आदि शक्ति सती कौन थीं, उनका भगवान शंकर से विवाह कैसे हुआ, और पिता दक्ष द्वारा अपने पति के अपमान की वजह से उन्होंने अपने प्राण कैसे त्याग दिए

माँ आदि शक्ति सती कौन हैंमाँ आदि शक्ति सती कौन हैं 

आदि शक्ति ‘सत’  रूप, ‘ज्ञान’ रूप और ‘आनंद’ रूप हैं । जिस तरह अंधकार सूर्य पर कभी कोई प्रभाव नहीं डाल सकता, वैसे ही आदि शक्ति में अणु मात्र भी अज्ञान सम्भव नहीं है, फिर भी दयामयी आदि शक्ति ने जीवों को भगवान और उनके प्रेम की ओर उन्मुख करने के लिये सती – अवतार में अज्ञता का अभिनय किया।

दक्ष प्रजापति ब्रह्मा के मानस पुत्र थे। वे पिता की आज्ञा से सृष्टि के क्रम को बढ़ाने में व्यस्त रहते थे। इसी बीच उन्हें पिता की दूसरी आज्ञा मिली कि वे शक्ति के अवतार के लिये तप करें। दक्ष ने ब्रह्मा जी की इस आज्ञा को भी शिरोधार्य किया।

वे कठिन तप में संलग्न हो गये – कभी सूखा पत्ता चबा लेते, कभी जल पी लेते और कभी हवा पीकर ही रह जाते। प्रत्येक परिस्थिति में जगदम्बा की पूजा निरन्तर चलती रहती थी। तीन हजार दिव्य वर्ष बीतने पर आदि शक्ति ने दक्ष को दर्शन दिया। वे सिंह पर बैठी थीं और उनके शरीर की कांति श्याम थी साथ ही उनके चार भुजाएं भी थीं।

उनका श्री मुख अत्यन्त मनोरम था। वे आहृादक प्रकाश से प्रकाशित हो रही थीं। उस समय कण – कण आहृाद से थिरक रहा था जो की एक अदभुत छटा थी। माँ जगदम्बा का दर्शन पाकर दक्ष ने अपने को धन्य माना और भली भांति प्रणाम कर उनकी स्तुति की।

जगदम्बा ने कहा ‘दक्ष! मैं तुम पर प्रसन्न हूँ। तुम जो वर चाहो मांग लो।’ दक्ष ने कहा ‘देवि! मेरे स्वामी प्रभु शंकर है। वे रूद्र रूप में अवतार ले चुके हैं। आप उनकी शक्ति हैं, अतः अवतार ग्रहण कर अपने रूप – लावण्य से उन्हें मोहित करें।’

आदि शक्ति ने कहा ‘मैं तुम्हारी पत्नी के गर्भ से पुत्री के रूप में अवतार लूूंगी; किंतु एक शर्त है, जिसे तुम ध्यान में रखना। वह यह है कि जब मेरे प्रति तुम्हारा आदर घट जायगा, तब मैं अपना शरीर त्याग दूंगी।’

दक्ष के घर माता सती का आगमन 

इतना कह कर वे अन्तर्धान हो गयीं । जब आदि शक्ति दक्ष प्रजापति की पत्नी के गर्भ में आयीं, तब उनके शरीर से पुण्यमय आभा निकलने लगी और चित्त में निरंतर प्रसन्नता ही प्रसन्नता छायी रहती थी।

उनकी पत्नी में आदि शक्ति का आवास जान कर वहां ब्रह्मा और विष्णु आये। उनके साथ सम्पूर्ण देव और ऋषि – मुनि भी थे। सभी ने प्रेमार्द्र – वाणी से भगवती शक्ति की स्तुति की और उन्हें प्रणाम किया। उन लोगों ने दक्ष और उनकी पत्नी की भी भूरि – भूरि प्रशंसा की। जब गुणों से युक्त सुहावना समय आया, तब शक्ति ने अपने को प्रकट किया।

उस समय दिशाएं प्रसन्न हो गयीं, शीतल मंद – सुगंधित हवा बहने लगी, आकाश स्वच्छ हो गया और पुष्पवृष्टि होने लगी। सब जगह सुख – शांति छा गयी। दक्ष ने शक्ति का वही रूप देखा, जिसे उन्होंने वरदान के समय देखा था। उन्होंने हाथ जोड़कर देवी को प्रणाम किया और स्तुति की।

तब स्तुति से प्रसन्न हो भगवती शक्ति इस प्रकार बोलीं ‘प्रजापति दक्ष! तुमने मेरे अवतरण के लिये तप किया था, अतः मैं तुम्हारी पुत्री के रूप में अवतीर्ण हो गयी हूँ। अब तुम तपस्या के फल को ग्रहण करो।’ ऐसा कह कर शक्ति नवजात शिशु बन कर रोने लगीं। शिशु का रोना सुन कर चारों ओर हर्ष छा गया।

स्त्रियां दौड़ी आयीं और बच्ची का लुभावना रूप देख कर सब ठगी – सी रह गयीं। जय – जयकार की ध्वनि से सारा नगर गूंजने लगा, हर तरफ बाजे बजने लगे। कल कण्ठों को स्वर – लहरियां वातावरण में तैरने लगीं। दक्ष ने कुलोचित वैदिक आचरण सम्पन्न किया। गौ , घोड़े , हाथी , सोना , वस्त्र आदि का दान दिया गया।

