भगवान शिव के सद्योजात, वाम देव, तत्पुरूष, अघोर और ईशान अवतार

भगवान शिव के सद्योजात, वाम देव, तत्पुरूष, अघोर और ईशान अवतारइस सृष्टि में जो परमानन्दमय हैं, जिनकी लीलाएं अनंत हैं, जो ईश्वरों के भी ईश्वर, सर्व व्यापक, महान गौरी के प्रियतम तथा कार्तिकेय और विघ्नहर्ता गणेश जी को उत्पन्न करने वाले हैं, उन आदि देव शंकर की मैं वंदना करता हूं । सर्वव्यापी सर्वेश्वर भगवान शिव के कल्प-कल्पान्तरों में असंख्य अवतार हुए हैं, उनमें से पांच अवतार अन्यतम हैं । यहां उनका वर्णन संक्षेप में इस प्रकार किया गया है |

सद्योजात-श्वेतलोहित अवतार कथा

सद्योजात-श्वेतलोहित नामक उन्नीसवें कल्प में उन परम प्रभु का ‘सद्योजात’ नामक अवतार हुआ था । यह उनका प्रथम अवतार कहलाता है । उस कल्प में जब एक बार ब्रह्मा जी परम ब्रह्म का ध्यान कर रहे थे, उसी समय एक श्वेत और लोहित वर्ण वाला शिखाधारी कुमार उत्पन्न हुआ ।

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उसे देख कर विधाता ब्रह्मा जी ने उसके विषय में मन-ही-मन विचार किया । जब उन्हें यह ज्ञात हो गया कि यह कुमार, ब्रह्मरूपी परमेश्वर हैं, तब उन्होंने हाथ जोड़कर उसकी वन्दना की । सद्योजात कुमार को शिव जानकर उन्हें महान हर्ष हुआ । वे अपनी सदबुद्धि से उन परब्रह्म का चिंतन कर ही रहे थे कि वहां श्वेत वर्ण वाले चार यशस्वी कुमार और प्रकट हुए ।

वे परमोत्कृष्ट ज्ञान सम्पन्न तथा परब्रह्म के साक्षात् स्वरूप थे । उनके नाम थे-सुनन्द, नन्दन, विश्वनन्द और उपनन्दन । ये सब के सब महात्मा ब्रह्मा जी के शिष्य हुए और इनसे वह ब्रह्म लोक व्याप्त हो गया । इसके बाद सद्योजात रूप् से प्रकट हुए परमेश्वर शिव ने परम प्रसन्न होकर ब्रह्मा जी को ज्ञान तथा सृष्टि-रचना की शक्ति प्रदान की । इस प्रकार से यह ‘सद्योजात’ नामक ब्रह्म शिव के पहले अवतार की कथा आती है ।

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वामदेव अवतार कथा

भगवान सदाशिव के ‘वामदेव’ नामक दूसरे अवतार की कथा इस प्रकार है | रक्त नामक बीसवें कल्प की बात है | उस समय पितामह ब्रह्मा जी ने रक्त वर्ण का शरीर धारण किया हुआ था । वे पुत्र की कामना से परमेश्वर का ध्यान कर रहे थे, उसी रंग की माला और लाल रंग के ही वस्त्र उनके दिव्य शरीर पर सुशोभित हो रहे थे ।

उनके नेत्र लाल थे और उन्होंने आभूषण भी लाल रंग के ही धारण कर रखे थे । उसी समय उन्होंने एक महान आत्म बल से सम्पन्न कुमार को देखा | उन्हें देख कर ब्रह्मा जी ध्यानस्थ हो गये । जब ब्रह्मा जी को यह ज्ञात हुआ कि कुमार रूपधारी ये वामदेव शिव हैं तो उन्होंने हाथ जोड़ कर उन्हें प्रणाम किया ।

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तत्पश्चात उनके विरजा, विवाह, विशोक और विश्वभावन नाम के चार पुत्र उत्पन्न हुए, जो सभी लाल वस्त्र धारण किये हुए थे । इसके बाद उन वामदेव रूपधारी सदाशिव ने परम प्रसन्न होकर ब्रह्मा जी को ज्ञान तथा सृष्टि-रचना की शक्ति दी ।

