नन्दी कौन थे, नन्दीश्वर अवतार की कथा

नन्दी कौन थे, नन्दीश्वर अवतार की कथामहादेव, भगवान् शिव की वंदना
‘जोे परमानन्दमय हैं, जिनकी लीलाएं अनन्त हैं, जोे ईश्वरों केे भाी ईश्वर, सर्वव्यापक, महान, गौरी के प्रियतम तथा कार्तिकेय और विघ्नराज गणेश के जो पिता हैं, उन आदि देव शंकर की मैं वंदना करता हूं।’

नंदीश्वर की कथा

प्राचीन काल की बात है | एक बार सनत्कुमार जी नेे नंदीश्वर जी से पूछा कि ‘हेे नन्दीश्वर! आप महादेव के अंश से कैसे उत्पन्न हुए तथा आपनेे शिवत्व कैसे प्राप्त किया? यह सब मैं सुनना चाहता हूं, आप कहियेे’ | नन्दीश्वर बोले ‘हेे सनत्कुुमार! बहुत समय पूर्व शिलाद नाम के एक ऋषि थे। पितरों के उद्धार की इच्छा से उन्होंने इन्द्र देव को प्रसन्न करने का सोचा |

इसी उददेश्य से उन्होंने बहुत समय तक कठोर तप किया। उनके तप से संतुष्ट होकर देवराज इन्द्र उनको वर देने को गये । इन्द्र ने शिलाद से कहा-मैं प्रसन्न हूं, तुम वर मांगो। तब इन्द्र देव को प्रणाम कर आदरपूर्वक स्रोतों से स्तुति कर शिलाद हाथ जोड़ कर बोले ‘हे देवेश! आप प्रसन्न हों तो मुझे मृत्युहीन आयोनिज पुत्र की प्राप्ति हो’।

इन्द्र बोले ‘हे मुने! मैं आपको मृत्युहीन आयोेनिज पुत्र नहीं दे सकता; क्योंकि विष्णु भगवान से पितामह ब्रह्मा जी तक तक, सब मृत्युु वाले हैं तो औरों की बात ही क्या हैै! हाँ, यदि भगवान शिव प्रसन्न हो जायं तो तुम्हारे लिये मृत्युुहीन आयोनिज पुत्र प्रदान कर सकते हैं, अतः आप शिव जी को प्रसन्न करें’। इतना कह कर इन्द्र देव अपने लोक को चलेे गये।

शिलाद द्वारा महादेव की आराधना

देवराज इन्द्र के जानेे के बाद शिलाद ने दिव्य सहस्र वर्ष तक महादेव जी की आराधना की। उनकी आराधना से प्रसन्न होकर भगवान शिव उनके समक्ष प्रकट हुए तथा उनकी आराधना सेे प्रसन्न होकर भगवान शिव ने शिलाद ऋषि से कहा ‘हेे शिलाद! उठो मैैं तुम्हें वर देनेे आया हूूं’। भगवान शिव केे ध्यान मेें मग्न और समाधि में लीन शिलाद मुुनि ने शिव की वाणी को नहीं सुना।

तब भगवान शिव नेे उन मुनि को अपने हाथ से स्पर्श किया, जिससे उनकी समाधि छूट गयी और अपने नेत्रों के सम्मुख अपने आराध्य उमा सहित भगवान शम्भु को देख कर वे मुुनि आनन्दपूर्वक उनके चरणों में गिर पड़े।

बड़े हर्ष सेे गदगद वाणी मेें वेे शिव जी की स्तुति करनेे लगे। तब देव देवेश भगवान शिव जी ने शिलाद सेे कहा कि ‘हे तपोधन! मैं तुम्हेेें वर देेनेे आया हूं’। शिव जी के ऐसेे वचन सुनकर शिलाद बोले ‘हेेे महेेश्वर! यदि आप मुझे वर देना चाहते हैं तो मुझको अपनेे समान एक मृत्युुहीन आयोनिज पुुत्र प्रदान करें’।

शिव जी बोलेे ‘हे विप्रवर ! मेरे समान कोई दूसरा नहीं हो सकता अतः मैैं स्वयं ही तुम्हारेे यहां नन्दी नामक आयोेनिज पुत्र रूप सेे प्रकट होऊँगा । हे मुने! तुम मुझ लोकत्रयी के पिता होने का सौभाग्य प्राप्त करोगे’ । इस प्रकार शिलाद को वर देकर शिव पार्वती सहित अन्तर्धान हो गये। शिलाद मुनि ने अपने आश्रम पर आकर यह सारा वृतान्त अन्य मुनियों से कहा तो सभी मुनि अत्यन्त प्रसन्न हुए।

