पक्षिराज गरुड़ कौन हैं, उनकी उत्पत्ति कैसे हुई, सर्प और नाग जाति से उनका क्या सम्बन्ध था, क्या वो बिना अमृत पिए ही अजर और अमर हैं तथा क्या उन्होंने इंद्र को भी हरा कर भगवान विष्णु के वाहन की शोभा प्राप्त की

पक्षिराज गरुड़ कौन हैं, उनकी उत्पत्ति कैसे हुई, सर्प और नाग जाति से उनका क्या सम्बन्ध था, क्या वो बिना अमृत पिए ही अजर और अमर हैं तथा क्या उन्होंने इंद्र को भी हरा कर भगवान विष्णु के वाहन की शोभा प्राप्त कीजब महर्षि उग्रश्रवा, शौनक आदि ऋषियों को महाभारत की कथा सुना रहे थे तो उसी समय सर्प जाति और भगवान् विष्णु के वाहन गरुण जी की उत्पत्ति का वर्णन शुरू हुआ | उग्रश्रवा जी से प्रसन्न हो कर महर्षि शौनक जी ने उनसे कहा “सूतनन्दन उग्रश्रवा ! अब तुम आस्तीक ऋषि की कथा सुनाओ, जिन्होंने जनमेजय के सर्प-सत्र में नागराज तक्षक की रक्षा की थी ।

तुम्हारे मुँह से निकली कथा मिठास से भरी और सुन्दर होती है । तुम अपने पिता के अनुरूप पुत्र हो । उन्हीं के समान हमें उनकी कथा सुनाओ, हम तुमसे प्रसन्न है” । उग्रश्रवा जी ने कहा “आयुष्मन् ! मैंने अपने पिता के मुँह से ऋषि आस्तीक की कथा सुनी है । वही आप लोगों को सुनाता हूँ । सत्ययुग में दक्ष प्रजापति की दो कन्याएँ थीं-कद्रू और विनता । उनका विवाह कश्यप ऋषि से हुआ था ।

एक दिन ब्रह्मर्षि कश्यप ने अपनी धर्मपत्नियों से प्रसन्न होकर कहा, “तुम्हारी जो इच्छा हो, मुझसे वर माँग लो” । कद्रू ने कहा, “एक हजार समान रूप से तेजस्वी नाग मेरे पुत्र हों” । विनता बोली, “तेज, शरीर और बल-विक्रम में कद्रू के पुत्रों से श्रेष्ठ केवल दो ही पुत्र मुझे प्राप्त हों” । कश्यप जी ने ‘एवमस्तु’ कहा । दोनों प्रसन्न हो गयीं । सावधानी से गर्भ-रक्षा करने की आज्ञा देकर कश्यप जी वन में चले गये ।

समय आने पर कद्रू ने एक हजार और विनता ने दो अंडे दिये । दासियों ने प्रसन्न होकर गरम बर्तनों में उन्हें रख दिया । पाँच सौ वर्ष पूरे होने पर कद्रू के तो हजार पुत्र निकल आये, परंतु विनता के दो बच्चे नहीं निकले । कुछ समय और बीतने पर अत्यंत अधीर हुई विनता ने अपने हाथों से एक अंडा फोड़ डाला । उस अंडे का शिशु आधे शरीर से तो पुष्ट हो गया था, परंतु उसका नीचे का आधा शरीर अभी कच्चा था ।

नवजात शिशु ने क्रोधित होकर अपनी माता को शाप दिया, ‘माँ ! तूने लोभवश मेरे अधूरे शरीर को ही निकाल लिया है । इसलिये तू अपनी उसी सौत की पाँच सौ वर्ष तक दासी रहेगी, जिससे तू डाह करती है । यदि मेरी तरह तूने दूसरे अंडे को भी फोड़कर उसके बालक को अंगहीन या विकृतांग न किया तो वहीं तुझे इस शाप से मुक्त करेगा ।

यदि तेरी ऐसी इच्छा है कि मेरा दूसरा बालक बलवान् हो तो धैर्य के साथ पाँच सौ वर्ष तक और प्रतीक्षा कर” । इस प्रकार शाप देकर वह बालक आकाश में उड़ गया और भगवान् सूर्य के रथ का सारथि बना । प्रात:कालीन लालिमा उसी की झलक है । उस बालक का नाम अरुण हुआ ।

