लक्ष्मी जी के प्रकट होने की कथा

लक्ष्मी जी के प्रकट होने की कथादेवी की जितनी शक्तियां मानी गयी हैं, उन सबका मूल रूप महालक्ष्मी ही हैं जो सर्वोत्कृष्ट पराशक्ति हैं। वह ही समस्त विकृतियों की प्रधान प्रकृति हैं। सारा विश्व प्रपंच महालक्ष्मी से ही प्रकट हुआ है। चिन्मयी लक्ष्मी समस्त पतिव्रताओं की शिरोमणि हैं। एक बार उन्होंने भृगु की पुत्री रूप में अवतार लिया था; इसलिये इन्हें ‘भार्गवी’ भी कहते हैं।

समुद्र – मंथन के समय यह ही क्षीर सागर से प्रकट हुई थीं, इसलिये इनका नाम ‘क्षीरोदतनया’ अथवा ‘क्षीरसागर – कन्या’ हुआ। भगवान जब – जब अवतार लेते हैं , तब – तब उनके साथ श्री लक्ष्मी देवी भी अवतीर्ण हो उनकी सेवा करती और उनकी प्रत्येक लीला में योग देती हैं। इनके आविर्भाव की कथा इस प्रकार है।

लक्ष्मी जी के प्राकट्य की पहली कथा

महर्षि भृगु की पत्नी ख्याति के गर्भ से एक त्रिलोक सुंदरी भुवन मोहिनी कन्या उत्पन्न हुई। वह समस्त शुभ लक्षणों से सुशोभित थी; इसलिये उसका नाम लक्ष्मी रखा गया अथवा साक्षात लक्ष्मी ही उस कन्या के रूप में अवतीर्ण हुई थीं, इसलिये वह लक्ष्मी कहलायी।

धीरे – धीरे बड़ी होने पर लक्ष्मी जी ने भगवान नारायण के गुण और प्रभाव का वर्णन सुना। इससे उनका हृदय भगवान में अनुरक्त हो गया। वह उन्हें पति रूप में प्राप्त करने की इच्छा से समुद्र के तट पर जाकर घोर तपस्या करने लगीं।

तपस्या करते – करते एक हजार वर्ष बीत गये। तब इन्द्र, भगवान विष्णु का रूप धारण करके लक्ष्मी जी के समीप आये और उनको वर मांगने को कहा। लक्ष्मी जी ने कहा “आप अपने विश्व रूप का मुझे दर्शन कराईये।” इन्द्र इसके लिये असमर्थ थे, अतः लज्जित होकर वहां से लौट गये।

इसके बाद कई और देवता पधारे, परंतु विश्व रूप दिखाने की शक्ति न होने के कारण उनकी भी कलई खुल गयी। यह समाचार पाकर साक्षात भगवान नारायण वहां देवी को दर्शन देने और उन्हें कृतार्थ करने के लिये प्रकट हो गए। भगवान ने देवी से कहा ‘वर मांगो।’

यह आदेश सुनकर देवी ने भगवान का गौरव बढ़ाने के लिये कहा ‘देव! यदि आप साक्षात भगवान नारायण हैं तो अपने विश्व रूप का दर्शन देकर मेरा संदेह दूर कर दीजिये।’ भगवान ने विश्व रूप का दर्शन कराया और लक्ष्मी जी की इच्छा के अनुसार उन्हें पत्नी रूप में ग्रहण किया।

इसके बाद वह बोले ‘देवि! ब्रह्मचर्य ही सब धर्मों का मूल तथा सर्वोत्तम तपस्या है। तुमने ब्रह्मचर्य में पालनपूर्वक इस स्थान पर कठोर तपस्या की है, इसलिये मैं यहां ‘मूलश्रीपति’ के नाम से विख्यात होकर रहूंगा तथा तुम भी ब्रह्मचर्य रूपिणी ‘ मूलश्री ’ के नाम से यहां प्रसिद्धि प्राप्त करोगी।

