भारतीय पौराणिक ग्रंथों में विभिन्न लोकों के कालान्तर का वर्णन


NASA-Planet-Imageपौराणिक ग्रंथो के रचयिता महर्षि वेदव्यास जी ने काल यानी समय के वर्गीकरण को प्राचीन आर्ष ग्रंथों में समुचित रीति से समझाया है उनके अनुसार परमेश्वर कल्प के प्रारम्भ में सृष्टि और कल्पके अन्त में प्रलय करते है ।

कल्प परमेश्वर का दिन है । इस कारण परमेश्वर के दिन में सृष्टि और रात्रि में प्रलय होता है । काल गणना की सबसे छोटी इकाई, निमेष, से प्रारम्भ करते हुए उन्होंने बताया कि अठारह निमेष (पलक गिरने के समय को निमेष कहते हैं) की एक काष्ठा होती है अर्थात् जितने समय में अठारह बार पलको का गिरना हो, उतने काल को काष्ठा कहते हैं ।

तीस काष्ठा की एक कला, तीस कला का एक क्षण, बारह क्षण का एक मुहूर्त, तीस मुहूर्त का एक दिन-रात, तीस दिन-रात का एक महीना, दो महीनों की एक ऋतु, तीन ऋतुओं का एक अयन दो अयन का एक वर्ष होता है ।

इस प्रकार से सूर्य भगवान के द्वारा दिन-रात्रि का काल-विभाग होता है । सम्पूर्ण जीव रात्रि को विश्राम करते है और दिन में अपने अपने कर्म में प्रवृत्त होते है । विभिन्न लोकों के कालान्तारों को स्पष्ट करते हुए उन्होंने बताया कि पितरो का दिन-रात मनुष्यों के एक महीने के बराबर होता है अर्थात् शुक्ल पक्ष (पन्द्रह दिन) में पितरो की रात्रि और कृष्ण पक्ष (पन्द्रह दिन) में पितरों का दिन होता है ।

देवलोक का एक अहोरात्र (दिन-रात) मनुष्य लोक के एक वर्ष के बराबर होता है अर्थात् हमारे यहाँ का उत्तरायण (छह महीने) उनके यहाँ का एक दिन तथा दक्षिणायन (छह महीने) उनकी एक रात्रि कही जाती है ।

उसके बाद उन्होंने युगों की आयु के अनुसार ब्रह्मा जी के दिन और रात्रि के समय का मान स्पष्ट किया है | भारतीय पौराणिक मान्यताओं के अनुसार चार युग होते हैं सत्ययुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग, और कलियुग |

उन्ही तथ्यों के अनुसार सत्ययुग चार हजार वर्ष का है, उसके संध्यांश के चार सौ वर्ष तथा संध्या के चार सौ वर्ष मिलकर इस प्रकार चार हजार आठ सौ दिव्य वर्षों का एक सत्ययुग होता है ।

इसी प्रकार त्रेतायुग तीन हजार वर्षों तथा संध्या और संध्यांश के छः सौ वर्ष को मिला कर कुल तीन हजार छ: सौ वर्ष का त्रेतायुग, द्वापर दो हजार वर्षों का संध्या तथा संध्यांश के चार सौ वर्ष मिला कर कुल दो हजार चार सौ वर्ष का द्वापर युग तथा कलियुग एक हजार वर्ष तथा संध्या और संध्यांश के दो सौ वर्ष मिलाकर कुल बारह सौ वर्षों के मान का होता है ।

ये सब दिव्य वर्ष मिलाकर बारह हज़ार दिव्य वर्ष होते हैं । यही देवताओं का एक युग कहलाता है । यानी हमारे यहाँ का एक चतुर्युग (कुल बारह हज़ार वर्ष) देवताओं के एक युग के बराबर होते हैं |

भविष्य पुराण के अनुसार देवताओं के ऐसे हजार युग होने से ब्रह्माजी का एक दिन होता है और यही प्रमाण उनकी रात्रि का है । मनुष्य लोक की तुलना में अन्यान्य उच्च लोकों का काल प्रवाह विस्तृत है |

जो जितनी उच्च आयामीय सृष्टि होगी वहाँ काल प्रवाह उतना ही विस्तृत होगा | काल प्रवाह के विस्तृत होने से जितने समय में वहाँ का एक वर्ष व्यतीत होगा उतने ही अंतराल में अन्यान्य निम्न लोकों में सैकड़ों या हज़ारों वर्ष व्यतीत हो चुके होंगे |

ब्रह्म लोक की तुलना में, ब्रह्मा जी द्वारा रची गयी सृष्टि के अन्यान्य निम्न लोकों का काल प्रवाह अत्यंत तीव्र होता है | जब ब्रह्माजी अपनी रात्रि के अन्त में सोकर उठते हैं तब सत्-असत्-रूप मन को उत्पन्न करते हैं । वह मन ही समस्त सृष्टि का कारक है |

