प्रेतों का सबूत


प्रेतों का सबूतभूत प्रेत पिशाचों की मान्यताएं सदियों से अस्तित्व में रही है; जैसे कि भारत, मैसोपोटामिया, हिब्रू, प्राचीन यूनानी और रोमन संस्कृतियों के मिथकों एवं कहानियों में दानवों और प्रेतात्माओं को आधुनिक पिशाचों का पूर्वज माना जाता है |

हालांकि पिशाच जैसे प्राणियों के अस्तित्व की घटना इन प्राचीन सभ्यताओं में होने के बावजूद लोककथाओं के आधार पर इनकी सत्ता के बारे में माना जाता है कि पिशाचों की उत्पत्ति विशेष रूप से 18वीं सदी में दक्षिण-पूर्व यूरोप में हुई, जब उस क्षेत्र के जातीय समूहों के मौखिक परंपराओं को लिपिबद्ध और प्रकाशित किया गया | अधिकतर मामलों में पिशाचों को बुरे प्राणियों, आत्महत्या के शिकार या चुड़ैलों के भूत-प्रेत के रूप में माना गया |

कुछ समय पश्चात ऐसी लोककथाओं में विश्वास इतना व्यापक हो गया कि कुछ क्षेत्रों में इसने सामूहिक उन्माद को जन्म दिया और पिशाच समझे जाने वाले लोगों को सार्वजनिक फांसी भी दी गई विशेष रूप से यूरोप के देशों में |

लोककथात्मक पिशाच का एक निश्चित विवरण देना कठिन है, हालांकि यूरोपीय लोककथाओं में ऐसे अनेक तत्व हैं जो सार्वजानिक रूप से सामान्य हैं | पिशाचों के बारे में ऐसी रिपोर्ट थी कि वे सामान्य तौर पर देखने में फूले हुए रक्त वर्ण के या पीले, बैंगनी अथवा काले रंग जैसे होते हैं मगर उनकी इन रूप-रंग की विशेषताओं को अक्सर आजकल के रक्त पीने की घटनाओं के लिए जिम्मेदार ठहरा दिया जाता है |

वास्तव में, अक्सर कफ़न में लिपटे या ताबूत में लेटे शव के नाक और मुंह से खून रिसता हुआ देखा गया और बायीं आंख को अक्सर खुला हुआ पाया गया, यही सब चीजें आज के आधुनिक पिशाच को इस रूप में आने के लिए प्रेरित की |

प्राचीन काल में पिशाच की पहचान के लिए अनेक व्यापक धर्मानुष्ठान आयोजित किये जाते थे | इसमें पिशाच के कब्र की पहचान करने का एक तरीका यह भी था कि एक कुंवारे लड़के को एक कुंवारी घोड़ी पर बिठाकर किसी कब्रगाह या गिरजा घर की जमीन से होकर गुजारा जाता था — घोड़ा अगर कब्र के पास प्रश्नात्मक भंगिमा में अड़ गया तो समझ लिया जाता था कि कब्र में पिशाच है |

आम तौर पर एक काले घोड़े को उपयोग में लाया जाता था, हालांकि अल्बानिया में इसका सफ़ेद होना जरूरी था | किसी कब्र के ऊपर मिट्टी में अगर कोई सुराख़ दिखाई देती थी तो उसे पैशाचिकी होने का चिन्ह मान लिया जाता था.

जिन शवों को पिशाच समझ लिया जाता था वे आमतौर पर अपेक्षा से अधिक स्वस्थ और गोल मटोल दिखते थे और उनमें सड़न का कोई नामो-निशान भी नहीं दिखाई देता था | कुछ मामलों में जब संदेहास्पद कब्रें खोली जाती थी, तो  ग्रामीणों के विवरण के अनुसार शवों के पूरे चेहरे पर किसी शिकार के ताजे खून पाए जाते थे |

मवेशियों, भेड़ों, रिश्तेदारों या पड़ोसियों की मौत यह प्रमाणित करती थी कि पिशाच किसी निश्चित इलाके में ही सक्रिय रहते थे | लोककथाओं के पिशाच छोटे-मोटे भुतहा कार्यों के जरिए अपनी मौजूदगी का अहसास दिला सकते थे, जैसे कि छतों पर पत्थर फेंकना, घर के सामानों को अस्त-व्यस्त कर देना और सोते हुए लोगों पर दबाव डालना इत्यादि |

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