नंदीश्वर का जन्म

“हेे सनत्कुमार! कुछ समय बीतनेे पर एक दिन शिलाद यज्ञ करने के निमित यज्ञ क्षेत्र जोेत रहेे थे। मैं उसी समय उन शिव जी की आज्ञा सेे उनका पुुुत्र रूप होकर प्रलयाग्नि केे समान देदीप्यमान रूप मेें प्रकट हुआ । उस समय देवताओें ने फूूल बरसायेे तथा ऋषिगण भी चारों तरफ से पुष्पवृष्टि करने लगे”।

“हे मुने! उस समय मेरा स्वरूप प्रलयकाल के सूर्य और अग्नि के समान प्रकाशित तथा त्रिनेत्र, चतुर्भुज और जटा मुकुटधारी था। साथ ही वह त्रिशूल आदि शस्त्रों को धारण किये हुए था। मेरा ऐसा स्वरूप देख कर मेरे पिता ने मुझे प्रणाम किया और बोले-हे सुरेश्वर! तुमने मझे महान आनंद दिया है, इस कारण तुम्हारा नाम ‘नन्दी’ हुआ । तदनन्तर मेरे पिता मुझे अपनी पर्ण कुटि में ले गये। पर्ण कुटी में पहुंचकर मैंने अपना वह रूप त्याग कर मनुष्य शरीर धारण कर लिया”।

“हे सनत्कुमार! मुझ पर अत्यधिक स्नेह करने वाले उन शालंकायन के पुत्र शिलाद ने मेरे सम्पूर्ण जात कर्म आदि संस्कार किये । पांच वर्ष की अवस्था में ही मेरे पिता ने मुझे साङ्गोपाङ्ग वेदों को और शास्त्रों को पढ़ाया। सातवें वर्ष में मित्र, वरूण संज्ञक दो मुनि शिवजी की आज्ञा से मुझे देखने को आये, तब मेरे पिता से सत्कार को प्राप्त होकर वे मुनि अच्छी प्रकार से बैठे और मुझे बारम्बार देख कर वे महात्मा बोले कि ‘हे तात! सम्पूर्ण शास्त्रों में पारगामी ऐसा बालक हमने नहीं देखा, परंतु यह तुम्हारा पुत्र नंदी थोड़ी अवस्था वाला है। इसकी आयु एक वर्ष की ही और होगी’।

उन ब्राह्मणों के ऐसा कहने पर मेरे पिता शिलाद उच्च स्वर में रोने लगे। मैंने अपने पिता को रोते हुए देख कर कहा ‘हे पिता जी ! आप क्यों रोेतेे हैं, यह मैैं तत्वपूूर्वक जानना चाहता हूँ’। पिता बोले ‘हे पुत्र! मैं तुम्हारी अल्प आयु में मृत्यु के दुःख से दुःखी हूँ’ ।

मैंने कहा ‘हे पिता जी ! देवता, दानव, यमराज, काल तथा मनुष्य भी मुझे मारें तो भी मेरी अल्प आयु में मृत्य नहीं होगी, इस कारण आप दुखी मत होइये । हे पिता जी ! यह मैं आपसे सत्य कहता हूँ, आपकी शपथ खाता हूँ’। पिता बोले ‘हे पुत्र! तुम्हारी अल्प आयु में मृत्यु को कौन दूर करेगा’? तब मैंने कहा ‘हे तात! मैं तप से अथवा विद्या से मृत्यु को दूर न करूंगा, केवल महादेव जी के भजन से मैं इस मृत्यु को जीतूंगा, इसमें संदेह नहीं है’।

नंदीश्वर द्वारा महादेव की आराधना

नन्दीश्वर बोल “हे मुने ! इस प्रकार कह कर पिता के चरणों में सिर से प्रणाम कर और उनकी प्रदक्षिणा करके मैं श्रेष्ठ वन में चला गया”। नन्दिकेश्वर बोले “हे मुने! वन में जाकर में एकान्त स्थल में स्थित होकर अति कठिन तथा श्रेष्ठ मुनियों के लिये भी दुष्कर तप करने लगा। मैं पंचमुख सदाशिव का परम ध्यान में मग्न हो कर पवित्र नदी के उत्तर भाग में एकाग्रचित्त से सावधान हो कर रूद्र मंत्र जपने लगा।

तब प्रसन्न होकर सदाशिव पार्वती सहित प्रकट होकर बोले ‘हे शिलाद नन्दन! तुम्हारे तप से मैं संतुष्ट हूँ, तुम अभीष्ट वर मांगों’। सामने शिव-पार्वती को देख कर अपने सिर को उनके चरणों में झुका कर मैं उनकी स्तुति करने लगा।