दक्ष ने कन्या का नाम ‘ सती ’ रखा। लोगों ने अपनी – अपनी रूचि के अनुसार उसके अलग – अलग नाम रखे। जो देखता, उसके मन में अपनापन जाग उठता। वह शुक्ल पक्ष के चंद्रमा की कला की तरह बढ़ती हुई सबके चित्त को आह्लादित करने लगी।

सती का शिव के प्रति बढ़ता प्रेम 

जैसे – जैसे बच्ची बढ़ती गयी, वैसे – वैसे शिव के प्रति उसका अनुराग भी बढ़ता गया। सखियों के बीच भी वह छिपाये न छिपा। उसके ओठों पर सदैव ही प्रभु शंकर के ही नाम थे, तो अंतर में उनकी करूण पुकार थी। शिव के प्रेम में डूबी हुई वह; कभी रोती तो कभी हंसती।

सखियां उस पर श्रद्धा रखने लगीं क्योंकि वह उनसे इतना प्यार करने लगीं कि वे अपने शरीर को भुला कर शिव के शरीर को ही अपना शरीर मानने लगीं। एक दिन ब्रह्मा जी नारद मुनि के साथ प्रजापति दक्ष के घर पधारे। उस समय सती विनम्र – भाव से पिता के पास ही खड़ी थीं। उनके उत्कट सौन्दर्य से वहां का वातावरण उदभासित हो रहा था।

वे तीनों लोकों के सौन्दर्य का सार प्रतीत हो रही थीं। जब आदर – सत्कार के पश्चात ब्रह्मा जी और नारद जी बैठ गये, तब उन्होंने सती से कहा कि ‘तुम शंकर भगवान को चाहती ही हो, अतः उन्हीं को पति बनाओ। भगवान शंकर भी तुम्हारे सिवा और किसी को कभी पत्नी नहीं बना सकते।’ यह सुन कर सती की प्रसन्नता का ठिकाना न रहा।

दक्ष भी प्रसन्न हुए, परंतु उन्हें यह चिंता व्याप्त हो गयी कि शंकर जी को ढूंढा कहां जाय, वे कहां मिल सकेंगे ? मिलने पर भी उन्हें विवाह के लिये राजी कर पाना कठिन था! वे इसी उधेड़ -बुन में पड़े रहते। इसी बीच एक दिन सती ने पिता से शंकर जी की प्राप्ति के लिये तपस्या की आज्ञा मांगी।

सती का अनुराग अब मीठी वेदना बनकर उन्ही को बेचैन करने लगा था। वे प्रतिक्षण शंकर जी का सानिध्य चाहने लगी थीं। तपस्या से मानसिक सानिध्य तो मिल ही सकता था। जिनके लिये तिल – तिल कर जला जा रहा था, वे औघड़दानी कब तक उदासीन बने रह सकते थे ?

माता – पिता स्वयं चिंतित तो थे ही अतः कोई अन्य मार्ग न देख कर उन्होंने अपनी लाडली बेटी को तपस्या के कठोर मार्ग पर चलने की आज्ञा दे दी। घर पर ही सारी सामग्री जुटा दी गयी। अब सती संसार से दूर हो गयी थीं, केवल वे थीं और थीं उनकी सखियां।

भगवान शिव को पति के रूप में पाने के लिए सती का घनघोर तप 

उन्होंने नन्दा व्रत का प्रारम्भ कर दिया। अब केवल पूज्य था, पूजा थी और पुजारिन थी। सखियां तो पुजारिन की ही अंग थी। वे अनुराग के बहाव में पूजा का क्रम संभालती थीं। नन्दा व्रत के समाप्त होते – होते त्रिपुटी भी समाप्त हो गयी। अब न पूजा थी और न पुजारिन; बस , पूज्य – ही – पूज्य रह गया था।

वे निष्कम्प घी की लौ की भांति प्रदीप्त हो रही थीं। पल बीता, घड़ी बीती, दिन बीता, रात बीती, मास बीते, वर्ष बीते; किंतु सती निश्चल बैठी रहीं। काल उनके लिये सापेक्ष हो गया था। यह पवित्र चर्चा तीनों लोकों में फैल चुकी थी।

सभी देवता एवं ऋषि गण विष्णु जी और ब्रह्मा जी को आगे कर इस अदभुत कर्म को देखने के लिये सती के पास आ पहुंचे। देवताओं और ऋषियों ने हाथ जोड़ कर सती की स्तुति की। विष्णु जी और ब्रह्मा जी के हृदय में प्रीति उमड़ आयी।

सभी आश्चर्यचकित थे तथा सती का सहयोग करना चाहते थे। वे सती को माथा टेक कर जैसे आये थे, वैसे लौट गये और भगवान शंकर के पास पहुँचे । सती के लिए तो उनका आना जाना और न आना जाना जैसे एक हो गया था।  वै वैसे ही निश्चेष्ट बैठी रहीं। उनके अंग – अंग से प्रेम का प्रभावक रस वैसे ही झर रहा था।

देवता और ऋषि गण जब शंकर जी के पास पहुंचे, तब उनके आगे लक्ष्मी जी के साथ विष्णु जी और सरस्वती जी के साथ ब्रह्मा जी थे। वहां सामूहिक स्तुति की गयी। लक्ष्मी जी और सरस्वती जी को आगे देख शंकर जी ने सबको यथोचित सम्मान दिया, और आने का कारण पूछा।

