भगवान शिव के अवधूतेश्वर अवतार की कथा


भगवान शिव के अवधूतेश्वर अवतार की कथापूरे त्रैलोक्य के लिए कल्याणकारी परमात्मा भगवान शिव सबके गर्वापहारी हैं । उनका अवधूतेश्वर अवतार देवराज इन्द्र के गर्वापहरण के लिये हुआ । यश, स्वर्ग, भोग, मोक्ष तथा सम्पूर्ण मनोवांछित फलों को प्राप्त कराने वाली है, भगवान्य शिव की यह पुण्य कथा शिव पुराण में आती है, जो इस प्रकार से है |

पूर्वकाल के एक कल्प की बात है, एक बार देवराज इन्द्र सम्पूर्ण देवताओं और बृहस्पति जी को लेकर कैलाश पर्वत पर गये । उस समय इन्द्र के मन में अपने ऐश्वर्य और अधिकार को ले कर अहंकार पैदा हो गया था । ब्रह्माण्ड के अन्य जीवों की तुलना में अपने आप को श्रेष्ठ समझने का भाव आ गया था उनमे |

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लेकिन भगवान शिव तो अन्तर्यामी हैं, उन परमात्मा से इन्द्र का यह मिथ्या अंहकार छिपा न रहा । अतः उन्होंने इन्द्र का पतन न हों इसलिए उनके कल्याण के लिये अवधूत का स्वरूप धारण किया और कैलाश आते समय उनके रास्ते में खड़े हो गये ।

अपने रास्ते में खड़ा देख, इन्द्र ने उन अवधूत रूपधारी सदाशिव से पूछा “तुम कौन हो? भगवान शिव अपने स्थान पर हैं या कहीं अन्यत्र गये हैं”? परंतु बार-बार पूछने पर भी शिव जी ने इन्द्र को कोई उत्तर न दिया ।

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इस प्रकार उस दिगम्बर अवधूत द्वारा अपनी अवहेलना होते देख इन्द्र क्रोधित हो गये और उन अवधूत रूपधारी सदाशिव को फटकारते हुए बोले “अरे मूढ़ ! दुर्मते ! तू बार-बार पूछने पर भी उत्तर नहीं देता, अतः मैं तुझ पर वज्र-प्रहार करता हूं । देखता हूं, इस त्रिलोक में तुझे कौन बचाता है” ।

इन्द्र को वज्र-प्रहार हेतु उद्यत देख कर अवधूत रूप धारी भगवान शिव ने उन्हें वज्रसहित स्तम्भित कर दिया, फिर तो इन्द्र की बाँह ही अकड़ गयाी और वे मंत्र से अभिमंत्रित सर्प की भांति क्रोध से जलने लगे । उधर उन अवधूतेश्वर स्वरूप भगवान शिव के ललाट से एक तेज निकला ।

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उस प्रज्वलित तेज रुपी शक्ति को इन्द्र की ओर बढ़ते देख कर देव गुरू बृहस्पपि ने यह समझ लिया कि ये और कोई नहीं, बल्कि अवधूत रूप धारी साक्षात परमात्मा भगवान शिव ही हैं, तो उन्होंने भगवान शिव की स्तुति की और इन्द्र को उनके शरणागत कर दिया तथा उस प्रज्वलित तेज से उनकी रक्षा करने के लिए प्रार्थना की ।

भगवान शिव ने प्रसन्न होकर हंसते हुए कहा “देवगुरु ! रोषवश निकली इस अग्नि को मैं पुनः कैसे धारण कर सकता हूं, कहीं सर्प अपनी छोड़ी हुई केन्चुल पुनः धारण करता है कभी ? फिर भी मैं तुम पर प्रसन्न हूं, तुमने इन्द्र को जीवनदान दिलाया, अतः आज से तुम्हारा नाम ‘जीव’ प्रसिद्ध होगा ।

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मेरे ललाटवर्ती नेत्र से निकली इस अग्नि रुपी भीषण शक्ति को देवता सह नहीं सकते, अतः मैं इनके कल्याण के लिये इसे अन्यत्र प्रक्षिप्त करता हूँ” यह कहकर अवधूत वेशधारी भगवान शंकर ने उस भयंकर तेज को एक क्षारीय महासागर में फेंक दिया, वहां गिरते ही वह तत्काल एक बाल के रूप में परिणत हो गया, जो सिंधु पुत्र जलंधर के नाम से विख्यात हुआ ।

इस प्रकार अवधूतेश्वर अवतार धारण कर इन्द्र के गर्व का भंजन करके लीलावपुधारी भगवान सदाशिव अन्तर्धान हो गये और देवगुरु बृहस्पति के साथ देवराज इंद्र अपनी मंडली को लिए हुए वापस लौट गए ।





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