सर्वशक्तिमान ईश्वर कौन हैं, उनके विभिन्न अवतार क्या हैं

सर्वशक्तिमान ईश्वर कौन हैं, उनके विभिन्न अवतार क्या हैंईश्वरीय तत्व जब महामाया के अविद्या रुपी अंश के साथ होता है तो वह उसके वशीभूत हो जाता है और बन जाता है ‘जीवात्मा’ | फिर आरम्भ होता है जन्म-जन्मान्तर तक विभिन्न देह ग्रहण करने और कर्मानुसार सुख-दुःख भोगने का क्रम |

देह भी प्रधानतया दो प्रकार की होती हैं-प्राकृत और अप्राकृत । प्रकृति के राज्य के अन्तर्गत आने वाली समस्त देह प्राकृत हैं और प्रकृति के साम्राज्य से परे ईश्वर के दिव्यचिन्मय राज्य की देह अप्राकृत होती हैं । अविद्या (माया) के मूल में होने की वजह से प्राकृत देह का निर्माण स्थूल, सूक्ष्म और कारण-इन तीन भेदों से होता है ।

जब तक कारण शरीर विद्यमान रहता है, तब तक प्राकृत देह से मुक्ति नहीं मिलती या यूं कहे कि आवागमन के बंधन से मुक्ति नहीं मिलती । इस त्रिविधदेहसमन्वित प्राकृत देह से छूटकर, प्रकृति के राज्य से विमुक्त होकर केवल आत्म रूप में ही स्थित होने या भगवान् के अविनाशी धाम में उनके चिन्मय पार्षदादि दिव्य स्वरूप की प्राप्ति होने का नाम ही ‘मुक्ति’ है ।

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जहाँ तक प्राकृत शरीर की बात है तो मैथुनी-अमैथुनी, योनिज-अयोनिज-सभी प्राकृत शरीर वस्तुतः योनि और बिन्दु के संयोग से ही बनते हैं । उपनिषदों में इनके कई स्तर बताये गए हैं । अधोगामी बिन्दु (अर्थात वीर्य के अधोगमन) से उत्पन्न शरीर अधम है और ऊर्ध्वगामी (अर्थात ऊर्ध्वरेता ब्रह्मचारी स्त्री-पुरुष) से उत्पन्न शरीर उत्तम ।

काम प्रेरित मैथुन क्रिया से उत्पन्न शरीर सबसे निकृष्ट माना गया है, किसी प्रसंगविशेष पर ऊर्ध्वरेता पुरूष के संकल्प से बिन्दु (वीर्य) के अधोगामी होने पर उससे उत्पन्न होने वाला शरीर, पिछली श्रेणी से उत्तम द्वितीय श्रेणी का है |

ऊर्ध्वरेता पुरूष के संकल्प मात्र से केवल नारी-शरीर के मस्तक, कण्ठ, कर्ण, हृदय या नाभि आदि के स्पर्श मात्र से उत्पन्न शरीर, द्वितीय श्रेणी की अपेक्षा भी उत्तम तृतीय श्रेणी का होता है । इसमें भी नीचे के अंगों की अपेक्षा ऊपर के अंगों के स्पर्श से उत्पन्न शरीर अपेक्षाकृत उत्तम है ।

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बिना स्पर्श के केवल दृष्टि द्वारा उत्पन्न शरीर उससे भी उत्तम चतुर्थ श्रेणी का है और बिना देखे ही संकल्प मात्र से उत्पन्न शरीर उससे भी श्रेष्ठ पंचम श्रेणी का है । इन पांच श्रेणियों में प्रथम और द्वितीय श्रेणी के शरीर मैथुनी हैं और शेष तीनों शरीर अमैथुनी है । अतः पहले दोनों शरीर (मैथुनी) की अपेक्षा बाद के तीनों शरीर (अमैथुनी) श्रेष्ठ तथा शुद्ध माने गए हैं । इनमें पंचम श्रेणी का शरीर सर्वोत्तम माना गया है ।

इन दोनों श्रेणियों के अतिरिक्त, स्त्रीपिण्ड या पुरूष पिण्ड के बिना भी शरीर उत्पन्न होते हैं, लेकिन उनमें भी सूक्ष्म योनि और बिन्दु का सम्बन्ध तो रहता ही है । प्रेतादि लोकों में वायुप्रधान और देवलोकादि में तेजः प्रधान, उनके लोक के अनुरूप देह भी प्राकृतिक ही होते हैं । योगियों के सिद्धिजनित ‘निर्माण-शरीर’ बहुत शुद्ध होते हैं, लेकिन वे भी प्रकृति से अतीत या परे नहीं होते हैं ।

अप्राकृत, भगवान के गण और पार्षदादि के अलावा भगवान् के मंगलमय लीलासंगियों के भावदेह भी अप्राकृत ही हैं (क्योंकि वे प्रकृति द्वारा रचे गए तत्वों से नहीं बने होते हैं) और वे प्राकृत शरीर से अत्यन्त विलक्षण होते हैं, पर वे भी ईश्वर के शरीर से निम्न श्रेणी के ही होते हैं ।