भगवान् शिव का नंदीश्वर को अमरत्व प्रदान करना

तब उन परमेश वृषभध्वज ने दोनों हाथों से मुझे पकड़ कर स्पर्श किया तथा बोले ‘हे वत्स! हे महाप्राज्ञ! तुम्हें मृत्यु से भय कहां? उन दोनों ब्राह्मणों को मैंने ही भेजा था, तुम मेरे ही समान हो, इसमें कुछ संशय नहीं है। तुम पिता और सुहृज्जनों सहित अजर, अमर, दुःख रहित, अविनाशी, अक्षय और मेरे प्रिय होगे’।

इस प्रकार कह कर उन्होंने अपनी कमलों से बनी शिरो माला उतार कर शीघ्र मेरे कण्ठ में डाल दी। हे मुने! उस सुन्दर माला को कण्ठ में पहनते ही तीन नेत्र, दस भुजाओं वाला मानों मैं दूसरा शिव हो गया । परमेश्वर ने कहा और क्या श्रेष्ठ वर दूं? इतना कह कर वृषभध्वज ने अपनी जटाओं से हार के समान निर्मल जल ग्रहण कर ‘नदी हो’ ऐसा कह कर उसको मेर ऊपर छिड़का।

उस जल से पांच शुभ नदियां-1-जटोदका, 2-त्रिस्रोता, 3-वृषध्वनि, 4-स्वर्णोंदका और 5-जम्बू नदी उत्पन्न होकर बहने लगीं। यह पंचनद नामक परम पवित्र शिव का पृष्ठ देश जपेश्वर के समीप वर्तमान है। शिव जी पार्वती जी से बोले कि मैं नन्दी को गणेश्वर पद में अभिषिक्त करता हूँ, तुम्हारी इसमें क्या सम्मति है? पार्वती जी बोली-हे देवेश! यह शिलाद पुत्र नन्दी आज से मेरा महाप्रिय पुत्र हुआ।

इसके बाद शिव जी ने अपने सभी गणों को बुला कर कहा कि यह नंदीश्वर मेरा पुत्र, सब गणों का अधिपति तथा प्रियगणों में मुख्य हुआ, सभी को मेरे इस वचन का पालन करना चाहिये। तुम सब प्रीतिपूर्वक नंदी को स्नान कराओ और आज से यह नंदी तुम सबका स्वामी हुआ।

शिव जी के ऐसा कहने पर सम्पूर्ण गणपति ‘बहुत अच्छा’ कह कर सब अभिषेक की सामग्री ले आये। इसके बाद इन्द्र सहित सम्पूर्ण देवता तथा नारायण, सम्पूर्ण मुनि प्रसन्न हो सब लोकों से आये। शिव के नियोग से ब्रह्मा जी ने सावधान हो नंदी का अभिषेक किया, तब विष्णु ने फिर इन्द्र ने इसके पश्चात लोकपालों ने अभिषेक किया। तब सभी ने नंदीश्वर जी की स्तुति की।

नंदीश्वर का विवाह

नंदीश्वर ने कहा “हे विप्र! इस प्रकार गणाध्यक्ष पद पर अभिषिक्त होने के उपरान्त मुझ नंदी ने ब्रह्मा जी की आज्ञा से सुयशा नाम वाली मरूत की परम मनोहर कन्या से विवाह किया। विवाह के समय जब मैं उस रूपवती सुंदरी सुयशा के साथ मनोहर सिंहासन पर बैठा तब महा लक्ष्मी ने मुझे मुकुट से सजाया, देवी ने अपने कण्ठ का दिव्य हार मुझे दिया।

श्वेत वृषभ, हाथी तथा सिंह की ध्वजा, सुवर्ण का हार इत्यादि वस्तुएं मुझे मिलीं। विवाह के पश्चात मैंने ब्रह्मा जी, विष्णु जी के चरणों में नमस्कार किया, तभी शिव जी ने मुझे सपत्नीक देख परम प्रीति से कहा ‘हे सत्पुत्र! तुम पति और यह सुयशा तुम्हारी पत्नी है। मैं तुमको वही वर दूूंगा, जो तुम्हारे मन में है। तुम मेरे सदा प्रिय रहोगे | जहां तुम होगे वहां मैं रहूंगा’। इस प्रकार कह कर शिव जी उमा सहित कैलास को चले गये। नंदीश्वर बोले “हे सनत्कुमार! जिस प्रकार मैंने शिवत्व प्राप्त किया, वह कथा मैंने आपको सुना दी”।