द्रोणाचार्य ने अर्जुन को कौन से अमोघ शक्ति दी, उसका क्या नाम था और क्या-क्या क्षमतायें थी

द्रोणाचार्य ने अर्जुन को कौन से अमोघ शक्ति दीमहाभारत काल में जब द्रोणाचार्यन अर्जुन, भीम, युधिष्ठिर आदि पांडवों तथा दुर्योधन आदि कौरवों को अस्त्र और शस्त्र शिक्षा दे रहे थे तो उनमे में से उन्हें अर्जुन सबसे मेधावी लगे | अर्जुन गुरु द्रोणाचार्य के प्रिय शिष्य थे |

गुरु द्रोणाचार्य महान अस्त्र शस्त्रों के ज्ञाता थे | उन्हें ऐसी-ऐसी शक्तियां प्राप्त थी जिनसे समूचे ब्रह्माण्ड में हाहाकार मचाया जा सके | अपनी एकाग्रता, युद्ध कौशल और विनम्रता की वजह से अर्जुन उनके प्रिय पात्र बन चुके थे | उन्होंने अर्जुन को वो सारी दिव्य शक्तियां सौंपने और सिखाने की सोची |

एक दिन अर्जुन को बुलाकर उन्होंने कहा, “देखो उस निशाने की ओर, चूकना मत । धनुष चढ़ाकर मेरी आज्ञा की बाट जोहो” । क्षण भर ठहरकर आचार्य ने पूछा, “क्या तुम इस वृक्ष को, गीध को और मुझे देख रहे हो” ?

अर्जुन ने कहा “भगवन् ! मैं गीध के अतिरिक्त और कुछ नहीं देख रहा हूँ” । द्रोणाचार्य ने थोड़ा परिहास की मुद्रा में पूछा, “अच्छा अर्जुन ! भला बताओ तो, गीध की आकृति कैसी है” ? अर्जुन बोले, ‘भगवन् ! मैं तो केवल उसका सिर देख रहा हूँ । आकृति का मुझे पता नहीं” ।

द्रोणाचार्य का रोम-रोम आनन्द की बाढ़ से पुलकित हो गया । वे बोले, “बेटा ! बाण चलाओ” । अर्जुन ने तत्काल बाण से गीध का सिर काट गिराया । अर्जुन की लक्ष्य भेदन की सफलता देखकर आचार्य ने निश्चय कर लिया था कि द्रुपद के द्वारा उन्हें दिए गए विश्वासघात का बदला अर्जुन ही ले सकेगा ।

एक दिन गंगास्नान करते समय एक विशालकाय मगर ने द्रोणाचार्य की जाँघ पकड़ ली । द्रोण स्वयं उससे छूट सकते थे, फिर भी उन्होंने शिष्यों से कहा कि “इस मगर को मारकर मेरा जीवन बचाओ” । उनकी बात पूरी होने के पहले ही अर्जुन ने पाँच पैने बाणों से पानी में डूबे मगर को बेध दिया । और सभी राजकुमार हक्के-बक्के होकर अपने-अपने स्थान पर ही खड़े रहे ।

अर्जुन के बाण से मगर मर गया और आचार्य की जाँघ छूट गयी । इससे प्रसन्न होकर द्रोणाचार्य बोले, “बेटा अर्जुन ! मैं तुम्हें ब्रह्मशिर नाम का एक दिव्य अस्त्र प्रयोग और संहार के साथ बतलाता हूँ । ध्यान से इसको ग्रहण करो, यह अमोघ है ।

इसे कभी किसी साधारण मनुष्य या योद्धा पर न चलाना । यह सारे जगत को जला डालने को शक्ति रखता है” । अर्जुन ने हाथ जोड़कर उस अस्त्र को स्वीकार किया । द्रोणाचार्य ने कहा, “अब पूरी पृथ्वी पर तुम्हारे समान कोई धनुर्धर न होगा” ।

उसके बाद ब्रह्मशिर के सामान ही द्रोणाचार्य ने अर्जुन को कई दिव्य, अति दिव्य अस्त्र दिए जिनका बाद में चल कर अर्जुन ने महाभारत युद्ध में बखूबी प्रयोग किया |