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ईश्वरीय शरीर तो भगवत्स्वरूप तथा सर्वथा अनिर्वचनीय है । भगवान् नित्य सच्चिदानन्दमय हैं, इसलिये भगवान् के सभी अवतार नित्य सच्चिदानन्दमय ही होते हैं, पर लीला-विकास (या दूसरे शब्दों में कहें तो कला-विकास) के तारतम्य से उनके अवतारों में अंतर होता है ।

मुख्यतया अवतारों के चार प्रकार माने गये हैं-पुरूषावतार, गुणावतार, लीलावतार और मन्वन्तरावतार ।

पुरुषावतार
आत्यंतिक महाप्रलय के बाद महामाया अपने समस्त विस्तार को समेट कर जिनके आश्रित हो कर उन्हीं में स्थिर हो जाती हैं, उन परमेश्वर ने सबके आदि में (जब काल के साम्राज्य का भी उद्भव नहीं हुआ था) लोक सृष्टि की इच्छा से महत्तत्वादि-सम्भूत षोडशकलात्मक पुरुषावतार धारण किया था ।

भगवान् का चतुर्व्यूह है-श्रीवासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न और अनिरूद्ध । वास्तव में ‘भगवान्’ शब्द श्रीवासुदेव के लिये प्रयुक्त होता है । इन्हीं को ‘आदिदेव नारायण’ भी कहा जाता है । इन आदिदेव भगवान के पुरूषावतार के तीन भेद हैं ।

इनमें से जो आद्यपुरूषावतार, उपर्युक्त षोडशकलात्मक पुरूष हैं, ये ही ‘श्रीसंकर्षण’ हैं । इन्हीं को ‘कारणार्णवशायी’ या ‘महाविष्णु’ कहा जाता हैं । इन्ही से महत्तत्व समेत सारे तत्वों, शक्तियों, एवं कलाओं की उत्पत्ति हुई है |

काल की उत्पत्ति भी इन्ही महाविष्णु से हुई है | पुरूषसूक्त में वर्णित ‘सहस्रशीर्ष पुरूष’ ये ही हैं । ये अशरीरी प्रथम पुरूष, ‘कारण-सृष्टि’ अर्थात् तत्वसमूह की आत्मा हैं ।

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आद्यपुरूषावतार ‘भगवान्’, ब्रह्माण्ड में जिस अन्तर्यामीरूप से प्रविष्ट होते हैं, वे उनके द्वितीय पुरूषावतार ‘श्रीप्रद्युम्न’ हैं । ये ही ‘गर्भोदकशायी’ रूप हैं । इन्हीं पद्मनाभ भगवान् के नाभि कमल से हिरण्य गर्भ का प्रादुर्भाव होता है |

ये ही ब्रह्माण्ड के कण-कण में समाये हैं और अंत में सारा ब्रह्माण्ड इन्ही में समा जाएगा | ‘भगवान’ के तृतीय पुरूषावतार ‘श्रीअनिरूद्ध’ हैं, जो प्रादेशमात्र विग्रह से समस्त जीवों में अन्तर्यामीरूप से स्थित हैं, प्रत्येक जीव में अधिष्ठित हैं ये । प्रत्येक जीवात्मा में, आत्म रूप स्थित ये क्षीराब्धिशायी सबके पालनकर्ता हैं ।

गुणावतार
गुणावतार से तात्पर्य, ऐसे अवतार से है जो सत्त्व, रज और तम की लीला के लिये ही प्रकट हुआ हो | भगवान के ऐसे अवतार, श्रीविष्णु, श्रीब्रह्मा और श्रीरूद्र हैं । इनका आविर्भाव गर्भोदकशायी द्वितीय पुरूषावतार ‘श्रीप्रद्युम्न’ से होता है ।

भगवान् के द्वितीय पुरूषावतार, लीला के लिये स्वयं ही इस विश्व की स्थिति, पालन तथा संहार के निमित्त तीनों गुणों को धारण करते हैं, परंतु उनके अधिष्ठाता होकर वे ‘विष्णु, ब्रह्मा और रूद्र’ नाम ग्रहण करते हैं । वस्तुतः ये कभी भी गुणों के वश में नहीं होते बल्कि उनके अधिष्ठाता होते हैं और नित्य स्वरूप स्थित होते हुए भी त्रिविध गुणमयी लीला करते हैं ।

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लीलावतार
भगवान् जो अपनी मंगलमयी इच्छा से विविध दिव्य मंगल-विग्रहों द्वारा बिना किसी प्रयास के अनेक विविध विचित्रताओं से पूर्ण नित्य-नवीन रसमयी क्रीड़ा करते हैं, उस क्रीड़ा का नाम ही लीला है । ऐसी लीला के लिये भगवान् जो मंगलविग्रह प्रकट करते हैं, उन्हें ‘लीलावतार’ कहा जाता है ।

