रहस्यमय जोम्बीज़ का सच


रहस्यमय जोम्बीज़ का सचकिसी समय डरावने किस्से-कहानियों के मुख्य पात्र भूत, प्रेत, पिशाच, बैताल आदि ही हुआ करते थे | समय बदला, पात्र बदले और दन्त-कथाओं, लोक-कथाओं एवं आज की आधुनिक फ़िल्मों से होता हुआ इन पात्रों का व्यवहार भी बदला | मानवीय कल्पनाओं के असीमित संसार में अब डरावने किरदारों ने नया रूप लेना प्रारम्भ कर दिया है |

यद्यपि ये प्रक्रिया एक दो सालों में नहीं बल्कि पीढ़ियों से गुजरती हुई पूरी होती है तथापि हम अपने आस-पास नज़र डालें तो हमें ये बदलाव दृष्टिगोचर हो सकता है | आज की पीढ़ी का बच्चा, किसी भी अन्य डरावने मानवेतर प्राणी की तुलना में, आपको ज़ोम्बीज़ के बारे में अधिक अच्छे तरीके से समझा देगा |

“ज़ोम्बी”, हैती देश से आया एक शब्द है | उत्तरी और दक्षिणी अमेरिका के बीच फैले हुए कैरेबियन द्वीप समूह में लगभग अठाईस हज़ार वर्ग किलोमीटर में फ़ैला हुआ एक देश हैती, जिसकी वर्तमान जनसंख्या एक करोड़ के आस-पास है, सन 1804 के करीब दुनिया के सामने पहली बार एक स्वतन्त्र राज्य के रूप में सामने आया |

इससे पहले उस पर फ़्रांस का अधिपत्य था | जब एक मृत मानव-शरीर एक चलती-फिरती ज़िन्दा लाश की तरह व्यवहार करे तो उसे ज़ोम्बी कहते है | इस पात्र को आपने कई विदेशी डरावनी फ़िल्मों में देखा होगा |

प्रसिद्ध डरावनी फ़िल्मों के निर्माता जोर्ज ए रोमेरो को कौन नहीं जानता | ज़ोम्बीज़ पर उनकी प्रसिद्ध फ़िल्म “नाईट ऑफ़ द लिविंग डेड”, रिचर्ड मैथेसोंन की उपन्यास “आई एम् लीजेंड” से प्रेरित थी | यद्यपि इस उपन्यास से प्रेरित इसी नाम पर, ज़ोम्बीज़ पर आधारित, एक और फ़िल्म भी बन चुकी है जिसमे मुख्य भूमिका विल स्मिथ ने निभाई थी |

हैती की दन्त-कथाओं में ज़ोम्बी उस चलते-फिरते मृत मानव-शरीर को बताया गया है जिसमे एक विशेष तरह के अभिचार कर्म से जान डाल दी गयी हो लेकिन उसमे किसी भी तरह से एक स्वतन्त्र सोच, बुद्धि, विवेक काम न करता हो | अक्सर उसको नियंत्रित करने वाला वो तान्त्रिक होता है जिसने अभिचार कर्म से उसे जीवित किया होता है |

तो मुख्य रूप से ज़ोम्बीज़ का निर्माण करना एक तान्त्रिक प्रक्रिया है | इतिहास में इससे मिलता-जुलता एक और पात्र है “गॉल” | ज़ोम्बीज़ जैसे ही व्यवहार प्रदर्शित करता ये पात्र अरबियन दन्त-कथाओं में पाया जाता है |

हैती लोगों की मान्यता के अनुसार सामान्य ज़ोम्बी से अलग एक अमूर्त एवं निराकार जोम्बी भी होता है जिसे ज़ोम्बी-एस्ट्रल कहते हैं जो वास्तव में मानवीय चेतना का ही एक भाग होता है | वहां का तान्त्रिक, जिसे वहां की भाषा में बोकोर कहते हैं, किसी की ज़ोम्बी-एस्ट्रल पर कब्ज़ा कर सकता है अपनी अध्यात्मिक शक्ति बढाने के लिए |

वहां की मान्यताओं के अनुसार बोकोर एक ज़ोम्बी-एस्ट्रल को कैद करके बोतल में सील बंद भी कर सकता है और उसे किसी क्लाइंट को बेच भी सकता है, उसका (क्लाइंट का) सौभाग्य वापस पाने के लिए, कोई लाईलाज बीमारी ठीक करने के लिए या व्यापर में सफ़लता के लिए |

ऐसी उनकी मान्यता है कि अन्ततोगत्वा ईश्वर उस ज़ोम्बी की आत्मा को फिर से ले लेंगे और उसे मुक्त करेंगे | तो इस प्रकार से ज़ोम्बी एक अस्थाई अभौतिक तत्व है जो भौतिक मृत मानव-शरीर में निवास करता है |

