामने है (गीता प्रेस से प्रकाशित) उसमे भारत में प्रचलित एवं सर्वमान्य ‘नीलकंठी’ टीका से चौरासी हज़ार श्लोक लिए गए हैं और हरिवंश के सोलह हज़ार श्लोक लिए गए हैं | कुल मिला कर श्लोको की संख्या एक लाख के लगभग हो जाती है |

क्रमशः ………

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