भगवान का अन्तर्यामी रूप में अवतार
मनुष्य एवं ईश्वर का संबंध पूर्वकाल से ही एक ऐसी मानवीय भूमि पर प्रतिष्ठित है , जहां एक के उत्क्रमण और दूसरे के अवतरण के द्वारा परस्पर आकर्षण होता रहा है। ईश्वर मनुष्य की स्वानुभूतियों से ऊपर इच्छामय , प्रेममय …
मनुष्य एवं ईश्वर का संबंध पूर्वकाल से ही एक ऐसी मानवीय भूमि पर प्रतिष्ठित है , जहां एक के उत्क्रमण और दूसरे के अवतरण के द्वारा परस्पर आकर्षण होता रहा है। ईश्वर मनुष्य की स्वानुभूतियों से ऊपर इच्छामय , प्रेममय …
श्री गंगा के उत्पत्ति में मूल कारण तपस्या है । भारतीय संस्कृति में तप के महत्व को सर्वाेच्च माना गया है । तप द्वारा अकथनीय ऊर्जा की उत्पत्ति होती है। राजा भागीरथ ने हजारों वर्षों तक तपस्या कर ब्रह्मा जी …
नवनीरद-श्याम, कोटि कन्दर्प लावण्य-लीला धाम, वनमाला विभूषित, पीताम्बरधारी भगवान श्री कृष्ण परब्रह्म परमात्मा हैं। प्रलय के समय स्वरूपा प्रकृति इनमें क्रियाशीला हो जाती है। सृष्टि के अवसर पर परब्रह्म परमात्मा स्वयं दो रूपों में प्रकट हुए-प्रकृति और पुरूष। परब्रह्म परमात्मा …
श्री महाप्रभु जी श्री वल्लभाचार्य जी अवतरित होकर इस धराधाम पर पधारे और उन्होंने अपने बताये भगवत्सेवा-स्मरण तथा ज्ञानोपदेश से दिग्भ्रमित भारतवासियों के जीवन को रसमय और आनंदमय बना दिया। उन्होंने अपने ‘चतुःश्लोकी’ में कहा है कि सच्चिदानन्द प्रभु श्री …
भगवान श्री हरि के वाहन और उनके रथ की ध्वजा में स्थित विनता नन्दन गरूड़ भगवान विभूति हैं। वे नित्य मुक्त और अखण्ड ज्ञान सम्पन्न हैं। उनका विग्रह सर्ववेदमय है, उनके पंख बृहत और रथन्तर हैं, उड़ते समय जिस से …
फल्गु नदी के अंत के रमणीय तट पर श्री विष्णु भगवान एवं माता मंगलागौरी जी के दिव्य स्थान से सुशोभित पितरो का उद्धार करने वाले , तीर्थ गया को भारतीय तीर्थों में सबसे उत्तम स्थान प्राप्त है। गया में भगवान …
श्री कृष्ण की राधा जी कौन थीं, इस सम्बन्ध में पुराणों में आख्यान बिखरे पड़े हैं | ‘अनया राधितो नूनं भगवान हरिरीश्वरः’-इस वचन के द्वारा श्री शुकदेव जी ने श्रीमद भागवत के दशम स्कन्ध में परोक्ष रूप से श्री राधिका …
भगवान के अवतार से तात्पर्य है-‘अवति भक्तांस्तारयति पतितांश्चेति अवतारः।’ अर्थात भक्तों की रक्षा करना और पापियों का उद्धार करना उन भगवान के अवतार का मुख्य प्रयोजन है। भगवान के असंख्य अवतार हैं, ‘अवतारा ह्यासंख्येयाः’ (श्रीमद0 1।3।26)। ब्रह्मा जी ने भगवान …
भगवान श्री कृष्ण भगवत गीता में कहते हैं कि वे समस्त वृक्षों में पीपल के वृक्ष हैं और देवर्षियों में नारद हैं। इसके बाद पुनः श्रीमद भागवत में वे कहते हैं-वनस्पतियों में मैं पीपल और धन्यों में यव (जौ) हूं। …
अवतार की अवधारणा सनातन संस्कृति का अभिन्न अंग रही है। अवतारवाद हमारी आस्था, श्रद्धा और भावना तो है ही, साथ ही एक उच्च आदर्श परम्परा भी है। ‘सम्भवामि युगे युगे’-यह श्री भगवान का बहुत स्पष्ट उदघोष है। साधुजनों का संरक्षण, …