श्री वल्लभाचार्य जी कौन थे

श्री वल्लभाचार्य जी कौन थेश्री महाप्रभु जी श्री वल्लभाचार्य जी अवतरित होकर इस धराधाम पर पधारे और उन्होंने अपने बताये भगवत्सेवा-स्मरण तथा ज्ञानोपदेश से दिग्भ्रमित भारतवासियों के जीवन को रसमय और आनंदमय बना दिया। उन्होंने अपने ‘चतुःश्लोकी’ में कहा है कि सच्चिदानन्द प्रभु श्री कृष्णचन्द्र को सर्वात्मना सर्वभाव समर्पण करके उनकी ही शरण में रहने से मानव मात्र का कभी कहीं भी पतन नहीं होता है ।

आचार्यचरण श्री वल्लभाचार्य जी ने किंकर्तव्यविमूढ़ मानव को श्री कृष्ण का परम मंगलमय मार्ग दिखलाया, उस भगवत्सेवा – रस सुरभित अत्यन्त आहृादकारी सुरम्य मार्ग पर चलकर आज भी असंख्य वैष्णव अपने जीवन को सार्थक तथा रससिक्त बनाते चले जा रहे हैं । अवतार का अभिप्राय होता है अवतरण। आचार्यचरण श्री वल्लभाचार्य जी साक्षात भगवदवतार थे। भगवान श्री कृष्ण की सरस भक्ति का प्रचार-प्रसार करने के लिये ही वे भूतल पर पधारे थे।

प्रत्येक अवतार में अलौकिकता विद्यमान रहती है। उसमें प्रादुर्भाव भी आश्चर्यजनक होता है और गमन भी आश्चर्यजनक। इनके पिता श्री लक्ष्मण भटट उपद्रव होने पर काशी छोड़ कर अपने यात्रा दल के साथ मध्य प्रदेश के चमपारण्य नामक स्थान पर पहुंचे। वहां इनकी माता श्री इल्लमागारू जी को प्रसव वेदना हुई तो वे वहीं अरण्य मे रूक गये। वहां विक्रम सम्वत 1535 वैशाख कृष्ण एकादशी रविवार के दिन, उस सात माह के नवजात शिशु को मृत समझ कर, पिता ने उसे शमी वृक्ष के कोटर में ले जाकर रख दिया।

माता ने नवजात बालक को मृत मान कर संतोष कर लिया। कुछ दिन बाद उपद्रव शांत होने पर पुनः काशी लौटते समय माता श्री इल्लमागारू जी अपने पति को साथ लेकर उसी जंगल से गुजर रही थी | वहां उन लोगों ने जंगल में उसी जगह (जहाँ उन्होंने अपने बालक को मृत समझ कर छोड़ दिया था) पर एक बालक को देखा जो सकुशल अग्नि घेरे में खेल रहा था।

बालक की सुंदरता उन लोगों के मन को मोह रही थी। माता उसे लेने आगे बढ़ीं तो अग्नि देव ने उन्हें रास्ता दे दिया-तत्क्षण मां ने उस सुंदर शिशु को अपनी गोद में उठा लिया। वही बालक बड़ा होने पर श्री वल्लभाचार्य जी श्री महाप्रभु महाराज के नाम से सुप्रसिद्ध हुआ।

उसी प्रकार मध्यवय पार करने पर विक्रम सम्वत 1587 आषाढ़ शुक्ल तृतीया के दिन मध्यान्ह में श्री महाप्रभु जी ने गंगा जी में प्रवेश किया और जहां प्रवेश किया वहां से एक अग्नि का प्रतिबिम्ब उठा, वह देखते ही देखते आकाश की ओर जाकर भुवन भास्कर के तेज में विलीन हो गया। गंगा तट पर असंख्य नर-नारी इस अदभुत दृश्य को देख कर भौचक्के रह गये। इस प्रकार श्री महाप्रभु जी की अवतार लीला सम्पन्न हुई।

श्री वल्लभाचार्य जी की मेधा शक्ति अनुपम और असाधारण थी। उनकी स्मरण शक्ति भी बड़ी अदभुत थी। उन्होंने अल्प समय में ही सांख्य, योग, वैशेषिक, पूर्व मीमांसा, उत्तर मीमांसा का अध्ययन कर लिया। साथ ही शंकर, रामानुज, विष्णु स्वामी, मध्वप्रभृति आचार्यों के वेदान्त-भाष्यों का भी अध्ययन किया।