विष्णु जी का निर्देश पाकर ब्रह्मा जी ने कहा ‘आप, विष्णु जी और मैं वस्तुतः एक ही हैं। सदाशिव ने कार्य के भेद से हमें तीन रूपों में व्यक्त किया है। यदि कार्य के भेदों को हम निष्पन्न न करेंगे तो हमारे रूप के भेद भी व्यर्थ हो जायंगे। अतः लोक – हित का एक ऐसा कार्य आ पड़ा है, जिसकी सिद्धि के लिये आप भी तदनुरूप कन्या के साथ विवाह कर लें।

भगवान शिव का विवाह के लिए शर्त रखना 

विष्णु जी भी सपत्नीक हैं और मैं भी। विश्व के हित के लिये आप भी सशक्तिक हो जायं।’ ब्रह्मा जी की बात सुन कर भगवान शिव के मुख पर मुस्कराहट बिखर गयी और वे बोले ‘मित्र आप दोनों मेरे बहुत ही प्रिय हो, किंतु मेरे लिये विवाह उपयुक्त नहीं है; क्योंकि मैं निवृत्ति – मार्ग पर चल रहा हूँ।

इसलिये मैंने अपवित्र और अमंगल वेष भी बना रखा है। ऐसी स्थिति में विवाह कैसे उपयुक्त हो सकता है? फिर भी आपकी बात तो रखनी ही पड़ेगी। इसके लिये मैं कुछ शर्तें रख रहा हूँ, जिससे मेरी आत्मारमता भी चलती रहे और वैवाहिक जीवन का भी उपभोग हो।

पहली शर्त यह है कि कन्या मेरी ही तरह निवृत्ति मार्ग की पथिक हो, योगिनी हो, आत्माराम हो। विश्व के हित के लिये विवाह का उपयोग करने वाली हो। दूसरी शर्त यह है कि उस कन्या का जब मुझ पर, मेरे वचन पर अविश्वास हो जायगा; तब मैं उसे त्याग दूंगा।’

शर्तें सुन कर विष्णु जी और ब्रह्मा जी को प्रसन्नता हुई; क्योंकि सती इन शर्तों के अनुकूल थीं। वे अंतरंग शक्ति का अवतार थीं बहिरंग- जैसी शक्ति उनका स्पर्श भी नहीं कर सकती थी। सूर्य के सामने अंधकार कभी नहीं आ सकता।

ब्रह्मा जी ने कहा ‘ब्रह्म की पराशक्ति उमा का सती के रूप में अवतार हो गया है और वे आपसे विवाह के लिए घनघोर तप में लीन हैं। आप अपने साथ विवाह करने का उन्हें वरदान दे आयें; क्योंकि उनका तप पराकाष्ठा पर पहुंच चुका है।’ शंकर जी से आश्वासन पाकर सभी लोग प्रसन्नता के साथ अपने – अपने लोक में पधारे।

shiv ji dwara sati ko var denaभगवान शंकर का सती को दर्शन देना 

भगवान शंकर ने सती को प्रत्यक्ष दर्शन दिया। वे अपने इष्टदेव को सामने पाकर प्रेम से विहृल हो गयीं। सती ने अनुभव किया कि उनमें सैकड़ों चंद्रमाओं से बढ़ कर आहृादकता और करोड़ों काम देवों से बढ़ कर सुंदरता है। भगवान ने उन्हें वर मांगने को कहा, किंतु लज्जा ने उन्हें बोलने न दिया।

उनका मुख ऊपर उठ ही नहीं रहा था, किंतु भगवान सती की बोली सुनना चाहते थे, अतः वे फिर बोले ‘सती! मैं तुम्हारे तप और व्रत से अत्यंत प्रसन्न हूँ। अब तुम इच्छानुसार वर मांग लो।’ भगवान बार – बार अपने वचन दोहरा रहे थे।

उन्हेें सुन – सुन कर सती में प्रेम – विह्वलता अत्यधिक बढ़ती जा रही थी। उनका मुंह खुल नहीं रहा था। इधर सती के वचन बोले  ‘सती! कुछ तो बोलो।’ तब सती यह सोच कर घबरा गयीं कि अब कुछ न बोलना, उनका अनादर करना है। पर वह लाजवश अभिलाषित वर मांग न सकीं।

इस शालीनता से भगवान और रीझ गये। उनकी विहृलता अब भगवान पर ही आरूढ़ होती जा रही थी। वे बोले ‘सती! तुम मेरी भार्या बन जाओ।’ भगवान ने सती का अंतर्द्वंद मिटा दिया था, अतः अभिलषित वर पाकर उनका हृदय आनंद के उल्लास से भर गया।

तब वे बोलीं ‘प्रभो। आपने महती अनुकम्पा की है, किंतु मेरे पिताजी से कह कर शास्त्रीय विधिक के अनुसार मेरा पाणि ग्रहण करने की कृपा करें। ’ शिव ने प्रेम भरी दृष्टि से सती को देखा और कहा ‘प्रिये! ऐसा ही होगा।’

सती और शिव का विवाह

भगवान शंकर जब अपने आश्रम में लौटे, तब अपने को अनमना पाया। वे सती के प्रेम – पाश से बंध चुके थे, अतः सती का वियोग उन्हें पीड़ित कर रहा था, विवाह व्यवधान – सा प्रतीत होने लगा था। उन्होंने ब्रह्मा जी का स्मरण किया।

तत्क्षण सरस्वती जी के साथ ब्रह्मा जी आ उपस्थित हुए। भगवान ने कहा ‘मित्र, ऐसा प्रयत्न करो, कि विवाह शीघ्रता से सम्पन्न हो जाय।’ ब्रह्मा जी ने कहा ‘सब काम पहले से ही तैयार है। दक्ष तो कन्यादान के लिये तैयार ही बैठे हैं, फिर भी आपकी ओर से उन्हें सूचित कर देता हूँ।’