लक्ष्मी जी के प्राकट्य की दूसरी कथा

लक्ष्मी जी के प्रकट होने का दूसरा इतिहास इस प्रकार है। एक बार भगवान शंकर के अंशभूत महर्षि दुर्वासा भूतल पर विचर रहे थे। घूमते – घूमते वह एक मनोहर वन में आ गये। वहां एक विद्याधर – सुंदरी हाथ में पारिजात – पुष्पों की माला लिये खड़ी थी, वह माला दिव्य पुष्पों से बनी हुई थी।

उसकी दिव्य गंध से समस्त वन – प्रान्त सुवासित हो रहा था। दुर्वासा ने विद्याधरी से वह मनोहर माला मांगी। विद्याधरी ने उन्हें आदरपूर्वक प्रणाम करके वह माला दे दी। माला लेकर उन्मत्त वेषधारी मुनि ने अपने मस्तक पर डाल ली और पुनः पृथ्वी पर भ्रमण करने लगे।

इसी समय मुनि को देवराज इन्द्र दिखायी दिये, जो मतवाले ऐरावत पर चढ़ कर आ रहे थे। उनके साथ बहुत से और देवतागण भी थे। मुनि ने अपने मस्तक पर पड़ी माला उतार कर हाथ में ले ली। उसके ऊपर भौंरे गुंजार कर रहे थे।

जब देवराज समीप आये तो दुर्वासा ने पागलों की तरह वह माला उनके ऊपर फेंक दी। देवराज ने उसे लेकर ऐरावत के मस्तक पर डाल दिया। ऐरावत ने उसकी तीव्र गंध से आकर्षित हो सूंड़ से माला उतार ली और सूंघ कर पृथ्वी पर फेंक दी।

यह देख दुर्वासा क्रोध से जल उठे और देवराज इन्द्र से इस प्रकार बोले “अरे इन्द्र! ऐश्वर्य के घमण्ड से तुम्हारा हृदय दूषित हो गया है। तुम पर जड़ता छा रही है, तभी तो मेरी दी हुई माला का तुमने आदर नहीं किया है। वह माला नहीं, लक्ष्मी का धाम था। माला लेकर तुमने प्रणाम तक नहीं किया इसलिये तुम्हारे अधिकार में स्थित तीनों लोकों की लक्ष्मी शीघ्र ही अदृश्य हो जायगी।”

यह शाप सुनकर देवराज इन्द्र घबरा गये और तुंरत ही ऐरावत से उतर कर मुनि के चरणों में गिर पड़ गये। उन्होंने दुर्वासा को प्रसन्न करने की लाख चेष्टाएं कीं, किंतु वह महर्षि टस से मस न हुए उलटे इन्द्र को फटकार कर वहां से चल दिये।

इन्द्र भी अपनी हाथी ऐरावत पर सवार हो अमरावती को लौट गये। तब तक उनके तीनों लोकों की लक्ष्मी नष्ट हो गयी। इस प्रकार त्रिलोकी से श्रीहीन एवं सत्त्वरहित हो जाने पर दानवों ने देवताओं पर चढ़ाई कर दी। देवताओं में अब उत्साह कहां रह गया था ? सब ने अब हार मान ली थी अतः सभी देवता ब्रह्मा जी की शरण में गये।

ब्रह्मा जी ने उन्हें भगवान विष्णु की शरण में जाने की सलाह दी तथा सबके साथ वह स्वयं भी क्षीर सागर के उत्तरी तट पर पहुंच गये। वहां पहुंच कर ब्रह्मा आदि सभी देवताओं ने बड़ी भक्ति से भगवान विष्णु का स्त्वन किया। भगवान नारायण प्रसन्न होकर देवताओं के सम्मुख प्रकट हो गए।

उनका अनुपम तेजस्वी मंगलमय विग्रह देख कर देवताओं ने पुनः स्तवन किया, तत्पश्चात भगवान नारायण ने उन्हें क्षीर सागर को मथने की सलाह दी और कहा “इससे अमृत प्रकट होगा। उसके पान करने से आप सब लोग अजर – अमर हो जाओगे; किंतु यह कार्य बहुत ही दुष्कर है, अतः तुम्हें दैत्यों को भी अपना साथी बना लेना चाहिये। मैं आप सबकी सहायता पीछे से करता रहूँगा।”