बालक की अदभुत तेजस्विता देख कर सब हतप्रभ रह जाते। स्वयं अग्नि देव ने प्रकट होकर श्री लक्ष्मण भटट से कहा कि मैं ही तुम्हारे पुत्र रूप में प्रकट हुआ हूँ, इसीलिये श्री वल्लभाचार्य जी पुष्टि सम्प्रदाय में वैश्वानरावतार माने गये हैं।

अपने प्रवास के प्रसंग में आप पुरी पधारे, उस समय वहाँ विद्वत्सभा हो रही थी। राजा स्वयं उस सभा में उपस्थित थे। सभा में चार प्रश्नों पर वैचारिक मंथन चल रहा था-
1. मुख्य शास्त्र कौन सा है?
2. मुख्य देव कोन है?
3. मुख्य मंत्र क्या है?
4. मुख्य कर्म क्य है?
किंतु सर्वमान्य समाधान नहीं हो पा रहा था। वहां श्री वल्लभाचार्य जी के मुख कमल से मानो साक्षात् भगवत्वाणी ही प्रस्फुटित हुई, लेकिन कुछ हठी पण्डितों ने उसे नहीं माना। तब श्री वल्लभाचार्य जी की प्रार्थना पर साक्षात प्रभु श्री जगन्नाथ जी ने अपने हस्ताक्षर सहित प्रमाणीकरण दे दिया कि-
1. देवकी पुत्र भगवान श्री कृष्ण द्वारा बोली गयी श्रीमद भगवदगीता ही एकमात्र शास्त्र है।
2. देवकी नन्दन श्री कृष्ण ही एकमात्र देव हैं।
3. भगवान श्री कृष्ण का नाम ही मंत्र है।
4. भगवान श्री कृष्ण की सेवा ही एकमात्र कर्म है यह स्वीकार कर लिया।

अपने असाधारण ज्ञान के कारण श्री वल्लभाचार्य जी बाल सरस्वती कहे जाने लगे। अब तो सभी ने नतमस्तक होकर इस सिद्धांत को स्वीकार कर लिया। आचार्यचरण श्री वल्लभाचार्य जी ने पुष्टि मार्ग और पूर्ण पुरूषोत्तम भगवान श्री कृष्ण की भक्ति का प्रचार करने के लिये आसेतु हिमालय भारत वर्ष की तीन परिक्रमाएं कीं तप्त मरूभूमि, उत्तुंग पर्वत प्रदेश और सघन कानन में कंटकाकीर्ण मार्ग पर चलते हुए श्री वल्लभाचार्य जी को बड़ी कठिनाइयां होतीं थी

विद्वत्समाज में आपने यह विश्वास जगा दिया कि श्री कृष्ण सनातन ब्रह्म ही हैं-‘कृष्णो ब्रह्मैव शाश्वतम्।’ आगे आप ओरछा की राजधानी गढ़ कुंडार पधारे। वहां आपने घट सरस्वती के साथ हुए शास्त्रार्थ में उन्हें निरूत्तर कर दिया, फिर प्रयाग होते हुए आप काशी पधारे, वहां मणिकर्णिका के घाट पर विद्वत्समाज से गम्भीर शास्त्र चर्चा हुई।

यहीं पर काशी के नगर सेठ श्री पुरूषोत्तम दास क्षत्रिय आपसे प्रभावित हो गये और सश्रद्धया आपको अपने घर आमन्त्रित किया । श्री वल्लभाचार्य जी ने उनकी भक्ति पर रीझकर उन्हें श्रीमद भागवत के दशम स्कन्ध के अन्तर्गत श्री कृष्ण जन्म महोत्सव की कथा सुनायी।

श्री महाप्रभु जी तो जहां भी पधारते थे, श्रीमद भागवत का सुधावर्षण ही करते थे। काशी में उस समय शैव और वेदान्ती विद्वानों का बाहुल्य था। वे वैष्णव सिद्धांतों के प्रतिकूल थे। यदि कोई ब्रह्मवाद की बात करता तो वे संघर्ष खड़ा कर देते थे।

इस पर आपने ‘पत्रावलम्बन’ नामक ग्रंथ की रचना की। इसमें वेद के पूर्व मीमांसा तथा उत्तर मीमांसा के मध्य समन्वयात्मक दृष्टिकोण प्रस्तुत किया। इसी में आपने मायावाद का निवारण किया और ब्रह्मवाद सिद्ध कर दिखाया।

उसके बाद श्री पुरूषोत्तम क्षेत्र, श्री जगन्नाथपुरी में, भगवत्प्रसाद की महिमा बतलाते हुए विजय नगर में प्रवेश कर गये। वहां राजा कृष्ण देव ने विराट धर्म सभा का आयोजन कर रखा था।

