भूत, प्रेत, पिशाच तो दिख सकते हैं लेकिन देवी-देवता नहीं, ऐसा क्यों

भूत, प्रेत, पिशाच तो दिख सकते हैं लेकिन देवी-देवता नहीं, ऐसा क्योंये प्रश्न ऐसा है जो बहुतों के मन में उठता होगा लेकिन इसका सटीक उत्तर किसी के पास नहीं होगा | और लॉजिक ऐसा है जिसे समझने में आज का मॉडर्न साइंस अभी तक सफल नहीं हो सका है | शनैः शनैः सनातन धर्म में लिखी हर बात नासा समेत यूरोप के सभी वैज्ञानिकों के सामने सही साबित होने से पाश्चात्य जगत के विद्वानों में हलचल मची हुई है और आज के तथाकथित कई सेक्युलर लोगों को ये बात अपने गले उतारने में परेशानी हो रही है की अभी तक वो जिसे पाखण्ड, अंधविश्वास आदि का नाम देकर मॉडर्न बनने की लिए पश्चिमी सभ्यता का अन्धाधुन्ध अनुकरण कर रहे थे, वही पश्चिमी सभ्यता वाले अपनी कर्मों से उपजी दुनिया भर की समस्याओं से परेशान हो कर अब हमारे सनातन धर्म के आदर्शों को तेजी से अपना रहें हैं | ये विडम्बना आज के तथाकथित बुद्धिजीवी वर्ग के कई प्राणियों की है |

दरअसल भूत प्रेत और पिशाचों की दुनिया यहीं है, हमारी दुनिया के बेहद करीब | लेकिन हमसे इतने करीब होते हुए भी वे एक बिलकुल अलग ही दुनिया में जीते है, एक ऐसी दुनिया जहाँ केवल आभाव है, दुःख है, एकाकीपन है और नैराश्य है | हमारी दुनिया से बेहद करीब होने के बावजूद यह आवश्यक नहीं कि भूत प्रेत हमें दिखाई ही पड़ने लगे | परन्तु सच्चाई तो यह है कि भूत प्रेतों के दिखाई पड़ने की घटनाएं अक्सर हम सुनते रहते है, जबकि देवी देवता अब हमारी माइथोलॉजी यानी प्राचीन किस्से कहानियों का हिस्सा हो गए हैं |

हमारे सनातन धर्म का सबसे पहला सिद्धांत है कि कर्मों की पवित्रता से विचारों की पवित्रता पैदा करना, जिसका की आज के युग में घोर आभाव है | विदेशी जो पहले अपने मनमाने नियम कानून व तरीके से लाइफ एन्जॉय करने की कोशिश करते रहे पर बदले में जिन्हें मिली सिर्फ बेचैनी, दुनिया भर की बिमारी आदि आदि पर जब उन्होंने सनातन धर्म के आदर्शों (जैसे योग, शाकाहार एवं सदाचार) को समझा और उसे अपने जीवन में उतारा तो धीरे धीरे उन्हें उनका खोया हुआ सुख संतोष वापस मिलने लगा |

क्या अंतर है भूत, प्रेत, पिशाच और देवी देवताओं में 

हमारे सनातन धर्म में बहुत अच्छे से समझाया गया है, भूत, प्रेत, पिशाच योनि और देवी देवताओं की योनि के बारे में |

भारत के प्राचीन ज्ञान विज्ञान के मूर्धन्य जानकार श्री डॉक्टर सौरभ उपाध्याय जी बताते है की हमारे सनातन धर्म के ग्रंथों के अनुसार, भूत, प्रेत और पिशाचों की योनि अतृप्त योनि होती है और सामन्यतया इनका शरीर दो तत्वों से मिलकर बना हुआ होता है और वो तत्व होते हैं वायु और अग्नि इसलिए वे हमें दिखाई नहीं देते हैं |