सृष्टि करने की इच्छा से जब मन विकार को प्राप्त होता है, तब उससे प्रथम आकाश-तत्व उत्पन्न होता है । आकाश का गुण शब्द कहा गया है । विकारयुक्त आकाश से सब प्रकार के गन्ध को वहन करने वाली पवित्र वायु की उत्पत्ति होती है, जिसका गुण स्पर्श है ।

इसी प्रकार विकारयुक्त वायु से अन्धकार का नाश करने वाला प्रकाशयुक्त तेज उत्पन्न होता है, जिसका गुण रूप है । विकारवान तेज से जल, जिसका गुण रस है और जल से गन्ध गुण वाली पृथ्वी उत्पन्न होती है । इसी प्रकार से सृष्टिका क्रम चलता रहता है ।

इससे पूर्व में जो बारह हजार दिव्य वर्षों का जो एक दिव्य युग बताया गया है, वैसे ही एकहत्तर युग होने से एक मन्वन्तर होता है । ब्रह्माजी के एक दिन में चौदह मन्वन्तर व्यतीत होते है। सत्ययुग में धर्म के चारों पाद वर्तमान रहते है अर्थात् सत्ययुग में धर्म चारों चरणों से (अर्थात् सर्वाङ्गपूर्ण) रहता है ।

फिर त्रेता आदि युगों में धर्म का बल घटने से धर्म क्रम से एक-एक चरण घटता जाता है,-अर्थात् त्रेता में धर्म के तीन चरण, द्वापर में दो चरण तथा कलियुग में धर्म का एक ही चरण बचा रहता है और तीन चरण अधर्म के रहते हैं ।

सत्ययुग के मनुष्य धर्मात्मा, नीरोग, सत्यवादी होते हुए चार सौ वर्षोंतक जीवन धारण करते हैं । फिर त्रेता आदि युगों में इन सभी वर्षों का एक चतुर्थांश न्यून हो जाता है, यथा त्रेता के मनुष्य तीन सौ वर्ष, द्वापर के दो सौ वर्ष तथा कलियुग के मनुष्य एक सौ वर्ष तक जीवन धारण करते हैं ।

इन चारों युगो के धर्म भी भित्र-भित्र होते हैं । सत्ययुग में तपस्या ही धर्म है, त्रेता में ज्ञान, द्वापर में यज्ञ और कलियुग में दान को प्रधान धर्म माना गया है । परम द्युतिमान परमेश्वर ने सृष्टि की रक्षा के लिये अपने मुख, भुजा, ऊरु और चरण से क्रमशः ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र-इन चार वर्णो को उत्पन्न किया और उनके लिये अलग-अलग कर्मों की स्थापना की ।

ब्राह्मण के लिये अध्ययन करना यानी पढ़ना- पढ़ाना, यज्ञ करना यज्ञ कराना तथा दान देना और दान लेना-वे छः कर्म निश्चित किये गये हैं । पढ़ना, यज्ञ करना, दान देना तथा प्रजा का पालन आदि कर्म क्षत्रियों के लिये नियत किये गये हैं ।

पढ़ना, यज्ञ करना, दान देना, पशुओं की रक्षा करना, खेती-व्यापार से धनार्जन करना—ये काम वैश्यों के लिये निर्धारित किये गये और पढ़ने के अलावा इन तीनों वर्णों की सेवा करना–यह एक मुख्य कर्म शूद्रों का नियत किया गया है ।

पौराणिक काल में भी पढ़ने यानि अध्ययन करने के कार्य को अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया था और इसे चारो वर्णों के आवश्यक कर दिया गया था | बहुत से वामपंथी इतिहासकार प्राचीन भारत में शूद्रों की स्थिति अत्यंत दयनीय और शोचनीय दिखाकर वर्णन करते हैं किन्तु ऐसा नहीं था | पढ़ने का अधिकार सभी को था |

शूद्रों का कार्य मुख्यतः नौकरी करना था और प्राचीन भारत में दूसरों के यहाँ नौकरी करना अच्छा नहीं समझा जाता था बल्कि स्वतंत्र व्यवसाय उत्तम और कृषि सर्वोत्तम मानी जाती थी | मांस खाना, काटना और दूसरों के भोजन के लिए उसे विक्रय करना निकृष्टतम कार्य माना जाता था |

लेकिन अंग्रेजों के शासन काल से ही परान्न्भोजी इतिहासकारों ने भारतीय इतिहास के ग्रंथों को मनमाने तरीके से विकृत किया है | परिणाम, एक ऐसी पीढ़ी के रूप में हमारे सामने है जिसे अपने गौरवमयी अतीत (इतिहास) से ना तो प्रेम है और ना ही उसमे दिलचस्पी है | लेकिन समय बदल रहा है | आने वाले समय में हमें इन्ही पीढ़ियों में कुछ ऐसे भी महामानव दिखाई देंगे जो सनातन धर्म के मूल्यों को पुनर्स्थापित करेंगे |

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