इस घटना के काफी समय बाद एक बार कद्रू और विनता दोनों बहनें एक साथ ही घूम रही थीं कि उन्हें पास ही उच्चैःश्रवा नाम का घोड़ा दिखायी दिया । यह अश्व-रत्न अमृत-मन्थन के समय उत्पन्न हुआ था और समस्त अश्वों में श्रेष्ठ, बलवान्, विजयी, सुन्दर, अजर, दिव्य एवं सब शुभ लक्षणों से युक्त था । उसे देखकर वे दोनों आपस में उसका वर्णन करने लगीं ।

इसी उच्चैःश्रवा घोड़े को देखकर कद्रू ने विनता से कहा “बहिन ! जल्दी से बताओ तो यह घोड़ा किस रंग का है?” विनता ने कहा ‘बहिन ! यह अश्वराज श्वेतवर्ण का है । तुम इसे किस रंग का समझती हो”? कद्रू ने कहा “अवश्य ही इस घोड़े का रंग सफेद है, परंतु पूँछ काली है । आओ, हम दोनों इस विषय में बाजी लगावें ।

यदि तुम्हारी बात ठीक हुई तो मैं तुम्हारी दासी रहूंगी और मेरी बात ठीक हुई तो तुम मेरी दासी रहना” । इस प्रकार दोनों बहनें आपस में बाजी लगाकर और दूसरे दिन घोड़ा देखने का निश्चय करके घर चली गयीं वहाँ से | कद्रू ने विनता को धोखा देने के विचार से अपने हजार पुत्रों को यह आज्ञा दी कि “पुत्रो ! तुम लोग शीघ्र ही काले बाल बनकर उच्चैःश्रवा की पूँछ ढक लो, जिससे मुझे दासी न बनना पड़े” ।

जिन सर्पों ने उसकी आज्ञा नहीं मानी, उसने, उन्हें उसने शाप दिया कि “जाओ, तुम लोगों को अग्नि, जनमेजय के सर्प-यज्ञ में जलाकर भस्म कर देगी” । यह दैवसंयोग की बात है कि कद्रू ने अपने पुत्रों को ही ऐसा शाप दे दिया । यह बात सुनकर ब्रह्मा जी और समस्त देवताओं ने उसका अनुमोदन किया । उन दिनों पराक्रमी और विषैले सर्प बहुत प्रबल हो गये थे । वे दूसरों को बड़ी पीड़ा पहुँचाते थे प्रजा के हित की दृष्टि से यह उचित ही हुआ ।

“जो लोग दूसरे जीवों का अहित करते हैं, उन्हें विधाता की ओर से ही प्राणान्त दण्ड मिल जाता है” । ऐसा कहकर ब्रह्माजी ने भी कद्रू की प्रशंसा की । कद्रू और विनता ने आपस में दासी बनने की बाजी लगाकर बड़े रोष और आवेश में वह रात बितायी । दूसरे दिन प्रात:काल होते ही निकट से घोड़े को देखने के लिये दोनों चल पड़ीं ।

उधर सर्पों ने परस्पर विचार करके यह निश्चय किया कि ‘हमें माता की आज्ञा का पालन करना चाहिये । यदि उसका मनोरथ पूरा न होगा तो वह प्रेम भाव छोड़कर रोष पूर्वक हमें जला देगी । यदि इच्छा पूरी हो जायगी तो प्रसन्न होकर हमें अपने शाप से मुक्त कर देगी । इसलिये चलो, हम लोग घोड़े की पूँछ को काली कर दें ।’ ऐसा निश्चय करके वे उच्चैःश्रवा की पूँछ से बाल बनकर लिपट गये जिससे वह काली जान पड़ने लगी ।

इधर कद्रू और विनता बाजी लगाकर आकाशमार्ग से समुद्र को देखते देखते दूसरे पार जाने लगी। दोनों ही घोड़े के पास पहुँचकर नीचे उतर पड़ी । उन्होंने देखा कि घोड़े का सारा शरीर तो चन्द्रमा की किरणों के समान उज्ज्वल है, परंतु पूँछ काली है । यह देखकर विनता उदास हो गयी, कद्रू ने उसे अपनी दासी बना लिया था ।

