श्रीलंका के जयसेना परिवार के पुत्र के पुनर्जन्म की घटना


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श्रीलंका के जयसेना परिवार के पुत्र के पुनर्जन्म की घटना

नवम्बर 1962 की बात है | श्रीलंका के नुगेगोड़ा में जयसेना दम्पत्ति के घर उनके छोटे पुत्र ने जन्म लिया | परिवार में हर्ष का वातावरण था | बच्चा शांत और धीर-गंभीर था | लेकिन थोड़ा उग्र स्वाभाव का था | दो वर्ष का होते ही उनके छोटे बेटे ने एक अजीब बात कहनी शुरू कर दी |

वह अक्सर अपनी माँ से कहता “तुम मेरी असली माँ नहीं हो | मेरी असली माँ बेयनगोडा में रहती है” | इन सब बातों से उसकी माँ दुखी तो जरूर हुई लेकिन अप्रैल 1965 तक उसने इस बात को गंभीरता से नहीं लिया |

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उस दिन जयसेना परिवार के लोग अपने पारिवारिक मित्रों से मिलने मडाले जा रहे थे | रास्ते में, 24 मील के पत्थर के गुजरते ही बच्चा बस की सीट पर खड़ा हो कर चीखने लगा “वहाँ, वहाँ मेरी माँ रहती है” | बस में अन्य सहयात्रियों के भी होने की वजह से बच्चे की माँ के लिए परिस्थितयाँ थोड़ी असहज हो गयीं | बस उसी समय उसकी माँ ने तय किया कि वह पूरे मामले की तह तक जायेगी |

लौटते समय बच्चे के माँ-बाप ने एक कार ले ली और उसी गाँव की तरफ आये जहाँ उनके बच्चे ने अपनी माँ के होने की बात चिल्लाकर कही थी | शाम ढल रही थी लेकिन गाँव में प्रवेश करते ही बच्चा गाड़ी से उतरने लगा | उत्तेजना में उसके मुह से निकला “मेरी माँ यहीं रहती है” |

बच्चा श्रीमती सेनेबिरत्ने के घर की तरफ भगा जा रहा था | पड़ोस के लोगों ने उसे पकड़ कर किसी तरह कार तक पहुँचाया | पड़ोस के लोगों से ही उस बच्चे के माँ-बाप को पता चला कि पांच साल पहले यहाँ श्री सेनेबिरत्ने और उनकी पत्नी का बच्चा खो गया था और फिर उसका कुछ पता नहीं चला | शाम हो चुकी थी और रात का अँधेरा घिर रहा था |

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जयसेना ने सेनेबिरत्ने के परिवार को परेशान करना उचित नहीं समझा | अपने बच्चे को किसी तरह से समझा बुझा कर, उसे दोबारा फिर से यहाँ लाने का वादा करके वे लोग वापस लौटे | कुछ महीने बाद बच्चे के बड़े मामा सेनेबिरत्ने के परिवार से मिले | उन्होंने उन लोगों से सब कुछ बताया और बच्चे को पहचानने के लिए लाने का दिन निश्चित हुआ |

उस दिन उसे कुछ मिठाइयाँ एक डिब्बे में भर कर दी गयीं कि वह उसे अपनी असली माँ को दे देगा | कार धीमे-धीमे चल रही थी | उसमे उसके माँ-बाप और मामा भी थे | लेकिन जैसे ही गाँव के अन्दर कार एक सड़क से मुड़ी तो बच्चे ने कार की सीट पर खड़े हो कर ड्राईवर से कहा “अंकल उधर नहीं, वहाँ चार्ली चाचा रहते हैं, मेरा घर दूसरी सड़क पर है” |

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थोड़ी दूर और चलने के बाद बच्चे से कहा गया कि वह आगे-आगे चले, कार उसके पीछे ही रहेगी | उसके बाद वह बच्चा सीधे अपने घर पहुँचा और वहाँ खड़ी भीड़ को लगभग चीरता हुआ श्रीमती विनी सेनेबिरत्ने के पैरों पर अपनी मिठाई के डिब्बे को रख दिया | वहां वो सबसे ऐसे मिला जैसे कोई अपने घर वालों से बहुत दिन बाद मिल रहा हो |

बच्चे ने अपने बड़े भाई को भी पहचान लिया और उसे उसके नाम से बुलाते हुए अपनी पूर्वजन्म की माँ को याद दिलाया कि एक बार उसके भाई ने उसे पीटा था | उसने चार्ली अंकल के बिजली के कारखाने की भी बात की और धान के अपने खेतों की तरफ इशारा करके उसके बारे में बात भी की |

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इन सब बातों से श्रीमती सेनेबिरत्ने हक्की-बक्की रह गयी | उन्होंने स्वीकार किया कि शुरू में उन्हें काफी संदेह था लेकिन अब वो पूरी तरह मान चुकी हैं कि 1960 में उनका जो बेटा खो गया था वही जयसेना के बेटे के रूप में जन्मा है |

भावी जन्म में, पिछले जन्म की स्मृतियों का बना रहना कुछ पुण्य कर्मों की वजह से होता है लेकिन हम सभी, अपने वर्तमान जन्म में भी, कुछ यौगिक साधनाओं (जैसे ध्यान और जालंधर बन्ध) के अभ्यास से, अपने पूर्वजन्म की बातें, एक-एक घटनाएं देख सकते हैं | लेकिन इन सब के लिए, बिना संदेह, इनका अभ्यास जरूरी है |