पर जब कोई भूत प्रेत या पिशाच अपनी अतृप्त इच्छा को पूरी करने के लिए बहुत ज्यादा उत्सुक होता है तब वो लम्बा अनुसन्धान करके अपने उस जगत के शरीर में आकाश तत्व को कुछ देर के लिए समाविष्ट कर लेता है जिससे वो मानवों की दुनिया में भी दिखने लगता है पर तभी तक के लिए जब तक की आकाश तत्व उसके शरीर में हैं लेकिन इस स्थिति में कोई उसके शरीर को छू नहीं सकता क्योंकि वो वायु स्वरुप ही होता है और ऐसी परिस्थिति में उसे छूने वाले का हाथ उसके शरीर के आर पार निकल जाता है जैसा की आपने अक्सर किसी डरावनी फिल्म में देखा होगा |

डॉक्टर सौरभ उपाध्याय जी का कहना है की भौतिक और नश्वर वस्तुओं और सुखों के प्रति बेहद अतृप्त भाव लिए कुछ भूत, प्रेत पिशाच, हमारी दुनिया में छूने का भी अहसास पाना चाहते हैं इसलिए वे बहुत प्रयास करके अपने अन्दर आकाश तत्व के साथ जल तत्व का भी समावेश कर लेते है जिससे कुछ देर के लिए वे स्पर्श का भी अनुभव पा सकते हैं पर इस स्थिति में कोई आदमी अगर उस प्रेत पिशाच को छू ले तो उसे लगेगा जैसे उसने बर्फ को छू लिया मतलब इतना ठंडा होता है उनका शरीर |

डॉक्टर उपाध्याय आगे बताते हैं की, दूसरी दुनिया में रहने वाले भूत,प्रेत और पिशाच योनि वाले चाहे कुछ भी कर लें, वे पांचवें तत्व यानी पृथ्वी तत्व का अपने शरीर में समावेश नहीं कर सकते हैं क्योंकि पांच तत्व से ही तो हम मानवों का शरीर बना हुआ है और किसी भी प्रेत पिशाच को प्रेत पिशाच योनि से वापस मानव योनि में आने के लिए उसे पहले सारे पापों का प्रयाश्चित करना पड़ता है तब अगर उसके कर्म इस लायक रहे की मानव जैसी दुर्लभ योनि मिल सके तो ही मानव योनि मिलती है अन्यथा उसे निम्न योनि जैसे कीड़े, मकोड़े, जीव, जन्तु, पेड़, पौधों आदि की योनि में भेजा जा सकता है |

पृथ्वी तत्व के आभाव की वजह से ही हर भूत, प्रेत, पिशाच का शरीर कभी भी पृथ्वी का स्पर्श करके नहीं चलता है बल्कि हमेशा जमीन से कुछ ऊपर उठा हुआ होता है | श्री डॉक्टर सौरभ जी का कहना है की उच्च योनियाँ जैसे देव योनि आदि में शरीर 6 तत्वों से बना हुआ होता है जिसमे पांच तत्व वायु, आकाश, अग्नि, जल और पृथ्वी के अलावा एक बिलकुल अलग और दिव्य,अक्षर तत्व भी होता है | ये अक्षर तत्व वो दिव्य तत्व होता है जो इन देव लोगों के दिव्य शरीरों का क्षरण (नाश) नहीं होने देता है और इन्हें हमेशा युवा, महाबली और अजर बनाये रहता है |

यही कारण है कि इन देव पुरुषों के शरीर का तेज सामान्य मनुष्य बर्दाश्त नहीं कर पाते हैं | अगर इन देव पुरुषों को (अपने दिव्य रूप में) साधारण मनुष्य अपनी स्थूल आँखों से देख ले तो देव पुरुषों के दिव्य तेज से वह मनुष्य अँधा भी हो सकता है और उसकी त्वचा भी जल सकती है |