चतुस्सन (सनकादि चारों मुनि), नारद, वराह, मत्स्य, यज्ञ, नर-नारायण, कपिल, दत्तात्रेय, हयग्रीव, हंस, ध्रुवप्रिय विष्णु़, ऋषभदेव, पृथु, श्रीनृसिंह, कूर्म, धन्वन्तरि, मोहिनी, वामन, परशुराम, श्रीराम, व्यासदेव, श्रीबलराम, बुद्ध और कल्कि उनके लीलावतार हैं । इन्हें ‘कल्पावतार’ भी कहा जाता हैं । स्वायम्भुव आदि चौदह मन्वन्तरावतार माने गये हैं ।

प्रत्येक मन्वन्तर के काल तक प्रत्येक अवतार का लीला कार्य होने से उन्हें ‘मन्वन्तरावतार’ भी कहा गया है । भगवान् के सभी अवतार परिपूर्णतम हैं, किसी में स्वरूपतः तथा तत्त्वतः न्यूनाधिकता नहीं है, फिर भी शक्ति की अभिव्यक्ति की न्यूनाधिकता को लेकर उनके चार प्रकार माने गये हैं | ‘आवेश’, ‘प्राभव’, ‘वैभव’ और ‘परावस्थ’।

उपर्युक्त अवतारों में चारो सनकादि मुनि, नारद, पृथु और परशुराम आवेशावतार हैं । कल्कि को भी आवेशावतार कहा गया है । ‘प्राभव’ अवतारों के दो भेद हैं, जिनमें एक प्रकार के अवतार तो थोड़े ही समय तक प्रकट रहते हैं-जैसे मोहिनी अवतार और हंसावतार आदि, जो अपना-अपना लीलाकार्य सम्पन्न करके तुरंत अन्तर्धान हो गये ।

दूसरे प्रकार के प्राभव अवतारों में शास्त्र निर्माता मुनियों के सदृश चेष्टा होती है । जैसे महाभारत-पुराणादि के प्रणेता भगवान् वेदव्यास, सांख्य प्रणेता भगवान् कपिल एवं दत्तात्रेय, धन्वन्तरि और ऋषभदेव | ये सब प्राभव-अवतार हैं | इनमें आवेशावतारों से शक्ति-अभिव्यक्ति की अधिकता तथा वैभावावतारों की अपेक्षा न्यूनता होती है ।

भगवान के वैभवावतार हैं-कूर्म, मत्स्य, नर-नारायण, वराह, हयग्रीव, पद्मगर्भ, बलभद्र और चतुर्दश मन्वन्तरावतार । इनमें कुछ की गणना अन्य अवतार-प्रकार में भी की जाती हैं ।

परावस्थावतार प्रधानतया तीन हैं-नृसिंह, श्रीराम और श्रीकृष्ण | ये षडैश्वर्यपरिपूर्ण हैं । इनमें श्रीनृसिंहावतार का कार्य एक प्रहलाद रक्षण एवं हिरण्यकशिपु-वध ही है तथा इनका प्राकट्य भी अल्पकालस्थायी है । अतएव मुख्यतया श्रीराम और श्रीकृष्ण ही परावस्थावतार हैं ।

इनमें भगवान् श्रीकृष्ण को ‘एते चांशकलाः पुंसः कृष्णस्तु भगवान् स्वयम्’ कहा गया है । अर्थात् उपर्युक्त सनकादि-लीलावतार भगवान् के अंश-कला-विभूति रूप हैं । श्रीकृष्ण साक्षात् स्वयं भगवान् हैं ।

भगवान् श्रीकृष्ण को विष्णु पुराण में ‘सित-कृष्ण-केश’ कहकर पुरूषावतार के केशरूप अंशावतार बताया गया है । महाभारत में कई जगह इन्हें नर के साथी नारायण ऋषि का अवतार कहा गया है, कहीं वामनावतार कहा गया है और कहीं भगवान् विष्णु का ही अवतार बतलाया गया है । वस्तुतः ये सभी वर्णन ठीक ही हैं ।

विभिन्न कल्पों में भगवान् श्रीकृष्ण के ऐसे अवतार होते भी हैं, परंतु इस वर्तमान सारस्वत कल्प में स्वयं भगवान् अपने समस्त अंशकला-वैभवों के साथ परिपूर्ण रूप से प्रकट हुए हैं । अतएव इनमें सभी का समावेश है । ब्रह्मा जी ने स्वयं इस पूर्णता को अपने दिव्य नेत्रों से देखा है ।

सृष्टि में प्राकृत-अप्राकृत जो कुछ भी तत्त्व हैं, श्रीकृष्ण सभी के मूल तथा आत्मा हैं । वे समस्त जीवों के, समस्त देवताओं के, समस्त ईश्वरों के, समस्त अवतारों के एकमात्र कारण, आश्रय और स्वरूप हैं ।

सित-कृष्ण-केशावतार, नारायणावतार, पुरूषावतार-सभी इनके अन्तर्गत हैं । वे क्या नहीं हैं? वे सबके सब कुछ हैं, वे ही सब कुछ हैं (एकोहम द्वितीयो नास्ति) । समस्त पुरूष, अंश-कला, विभूति, लीला-शक्ति आदि अवतार उन्हीं में अधिष्ठित हैं । इसी से वे स्वयं भगवान् हैं-‘कृष्णस्तु भगवान् स्वयम्’ ।