पंचतन्त्र की कहानियाँ-चूहे की पुत्री ने विवाह के लिए अंततः चूहे को ही चुना


पंचतन्त्र की कहानियाँ-चूहे की पुत्री ने विवाह के लिए अंततः चूहे को ही चुनाएक नदी के तट पर साधुओं का आश्रम था । आश्रम में साधु-महात्मा रहते थे | वे भिक्षा मांगकर खाते और भगवान के भजन-कीर्तन में लगे रहते थे। साधुओं के गुरु जी बड़े तपस्वी थे। उनमें कई चमत्कारी, शक्तियां थीं। वे योग और मंत्र की शक्ति से कई चमत्कारिक कार्य कर दिया करते थे। वे अपनी पत्नी के साथ आश्रम में ही रहते थे। प्रभात का समय था | सूर्य की किरणें चारो तरफ फैल गई थीं ।

तपस्वी नदी के तट पर बैठकर प्रार्थना करने में संलग्न थे । सहसा उनके सामने एक चुहिया गिर पड़ी । चुहिया भूरे रंग की थी, लंबी पूंछ थी, चमकीले नेत्र थे | तपस्वी को उस पर दया आ गई । उन्होंने उसे उठाकर हथेली पर रख लिया । वह उनकी हथेली पर बैठकर उनकी ओर देखने लगी | तपस्वी के मन में चुहिया के प्रति और भी अधिक दया जाग उठी ।

उन्होंने मंत्र पढ़कर उस पर जल छिड़क दिया । वह चुहिया से एक सुंदर कन्या बन गई। तपस्वी उस कन्या को अपनी पत्नी के पास ले गए। उन्होंने पत्नी से कहा, “तुम्हारी कोई संतान नहीं है। तुम अपनी संतान के समान ही इस कन्या का पालन-पोषण करो।” तपस्वी की पत्नी बड़े प्रेम से कन्या का पालन-पोषण करने लगी | कन्या जैसे-जैसे बड़ी होने लगी, तैसे-तैसे उसका रूप भी निखरने लगा।

बड़ी होने पर वह पूर्णिमा के चंद्रमा की भांति निखर उठी। कन्या जब विवाह योग्य हुई, तो तपस्वी के मन में उसके लिए वर खोजने की चिंता हुई। उन्होंने सोचा, कन्या बड़ी रूपवती है, अतः इसका वर भी इसी के समान सुंदर और रूपवान होना चाहिए। तपस्वी ने विचारकर देखा, तो उन्हें कन्या के लिए सूर्य देव उपयुक्त वर जान पड़े ।

तपस्वी ने मंत्र की शक्ति से सूर्य देव को अपने पास बुलाया । सूर्य ने तपस्वी से पूछा, “महात्मन्, आपने मुझे किसलिए बुलाया है ?” तपस्वी ने उत्तर दिया, “मेरी कन्या बड़ी रूपवती है । उसके लिए आप ही उपयुक्त वर हैं । मैं चाहता हूं, आप पत्नी के रूप में मेरी कन्या को स्वीकार करें।” कन्या पास ही खड़ी थी ।

सूर्य के उत्तर देने के पहले ही वह बोल उठी, “पिताजी, यह बहुत गर्म रहते हैं, मैं इनके साथ विवाह नहीं करूंगी।” जब कन्या ने ही अस्वीकार कर दिया, तो तपस्वी क्या करते? उन्होंने सूर्य की ओर देखते हुए कहा, “क्षम कीजिए सूर्यदेव ! कृपया बताइए, क्या आपसे भी कोई बड़ा है ?” सूर्य ने उत्तर दिया, “मुझसे भी बड़ा मेघ है । वह मुझे भी ढक लेता है ।”

तपस्वी ने मंत्र की शक्ति से मेघ को अपने पास बुलाया। मेघ ने तपस्वी से प्रश्न किया, “महाराज, आपने मुझे किसलिए बुलाया है?” तपस्वी ने उत्तर दिया, “मेरी कन्या बड़ी रूपवती है। आप तीनों लोकों में सबसे बड़े हैं। अतः मैं आप ही के साथ अपनी कन्या का विवाह करना चाहता हूं।” कन्या पास ही खड़ी थी।

वह नाक सिकोड़ कर बोली, “पिताजी, यह तो बहुत काले रंग के हैं। मैं इनके साथ विवाह नहीं करूंगी ।” तपस्वी मौन हो गए  । उन्होंने बादल से कहा, “मुझे बड़ा दुःख है । कृपया बताइए, कि आपसे भी कोई बड़ा है?” बादल ने उत्तर दिया, “मुझसे बड़ा पवन है, क्योंकि वह मुझे एक जगह स्थिर नहीं रहने देता।”

तपस्वी ने मंत्र की शक्ति से पवन देव को बुलाया | पवन देव ने तपस्वी से पूछा, “तपस्वी जी, आपने मुझे किसलिए बुलाया है?” तपस्वी ने उत्तर दिया, “आप तीनों लोकों में सबसे बड़े है, मैं अपनी सुंदर कन्या का विवाह आपके साथ करना चाहता हूं।” कन्या पास ही खड़ी थी। वह उंगलियों को नचाती हुई बोली, “पिताजी, यह तो सदा चलते ही रहते हैं। मैं इनके साथ कैसे विवाह कर सकती हूँ।”

तपस्वी ने दुःखी होकर पवन देव की ओर देखते हुए कहा, “पवनदेव, क्षमा कीजिए। दया करके बताइए कि क्या आपसे भी कोई बड़ा है?” पवन ने उत्तर दिया, “मुझसे बड़ा पहाड़ है । मैं सबको तो उड़ा ले जाता हूं, पर पहाड़ को नहीं उड़ा पाता ।” तपस्वी ने मंत्र की शक्ति से पहाड़ को भी बुलाया ।

पहाड़ ने पूछा, “महात्मन्, क्या आज्ञा है ?” तपस्वी ने उत्तर दिया, “आप सबसे बड़े हैं । मैं अपनी रूपवती और गुणवती कन्या का हाथ आपके ही हाथ में देना चाहता हूं।” पास में खड़ी कन्या सुन ही रही थी । वह भौंहों को नचाती हुई बोली, “इनका हृदय तो बड़ा कठोर है । मैं इनके साथ विवाह नहीं करूंगी ।”

तपस्वी ने पहाड़ की ओर देखते हुए कहा, “कृपा करके बताइए, क्या आपसे भी कोई बड़ा है?” पहाड़ ने उत्तर दिया, “चूहा, मुझसे भी बड़ा है, क्योंकि वह खोदकर मुझमे भी बिल बना लेता है।” तपस्वी ने चूहे को बुलाया । चूहे को देखते ही कन्या प्रसन्न हो उठी । मुसकराती हुई बोली, “यही मेरे योग्य वर हैं । मैं इन्हीं को ढूंढ रही थी।”

तपस्वी ने मंत्र की शक्ति से कन्या को फिर से चुहिया बना दिया। चुहिया प्रसन्न होकर चूहे के साथ चली गई। कोई कितना ही प्रयत्न क्यों न करे, पर स्वभाव नहीं बदलता।

कहानी से शिक्षा

जीवों के प्रति दया दिखाना सबसे बड़ा धर्म है। संसार में ईश्वर को छोड़कर कोई बड़ा नहीं है | प्रयत्न करने पर भी जातीय गुण और स्वभाव नहीं बदलता