इधर दक्ष सती की सफलता सुन कर आनंद और चिंता दोनों के झूले में झूल रहे थे। चिंता यह थी कि शंकर जी को ढूंढ़ा कहां जाय और कैसे उन्हें प्रसन्न किया जाय।

इसी बीच ब्रह्मा जी ने बतलाया कि ‘जिस तरह सती शंकर को आराधना कर रही थीं, वैसे ही शंकर भी सती की आराधना करते रहे हैं। इसलिये शीघ्र ही विवाह का शुभ कार्य सम्पन्न कर लिया जाय।’ चैत्र मास के शुक्ल पक्ष को त्रयोदशी को पूर्व – फाल्गुनी नक्षत्र में विष्णु जी, ब्रह्मा जी, इन्द्र एवं समस्त देवताओं तथा ऋषियों के साथ भगवान शंकर ने विवाह के लिये यात्रा की।

उस समय भगवान शंकर की इच्छा से वृषभ, व्याघ्र, सर्प आदि तरह – तरह के अलंकार बन गये। उनकी छटा निराली थी। देवताओं और प्रमथ गणों ने रास्ते में उत्सवों का तांता लगा दिया। प्रजापति दक्ष ने उत्साह और हर्ष के साथ बारात की आगवानी की और स्वयं ब्रह्मा जी ने विवाह कराया।

जब दक्ष ने सती का हाथ भगवान के हाथ में दिया तो सारा वातावरण उत्फुल्ल हो उठा। नृत्यों और गीतों की अटूट परम्परा चल पड़ी।  हर तरफ आनंद – ही – आनंद बरसने लगा। सारा विश्व मंगल का निकेतन बन गया।

विदाई के समय दक्ष ने विनय – विनम्र होकर भगवान की स्तुति की। सती के साथ शंकर की शोभा देख कर लोग ठगे से रह गये। कैलास लौट कर भगवान शंकर ने बारातियों को सम्मान के साथ बिदा किया। अब तक शक्ति अलग थी और शक्तिमान भी।

आदि शक्ति सती का अवतार किस प्रयोजन से हुआ था

माता सती का लोक – कल्याण के लिये ही अवतार हुआ था। दाम्पत्य जीवन का आदर्श प्रस्तुत कर उन्होंने ज्ञान – विज्ञान से विश्व को आलोकित करना चाहा। एक दिन सती बोलीं ‘अब मैं परम तत्त्व का ज्ञान प्राप्त करना चाहती हूं, अतः आप जिससे जीव का परम हित हो, वह बतलाइये।’

भगवान शंकर ने ज्ञान, विज्ञान, नवधा भक्ति, भक्त की महिमा आदि विषयों का प्रतिपादन किया। इस तरह सती ने तंत्र, मंत्र, योग आदि साधनों को जीवों के लिये सुलभ करा दिया; किंतु उनके अवतार का मुख्य उददेश्य अभी भी पूरा नहीं हुआ था।

उन दिनों सती के पिता दक्ष तथा भृगु आदि महर्षि योग को ही प्रमुख स्थान देते थे। योग वैदिक कर्म है, अतः आवश्यक है। प्रवृत्ति मार्ग और निवृत्ति मार्ग दोनों वेदोक्त हैं। अधिकार – विशेष से दोनों आवश्यक है। वर्ण धर्म में दोनों की उपयोगिता है।

पर प्रवृत्ति मार्ग को ही मार्ग मानना और निवृत्ति मार्ग पर रोक लगना बुरा है। दक्ष आदि एकदेशी विचार के हो गये थे। वे वेद के दूसरे अंगों पर कुठाराघात कर रहे थे। नारद मुनि ने उनके कुछ अधिकारी पुत्रों को निवृत्ति मार्ग पर लगा दिया था।

दक्ष इस बात को सहन न कर सके और उन्होंने देवर्षि को शाप तक दे डाला। सबसे बड़ी बात थी भगवत्प्रेम की उपेक्षा। भगवान प्रेम स्वरूप हैं और इसी प्रेम के लिये वे सृष्टि की रचना करते हैं, सगुंण बनते हैं, अवतार लेते हैं। इस तथ्य को समझाने के लिये सती का अवतार हुआ था।

आत्मदान देकर और दूसरा जन्म धारण कर उन्होंने यह प्रकाश हमें दिया। धन्य है उनकी दयालुता! वे इसके लिये इतना अज्ञ बन गयीं, उन्होंने जड़ता का इतने नीचे स्तर का अभिनय किया, जो कोई करूणामयी मां ही कर सकती है।

सती का भगवान राम के परब्रह्म होने की परीक्षा लेना

शिव पुराण में वह घटना इस प्रकार है। भगवान शंकर सती के साथ देशाटन कर रहे थे। विश्व के हित के लिये सती के प्रश्न और शंकर भगवान के द्वारा उनका उत्तर सतत चलता जा रहा था। दण्ड कारण्य पहुंचने पर नया दृश्य सामने आया। रावण द्वारा हरी गयी सीता के वियोग में भगवान राम शोक विहृल हो गये थे।

उनकी आंखों से आंसू की अजस्त्र धाराएं बह रही थीं। वे पेड़ – पौधों से सीता का पता पूछ रहे थे। लक्ष्मण जी भी श्री राम के दुःख में साथ दे रहे थे। दोनों ही शोक की मूर्ति बने हुए थे। भगवान शंकर ने जब श्री राम को देखा, तब उनके हृदय में इतना आनंद उमड़ा की वह रोके रूक न रहा था।