उधर समय बीतता रह और कुछ समय बाद, समय पूरा होने पर महा तेजस्वी गरुड़ माता की सहायता के बिना ही अण्डा फोड़कर उससे बाहर निकल आये। उनके तेज से दिशाएँ प्रकाशित हो गयी। उनकी शक्ति, गति, दीप्ति और वृद्धि विलक्षण थी । नेत्र बिजली के समान पीले और शरीर अग्नि के समान तेजस्वी । वे जन्मते ही आकाश में बहुत ऊपर उड़ गये। उस समय वे ऐसे जान पड़ते थे, मानो दूसरा बड़वानल ही हो ।

देवताओं ने तो समझा कि अग्नि देव ही इस रूप में बढ़ रहे हैं । उन्होंने विश्व रूप अग्नि की शरण में जाकर प्रणाम पूर्वक कहा, “अग्नि देव ! आप अपना शरीर मत बढ़ाइये । क्या आप हमें भस्म कर डालना चाहते हैं? देखिये, देखिये, आपकी यह तेजोमयी मूर्ति हमारी ओर बढ़ती आ रही है”। अग्नि ने कहा, “देवगण यह मेरी मूर्ति नहीं है । ये विनता नन्दन परम तेजस्वी पक्षिराज गरुड़ हैं। इन्हीं को देखकर आप लोगों को भ्रम हुआ है ।

ये नागों के नाशक, देवताओं के हितैषी और आसुरों के शत्रु हैं । आप इनसे भयभीत न हों । मेरे साथ चलकर इनसे मिल लें” । अग्नि के साथ जाकर देवता और ऋषियों ने गरुड़ की स्तुति की । देवता और ऋषियों की स्तुति सुनकर गरुड़जी ने कहा “मेरे भयंकर शरीर को देखकर जो लोग घबरा गये थे, वे अब भयभीत न हों । मैं अपने शरीर को छोटा और तेज को कम कर लेता हूँ” । सब लोग प्रसन्नता पूर्वक लौट गये ।

एक दिन विनता अपने पुत्र के पास बैठी हुई थी, कद्रू ने उसे बुलाकर कहा “मुझे समुद्र के भीतर नागों का एक दर्शनीय स्थान देखना है । वहाँ तू मुझे ले चल” । अब विनता ने कद्रू को और गरुड़ जी ने माता की आज्ञा से सर्पों को अपने कन्धों पर बैठा लिया और उनके अभीष्ट स्थान को ले चले । गरुड़ जी बहुत ऊपर सूर्य के निकट से चल रहे थे । तीक्ष्ण गर्मी के कारण सर्प बेहोश हो गये ।

कद्रू ने इन्द्र से प्रार्थना करके सारे आकाश को मेघ-मण्डल से आच्छादित करा दिया, वर्षा हुई, सब सर्प सुखी हो गये । उन्होंने अभीष्ट स्थान पर पहुँचकर लवण सागर, मनोहर वन आदि देखा, यथेच्छ विहार किया और खूब खेलकूद कर गरुड़ से कहा “तुमने तो आकाश में उड़ते समय बहुत-से सुन्दर-सुन्दर द्वीप देखे होंगे । अब हमें और किसी द्वीप में ले चलो” ।

गरुड़ कुछ चिन्ता में पड़ गये । उन्होंने सोच विचार कर अपनी माता से पूछा कि “माँ ! मुझे सर्पो की आज्ञा का पालन क्यों करना चाहिये”? विनता ने कहा “बेटा ! इन सर्पों के छल से मैं बाजी हार गयी और दुर्भाग्यवश अपनी सौत कद्रू की दासी हो गयी । अपनी माता के दुःख से गरुड़ भी बड़े दुःखी हुए ।

उन्होंने सर्पों से कहा “सर्पगण ! ठीक-ठीक बताओ । मैं तुम्हें कौन-सी वस्तु ला दूं, किस बात का पता लगा दूँ अथवा तुम लोगों का कौन-सा उपकार कर दूँ, जिससे मैं और मेरी माता दासत्व से मुक्त हो जायें” ! सर्पों ने कहा “गरुड़ ! यदि तुम अपने पराक्रम से हमारे लिये अमृत ला दो तो हम तुम्हें और तुम्हारी माता को दासत्व से मुक्त कर देंगे”

