जब राजा विक्रमादित्य ने पाताल लोक की यात्रा की तथा वहाँ के राजा शेषनाग से मुलाकात की

जब राजा विक्रमादित्य ने पाताल लोक की यात्रा की तथा वहाँ के राजा शेषनाग से मुलाकात कीराजा भोज से स्वर्ण सिंहासन की सोलहवीं पुतली, सत्यवती ने जो विक्रमादित्य की कथा कही वह इस प्रकार थी | राजा विक्रमादित्य के शासन काल में उज्जैन नगरी का यश चारों ओर फैला हुआ था। एक से बढ़कर एक विद्वान उनके दरबार की शोभा बढ़ाते थे और उनकी नौ महा विद्वानों की एक समिति थी जो हर विषय पर सम्राट को परामर्श देते थे, तथा सम्राट उनके परामर्श के अनुसार ही राज-काज सम्बन्धी निर्णय लिया करते थे ।

राज दरबार में एक बार सम्पन्नता तथा ऐश्वर्य पर बहस छिड़ी, तो मृत्युलोक समेत अन्य लोकों की भी बात चली । राजा विक्रमादित्य को अपने विद्वानों से पता चला कि पाताल लोक के राजा शेषनाग का ऐश्वर्य देखने लायक है और उनके लोक में हर तरह की सुख-सुविधाएँ मौजूद है । चूँकि वे भगवान विष्णु के खास सेवकों में से एक हैं, इसलिए उनका स्थान देवताओं के समकक्ष है । ऐसा कहा जाता है कि उनके दर्शन मात्र से मनुष्य का जीवन धन्य हो जाता है ।

पाताल लोक के राजा शेषनाग के ऐश्वर्य की इतनी प्रशंसा सुन कर विक्रमादित्य ने सशरीर पाताल लोक जाकर उनसे भेंट करने का निश्चय कर लिया । उन्होंने दोनों बेतालो का स्मरण किया । जब वे उपस्थित हुए, तो उन्होंने उनसे पाताल लोक ले चलने को कहा । दोनों बेताल उन्हें जब पाताल लोक लाए, तो उन्होंने पाताल लोक के बारे में दी गई सारी जानकारी सत्य पाई ।

सारा लोक साफ-सुथरा तथा सुनियोजित तरीके से बसा हुआ था । हीरे-जवाहरात से पूरा लोक जगमगा रहा था । जब शेषनाग को ख़बर मिली कि मृत्युलोक से कोई सशरीर आया है तो वे उनसे मिले । राजा विक्रमादित्य ने पूरे आदर तथा नम्रता से उन्हें अपने आने का प्रयोजन बताया तथा अपना परिचय दिया ।

उनके व्यवहार से शेषनाग इतने प्रसन्न हो गए कि उन्होंने चलते वक्त उन्हें चार चमत्कारी रत्न उपहार में दिए । पहले रत्न से मुँहमाँगा धन प्राप्त किया जा सकता था । दूसरा रत्न माँगने पर हर तरह के वस्त्र तथा आभूषण दे सकता था । तीसरे रत्न से हर तरह के रथ, अश्व तथा पालकी की प्राप्ति हो सकती थी । तथा चौथा रत्न धर्म-कार्य तथा यश की प्राप्ति करा सकता था । राजा विक्रमादित्य ने शेषनाग को बहुत धन्यवाद् दिया |

इसके बाद माँ काली द्वारा प्रदत्त दोनों बेताल स्मरण करने पर उपस्थित हुए तथा विक्रम को उनके नगर की सीमा पर पहुँचा कर अदृश्य हो गए । राजा विक्रमादित्य चारों रत्न लेकर अपने नगर में प्रविष्ट हुए ही थे कि उनका अभिवादन एक परिचित ब्राह्मण ने किया । उन्होंने राजा से उनकी पाताल लोक की यात्रा तथा रत्न प्राप्त करने की बात जानकर कहा कि राजा की हर उपलब्धि में उनकी प्रजा की सहभागिता है ।

राजा विक्रमादित्य ने उसका अभिप्राय समझकर उससे अपनी इच्छा से एक रत्न ले लेने को कहा । ब्राह्मण असमंजस में पड़ गया और बोला कि अपने परिवार के हर सदस्य से विमर्श करने के बाद ही कोई फैसला करेगा । जब वह घर पहुँचा और अपनी पत्नी बेटे तथा बेटी से सारी बात बताई, तो तीनों ने तीन अलग तरह के रत्नों में अपनी रुचि जताई ।

ब्राह्मण फिर भी किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँच सका और इसी मानसिक दशा में राजा के पास पहुँच गया। विक्रम ने हँसकर उसे चारों के चारों रत्न उपहार में दिए ।