उनकी आंखों में प्रेमाश्रु भर आये थे और रोम – रोम पुलकित हो उठा था। चाल डगमगा रही थी। उन्होंने ‘सच्चिदानंद की जय हो’ कह कर श्री राम को प्रणाम किया; किंतु अनवसर जान कर जान – पहचान नहीं की और दूसरी ओर चल दिये। श्री राम के दर्शन का आनंद अब भी उमड़ता ही जा रहा था।

आदि शक्ति का स्वरूप ही  ज्ञान’ है, फिर इनमें अज्ञान कैसे आ सकता है ? पर उन्होेंने हम जीवों पर दया कर हमारी – जैसी अज्ञता का अभिनय किया। उधर ‘आनंद’ – रूप श्री राम ‘शोक’ का अभिनय कर रहे थे तो इधर हमारी चरित नायिका ‘ज्ञानरूपा’ होकर ‘अज्ञान’ का अभिनय करने लगीं।

वे ऐसी ‘अज्ञ’ बन गयीं, जैसे कोई निकृष्ट जीव हो। उन्होंने घोर संशयालु बन कर पूछा ‘नाथ! आप तो सबके लिये प्रणम्य हैं, सबसे ऊँचे हैं, पूर्ण परब्रह्म हैं ? फिर आपने इस मनुष्य को प्रणाम क्यों किया और इसे सच्चिदानन्द कैसे कहा ? सेव्य सेवक को प्रणाम करे, यह उचित नहीं है। इसी तरह किसी मनुष्य को ‘सच्चिदानन्द’ कहना अनुचित जान पड़ता है ?’

भगवान शंकर ने कहा ‘देवि! ये दोनों सम्राट दशरथ के पुत्र हैं। छोटे भाई का नाम लक्ष्मण और श्याम रंग वाले भाई का नाम श्री राम है। ये साक्षात परब्रह्म के अवतार हैं। राक्षसों के उपद्रव शांत करने एवं जगत का कल्याण करने के लिये इनका अवतार हुआ है।’

सती भगवान शंकर के प्रत्येक वचन को ब्रह्म वाक्य मानती थीं, परंतु आज तो अभिनय करना था, अतः उन्होंने उनके कथन पर विश्वास नहीं किया। तब भगवान को कहना पड़ा कि ‘यदि विश्वास न हो तो जाकर परीक्षा कर लो।’ सती, सीता का रूप धारण कर श्री राम के पास पहुंचीं।

उन्हें देखते ही श्री राम ने प्रणाम किया और पूछा ‘सती जी! इस समय शिव जी कहां हैं, आप अकेले इस वन में कैसे घूम रही हैं ? और अपना रूप छोड़ कर यह रूप क्यों धारण कर रखा है ?’ यह सुनते ही सती जी पानी – पानी हो गयीं और बोलीं ‘मैं आपकी प्रभुता देखना चाहती थी।’

श्री राम ने सती जी का बहुत सम्मान किया और उनकी आज्ञा लेकर वे पुनः अपने अभिनय में लग गये। दोनों अभिनय ही तो कर रहे थे। लौटते समय सती चिंतित थीं और सोच रही थीं कि ‘मैंने आज अपने स्वामी के वचन पर अविश्वास कैसे कर लिया ?’ वे अप्रसन्न मन से भगवान शंकर के पास पहुंची। शोक ने उन्हें व्याकुल बना दिया था।

भगवान शिव ने पूछा ‘सती! तुमने किस प्रकार परीक्षा ली थी ?’ सती मस्तक झुकाये उनके पास खड़ी हो गयीं। वे शोक और विषाद से भर गयी थीं। भगवान शंकर ने ध्यान लगा कर सारी बातें जान लीं।

उन्हें दुःख तो हुआ; परंतु पूर्व – प्रतिज्ञा के अनुसार उन्होंने सती का मन से त्याग कर दिया; किंतु सती को दुःख होगा, इसलिये त्याग वाली बात उन्हें बतलायी नहीं। उनका पहले – जैसा मीठा व्यवहार बना रहा। इतने में आकाशवाणी हुई ‘परमेश्वर! तुम धन्य हो और तुम्हारी प्रतिज्ञा भी धन्य है!’

आकाशवाणी सुन कर सती की कान्ति मलिन हो गयी। उन्होंने पूछा ‘मेरे स्वामी! आपने कौन – सी प्रतिज्ञा की है ? बतलाइये।’ भगवान अप्रिय वचन कह कर सती को दुःखित करना नहीं चाहते थे, अतः उन्होंने कहा ‘देवि! इसे मत पूछो।’ किंतु सती ने ध्यान से सब बातें जान लीं।

वे सिसकने और लम्बी – लम्बी सांसें खींचने लगीं। भगवान शंकर ने उन्हें ढांढस बंधाया तथा विभिन्न कथाओं द्वारा उनका मन बहलाव किया। कैलाश पहुंच कर भगवान ध्याननिष्ठ हो गये। जब ध्यान टूटा, तब सती को सामने प्रणाम करते पाया।

भगवान ने सती को प्रेम से आसन देकर सामने बैठाया और मनोरम कथाएं सुनायीं। उन्होंने इतना अच्छा व्यवहार किया कि सती का सारा शोक दूर हो गया। वे पहले की तरह सुखी हो गयीं; पर शिव ने अपनी प्रतिज्ञा न छोड़ी।