अमृत के लिये गरुड़ की यात्रा और गजकच्छप का वृत्तान्त

उग्रश्रवा जी कहते हैं “शौनकादि ऋषियो ! सर्पो की बात सुनकर गरुड़ ने अपनी माता विनता से कहा, ‘माता ! मैं अमृत के लिये जा रहा हूँ । उसके पहले मैं यह जानना चाहता हूँ कि वहाँ खाऊँगा क्या’ । विनता ने कहा, ‘बेटा ! समुद्र में मनुष्यों की एक बस्ती है । उन्हें खाकर तुम अमृत ले आओ । एक बात का स्मरण रखना । ब्राहाण का वध कभी न करना, उनके श्राप से तुम्हे कोई नहीं बचा पायेगा । वे सबके लिये अवध्य हैं’ ।

गरुड़ जी माता जी की आज्ञा के अनुसार उस द्वीप के मनुष्यों को खाकर आगे बढ़े । गलती से एक ब्राह्मण उनके मुँह में आ गया, जिससे उनका तालू जलने लगा । उसे छोड़कर वे कश्यप जी के पास गये । कश्यप जी ने पूछा “बेटा ! तुम लोग सकुशल तो हो? आवश्यकतानुसार भोजन तो मिल जाता है न”? गरुड़ जी ने कहा, “मेरी माता सकुशल है । हम भी सानन्द हैं ।

पर्याप्त भोजन न मिलने से कुछ दुःख रहता है । मैं अपनी माता को दासीपन से छुड़ाने के लिये सर्पो के कहने पर अमृत लाने के लिये जा रहा हूँ । माता ने मुझे मनुष्यों का भोजन करने के लिये कहा था, परंतु उससे मेरा पेट नहीं भरा । अब आप कोई ऐसी खाने की वस्तु बताइये, जिसे खाकर मैं अमृत ला सकूँ”। कश्यप जी ने कहा, “बेटा ! यहाँ से थोड़ी दूर पर एक विश्वविख्यात सरोवर है । उसमें एक हाथी और एक कछुआ रहता है । वे दोनों पूर्वजन्म के भाई परंतु एक-दूसरे के शत्रु हैं । वे अब भी एक-दूसरे से उलझे रहते हैं ।

अच्छा, अब उनके पूर्वजन्म की कथा सुनो-

प्राचीन काल में विभावसु नामक एक बड़े क्रोधी ऋषि थे । उनका छोटा भाई था बड़ा तपस्वी सुप्रतीक । सुप्रतीक अपने धन को बड़े भाई के साथ नहीं रखना चाहता था । वह नित्य बँटवारे के लिये कहा करता । विभावसु ने अपने छोटे भाई से कहा, “सुप्रतीक ! धन के मोह के कारण ही लोग उसका बँटवारा चाहते हैं और बँटवारा होने पर एक-दूसरे के विरोधी हो जाते हैं ।

तब शत्रु भी उनके अलग-अलग मित्र बन जाते हैं और भाई-भाई में भेद डाल देते हैं । उनका मन फटते ही मित्र बने हुए शत्रु दोष दिखा दिखाकर वैर-भाव बढ़ा देते हैं । अलग-अलग होने से तत्काल उनका अध:पतन हो जाता है । क्योंकि फिर वे एक-दूसरे की मर्यादा और सौहार्द का ध्यान नहीं रखते । इसी से सत्पुरुष भाइयों के अलगाव की बात को अच्छी नहीं मानते ।

जो लोग गुरु और शास्त्र के उपदेश पर ध्यान न देकर परस्पर एक-दूसरे को सन्देह की दृष्टि से देखते हैं, उनको वश में रखना कठिन है। तू भेद भाव के कारण ही धन अलग करना चाहता है । इसलिये जा, तुझे हाथी की योनि प्राप्त होगी । सुप्रतीक ने कहा, “मैं हाथी होऊँगा तो तुम कछुआ होगे” । “गरुड ! इस प्रकार दोनों भाई धनके लालच से एक-दूसरे को शाप देकर हाथी और कछुआ हो गये हैं।

यह पारस्परिक द्वेष का परिणाम है। वे दोनों विशालकाय जन्तु अब भी आपस में लड़ते रहते हैं। हाथी छ: योजन ऊँचा और बारह योजन लम्बा है। कछुआ तीन योजन ऊँचा और दस योजन गोल है। वे मतवाले एक-दूसरे का प्राण लेने के लिये उतावले हो रहे हैं। तुम जाकर उन दोनों भयंकर जन्तुओं को खा जाओ और अमृत ले आओ” ।

