अवतार क्या है, प्रकृति क्या है, भगवान के 24 अवतार क्या हैं ?
अवतार क्या है जिसका अवतार होता है , वह क्या है ? अवतार से पूर्व क्या होता है ? अवतार का कारण क्या है ? इन सब बातों पर विचार करने के लिये हम वेदों की ऋचाओं पर दृष्टिपात करते …
अवतार क्या है जिसका अवतार होता है , वह क्या है ? अवतार से पूर्व क्या होता है ? अवतार का कारण क्या है ? इन सब बातों पर विचार करने के लिये हम वेदों की ऋचाओं पर दृष्टिपात करते …
माँ आदि शक्ति सती कौन हैं आदि शक्ति ‘सत’ रूप, ‘ज्ञान’ रूप और ‘आनंद’ रूप हैं । जिस तरह अंधकार सूर्य पर कभी कोई प्रभाव नहीं डाल सकता, वैसे ही आदि शक्ति में अणु मात्र भी अज्ञान सम्भव नहीं है, …
श्री भगवान नारायण की आज्ञा से स्वयं वायुदेव ने ही भक्ति सिद्धांत की रक्षा के लिये तमिलनाडु प्रान्त के मंगलूर जिले के अन्तर्गत उडुपी क्षेत्र से दो – तीन मील दूर वेललि ग्राम में भार्गवगोत्रीय नारायण भटट के अंश से …
आद्य शक्ति भगवती जगदम्बा ‘विद्या’ और ‘अविद्या’ – दोनों ही रूपों में विद्यमान हैं। अविद्या रूप में वह प्राणियों के मोह की कारण हैं तो विद्या रूप में मुक्ति की। भगवती जगदम्बा विद्या या महाविद्या और भगवान सदाशिव विद्यापति के …
प्राचीन काल में राजस्थान के बाड़मेर जिले की उण्डू एवं काश्मीर रियासत में राजा अजमल राज्य करते थे। उनके भाई का नाम धनरूप था। एक बार की बात है कि धनरूप जी वैराग्य धारण कर घर से निकल पड़े। तीर्थाटन …
देवी की जितनी शक्तियां मानी गयी हैं, उन सबका मूल रूप महालक्ष्मी ही हैं जो सर्वोत्कृष्ट पराशक्ति हैं। वह ही समस्त विकृतियों की प्रधान प्रकृति हैं। सारा विश्व प्रपंच महालक्ष्मी से ही प्रकट हुआ है। चिन्मयी लक्ष्मी समस्त पतिव्रताओं की …
परम ज्ञानी श्री शुकदेव जी ने अवतार तत्व की मीमांसा करते हुए राजा परीक्षित से कहा – हे राजन! भगवान प्रकृति के विकास और विनाश , प्रमाण और प्रमेय आदि गुणों से रहित हैं। वे अप्राकृत अनंत गुणों के आश्रय …
महामुनि मेधा ने राजा सुरथ और समाधि वैश्य को महा सरस्वती का चरित्र इस प्रकार सुनाया। प्राचीन काल में शुम्भ और निशुम्भ नामक दो परम पराक्रमी दैत्य उत्पन्न हुए थे। तीनों लोकों में उनका भय व्याप्त हो गया था। उनके …
कर्म काण्ड का अबाधित महत्त्व है। इससे अभ्युदय तो होता है, किंतु यह ब्रह्म का स्थान ग्रहण नहीं कर सकता। प्रकृति ब्रह्म की बहिरंग शक्ति हैं। वह जब स्वयं ब्रह्म के सम्मुख नहीं जा सकती, तब अपने उपासकों को ब्रह्म …
पूर्व समय की बात है, अरूण नाम का एक पराक्रमी दैत्य था। देवताओं से द्वेष रखने वाला वह दानव पाताल में रहता था। उसके मन में देवताओं को जीतने की इच्छा उत्पन्न हो गयी, अतः वह हिमालय पर जाकर भगवान् …