हैती में ही ला इस्तेयर नाम का एक गाँव है जहाँ से, 1982 में, ये खबर उड़ी थी की वहां कुछ किसानो के खेतों में ज़ोम्बीज़ मज़दूरी का काम करते है, एक बन्धुआ मज़दूर की तरह | इसी ला इस्तेयर गाँव के रहने वाले क्लैर्विऔस नारसिसे (1922 – 1994) ने अपनी मृत्यु के 20 वर्ष बाद वापस आकर गाँव वालों को एक ऐसी हैरतंगेज़ बात बतायी जो आपको भी ज़ोम्बीज़ के बारे में दोबारा सोचने पर विवश कर देगी |

उन्होंने बताया की एक दिन अचानक मेरी तबियत ख़राब हो गयी | मेरी बहन मुझे डेशाबेले के अल्बर्ट श्विज़र मेमोरियल हॉस्पिटल ले गयी | मेरी हालत बिगड़ती जा रही थी | मुझे लग रहा था मेरे फेफड़े काम नहीं कर रहे थे | दिल डूबता जा रहा था और साथ ही मेरे पेट में भयंकर जलन हो रही थी |

अचानक मुझे लगा मेरा पूरा शरीर जम सा गया है जब मैंने डॉक्टर को मेरी बहन से यह कहते सुना कि तुम्हारा भाई मर चुका है | डॉक्टर ने सफ़ेद चद्दर से मेरा शरीर ढक दिया और मेरी बहन को मेरा मृत्यु प्रमाण-पत्र बनाकर दे दिया | हॉस्पिटल में मेरे कुछ मित्र मुझे देखने आये | मै उन्हें दुःख प्रकट करते सुन रहा था लेकिन अब मेर अन्दर हिलने या बोलने की भी शक्ति नहीं बची थी |

दिन के समय मुझे ताबूत में डाल कर दफना दिया गया और मै ताबूत पर गिरती हुई मिटटी की आवाज़ सुनता रहा | रात को दो आदमियों ने मुझे मेरी कब्र से निकाला | कब्र को मिटटी से पाटकर और पहले जैसी बनाकर वे लोग मुझे रस्सियों से बांधकर एक खेत पर ले गए जहाँ पहले से ही 100 से ज्यादा तथाकथित ज़ोम्बीज़ बंधुआ मज़दूर की तरह काम कर रहे थे |

दुनिया की नज़रों में ये लोग मर चुके थे | जादू-टोने करने वाले तांत्रिक और ओझा इन्हें रात-दिन नशे में रखकर मज़दूरी कराते थे | इनकी बुद्धि और विवेक दोनों ही दवाओं के नशे में दब चुके थे |

मैंने दो वर्षों तक वहां काम किया | एक दिन वहां का सुपरवाईज़र गलती से मज़दूरों को नशे की दवा देना भूल गया | कुछ मजदूरों को जब होश आया तो सहसा उन्हें विश्वास ही नहीं हुआ कि उनके साथ आखिर ये हो क्या रहा है | विद्रोह करके सुपरवाईज़र को मारकर हम लोग वहां से भाग निकले |

उसके बाद मै अपने भाई के डर से अपने गाँव नहीं लौटा क्योकि मेरा भाई भी इस काण्ड में लिप्त था | क्लैर्विऔस के अनुसार वो अपने भाई की मौत के बीस साल बाद गाँव में ये बताने आया था कि वो ज़ोम्बी नहीं है, एक ज़िन्दा इन्सान है | वहां से भागने के बाद नारसिसे ने अपनी मेडिकल जांच कराई |

जांच रिपोर्ट में ये दावा किया गया कि नारसिसे को कुछ रासायनिक पदार्थो का मिश्रण दिया गया खाने को जिसमे tetrodotoxin और bufotoxin प्रमुख रूप से थे जिसकी वजह से वो कोमा में चला गया और फिर मृत्यु की बिलकुल करीब पहुँच गया | उसके बाद उसे मृत मानकर उसी अवस्था में दफना दिया गया |

किसी भी निष्कर्ष पर पहुँचने से पहले हमें क्लैर्विऔस की बातों के सारे पहलुओं पर गौर करना चाहिए | क्योकि कई बार जो दीखता है वो वास्तव में हुआ नहीं होता | हम जिस माया का आश्रय लेकर ये जीवन जी रहे हैं, ये चराचर जगत, अखिल विश्व ब्रह्माण्ड उसी माया का एक वृहत्तम जाल है जिसे समझना बहुत ही कठिन है |

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