अपनी मृत्यु को निकट देख कर भी बालक क्यों हँसा

अपनी मृत्यु को निकट देख कर भी बालक क्यों हँसासम्राट विक्रमादित्य ने, अपने धर्म का पालन करते हुए, वापस पेड़ पर लौटने वाले बेताल को फिर से अपनी पीठ पर लादा और चल दिए उस तान्त्रिक के पास, जिसने उन्हें लाने का काम सौंपा था | थोड़ी देर बाद बेताल ने अपना मौन तोड़ा और कहा “तुम भी बड़े हठी हो राजन, खैर चलो, मार्ग आसानी से कट जाए, इसके लिए मै तुम्हे एक कथा सुनाता हूँ |

किसी समय चित्रकूट नगर में एक राजा रहता था। एक दिन वह आखेट खेलने जंगल में गया। घूमते-घूमते वह रास्ता भूल गया और अपने सैनिकों से अलग, राह भटक गया । थक कर वह एक पेड़ की छाया में लेटा कि उसे एक ऋषि-कन्या दिखाई दी। उसे देखकर राजा उस पर मोहित हो गया।

थोड़ी देर में जिनकी वह कन्या थी वह ऋषि स्वयं वहाँ आ गये। ऋषि ने पूछा, “राजन तुम यहाँ कैसे आये हो?” राजा ने कहा, “मैं शिकार खेलने आया हूँ। ऋषि बोले, “बेटा, तुम भोले और निष्पाप जीवों को क्यों मारकर पाप कमाते हो?” ऋषि के वचनों को सुनने के बाद राजा ने प्रतिज्ञा किया कि मैं अब कभी आखेट नहीं करूँगा । प्रसन्न होकर ऋषि ने राजा से कहा, “वत्स! तुम्हें जो माँगना हो, माँग लो।”

राजा ने प्रसन्न हो कर उन ऋषि से ऋषि-कन्या माँगी और ऋषि ने प्रसन्न होकर दोनों का विवाह कर दिया । राजा जब ऋषि-कन्या को लेकर चला तो रास्ते में एक भयंकर राक्षस मिला । उसने राजा से बोला, “मैं तुम्हारी रानी को खाऊँगा। अगर चाहते हो कि वह बच जाय तो सात दिन के भीतर एक ऐसे ब्राह्मण-पुत्र का बलिदान करो, जो अपनी इच्छा से अपने को दे और उसके माता-पिता उसे मारते समय उसके हाथ-पैर पकड़ें।”

राक्षस का भयंकर एवं भीमकार रूप देख कर डर के मारे राजा ने उसकी बात मान ली । वह अकेला अपने नगर को लौटा और अपने प्रधान मंत्री को सब हाल कह सुनाया। प्रधान मंत्री ने कहा, “आप परेशान न हों, मैं कोई उपाय करता हूँ।” उसकी बात से राजा को थोड़ा ढाढस मिला |

इसके बाद प्रधान मंत्री ने सात बरस के बालक की सोने की एक मूर्ति बनवायी और उसे कीमती गहने पहनाकर नगर-नगर और गाँव-गाँव घुमवाया। और यह कहलवा दिया कि जो कोई सात बरस का ब्राह्मण का बालक अपने को बलिदान के लिए देगा और बलिदान के समय उसके माँ-बाप उसके हाथ-पैर पकड़ेंगे, उसी को यह मूर्ति और सौ गाँव मिलेंगे।

यह ख़बर सुनकर एक दरिद्र ब्राह्मण-बालक तैयार हो गया, उसने अपने माँ-बाप से कहा, “माँ, पिताजी आपको मेरे जैसे और भी पुत्र अभी पैदा होंगे । किन्तु मेरे शरीर के बलिदान से अपने राज्य के राजा की भलाई होगी और आपकी दरिद्रता मिट जायेगी।” उसके माँ-बाप ने उसे सख्ती से मना किया, पर बालक ने हठ करके उन्हें किसी तरह तैयार कर लिया।

अब माँ-बाप बालक को लेकर राजा के पास गये। राजा उन्हें लेकर राक्षस के पास गया। राक्षस के सामने माँ-बाप ने बालक के हाथ-पैर पकड़े और राजा उसे तलवार से मारने को हुआ। उसी समय बालक बड़े ज़ोर से हँस पड़ा। इतनी कथा सुनाकर बेताल राजा विक्रमादित्य से बोला, “हे राजन्, मुझे यह बताओ कि वह बालक क्यों हँसा?”

राजा विक्रमादित्य ने तुरंत उत्तर दिया, “इसलिए कि भय के उपस्थित होने पर हर मनुष्य रक्षा के लिए अपने माता पिता को पुकारता है। माता-पिता न हों तो पीड़ितों की सहायता राजा करता है। राजा न कर सके तो मनुष्य देवता को याद करता है। पर यहाँ तो कोई भी बालक के साथ न था।

माँ-बाप हाथ पकड़े हुए थे, राजा तलवार लिये खड़ा था और राक्षस भक्षक हो रहा था। ब्राह्मण का लड़का परोपकार के लिए अपना शरीर दे रहा था। इसी हर्ष से और अचरज से वह हँसा।”

इतना सुनकर बेताल अन्तर्धान हो गया और राजा विक्रमादित्य लौटकर फिर से उसे ले आये । रास्ते में बेताल ने फिर से नयी कथा सुनायी ।