दक्ष द्वारा भगवान शंकर का अपमान करना एवं इससे भड़क का नंदी का उन्हें श्राप देना

एक बार दक्ष सभी प्रजापतियों के प्रधान एवं समस्त ब्राह्मणों के अधिपति बनाये गये थे। उन्हें बहुत बड़ा पद मिला था। वे तेजस्वी तो थे ही। सब थे, पर वे आत्मज्ञानी न थे। जो आत्मा को ही न जानेगा, वह परमात्मा को कैसे जान सकेगा ? फलतः वे घोर अहंकारी बन गये थे। एक बार मुनियों ने प्रयाग में महान यज्ञ किया था।

इसमें ब्रह्मा जी भी उपस्थित थे। भगवान शिव भी यहां आ पहुंचे। उनके साथ सती भी थीं। ब्रह्मा आदि ने उठकर उन्हें प्रणाम किया और उनकी स्तुति की। भगवान शंकर का दर्शन पाकर सब लोगों ने अपने को धन्य माना। वहां प्रजापतियों के प्रधान, दक्ष भी आ पहुंचे। सबने उठ कर उनका अभ्युत्थान किया। वे ब्रह्मा जी को प्रणाम कर बैठ गये, किंतु शंकर जी को देख कर क्रोध से भर गये। अभिमान के कारण उनकी बुद्धि मारी गयी थी।

अपनी कन्या के विवाह के अवसर पर उन्होंने भगवान शंकर को प्रणाम किया था, स्तुति की थी, अपना प्रभु माना था, किंतु अंहकार वश वे इस बार पुरानी बातें भूल गये। इस अवसर पर उन्होंने भगवान शंकर को बहुत ही बुरा – भला कहा और शाप तक दे डाला कि ‘आज से तुम देवताओं के साथ भाग नहीं पाओगे।’

भृगु आदि कुछ महर्षि, जो ब्रह्मा जी के स्थान पर कर्म काण्ड के निमित्त बैठाये गये थे, दक्ष की हाँ में हाँ मिला कर भगवान शंकर की निंदा करने लगे।

इधर नंदी का क्रोध अपने स्वामी के अपमान से भड़क उठा। उन्होंने भी शाप देते हुए कहा कि ‘दक्ष! तुम्हारा सिर नष्ट हो जाय, कर्म भ्रष्ट हो जाय और तुम बकरे का मुख प्राप्त करो।’ इस घटना के बाद दक्ष शंकर के कटटर द्रोही हो गये। वे शिव के विरूद्ध सदा रोष में भरे रहते थे।

एक बार दक्ष ने यज्ञ किया। उसमें विश्वकर्मा ने अत्यन्त दीप्तिमान, विशाल और बहुमूल्य भवन बनाया था। यह यज्ञ कनखल में हुआ था। सभी देवता, ऋषि, मुनि वहां आये थे। सभी बुलाये गये थे; किंतु दक्ष ने भगवान शंकर को नहीं बुलाया था।

दक्ष के यज्ञ में सती का एवं उनके पति शंकर जी का घोर अपमान होना 

श्रीमद भागवत कल्प में विष्णु जी और ब्रह्मा जी बुलाने पर भी नहीं गये थे; क्योंकि वे दोनों उसकी दुर्बुद्धिता का असहयोग कर रहे थे। महान शिव भक्त दधीच ने जब देखा कि इस यज्ञ में भगवान शंकर उपस्थित नहीं हैं, तब उन्होंने पूछा कि ‘यहां भगवान शंकर क्यों नहीं आये हैं? शास्त्र का कहना है कि सभी मंगल कार्य भगवान शंकर की कृपा दृष्टि से ही सम्पन्न होते हैं।

जिनके स्वीकार करने पर अमंगल भी मंगल हो जाता है, उनका पदापर्ण इस यज्ञ में आवश्यक है। आदि शक्ति सती भी यहां नहीं दीखतीं। उन्हें भी साथ ही बुलाना चाहिये। यदि ये दोनों नहीं आये तो यज्ञ कैसे पूरा होगा? ’

यह सुन कर दक्ष ने भगवान शंकर के संबंध में कुत्सित शब्दों का प्रयोग करते हुए कहा ‘ब्रह्मा जी के कहने से मैंने अपनी कन्या उसे दी। नही तो उस अकुलीन, माता – पिता से रहित, भूत – प्रेतों के स्वामी, अभिमानी और कपाली को कौन पूछता ?

वह यज्ञ- कर्म के अयोग्य है इसलिये उसे नहीं बुलाया और आगे भी नहीं बुलायेंगे। अतः दधीच जी! आप फिर कभी ऐसी बात मत कहियेगा। आप लोग इस यज्ञ को सफल बनावें।’ दधीच ने कहा ‘दक्ष! शिव के बिना यह यज्ञ ही अयज्ञ हो गया है। तुम चेत जाओ, नही तो इससे तुम्हारा विनाश हो जायगा।’

ऐसा कह कर वे अकेले ही यज्ञशाला से बाहर निकल गये। भगवान शंकर के तत्त्व को जानने वाले अन्य लोग भी धीरे – धीरे यज्ञशाला से खिसक गये। दक्ष ने उनका उपहास किया और कहा कि ‘अच्छा हुआ कि ये लोग चले गये। मैं इन बहिष्कृतों को अपने यज्ञ में चाहता ही नहीं था।’