अनुनय-विनय होने पर श्री वल्लभाचार्य जी उस धर्म सभा में पहुंचे। वहां श्रीमद भागवत को श्री वेद व्यास जी की समाधि भाषा प्रमाणित करने के लिये आपने अनेक दृष्टान्त दियेे। शास्त्रार्थ में विभिन्न पण्डितों के तर्क सम्मत प्रश्नों का आपने सतर्क प्रत्युत्तर देकर सभी को संतुष्ट कर दिया और वहां ब्रह्मवाद की विजयपताका फहरा दी।

सभी पण्डितों ने मिलकर आपका कनकाभिषेक किया तथा आपको अन्य आचार्यों तथा विद्वानों ने सर्व सम्मति से आपको ‘अखण्ड भूमण्डलाचार्यवर्य जगदगुरू श्रीमदाचार्य श्री महाप्रभु’ की उपाधि से विभूषित कर महा महिमा-मण्डित कर दिया।

भारत भ्रमण करते हुए आपने चैरासी बैठकें स्थापित कीं और चैरासी वैष्णव बनाये। बाल सरस्वती, वाचस्पति, दिग्विजयी, अखण्डभूमण्डलाचार्यवर्य श्री महाप्रभु, अदेयदानदक्ष तथा धर्म के मूर्तिमान स्वरूप जैसी महाविरूदावलियों से विभूषित होते हुए भी आपका परम संत सा रहन-सहन था।

भारत वर्ष में आप लोकप्रियता के शिखर पर पहुंच चुके थे। सर्वत्र जय-जयकार हो रही थी। जिस पथ से श्री महाप्रभु जी पधारते थे, उस पथ पर अंकित श्री महाप्रभु जी के चरण चिन्ह की रेणु को श्रद्धालु अपने सिर पर चढ़ाते थे।

राजा से लेकर रंक तक आपकी सरस वाणी, मोहक व्यक्तित्व, असाधारण पाण्डित्य, चूडान्तज्ञान, स्पष्ट विचारधारा और अनूठी भगवत्सेवा प्रणाली से प्रभावित थे तथा अनेक विद्वान सम्भ्रान्तजन आपके शिष्य बनते चले जा रहे थे ।

भगवदाज्ञा होते ही श्री वल्लभाचार्य श्री गोवर्धन पर देव दमन श्री नाथ जी के दर्शन करने चल पड़े। बीच में आप व्रज में गोकुल के श्री गोविन्द घाट पर पधारे। वहां विक्रम सम्वत 1563 श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी गुरूवार को साक्षात प्रभु श्री नाथ जी से आपने ब्रह्म सम्बन्ध की दीक्षा ग्रहण की।

यह भी कम विस्मय की बात नहीं है कि जब चम्पारण्य में मां श्रीइल्लमागारू जी की कोख से श्री वल्लभाचार्य जी का प्रादुर्भाव हुआ, ठीक उसी दिन, उसी समय श्री गोवर्धनगिरि पर प्रभु श्री नाथ जी के मुखारविन्द का प्राकट्य हुआ।

इसीलिये श्री हरि राय महाप्रभु ने श्रीवल्लभाचार्य जी को प्रभु श्री नाथ जी का ‘वदनावतार’ कहा है। भक्त श्री सदगुणदास ने भी ‘प्रगटे जान पूरन पुरूषोत्तम’ कहकर आपके अवतार की पुष्टि की है। आपने श्री गोवर्धन में ही रहकर श्री गिरिराज जी पर मंदिर बनवाया, उसमें आनंदकन्द सच्चिदानंद प्रभु श्री नाथ जी की स्थापना की।

अनेक भक्तों को आत्म निवेदन कराते हुए प्रभु के समक्ष ब्रह्म सम्बन्ध की दीक्षाएं दीं। वहां विराजते हुए आपने पुष्टि सम्प्रदाय की परमानन्ददायक वल्लरी को पल्लवित, पुष्पित और सुगंधित किया; जिसके अन्तर्गत प्रवहमान श्री कृष्ण-चरणानुरक्ति एवं भगवत्सेवा अनुराग के सुखद सुवास से समग्र भारत वर्ष सुरभित हो उठा।

प्रभु श्री नाथ जी की सेवा-व्यवस्था व्यवस्थित की तथा प्रभु कीर्तन-सेवा के लिये उस समय के चार प्रमुख गायकों-भक्त कवि कुम्भनदास, सूरदास, परमानन्ददास और कृष्णदास को सेवा में नियुक्त किया। प्रभु की कीर्तन सेवा का शुभारम्भ आपसे प्रारम्भ हुआ।

