पार्वती नन्दन, भगवान् मयूरेश्वर के अवतार की कथा


पार्वती नन्दन, भगवान् मयूरेश्वर के अवतार की कथा
आज से काफी समय पूर्व त्रेतायुग की बात है । देश के दक्षिणी भाग में स्थित मैथल क्षेत्र में एक प्रसिद्ध नगर हुआ करता था जिसका नाम था गण्डकी | वहां के धर्म परायण नरेश चक्रपाणि के पुत्र सिन्धु के क्रूरतम शासन की वजह से पृथ्वी पर धर्म की मर्यादा का अतिक्रमण हो रहा था । उस अत्याचारी एवं महाबलशाली शासक की वजह से पृथ्वी समेत तीनो लोकों में अधर्मियों का उत्पात मचा हुआ था |

उसी समय भगवान् ने ‘मयूरेश्वर’ के रूप में लीला-विग्रह धारण कर विविध लीलीएँ कीं और महाबली सिन्धु के अत्याचारों से धरा का रक्षण करते हुए पुनः ईश्वरीय विधान के नियमों की प्रतिष्ठापना की ।

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सिन्धु ऐसे ही शक्तिशाली नहीं हुआ था, किसी समय उसने दो सहस्र वर्ष की उग्र तपस्या से सहस्रांशु ईश्वर को बहुत प्रसन्न कर लिया था और उन्होंने उसकी अजेय होने की कामना को देखते हुए उसे अभीष्ट वर के रूप में एक ‘दिव्य तत्वों से बना हुआ एक गोल घेरे का पात्र’ (Disk) प्रदान करते हुए कहा-जब तक यह अमृतपात्र तुम्हारे कण्ठ में रहेगा, तब तक तुम्हें देवता, नाग, मनुष्य, पशु एवं पक्षी आदि कोई भी, न तो दिन में, न रात में, और ना ही प्रातः तथा सायं किसी भी समय मार न सकेगा ।’

उसका वह चकरी (Disk) जैसा अमृतपात्र विलक्षण था | सम्राट सिन्धु ने उसे इस प्रकार धारण किया था मानो वह उसी के शरीर का एक हिस्सा हो | उस अद्भुत, अद्वितीय अमृतपात्र ने उसके शरीर के चारो तरफ़ एक बेहद शक्तिशाली किन्तु अदृश्य घेरा बना दिया था जिससे उसका अनिष्ट करने वाली कोई भी चीज, उस पर बेअसर हो जाती थी |

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अब तो ईश्वर से इस प्रकार का वर प्राप्तकर वह अत्यन्त मदोन्मत्त हो गया । अकारण ही, बिना वजह सत्यधर्म के मार्ग पर चलने वालों का तथा निरपराध नर-नारियों एवं अबोध शिशुओं की हत्या करने में उसे गर्व एवं आनन्द का अनुभव होने लगा । सम्पूर्ण धरित्री मानो रक्त-रंजित-सी हो गयी ।

इसके बाद उसने पाताल में भी अपना आधिपत्य जमा लिया और ससैन्य स्वर्गलोक पर चढ़ाई करके वहाँ शचीपति इन्द्रादि देवताओं को पराभूत कर तथा विष्णु को बंदी बनाकर सर्वत्र हाहाकार मचा दिया । जीवों को बन्धन में बाँधने वाला स्वयं अपनी ही लीला के बंधन में था |

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अत्यंत चिन्तित देवताओं ने इस विकट कष्ट से मुक्ति पाने के लिये अपने गुरू बृहस्पति से निवेदन किया । देवगुरु बृहस्पति ने कहा ‘परम प्रभु परमात्मा ही इस दारुण, महाभीषण कष्ट से छुटकारा दिला सकते हैं, अतः आप लोग असुरसंहारक, उन अनंत प्रभु की स्तुति-प्रार्थना करें । ऐसा करने से वे करूणा सिन्धु अवतरित होकर असुरों का वधकर धरा का भार हलका करेंगे और आप लोगों का अपहृत पद पुनः प्रदान करेंगे’ |

प्रसन्नतापूर्वक देवताआों ने भक्तिपूर्वक उनका स्तवन प्रारम्भ कर दिया । देवाताओं की प्रार्थना से प्रसन्न होकर परमप्रभु अपना मनोहर रूप लिए प्रकट हो गये और कहने लगे-‘जिस प्रकार मैंने महामुनि कश्यप की परम साध्वी पत्नी अदिति के गर्भ से जन्म लिया था, उसी प्रकार शिवप्रिया माता पार्वती के यहाँ अवतरित होकर महादैत्य सिन्धु का वध करूँगा और आप सबको अपना-अपना पद प्रदान करूँगा । इस अवतार में मेरा नाम ‘मयूरेश्वर’ प्रसिद्ध होगा’-इतना कहकर परम प्रभु अन्तर्धान हो गये ।

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देवगणों के तो हर्ष का ठिकाना न रहा । कुछ ही समय बाद भाद्रपद-मास की शुक्ल-पक्षीय चतुर्थी-तिथि आयी । सभी ग्रह-नक्षत्र शुभस्थ एवं मंगलमय योग में विराजमान थे । उसी समय विराट रूप में पार्वती के सम्मुख परमेश्वर का अवतरण हुआ । इस रूप से चकित-थकित होती हुई तपस्विनी पार्वती ने कहा-‘प्रभो ! मुझे अपने पुत्र-रूप का दर्शन कराइये ।’