उधर सती प्रिय सखियों के साथ गन्धमादन पर्वत पर धारा गृह में स्नान कर रही थीं। उन्होंने चंद्रमा को रोहिणी के साथ कहीं जाते देखा। जब उन्होंने विजया से पुछवाया कि वे लोग कहां जा रहे हैं ? चंद्रमा ने विजया को आदर के साथ बताया कि वे दक्ष के यज्ञ में जा रहे हैं।

सती को विजया के मुख से अपने पिता के यहां होते हुए यज्ञ का समाचार सुन कर बहुत विस्मय हुआ। वे सोचने लगीं कि अपने यहां आमंत्रण क्यों नहीं आया? उन्होंने भगवान शंकर से सब समाचार कह सुनाया और प्रार्थना भी की कि हमें वहां चलना चाहिये; क्योंकि सम्बन्धियों का धर्म है कि वे अपने सम्बन्धियों से मिलते – जुलते रहें।

इससे परस्पर प्रेम बढ़ता है। भगवान शंकर ने मधुर वाणी से कहा ‘देवि! तुम्हारे पिता मेरे द्रोही बन गये हैं। अतः वहां जाने से संबंध और बिगड़ सकता है। उन्हीं की तरह जो अनात्मज्ञ ऋषि – मुनि हैं, वे तुम्हारे पिता के यज्ञ में गये हैं।’

पिता की दुष्टता सुन कर सती को रोष हो आया। उन्होंने कहा ‘जिनके जाने से यज्ञ सफल होता है, उन्हीें को मेरे पिता ने नहीं बुलाया है। मैं दुरात्मा पिता और ऋषियों के मनोभावों का पता लगाना चाहती हूँ अतः मुझे वहां जाने की आज्ञा दे।’

भगवान ने प्यार से कहा ‘देवि! यदि तुम्हारी रूचि हो ही गयी है तो जाओ, किंतु रानी की तरह सज – धज कर जाना।’ ऐसा कह कर भगवान ने स्वयं सती को आभूषण, छत्र, चामर आदि राजोचित वस्तुए प्रदान कीं और साठ हजार रूद्र गणों को साथ विदा कर दिया।

सती उस स्थान पर जा पहुंची, जहां प्रकाश युक्त यज्ञ हो रहा था। वह यज्ञ मण्डप आश्चर्यजनक वस्तुओं, देवताओं और ऋषियों से भरा हुआ था। माता एवं बहनों ने तो सती का उचित आदर – सत्कार किया; किंतु दक्ष ने कुछ भी आदर नहीं किया, अपितु उपेक्षा की।

दक्ष के डर से अन्य किसी ने भी सती का कोई सम्मान नहीं किया। सब लोगों के द्वारा तिरस्कृत होने से वह विस्मित हुई। फिर भी उन्होंने माता – पिता के चरणों में मस्तक झुकाया, किंतु वे हृदय से दुःखी थीं; क्योंकि वहां भी देवताओं के भाग तो दीख पड़े, किंतु भगवान शंकर का भाग नहीं दिखायी दिया।

तब उन्हें रोष हो आया और वे पूछ बैठी ‘पिता जी! आपने यज्ञ में मंगलकारी भगवान शिव को क्यों नहीं बुलाया ? जो स्वयं यज्ञ, यज्ञ के अंग, यज्ञ की दक्षिणा और यजमान स्वरूप हैं, उनके बिना यज्ञ की सिद्धि कैसे होगी ?

क्या आपने भगवान शिव को सामान्य देवता समझ रखा है ? इसके बाद उन्होंने यज्ञ में सम्मिलित देवताओं और ऋषियों को फटकारा। वे सभी चुप रह गये। दक्ष ने कहा ‘तुम यहां आयी ही क्यों ? इस समय यहां तुम्हारा कोई काम नहीं है। तुम्हारे पति अमंगल स्वरूप हैं, वेद से बहिष्कृत हैं।

वे शास्त्र का अर्थ नहीं जानते, उददण्ड और दुरात्मा हैं। मैंने ब्रह्मा जी के बहकावे में आकर मूर्खतावश तुम्हारा विवाह उनके साथ कर दिया था।’ सती ने कहा ‘जो महादेव की निंदा करता या सुनता है, वे दोनों नरक में जाते हैं। अतः पिता जी! अब मैं इस शरीर को त्याग दूंगी।

devi sati ka atmdahपति के घोर अपमान से तिलमिलाई सती का प्राण त्याग देना 

जो शिव साक्षात परमेश्वर हैं, उन्हें कर्म काण्डी क्या जानेगा ? ये स्वार्थी देवता और कर्म वादी मुनि शिव की निंदा सुन कर भी चुप हैं। इसका फल इन्हें भोगना पडे़गा।’ इसके बाद सती शान्त हो गयीं और प्राणवल्लभ पति का स्मरण करने लगीं।

उन्होंने उत्तर की ओर भूमि पर बैठ कर आचमन किया और वस्त्र ओढ़ लिया तथा पति का चिंतन करते हुए प्राणायाम के द्वारा प्राण और अपान को एक में मिला कर नाभि चक्र में स्थित किया, पुनः कण्ठ स्थित वायु को भृकुटियों के बीच ले जाकर केवल पति का स्मरण करते हुए चित्त को योग मार्ग में स्थित कर दिया। इस प्रकार योग अग्नि से उनका शरीर जल गया। यह देख कर सब लोग हाहाकार करने लगे। शिव के कुछ पार्षद तो इतने दुःखी हुए कि वे अपने ही ऊपर हथियार चला कर मर मिटे।