कश्यप जी की आज्ञा प्राप्त करके गरुड़ जी उस सरोवर पर गये । उन्होंने एक पंजे से हाथी को और दूसरे से कछुए को पकड़ लिया तथा आकाश में बहुत ऊँचे उड़कर अलम्ब तीर्थ में जा पहुँचे । वहाँ सुवर्णगिरि पर बहुत-से देव वृक्ष लहलहा रहे थे । वे गरुड़ को देखते ही इस भय से काँपने लगे कि कहीं इनके धक्के से हम टूट न जायँ ! उनको भयभीत देखकर गरुड़जी दूसरी ओर निकल गये।

उधर एक बड़ा-सा वटवृक्ष था । वटवृक्ष ने गरुड़ जी को मन के वेग से उड़ते देखकर कहा कि “तुम मेरी सौ योजन लम्बी शाखा पर बैठकर हाथी और कछुए को खा लो” । ज्यों ही गरुड़जी उसकी शाखा पर बैठे त्यों ही वह चड़चड़ाकर टूट गयी और गिरने लगी । गरुड़ जी ने गिरते-गिरते उस शाखा को पकड़ लिया और बड़े आश्चर्य से देखा कि उसमें नीचे की ओर सिर करके वालखिल्य नामक ऋषिगण लटक रहे हैं ।

गरुड़ जी ने सोचा कि यदि शाखा गिर गयी तो ये तपस्वी ब्रह्मर्षि मर जायँगे । अब उन्होंने झपटकर अपनी चोंच से वृक्ष की शाखा पकड ली और हाथी तथा कछुए को पंजों में दबाये आकाश में उड़ने लगे । कहीं भी बैठने का स्थान न पाकर वे आकाश में उड़ते ही रहे । उस समय उनके पंखों की हवा से पहाड़ भी काँप उठते थे । वालखिल्य ऋषियों के ऊपर दयाभाव होने के कारण वे कहीं बैठ न सके और उड़ते-उड़ते गन्धमादन पर्वत पर गये ।

कश्यप जी ने उन्हें उस अवस्था में देखकर कहा, “बेटा ! कहीं सहसा साहस का काम न कर बैठना । सूर्य की किरण पीकर तपस्या करने वाले वालखिल्य ऋषि क्रुद्ध होकर कहीं तुम्हें भस्म न कर दें” । पुत्र से इस प्रकार कहकर उन्होंने तप:शुद्ध वालखिल्य ऋषियों से प्रार्थना की, “तपोधनो ! गरुड़ प्रजा के हित के लिये एक महान् कार्य करना चाहता है । आप लोग इसे आज्ञा दीजिये” ।

वालखिल्य ऋषियों ने उनकी प्रार्थना स्वीकार करके वटवृक्ष की शाखा छोड़ दी और तपस्या करने के लिये हिमालय पर चले गये । गरुड़ जी ने वह शाखा फेंक दी और पर्वत की चोटी पर बैठकर हाथी तथा कछुए को खाया । गरुड़ जी खा-पीकर पर्वत की उस चोटी से ही ऊपर की ओर उड़े । उस समय देवताओं ने देखा कि उनके यहाँ भयंकर उत्पात हो रहे हैं ।

देवराज इन्द्र ने बृहस्पति जी के पास जाकर पूछा “भगवन् ! यकायक बहुत-से उत्पात क्यों होने लगे हैं । कोई ऐसा शत्रु तो नहीं दिखायी पड़ता, जो मुझे युद्ध में जीत सके” । बृहस्पति जी ने कहा, “इन्द्र ! तुम्हारे अपराध और प्रमाद से तथा महात्मा वालखिल्य ऋषियों के तपो बल से विनता नन्दन गरुड़ अमृत लेने के लिये यहाँ आ रहा है ।

वह आकाश में स्वच्छन्द विचरता तथा इच्छानुसार रूप धारण कर लेता है । वह अपनी शक्ति से असाध्य कार्य को भी साध सकता है । अवश्य ही उसमें अमृत हर ले जाने की शक्ति है । बृहस्पति जी की बात सुनकर इन्द्र ने तुरंत अमृत के रक्षकों को सावधान करके कहा कि “देखो, परम पराक्रमी पक्षिराज गरुड़ यहाँ से अमृत ले जाने के लिये आ रहा है । सचेत रहो । वह बलपूर्वक अमृत न ले जाने पावे” ।