डॉक्टर उपाध्याय आगे बताते हैं की, अगर ये दैवीय और अर्ध  दैवीय प्राणी अपने अक्षर तत्व को कुछ देर के लिए अपने शरीर से बाहर कर दें तो इस जगत में, हर मनुष्य इन्हें आसानी देख सकता है पर इस दौरान उस देवता के पञ्च तत्वों के शरीर की किसी कारण से मौत हो गयी तो वो देव पुरुष बुरी तरह से फंस सकता है क्योंकि उसे जो नयी शरीर मिलेगी, उसमे उसे छठवें तत्व को फिर से समावेश करने का तरीका जानना बहुत मुश्किल होगा जिससे वो देव पुरुष अनन्त काल के लिए भटकाव के चक्र में फंस सकता है बिना देव शरीर वापस पाए | इसलिए देव पुरुष अपने तेज को कम करके साधारण मानवों के सामने आने की बजाय सिर्फ उन्ही तपस्वी सन्तों को दर्शन देते हैं जो उनका रूप बर्दाश्त करने की क्षमता रखते हों |

हमारे समाज में एक बड़ी विचित्र विडम्बना यह फैली हुई है कि कई लोग देवताओं को ही भगवान् समझते हैं जबकि ये गलत है | देवता, भगवान के द्वारा बनाये हुए प्राणी है जैसे की हम लोग, पर देवताओं को हमारी तुलना में ज्यादा सुख और शक्तियां प्राप्त होती है क्योंकि वो देवता जब पूर्व जन्म में मनुष्य थे तो उन्होंने अच्छे कर्म जैसे गरीबों, बीमारों की सहायता आदि किये थे जिसकी वजह से उन्हें मरने के बाद देवलोक मिला पर उनके अच्छे कर्म थोड़े से कम पड़ गए जिसके वजह से उन्हें मरने के बाद सीधे भगवान का लोक नहीं मिला बल्कि उससे नीचे का लोक, देवलोक मिला | केवल एक स्वर्ग ही देवताओं का लोक या निवास स्थान नहीं है, स्वर्ग के अलावा और अन्य कई उच्च लोक (जैसे की भुंवर लोक आदि) भी हैं इस ब्रह्माण्ड में, जहां मनुष्य की तुलना में उच्च योनियाँ निवास करती हैं |

श्री डॉक्टर सौरभ उपाध्याय जी का कहना है की, एक बात और ध्यान देने वाली है की हमारे हिन्दू धर्म के ज्ञान के मुताबिक हम मानव तीन आयामी (लम्बाई, चौड़ाई, उचाई) संसार में रहते हैं इसलिए 3 आयाम से ज्यादा आयाम के लोकों को उच्च लोक कहते हैं और 3 आयाम से नीचे आयाम के लोकों को निम्न लोक कहते हैं | 11 आयामों से रचित इस महासृष्टि में ब्रह्माण्ड के निर्माता श्री ब्रह्मा जी रहते है और 11 वां आयाम हमारे इस ब्रह्माण्ड का आखिरी आयाम होता है पर इन सभी 11 आयाम और इन सभी आयाम में रहने वाले सभी प्राणी चाहे वो निम्न आयामों वाली सृष्टि के हों, मनुष्य लोक के प्राणी हों हों या उच्च लोकों के दैवीय प्राणी हों, उनका विलय, नाश या समाप्ति हो जाती है जब महा माया परम सत्ता की अध्यक्षता में महा प्रलय करती है | पर परम सत्ता का जो निज धाम या निवास स्थान है, जो कृष्ण भक्त को गोलोक प्रतीत होता है, शिव के भक्तों को शिव लोक और नारायण के भक्त को बैकुण्ठ प्रतीत होता है उसका कभी भी नाश नहीं होता है क्योंकि वो अनन्त आयाम से बना हुआ है और वहां जाने का महा सौभाग्य पाने वाले भक्तों के शरीर भी अनन्त तेजस्वी अक्षर तत्व से बना हुआ होता है |

भगवान् के परम गुह्य और परम दिव्य लोक में निवास का महा सौभाग्य सिर्फ उन्ही को प्राप्त होता है जिन पर परमात्मा की महान अनुकम्पा हो और इस महान कृपा का अधिकारी भी वही है जिसका मन वचन कर्म सब सिर्फ दूसरों की भलाई में ही मृत्यु पर्यन्त लगा रहे |