इतना सुनना था कि सर्वसमर्थ प्रभु तत्काल स्फटिकमणितुल्य षड्भुज दिव्य विग्रहधारी शिशुधारी में क्रीडा करने लगे । उनकी देह की कान्ति अदभुत लावण्ययुक्त एवं प्रभा सम्पन्न थी । उनका वक्षःस्थल विशाल था । सभी अंग पूर्णतः शुभ चिन्हों से अलंकृत थे । दिव्य शोभा सम्पन्न यह विग्रह ही ‘मयूरेश्वर’ रूप मे साक्षात् प्रकट हुआ था । मयूरेश के आविर्भाव से ही प्रकृतिमात्र आनन्द विभोर हो उठी । आकाशस्थ देवगण पुष्प-वर्षण करने लगे ।

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आविर्भाव के समय से ही सर्वविघ्रहर्ता शिवा-पुत्र की दिव्य लीलाएँ प्रारम्भ हो गयी थीं । एक दिन की बात है । समस्त ऋषियों के अन्यतम प्रीतिभाजन हेरम्ब क्रीडा-मग्न थे, सहसा गृध्ररूपधारी एक भयानक असुर ने उन्हें अपनी चोंच में पकड़ लिया और उन्हें लिए हुए बहुत ऊँचे आकाश में उड़ गया । जब पार्वती जी ने अपने प्राणप्रिय शिशु को आकाश में उस विशाल गृध्र के मुख में देखा तो सिर पकड़ कर करूण विलाप करने लगीं ।

सर्वात्मा हेरम्बने माता की व्याकुलता देखकर मुष्टि-प्रहार मात्र से ही गृध्रासुर का वध कर दिया । चीत्कार करता हुआ वह विशालकाय असुर पृथ्वी पर गिर पड़ा । बाल भगवान् मयूरेश उस असुर के साथ ही नीचे आये थे, परंतु वे सर्वथा सुरक्षित थे, उन्हें खरोंच तक नहीं लगी थी । माता पार्वती ने दौड़कर बच्चे को उठा लिया और देवताओं की मिन्नतें करती हुई दुग्धपान कराने लगीं ।

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इसी तरह एक दिन माता पार्वती जब उन्हें पालने में लिटाकर लोरी सुना रही थीं, उसी समय क्षेम और कुशल नामक दो भयानक असुर वहाँ आकर बालक को मारने का प्रयत्न् करने लगे, पार्वती अभी कुछ समझ पातीं तब तक बालक ने अपने पदाघात से ही उन राक्षसों का हृदय विदीर्ण कर दिया । वे राक्षस रक्त-वमन करते हुए वहीं गिर पड़े और भगवान् ने उन्हें मोक्ष प्रदान कर दिया ।

एक दिन माता पार्वती सखियों के साथ मन्दिर में पूजा करने गयीं । बालक गणेश वहीं मन्दिर के बाहर खेलने लगे । उसी समय क्रूर नामक एक महाबलवान् असुर ऋषि पुत्र के वेष में आकर उनके साथ खेलने लगा और खेल-खेल में हेरम्ब को मार डालने के लिये उनके केश पकड़कर उन्हें धरती पर पकटना चाहता था, परंतु लीलाधारी भगवान् गणेश ने उसका गला दबाकर तत्क्षण ही उसकी इहलीला समाप्त कर दी ।

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सखियों सहित पार्वती यह दृश्य देखकर आश्चर्यचकित हो गयीं । इसी तरह मंगलमोद प्रभु गणेश ने लीला करते हुए असुर सिन्धु द्वारा भेजे गये अनेक छल-छद्मधारी असुरों को सदा-सर्वदा के लिये मुक्त कर दिया । इस क्रम में उन्होंने दुष्ट वकासुर तथा श्वानरूपधारी ‘नूतन’ नामक राक्षस का वध किया ।

अपने शरीर से असंख्य गणों को उत्पन्न कर ‘कमलासुर’ की बारह अक्षौहिणी सेना का विनाश कर दिया तथा त्रिशूल से कमलासुर का मस्तक काट डाला । उसका मस्तक भीमा नदी के तट पर जा गिरा । देवताओं तथा ऋषियों की प्रार्थना पर गणेश वहाँ ‘मयूरेश’ नाम से प्रतिष्ठित हुए ।

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इधर जब दुष्ट दैत्य सिन्धु ने सभी देवताओं को अपने दिव्य कारागार में बंदी बना लिया, तब भगवान् मयूरेश्वर ने दैत्य को ललकारा । दिव्य शस्त्रास्त्रों से भयंकर युद्ध हुआ । असुर-सैन्य पराजित हुआ । यह देख कुपित दैत्यराज अनेक प्रकार के अस्त्र-शस्त्रों से मयूरेश पर प्रहार करने लगा, परंतु सर्वशक्तिमान् के लिये शस्त्रास्त्रों का क्या महत्त्व! सभी प्रहार निष्फल हो गये ।

अन्त में महादैत्य सिन्धु, मयूरेश के परशु-प्रहार से निश्चेष्ट हो कर पृथ्वी पर गिर पड़ा । उसे दुर्लभ मुक्ति प्राप्त हुई । उसे सर्वशक्तिमान ने मारा था | देवगण मयूरेश की स्तुति करने लगे । भगवान् मयूरेश ने सबको आनन्दित कर सुख-शान्ति प्रदान किया और अपने लीलावतरण के प्रयोजन की पूर्णता सिद्ध करते हुए अन्त में अपनी लीला का संवरण करके वे परम प्रभु परमधाम को पधार गये |