तत्पुरूष अवतार कथा

भगवान शिव का ‘तत्पुरूष’ नामक यह तीसरा अवतार पीतवासा नामक इक्कीसवें कल्प में हुआ । उस कल्प में महाभाग ब्रह्मा जी पीतवस्त्रधारी हुए । जब वे पुत्र की कामना से ध्यान कर रहे थे, उस समय उनसे एक महा तेजस्वी कुमार उत्पन्न हुआ । उस कुमार की भुजाएं विशाल थीं और उसके शरीर पर पीताम्बर झलमला रहा था ।

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उसे देख कर ब्रह्मा जी ने अपने बुद्धि बल से यह जान लिया कि ये परब्रह्म परमात्मा शिव ही ‘तत्पुरूष’ रूप में उत्पन्न हुए हैं । तब उन्होंने ध्यानमुक्त चित्त से शांकरी गायत्री का जप करते हुए उन्हें नमस्कार किया । इसके बाद उनके पार्श्व भाग से पीतवस्त्रधारी अन्य दिव्य कुमार प्रकट हुए, वे सब के सब योग मार्ग के प्रवर्तक हुए ।

अघोर अवतार कथा

भगवान शिव के कई अवतारों में से एक, अघोर अवतार भी है | ‘शिव’ नामक कल्प में भगवान शिव का ‘अघोर’ नामक चौथा अवतार हुआ । उस अवतार की कथा इस प्रकार है | जब एकार्णव (एक रहस्यमयी स्थिति) की स्थिति में एक सहस्र दिव्य वर्ष व्यतीत हो गये, तब ब्रह्मा जी प्रजाओं की सृष्टि करने की इच्छा से दुःखी हो विचार करने लगे ।

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उस समय ब्रह्मा जी के समक्ष एक कुमार प्रकट हुआ । उस कुमार के शरीर का रंग काला था, वह अपने ही तेज से उदीप्त हो रहा था तथा काला वस्त्र, काली पगड़ी और काला यज्ञोपवीत धारण किये हुए था । उसका मुकुट भी काला था और स्नान के पश्चात अनुलेपन-चन्दन भी काले रंग का ही था । उन महा भयंकर, पराक्रमी, महा मनस्वी, देव देवश्वर, अलौकिक, कृष्णपिडंगल-वर्ण वाले ‘अघोर’ को देख कर ब्रह्मा जी ने उनकी वंदना की ।

तत्पश्चात उनके पार्श्व भाग से कृष्ण वर्ण वाले काले रंग का अनुलेपन धारण किये हुए चार महामनस्वी कुमार उत्पन्न हुए । वे सबके सब परम तेजस्वी, अव्यक्तनामा तथा शिव-सरीखे रूप वाले थे । उनके नाम थे-कृष्ण, कृष्णशिख, कृष्णास्य और कृष्ण कण्ठधृक । इस प्रकार से उत्पन्न होकर इन महात्माओं ने ब्रह्मा जी को सृष्टि-रचना के निमित्त महान अदभुत ‘घोर’ नामक योग का प्रचार किया ।

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ईशान अवतार कथा

ब्रह्मा जी के विश्व रूप नामक कल्प में परमात्मा भगवान शिव का ‘ईशान’ नामक पांचवां अवतार हुआ । इस अवतार की कथा इस प्रकार से है | ब्रह्मा जी पुत्र की कामना से मन-ही-मन शिव जी का ध्यान कर रहे थे, उसी समय महान सिंहनाद करने वाली विश्व रूपा सरस्वती जी प्रकट हुईं तथा उसी प्रकार, उस समय परमेश्वर भगवान ईशान भी प्रकट हुए, जिनका वर्ण शुद्ध स्फटिक के समान उज्जवल था और जो समस्त आभूषणों से विभूषित थे ।

