मद्र्राज शल्य को अपना सारथी बनाने के लिए अंगराज कर्ण और दुर्योधन ने अथक परिश्रम किया

मद्र्राज शल्य को अपना सारथी बनाने के लिए अंगराज कर्ण और दुर्योधनराजा शल्य को समझाते हुए दुर्योधन ने कहा “वीरवर ! सारथि तो रथी से भी बढ़कर होना चाहिये । इसलिये आप संग्राम भूमि में कर्ण के घोड़ों का नियन्त्रण कीजिये । जिस प्रकार त्रिपुरों के नाश के लिये देवताओं ने कोशिश करके ब्रह्माजी को भगवान् शंकर का सारथि बनाया था उसी प्रकार हम कर्ण से भी श्रेष्ठ आपको उसका सारथि बनाना चाहते हैं ।

शल्य ने कहा “राजन् ! जिस प्रकार ब्रह्माजी ने महादेव जी का सारथ्य किया था और जिस प्रकार एक ही बाण से सम्पूर्ण दैत्यों का संहार हुआ था वह सब मुझे मालूम है । यह प्रसंग श्रीकृष्ण को भी विदित ही है । वे भूत, भविष्य की सब बातों को पूरी तरह से जानते हैं । यह सब जान कर ही उन्होंने अर्जुन का सारथ्य ग्रहण किया है ।

यदि किसी प्रकार कर्ण ने अर्जुन को मार डाला तो उसे मरा देखकर श्री कृष्ण स्वयं युद्ध करने लगेंगे और जब वे कोप करेंगे तो तुम्हारी सेना का कोई भी राजा शत्रुओं की सेना का सामना नहीं कर सकेगा” । इस पूरे घटनाक्रम को धृतराष्ट्र को बताते हुए संजय ने कहा “राजन् ! जब मद्रराज शल्य ने ऐसा कहा तो दुर्योधन कहने लगा, ‘महाराज ! आप कर्ण का अपमान न करें । वह समस्त शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ और सम्पूर्ण अस्त्रविद्या में पारंगत है ।

यह बात प्रत्यक्ष ही है कि उस रात्रि में घटोत्कच ने सैकड़ों मायाएँ रची थीं, तब उसे कर्ण ने ही मारा था । इन दिनों में अर्जुन भी डर के मारे कभी डटकर कर्ण के सामने खड़ा नहीं हुआ है । महाबली भीम को भी कर्ण ने धनुष की नोक से युद्ध के लिये उत्तेजित किया था और उसे ‘ओ मूढ़ ! ओ पेटपाल !’ ऐसा कहकर सम्बोधन किया था ।

उसने माद्री-पुत्र शूरवीर नकुल को भी संग्राम में परास्त कर दिया था और किसी विशेष कारण से ही उसे नहीं मारा था । कर्ण ने ही वृष्णिकुल तिलक सात्यकि को युद्ध में परास्त किया था और उसे बलात् रथहीन कर दिया था । उसने धृष्टद्युम्नादि संजय वीरों को तो संग्राम भूमि में हँसते-हँसते कई बार नीचा दिखाया था । भला, ऐसे महारथी कर्ण को पाण्डव लोग कैसे परास्त कर सकते हैं ।

कर्ण तो कुपित होने पर वज्रधर इन्द्र को भी मार सकता है । आप भी सम्पूर्ण अस्त्रों के ज्ञाता और समस्त विद्याओं में पारंगत हैं । पृथ्वी में आपके समान किसी का भी बाहुबल नहीं है । आप शत्रुओं के लिये शल्य के समान हैं, इसीसे आप ‘शल्य’ नाम से प्रसिद्ध हैं । सारे यदुवंशी मिलकर भी आपके बाहुपाश में पड़ने पर उससे छुटकारा नहीं पा सकते ।

राजन् ! कृष्ण क्या आपके बाहुबल से भी बल में बढ़े-चढ़े हैं? जिस प्रकार अर्जुन के मारे जाने पर श्रीकृष्ण पाण्डव-सेना की रक्षा करेंगे उसी प्रकार यदि कर्ण मारा गया तो आपको हमारी विशाल वाहिनी की रक्षा करनी होगी । महाराज ! मैं तो आपके बल से ही अपने भाइयों और समस्त राजाओं के ऋण से मुक्त होना चाहता हूँ” ।