बाद में आपके यशस्वी सुपुत्र श्री गुसांई जी महाराज ने चार और गायक-भक्त कवि नन्ददास, चतुर्भुजदास, गोविन्द स्वामी और छीतस्वामी को रख कर ‘अष्टछाप’ की स्थापना करके भारत वर्ष में भक्ति-साहित्य संगीत की कलिमलहारिणी कलिन्दजा प्रवाहित कर दी। उन्होंने प्रभु की दुग्धसेवा के लिये गौमाता रखी तथा अपने अनेक भगवदीय कार्यों से जन-जन को चमत्कृत करते हुए व्रज में रहकर प्रभु श्री कृष्णचन्द्र के अनेक लीला स्थलों की खोज की तथा उनका पुनरूद्धार कराया।

अब तो श्री महाप्रभु जी की कृपा से कलियुग में भी द्वापर युग की श्री कृष्णचन्द्र की मधुरातिमधुर बाल लीलाओं के प्रत्यक्ष दर्शन व्रज भक्तों को होने लगे। सम्पूर्ण व्रज मण्डल में ब्रह्मानन्द का साम्राज्य हो गया।

इसके पश्चात आप पंढरपुर पधारे। पंढरपुर में श्री हरिविटठल ने आपको एक सुलक्षणा कन्या से विवाह कर गृहस्थी में प्रवेश करने की आज्ञा दी। आप फिर काशी आ गये और प्रभु की आज्ञा शिरोधार्य कर श्री महालक्ष्मी नामक सुशील कन्या से विवाह किया तथा अपनी गृहस्थी बसायी।

इसके बाद श्री सुबोधिनी जी के लेखन का कार्य हाथ में ले लिया। श्री सुबोधिनी जी को सुनने तो भगवदवतार श्री कृष्ण द्वैपायन श्री वेद व्यास जी स्वयं श्री महाप्रभु जी के सामने प्रकट हे गये और सम्पूर्ण श्री सुबोधिनी जी का श्रवण किया।

उसके बाद तो आपकी सरस्वती प्रवहमान होती हो गयी। गायत्री भाष्य, तत्वार्थ दीप निबंध, शास्त्रार्थ प्रकरण, श्री पुरूषोत्तम-सहस्रनाम एवं अणु भाष्य की रचना हुई। ‘अन्तःकरण प्रबोध’ में श्री महाप्रभु जी लिखते हैं “हे अंतःकरण! मेेरे वचन को सावधान होकर सुनो, वस्तुतः श्री कृष्ण के अतिरिक्त दूसरा दोषरहित कोई देवता नहीं है”।

इसी प्रकार ‘नवरत्न’ में भी आप कहते हैं-तस्मात् सर्वात्मना नित्यं श्रीकृष्णः शरणं मम। वददिरेव सततं स्थेयमित्येव मे मतिः।। इसलिये सर्वात्मभाव से नित्य-निरंतर ‘श्रीकृष्णःशरणं मम’ बोलते हुए जीवन व्यतीत करे-यह मेरी सम्मति है।

स्वयं श्री महाप्रभु जी ने अपने जीवन में प्रभु श्री कृष्णचन्द्र के नाम का कभी भी विस्मरण नहीं किया। पूर्वजों से चली आ रही परम्परा में तीन सोमयागों की पूर्ति की।

अत्यधिक व्यस्तता हुए भी आप बारम्बार श्री गिरिराज गोवर्धन पधारते और श्री नाथ जी की सेवा-व्यवस्था संभालते। इस प्रकार श्री महाप्रभु जी समग्र भारत राष्ट्र को श्री कृष्ण भक्ति रस में सराबोर करके जन-जन को श्री कृष्णमय बनाकर काशी पधार गये। वहां हनुमान घाट पर रहते हुए आपने मौन व्रत ले लिया और सन्यास ग्रहण करके अपनी अंतिम लीला का संवरण किया।

अनेक कवियों ने श्री महाप्रभु श्री वल्लभाचार्य जी के अवतारवाद की अपनी-अपनी कविताओं में वन्दना की है | पुष्टि सम्प्रदाय में श्री वल्लभाचार्य श्री महाप्रभु जी को साक्षात श्री कृष्ण स्वरूप प्रभु श्री नाथ जी का मुखावतार माना गया है। इसी कारण उनकी पवित्र पादुकाएं, जिन्हें धारण कर उन्होंने सम्पूर्ण भारत की परिक्रमाएं की थीं और श्री कृष्ण भक्ति का प्रचार-प्रसार किया था, अद्यावधिपर्यन्त श्रीवल्लभ सम्प्रदाय के मंदिरों में विराजमान हैं और उन्हें भगवत्स्वरूप मान कर उनकी नित्य सेवा की जाती है।