भगवान की आज्ञा पाकर देवगण दैत्यों से संधि करके अमृत – प्राप्ति के लिये यत्न करने लगे। वे भांति – भांति की औषधियां ले आएं और उन्हें क्षीर सागर में छोड़ दिया; फिर मन्दराचल को मथानी और वासुकि को नेती ( रस्सी ) बनाकर बड़े वेग से समुद्र मंथन का कार्य आरम्भ किया।

भगवान ने वासुकि की पूंछ की ओर देवताओं को और मुख की ओर दैत्यों को लगाया। मंथन करते समय वासुकि की निःश्वास अग्नि से झुलस कर सभी दैत्य निस्तेज हो गये और उसी निःश्वास वायु से विक्षिप्त होकर बादल वासुकि की पूंछ की ओर बरसते थे; जिससे देवताओं की शक्ति बढ़ती गयी।

भक्त वत्सल भगवान विष्णु स्वयं कच्छप रूप धारण कर क्षीर सागर में घूमते हुए मन्दराचल के आधार बने हुए थे। वह एक ही रूप से देवताओं में और एक रूप से दैत्यों में मिल कर नागराज को खींचने में भी सहायता दे रहे थे तथा एक अन्य विशाल रूप से, जो देवताओं और दैत्यों को दिखायी नहीं देता था, उन्होंने मन्दराचल को ऊपर से दबा रखा था।

इसके साथ ही वे नागराज वासुकि में भी बल का संचार करते थे और देवताओं की भी शक्ति बढ़ा रहे थे। इस प्रकार मंथन करने पर क्षीर सागर से क्रमशः कामधेनु , वारूणी देवी , कल्प वृक्ष और अप्सराएं प्रकट हुईं। इसके बाद चंद्रमा निकले , जिन्हें महादेव जी ने अपने मस्तक पर धारण कर लिया और फिर विष प्रकट हुआ , जिसे नागों ने चाट लिया।

तदनन्तर अमृत का कलश हाथ में लिये धन्वतरि का प्रादुर्भाव हुआ। इससे देवताओं और दानवों को भी बड़ी प्रसन्नता हुई। सब के अंत में क्षीर समुद्र से भगवती लक्ष्मी देवी प्रकट हुईं जो खिले हुए कमल के आसन पर विराजमान थीं।

उनके श्री अंगों की दिव्य कान्ति सब ओर प्रकाशित हो रही थी। उनके हाथ में कमल का फूल अत्यधिक शोभा दे रहा था। उनका दर्शन करके देवता और महर्षिगण प्रसन्न हो गये।

उन्होंने वैदिक श्रीसूक्त का पाठ करके लक्ष्मी देवी का स्तवन किया और फिर देवताओं ने उन्हें स्नान आदि कराकर दिव्य वस्त्र आभूषण अर्पण किये। वह उन दिव्य वस्त्र आभूषणों से विभूषित होकर सबको देखते – देखते अपने सनातन स्वामी श्री विष्णु भगवान के पास में चली गयीं। भगवान को लक्ष्मी जी के साथ देखकर देवता प्रसन्न हो गये परन्तु दैत्यों को बड़ी निराशा हुई।

उन्होंने धन्वन्तरि के हाथ से अमृत का कलश छीन लिया, किंतु भगवान ने मोहिनी स्त्री के रूप से उन्हें अपनी माया द्वारा मोहित करके सारा अमृत देवताओं को ही पिला दिया। तदनन्तर इन्द्र ने बड़ी विनय और भक्ति के साथ श्री लक्ष्मी देवी का स्तवन किया। उससे प्रसन्न होकर लक्ष्मी ने देवताओं को मनोवांछित वरदान दिया। इस प्रकार लक्ष्मी जी भगवान विष्णु की अनन्य प्रिया हैं।

भगवान के साथ प्रत्येक अवतार में यह साथ रहती हैं। जब श्री हरि, विष्णु नामक आदित्य के रूप में स्थित हुए तब यह कमलोभदवा ‘पद्मा’ के नाम से विख्यात हुईं। वह श्री राम जी के साथ ‘सीता’ और श्री कृष्ण के साथ ‘रूक्मिणी’ होकर अवतीर्ण हुई थीं। भगवान के साथ इनकी आराधना करने से अभ्युदय और निःश्रेयस दोनों की सिद्धि होती है।