वहीँ उपस्थित कर्ण ने कहा “मद्रराज ! जिस प्रकार ब्रह्माजी भगवान् शंकर के और श्रीकृष्ण अर्जुन के सारथि बनकर उनका हित करते रहे हैं, उसी प्रकार आप सर्वदा हमारे हित में तत्पर रहें” । शल्य बोले “अपनी या दूसरे की निन्दा अथवा स्तुति करना श्रेष्ठ पुरुषों का काम नहीं है तो भी तुम्हारे विश्वास के लिये मैं अपने विषय में जो प्रशंसा की बातें कहता हूँ वह सुनो ।

मैं सावधानी से घोड़ों को हाँकने, उनके गुण-दोषों को जानने तथा उनकी चिकित्सा करने में इन्द्र के सारथि मातलि के समान हूँ । अतः तुम चिन्ता न करो । अर्जुन के साथ युद्ध करते समय मैं तुम्हारा रथ हाँकूँगा” । दुर्योधन ने कहा “कर्ण ! महाराज शल्य श्रीकृष्ण से भी बड़े सारथि हैं । अब ये तुम्हारा सारथ्य करेंगे | मातलि जैसे इन्द्र के रथ को हाँकता है, उसी प्रकार ये तुम्हारे रथ के घोड़ों को हाँकेंगे ।

अब तुम नि:संदेह पाण्डवों को नीचा दिखा सकोगे राजन्” ! तब कर्ण ने प्रसन्न होकर अपने सारथि से कहा “सूत ! तुम फौरन मेरा रथ तैयार करके लाओ” । सारथि ने कर्ण के विजयी रथ को विधिवत् सजाकर “महाराजकी जय हो” ! ऐसा कहकर निवेदन किया । कर्ण ने शास्त्रविधि से उस श्रेष्ठ रथ का पूजन किया और उसकी परिक्रमा करके सूर्यदेव की स्तुति की ।

फिर उसने पास ही खड़े हुए मद्रराज शल्य से कहा, “राजन् ! रथ पर बैठिये” । महातेजस्वी शल्य रथ के अग्रभाग पर बैठे । इसके बाद कर्ण भी उस पर सवार हुआ । उस समय वहाँ दोनों तेजस्वी वीरों का स्तुतिगान हो रहा था । महाराज शल्य ने घोड़ों की रासें सँभाली और कर्ण रथ पर बैठकर धनुष की टंकार करने लगा । तब दुर्योधन ने कर्ण से कहा “वीरवर ! मैं समझता था कि महारथी भीष्म और द्रोण, अर्जुन और भीमसेन को मार डालेंगे ।

किन्तु वे इस कर्म को नहीं कर सके । अब तुम या तो धर्मराज को कैद कर लो, या अर्जुन, भीमसेन और नकुल-सहदेव को मार डालो । अच्छा, तुम युद्ध के लिये प्रस्थान करो । तुम्हारी जय हो, कल्याण हो । तुम पाण्डुपुत्रों की सारी सेना को भस्म कर दो” । कर्ण ने दुर्योधन की बात स्वीकार करके राजा शल्य से कहा “महाबाहो ! घोड़ों को बढ़ाइये, जिससे कि मैं अर्जुन, भीम, नकुल-सहदेव और युधिष्ठिर को मार सकूँ ।

आज पाण्डवों के नाश और दुर्योधन की विजय के लिये मैं हजारों तीखे बाण छोडूंगा” । शल्य बोले “सूतपुत्र ! तुम पाण्डवों का अपमान क्यों करते हो ? वे तो समस्त शास्त्रों के पारगामी, महान् धनुर्धर, रण में पीठ न दिखाने वाले, अजेय और अत्यन्त पराक्रमी हैं । वे साक्षात् इन्द्र को भी भयभीत कर सकते हैं । जिस समय तुम गाण्डीव धनुष की वज्र के समान भीषण टंकार सुनोगे उस समय इस प्रकार गाल बजाना भूल जाओगे ।

जिस समय भीमसेन दाँत उखाड़-उखाड़ कर हाथियों की सेना का संहार करेगा उस समय तुम इस प्रकार बातें न बना सकोगे । जिस समय तुम धर्मराज युधिष्ठिर और नकुल-सहदेव को अपने पैने बाणों से शत्रुओं का संहार करते देखोगे उस समय ऐसी कोई बात नहीं कह सकोगे” । संजय ने कहा “राजन् ! उस समय शल्य की बातें वहां उपस्थित किसी को पसंद नहीं आई इसलिए मद्रराज शल्य की इन सब बातों की उपेक्षा करके कर्ण ने उनसे कहा, “अच्छा, अब रथ बढ़ाइये” ।