सभी देवता और स्वयं इन्द्र भी अमृतको घेरकर उसकी रक्षा के लिये डट गये । गरुड़ ने वहाँ पहुँचते ही पंखों की हवा से इतनी धूल उड़ायी कि देवता अन्धे-से हो गये । वे धूलसे ढक कर मूढ़ से बन गये । सभी रक्षक आँखें खराब होने से डर गये । वे एक क्षण तक गरुड़ को देख भी नहीं सके । सारा स्वर्ग क्षुब्ध हो गया । चोंच और डैनों की चोट से देवताओं के शरीर जर्जरित हो गये ।

इन्द्र ने वायु को आज्ञा दी कि “तुम यह धूल का परदा फाड़ दो । यह तुम्हारा कर्तव्य है” । वायु ने वैसा ही किया । चारों और उजाला हो गया, देवता उन पर प्रहार करने लगे । गरुड़ ने उड़ते-उड़ते ही गरजकर उनके प्रहार सह लिये और आकाश में उनसे भी ऊँचे पहुँच गये देवताओं के शस्त्रास्त्रों के प्रहार से गरुड तनिक भी विचलित नहीं हुए । उनके आक्रमण को विफल कर दिया ।

गरुड़ के पंखों और चोंचों की चोट से देवताओं की चमड़ी उधड़ गयी, शरीर खून से लथपथ हो गया । वे घबराकर स्वयं ही तितर-बितर हो गये । इसके बाद गरुड़ आगे बढ़े । उन्होंने देखा कि अमृत के चारों ओर आग की लाल-लाल लपटें उठ रही हैं । अब गरुड़ ने अपने शरीर में आठ हजार एक सौ मुँह बनाये तथा बहुत सी नदियों का जल पीकर उसे धधकती हुई आग पर उड़ेल दिया । अग्नि शान्त होने पर छोटा-सा शरीर धारण करके वे और आगे बढे ।

गरुड़ का अमृत लेकर आना और विनता को दासीभाव से छुड़ाना

उग्रश्रवा जी कहते हैं “सूर्य की किरणों के समान उज्ज्वल और सुनहला शरीर धारण करके गरुड़ ने बड़े वेग से अमृत के स्थान में प्रवेश किया । उन्होंने वहाँ देखा कि अमृत के पास एक लोहे का चक्र निरन्तर घूम रहा है । उसकी धार तीखी है, उसमें सहस्रों अस्त्र लगे हुए हैं । वह भयंकर चक्र सूर्य और अग्नि के समान जान पड़ता है । उसका काम ही था अमृतकी रक्षा ।

गरुड़ जी चक्र के भीतर घुसने का मार्ग देखते रहे । एक क्षण में ही उन्होंने अपने शरीर को संकुचित किया और चक्र के आरों के बीच होकर भीतर घुस गये । अब उन्होंने देखा कि अमृत की रक्षा के लिये दो भयंकर सर्प नियुक्त हैं । उनकी लपलपाती जीभ, चमकती आँखें और अग्नि की-सी शरीर कान्ति थी । उनकी दृष्टि से ही विष का संचार होता था । गरुड़ जी ने धूल झोंक कर उनकी आँखें बंद कर दी ।

चोंचों और पंजों से मार मार कर उन्हें कुचल दिया, चक्र को तोड़ डाला और बड़े वेग से अमृतपात्र लेकर वहाँ से उड़ चले । उन्होंने स्वयं अमृत नहीं पिया । बस, आकाश में उड़कर सर्पो के पास चल दिये । आकाश में उन्हें विष्णु भगवान के दर्शन हुए । गरुड़ के मन में अमृत पीने का लोभ नहीं है, यह जानकर अविनाशी भगवान् उन पर बहुत प्रसन्न हुए और बोले

“गरुड़ ! मैं तुम्हें वर देना चाहता हूँ । मनचाही वस्तु माँग लो” ।’ गरुड़ ने कहा, “भगवन् ! एक तो आप मुझे अपनी ध्वजा में रखिये, दूसरे मैं अमृत पीये बिना ही अजर-अमर हो जाऊँ” । भगवान् ने कहा, “तथास्तु” ! गरुड़ने कहा, “मैं भी आपको वर देना चाहता हूँ । मुझसे भी कुछ माँग लीजिये” । भगवान् ने मुस्कुरा कर कहा, “तुम मेरे वाहन बन जाओ” । गरुड़ने “ऐसा ही होगा” कहकर उनकी अनुमति से अमृत लेकर यात्रा की ।