उन अजन्मा, सर्वव्यापी, सर्वान्तर्यामी, सब कुछ प्रदान करने वाले, सर्व स्वरूप, सुंदर रूप वाले तथा अरूप ईशान को देख कर ब्रह्मा जी ने उन्हें प्रणाम किया । तब शक्ति सहित विभु ईशान ने भी ब्रह्मा जी को सन्मार्ग का उपदेश देकर चार सुंदर बालकों की कल्पना की । उनके नाम थे-जटी, मुण्डी, शिखण्डी और अर्धमुण्ड । वे योगानुसार सद्धर्म का पालन करके योग गति को प्राप्त हो गये ।

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इस प्रकार जगत के मांगल्य की कामना से भगवाना सदाशिव के ये अवतार विभिन्न कल्पों में हुए हैं । कल्याणकामी मनुष्यों को भगवान शंकर के इन स्वरूपों की सदा प्रयत्नपूर्वक वंदना करनी चाहिये, क्योंकि जो श्रेयःप्राप्ति में एकमात्र प्राकट्य की कथा को पढ़ता अथवा सुनता है, वह जगत में समस्त काम्य भोगों का उपभोग करके अंत में परम गति को प्राप्त होता है |

भगवान शिव के स्थिति, पालन, संहार, निग्रह (तिरोभाव) और अनुग्रह-ये पंचकृत्य सभी आगमों में प्रसिद्ध हैं । इन पाँचों में पूर्व के जो चार कृत्य हैं-सृष्टि, पालन, संहार और तिरोभाव-वे संसार का विस्तार करने वाले हैं और अंतिम पाँचवां कृत्य अनुग्रह है, जो मोक्ष का हेतु है, वह सदाशिव में स्थिर रहता है ।

तंत्र साहित्य में ब्रह्म के सच्चिदानन्द स्वरुप की व्याख्या

भगवान शिव स्वयं कहते हैं कि ये पाँचों कृत्य मेरे पाँच मुखों द्वारा धारित हैं, चारों दिशाओं में चार मुख और पाँचवां मुख मध्य में है |
भगवान शिव का जो पंचाननस्वरूप है, उसमें पश्चिम दिशा का मुख ‘सद्योजात’ है ।

‘ऊँ सद्योजात प्रपद्यामि’ यह उनकी आराधना का वैदिक मंत्र है । उत्तर दिशा का मुख ‘वामदेव’ है, उसका मंत्र ‘वामदेवाय नमो ज्येष्ठाय नमः’ है । दक्षिण मुख ‘अघोर’ है, उसका मंत्र ‘ऊँ अघोरभ्यो’ इत्यादि है । भगवान शिव के पूर्वमुख का नाम ‘तत्पुरूष’ है, उसका वैदिक मंत्र ‘ऊँ तत्पुरूषाय विद्यहे’ इत्यादि है । ऊर्ध्वमुख ‘ईशान’ नाम वाला है, इनकी आराधना का वैदिक मंत्र ‘ऊँ ईशानः सर्वविद्यानामीश्वरः’ इत्यादि है ।

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पंचमुख सदाशिव का एक ध्यान-स्वरूप इस प्रकार वर्णित है-

अर्थात् जिन भगवान शंकर के पाँच मुखों में क्रमशः ऊर्ध्वमुख गजमुक्ता के समान हलके लाल रंग का, पूर्वमुख पीतमवर्ण का, दक्षिणमुख सजल मेघ के समान नीलवर्ण का, पश्चिम मुख मुक्ता के समान कुछ भूरे रंग का और उत्तर मुख जवा पुष्प के समान प्रगाढ़ रक्त वर्ण का है, जिनकी तीन आँखें हैं और सभी मुख-मण्डलों में नील वर्ण के मुकुट के साथ चंद्रमा सुशोभित हो रहे हैं,

जिनके मुख मण्डल की आभा करोड़ों पूर्ण चंद्रमा के तुल्य आहलादित करने वाली है, जो अपने हाथों में क्रमशः त्रिशूल, टड़क (परशु), तलवार, वज्र, अग्नि, नागराज, घण्टा, अंकुश, पाश तथा अभय मुद्रा धारण किये हुए हैं एवं जो अनंत कल्प वृक्ष के समान कल्याणकारी हैं, उन सर्वेश्वर भगवान शंकर का ध्यान करने से मुक्ति सहज सुलभ हो जाती है ।