माँ और बेटी की संतानों में क्या रिश्ता हुआ?


बेताल के फिर से उड़कर वृक्ष पर जा लटकने के बाद भी विक्रमादित्य ने अपना आपा नहीं खोया और धैर्य बनाये रखा | विक्रम फिर से गए, बेताल को वृक्ष से उतारा, अपने कंधे पर लादा और चल दिए तांत्रिक के पास | कुछ समय बाद बेताल ने भी अपना मौन व्रत तोड़ा और विक्रम के धैर्य की प्रशंसा करते हुए उन्हें एक कथा सुनाई |

एक बार पुष्कल नामक नगर में मांडलिक नाम का एक राजा राज करता था । उसकी पत्नी का नाम चडवती था । वह मालव देश के राजा की लड़की थी । चडवती की लावण्यवती नाम की एक कन्या थी । लावण्यवती अपने नाम के अनुरूप अत्यंत सुंदरी थी | जब वह विवाह के योग्य हुई तो राजा के भाई-बन्धुओं ने उसका राज्य छीन लिया और उसे अपने ही देश से निकाल दिया ।

राजा मांडलिक बेचारा क्या करता, वह अपनी रानी चडवती और कन्या लावण्यवती को साथ लेकर मालव देश को चल दिया । रात को वे एक वन में ठहरे । पहले दिन चलकर वे भीलों की नगरी में पहुँचे । राजा ने अपनी रानी और बेटी से कहा कि तुम लोग वन में छिप जाओ, नहीं तो भील तुम्हारा अपहरण कर लेंगे । वे दोनों मांडलिक की आज्ञानुसार वन में चली गयीं । इसके बाद भीलों ने राजा पर हमला किया । राजा ने वीरता से मुकाबला किया, पर अन्त में वह वीर गति को प्राप्त हुआ । भील अपने नगर में चले गये ।

उनके जाने पर राजा की रानी और बेटी जंगल से निकलकर आयीं और राजा को मरा हुआ देखकर बड़ी दु:खी हुईं और रोने लगी । वे दोनों शोक करती हुईं एक तालाब के किनारे पहुँची । उसी समय वहाँ चंडसिंह नाम का एक धनी व्यापारी अपने लड़के के साथ, घोड़े पर चढ़कर, शिकार खेलने के लिए उधर आया । दो स्त्रियों के पैरों के निशान देखकर व्यापारी अपने बेटे से बोला, “अगर ये स्त्रियाँ मिल जाए तो तुम जिससे चाहो, विवाह कर लेना।”

लड़के ने थोड़ा सोच कर कहा, “छोटे पैर वाली छोटी आयु की होगी, अतः उसी से मैं विवाह कर लूँगा । आप बड़ी से विवाह कर लीजियेगा ।” यद्यपि व्यापारी की पत्नी और उसके बेटे की माँ का देहांत काफी पहले ही हो चुका था, किन्तु व्यापारी स्वयं विवाह नहीं करना चाहता था, वह अपने पुत्र के विवाह के लिए चिंतित था पर बेटे के बहुत समझाने बुझाने पर वह इसके लिए तैयार हो गया ।

थोड़ा आगे बढ़ते ही उन्हें वे दोनों स्त्रियां यानी रानी चडवती और उसकी कन्या लावण्यवती दिखाई दीं । व्यापारी ने विनम्रता से उनसे पूछा, “तुम दोनों सुंदरी कौन हो?” रानी चडवती ने अपना परिचय व आपबीती उन दोनों को सुनायी । व्यापारी ने उन्हें उनकी सुरक्षा व सम्मान का वचन दिया व उन्हें अपने घर ले गया ।

घर पर कुछ महीने तक उन स्त्रियों का अतिथि की तरह स्वागत सत्कार करने के बाद उस व्यापारी ने उन स्त्रियों के सामने विवाह का प्रस्ताव रखा जिसे उन दोनों स्त्रियों ने सहर्ष स्वीकार कर लिया | अब संयोग से रानी के पैर छोटे थे, और उसकी पुत्री के पैर बड़े । इसलिए व्यापारी ने रानी की पुत्री लावण्यवती से विवाह किया, और व्यापारी के पुत्र ने रानी चडवती से विवाह किया | इस तरह पुत्री सास बनी और माँ बेटे की बहू । उन दोनों के आगे चलकर कई सन्तानें हुईं ।

इतनी कथा सुना कर बेताल राजा विक्रमादित्य से बोला, “राजन् ! बताइए, इन माँ-बेटी के जो बच्चे हुए, उनका आपस में क्या रिश्ता हुआ?” यह प्रश्न सुनकर राजा विक्रम बड़े फेर में पड़े । उन्होंने बहुत सोचा, पर उन्हें उसका उत्तर न सूझ पड़ा । इसलिए वह चुपचाप शांति से चलते रहे ।

बेताल यह देखकर बोला, “राजन्, कोई बात नहीं है । मैं तुम्हारे धीरज और पराक्रम से प्रसन्न हूँ । मैं अब इस मुर्दे से निकला जाता हूँ । तुम इसे उस तांत्रिक के पास ले जाओ । जब वह कपटी तुम्हें इस मुर्दे को सिर झुकाकर प्रणाम करने को कहे तो तुम कह देना कि पहले स्वयं करके दिखाओ। जब वह सिर झुकाकर बतावे तो तुम उसी समय उसका सिर काट लेना ।

उसका वध करने के पश्चात् तुम सारी पृथ्वी के राजा बन जाओगे । और अगर उसका सिर नहीं काटा तो वह तुम्हारी बलि देकर सिद्धि प्राप्त करेगा, फिर उस नराधम को कोई नहीं रोक पायेगा ।” इतना कहकर बेताल चला गया और राजा विक्रमादित्य मुर्दे को लेकर योगी के पास आये ।