उनकी संख्या बीस हजार थी। वे सती के दुःख से अत्यन्त कातर हो गये थे। कुछ रूद्र गण शस्त्र उठा कर दक्ष पर टूट पड़े। यह देख कर भृगु ने रक्षोघन – मंत्र से दक्षिणाग्नि में आहुति दी। आहुति देते ही हजारों की संख्या में महान बलशाली ऋभु देवता प्रकट हो गये।

दक्ष के यज्ञ का घनघोर विनाश होना 

उन्होंने प्रमथ गणों को मार भगाया। इसी बीच चेतावनी से भरी हुई आकाशवाणी हुई ‘दुर्बल ज्ञान वाले दक्ष! तुम्हें घमण्ड हो गया है, जिससे तुम्हारी बुद्धि मोह से ढक गयी है। सती, आदि शक्ति की अवतार हैं। वे परात्पर शक्ति हैं; सृष्टि, स्थिति एवं लय करने वाली परमेश्वरी हैं।

ऐसी सती जिनकी धर्म पत्नी हैं, उन शंकर को तुमने यज्ञ में भाग नहीं दिया ? तुम मूढ़ और कुविचारी हो। तुम्हारा गर्व दूर हो जायगा। सभी देवता, नाग और मुनि यज्ञ मण्डप से निकल जायं, नही तो सबका विनाश हो जायगा।’

उधर भृगु के मंत्र बल से प्रताड़ित प्रमथ गण भगवान शिव के पास पहुंचे। उन्होंने सारी दुर्घटनायें कह सुनायीं। भगवान शंकर ने नारद का स्मरण किया, जिससे वे सत्य समाचार विस्तारपूर्वक सुन सकें। नारद जी से सारी घटनायें सुन कर शिव ने भयानक क्रोध प्रकट किया। उन्होंने एक जटा उखाड़ कर उसे शिला पर पटक दिया।

उसके दो टुकड़े हो गये। उस समय महाप्रलय के समान भीषण शब्द हुआ। एक भाग से प्रलय अग्नि के समान दहकते हुए वीरभद्र प्रकट हुए और दूसरे भाग से महाकाली प्रकट हुईं। शिव के निःश्वास से सौ प्रकार के ज्वर पैदा हुए। सबने भगवान शिव को प्रणाम किया।

वीरभद्र को भगवान ने आज्ञा दी कि ‘दक्ष के यज्ञ का विध्वंस कर दो। जो वहां ठहरे हुए हैं, उन्हें भी भस्म कर डालना। किसी की स्तुति मत सुनना।’ वीरभद्र जब दक्ष के यज्ञ का विध्वंस करने के लिये प्रस्थित हुए तब भगवान शंकर ने करोड़ों गणों को उनके साथ कर दिया। वीरभद्र का रथ बहुत लम्बा – चौड़ा और ऊँचा था।

उसे दस हजार सिंह खींच रहे थे। काली, कात्यायनी आदि शक्तियां भी उनके साथ थीं। वीरभद्र जब यज्ञ मण्डल में पहुंचे, तब अहंकारी देवता इन्द्र को आगे कर उनसे भिड़ गये। वीरभद्र ने कुछ ही क्षण में सब देवताओं को भगा दिया। यज्ञ मृग का रूप धारण कर भाग खड़ा हुआ। वीरभद्र ने उसका सिर काट डाला।

दक्ष का सर्वनाश हो जाना 

मणिभद्र ने भृगु को पटक कर छाती पर पैर रख कर उनकी दाढ़ी उखाड़ ली। चण्ड ने पूषा के दांत उखाड़ लिये; क्योंकि शिव के अपमान के समय वे हंस रहे थे। दक्ष वेदी के भीतर जा छिपे थे। वीरभद्र ने उनका सिर मरोड़ कर तोड़ डाला और अग्नि कुण्ड में डाल दिया।

इस तरह दक्ष का यज्ञ विध्वंस कर वीरभद्र सेना के साथ कैलाश लौटे। ब्रह्मा जी को जब पता चला कि दक्ष मार डाला गया, तब वे बहुत क्षुब्ध हुए। वे चाहते थे कि दक्ष जीवित हो जाय और उसका यज्ञ भी पूरा हो जाय।

उस समय भगवान विष्णु ने सलाह दी कि सभी देवता भगवान शंकर की शरण ग्रहण करें। यदि वे प्रसन्न न होंगे तो प्रलय हो जायगा। देवताओं ने शंकर जी की स्तुति की और वे उनके चरणों में लेट गये।

भगवान शंकर द्वारा सभी को क्षमा प्रदान करना एवं दक्ष के धड़ पर बकरे का सर लगाकर उन्हें पुनर्जीवित करना 

भगवान शंकर ने सभी को क्षमा प्रदान किया। इसके बाद तीनों देव दक्ष की यज्ञशाला में आये। वहां स्वाहा , स्वधा , पूषा , तुष्टि , धृति , ऋषि , पितर , गंधर्व आदि पड़े हुए थे। स्वामी का आदेश पाकर वीरभद्र दक्ष के मृत शरीर को वहां ले आये।

यज्ञनिमित्तक बकरे का सिर लेकर भगवान शंकर ने दक्ष के धड़ पर जोड़ दिया और ज्यों ही उनकी ओर कृपा दृष्टि से देखा, त्यों ही वे जीवित हो गये। अब दक्ष की बुद्धि स्वस्थ हो गयी थी। उन्होंने शिव जी की स्तुति की। उसके बाद इन्द्र आदि दिकृपालों ने भी किया। इस प्रकार शिव जी की कृपा से उनका यज्ञ पूर्ण हुआ।