अबतक इन्द्र की आँखें खुल चुकी थीं । उन्होंने गरुड़ को अमृत ले जाते देख क्रोध से भरकर वज्र चलाया । गरुड़ ने वज्राहत होकर भी हँसते हुए कोमल वाणी से कहा “इन्द्र ! जिनकी हड्डी से यह वज्र बना है, उनके सम्मान के लिये मैं अपना एक पंख छोड़ देता हूँ । तुम उसका भी अन्त नहीं पा सकोगे । वज्राघात से मुझे तनिक भी पीड़ा नहीं हुई है । गरुड़ ने अपना एक पंख गिरा दिया ।

उसे देखकर लोगों को बड़ा आनन्द हुआ । सबने कहा, “जिसका यह पंख है, उस पक्षी का नाम ‘सुपर्ण’ हो” । इन्द्र ने चकित होकर मन-ही-मन कहा, “धन्य है यह पराक्रमी पक्षी” ! उन्होंने कहा, “पक्षिराज ! मैं जानना चाहता हूँ कि तुममें कितना बल है । साथ ही तुम्हारी मित्रता भी चाहता हूँ” । गरुड़ ने कहा, “देवराज ! आपके इच्छानुसार हमारी मित्रता रहे ।

बल के सम्बन्ध में क्या बताऊँ? अपने मुँह से अपने गुणों का बखान, बल की प्रशंसा सत्पुरुषों की दृष्टिमें अच्छी नहीं है । आप मुझे मित्र मानकर पूछ रहे हैं तो मैं मित्र के समान ही बतलाता हूँ कि पर्वत, वन, समुद्र और जल सहित सारी पृथ्वी को तथा इसके ऊपर रहने वाले आप लोगों को अपने एक पंख पर उठाकर मैं बिना परिश्रम उड़ सकता हूँ” । इन्द्र ने कहा, आपकी बात पूर्णतः सत्य है ।

आप अब मेरी घनिष्ठ मित्रता स्वीकार कीजिये । यदि आपको अमृत की आवश्यकता न हो तो मुझे दे दीजिये । आप यह ले जाकर जिन्हें देंगे, वे हमें बहुत दुःख देंगे” । गरुड़ जी ने कहा, “देवराज ! अमृत को ले जाने का एक कारण है । मैं इसे किसी को पिलाना नहीं चाहता हूँ । मैं इसे जहाँ रखू, वहाँ से आप उठा लाइये” ।

इन्द्र ने सन्तुष्ट होकर कहा, “गरुड़! मुझ से मुँहमाँगा वर ले लो” । गरुड़ को सर्पों की दुष्टता और उनके छल के कारण अपनी माता को होने वाले दुःख का स्मरण हो आया । उन्होंने वर माँगा “ये बलवान् सर्प ही मेरे भोजन की सामग्री हो” । देवराज इन्द्रने कहा, “तथास्तु” । इन्द्र से विदा होकर गरुड़ सर्पों के स्थान पर आये । वहीं उनकी माता भी थीं ।

उन्होंने प्रसन्नता प्रकट करते हुए सर्पों से कहा, “यह लो, मैं अमृत ले आया । परन्तु पीने में जल्दी मत करो। मैं इसे कुशों पर रख देता हूँ । स्नान करके पवित्र हो लो । फिर इसे पीना । अब तुम लोगों के कथनानुसार मेरी माता दासीपन से छूट गयी, क्योंकि मैंने तुम्हारी बात पूरी कर दी है” । सर्पों ने स्वीकार कर लिया । जब सर्पगण प्रसन्नता से भरकर स्नान करने के लिये गये, तब इन्द्र अमृत-कलश उठा कर स्वर्ग में ले आये।

मंगल-कृत्यों से लौट कर सर्पो ने देखा तो अमृत उस स्थान पर नहीं था । उन्होंने समझ लिया कि हमने विनता को दासी बनाने के लिये जो कपट किया था, उसी का यह फल है । फिर यह समझकर कि यहाँ अमृत रखा गया था, इसलिये सम्भव है इसमें उसका कुछ अंश लगा हो, सर्पों ने कुशों को चाटना शुरू किया । ऐसा करते ही उनकी जीभ के दो-दो टुकड़े हो गये । अमृत का स्पर्श होने से कुश पवित्र माना जाने लगा । अब गरुड़ कृतकृत्य होकर आनन्द से अपनी माता के साथ रहने लगे । वे पक्षिराज हुए, उनकी कीर्ति चारों ओर फैल गयी और माता सुखी हो गयीं ।