पंचतन्त्र की कहानियाँ-धोखेबाजी का फल बुरा होता है
एक तालाब के किनारे एक सारस रहता था । सारस बड़ा मक्कार था । वह प्रतिदिन तालाब की मछलियों को खाया करता और बड़े सुख से साथ जीवन व्यतीत करता था | उसे जब भी भूख लगती, तालाब के किनारे …
एक तालाब के किनारे एक सारस रहता था । सारस बड़ा मक्कार था । वह प्रतिदिन तालाब की मछलियों को खाया करता और बड़े सुख से साथ जीवन व्यतीत करता था | उसे जब भी भूख लगती, तालाब के किनारे …
किसी समय एक राज्य में तीन युवक थे – एक था राजा का लड़का, दूसरा था मंत्री का लडका और तीसरा था, वहां के एक बड़े व्यापारी का लड़का । तीनों युवकों में घनिष्ठ मित्रता थी । तीनों युवक साथ-साथ …
एक नदी के तट पर साधुओं का आश्रम था । आश्रम में साधु-महात्मा रहते थे | वे भिक्षा मांगकर खाते और भगवान के भजन-कीर्तन में लगे रहते थे। साधुओं के गुरु जी बड़े तपस्वी थे। उनमें कई चमत्कारी, शक्तियां थीं। …
कल्पान्त तक अपनी आयु और अपने रूप को सजीव रखने के लिए तथा अतुलनीय रूप से शक्ति शाली बनने के लिए देव शक्तियों और असुर शक्तियों ने मिलकर परम दिव्य क्षीर सागर (जिसका न कोई आदि पता चलता था न …
एक धोबी के पास एक गधा था । गधा प्रतिदिन मैले कपड़ों की गठरी पीठ पर लादकर घाट पर जाता था | और संध्या समय धुले हुए कपड़ों का गट्ठर लेकर फिर घर लौट आता था । उसका प्रतिदिन यही …
एक वृक्ष पर एक उल्लू रहता था । उल्लू को दिन में दिखाई नहीं पड़ता, इसीलिए इसको दिवांध भी कहते हैं । उल्लू दिन-भर अपने घोंसले में छिपा रहता था । जब रात होती थी, तो शिकार के लिए बाहर …
एक गांव में एक ब्राह्मण रहता था । ब्राह्मण बड़ा गरीब था । भिक्षा को छोड़कर उसकी जीविका का कोई साधन नहीं था । वह प्रतिदिन सवेरा होते ही भिक्षा के लिए निकल जाता था । परंतु ब्राह्मण को रोज …
समुद्र मंथन के समय जब भगवान् ने कच्छपरूप धारण किया था और उनकी पीठ पर बड़ा भारी मन्दराचल पर्वत मथानी की तरह घूम रहा था, उस समय मन्दराचल की तीखी चटटानों की नोक से उनकी पीठ के खुजलाये जाने के …
कबूतरों का एक दल भोजन की खोज में उड़ता चला जा रहा था, परंतु दूर जाने पर भी कहीं उन्हें कुछ भोजन दिखाई नहीं पड़ा | कबूतर उड़ते-उड़ते थक गए थे, फिर भी भोजन की आशा में उड़ते रहे। आखिर …
समूची पृथ्वी के एक तत्व में विलीन हो जाने पर, अपनी विद्या शक्ति से सम्पन्न भगवान् विष्णु योग निद्रा का आश्रय लेकर शेषनाग पर शयन कर रहे थे । शयन समाप्त होने पर प्रभु की नाभि से सहस्र दलों वाला …