राजा विक्रमादित्य के स्वर्ण सिंहासन का क्या हुआ, सिंहासन बत्तीसी की अंतिम कथा

सिंहासन बत्तीसी की putliसिंहासन बत्तीसी के स्वर्ण सिंहासन की अंतिम पुतली थी रानी रूपवती

राजा विक्रमादित्य के स्वर्ण सिंहासन की अंतिम यानी बत्तीसवीं पुतली का नाम था रानी रूपवती | बत्तीसवें दिन जब रानी रूपवती ने राजा भोज को स्वर्ण सिंहासन पर बैठने की कोई रुचि नहीं दिखाते हुए देखा तो उसे बड़ा अचरज हुआ । उसने जानना चाहा कि राजा भोज में आज, पहले वाली व्यग्रता क्यों नहीं दिखाई दे रही है ।

राजा भोज ने रानी रूपवती से कहा कि राजा विक्रमादित्य के देवताओं वाले गुणों की कथाएँ सुनकर उन्हें ऐसा लगा कि इतनी विशेषताएँ एक मनुष्य में असम्भव हैं और वो ये मानते हैं कि राजा विक्रमादित्य की तुलना में उनमें बहुत सारे दुर्गुण हैं । अत: उन्होंने सोचा है कि इस स्वर्ण सिंहासन को फिर वैसे ही उस स्थान पर गड़वा देंगे जहाँ से इसे निकाला गया है ।

सिंहासन बत्तीसी की सारी पुतलियाँ एक साथ आ गयी 

राजा भोज का इतना बोलना था कि सारी पुतलियाँ अपनी रानी यानि रानी रूपवती के पास आ गईं । उन्होंने हर्षित होकर राजा भोज को उनके निर्णय के लिए धन्यवाद दिया । पुतलियों ने उन्हें बताया कि आज से वे भी मुक्त हो गईं । आज से यह सिंहासन बिना पुतलियों का हो जाएगा ।

उन्होंने राजा भोज को विक्रमादित्य के गुणों का आंशिक स्वामी होना बतलाया तथा कहा कि इसी योग्यता के चलते ही उन्हें इस सिंहासन के दर्शन हो पाये । उन्होंने यह भी बताया कि हम पुतलियों से वंचित होने के बाद इस सिंहासन की जीवन्तता समाप्त हो जायेगी इसलिए आज से इस सिंहासन की आभा कम पड़ जाएगी और धरती की सारी चीजों की तरह इसे भी पुराना पड़कर नष्ट होने की प्रक्रिया से गुज़रना होगा ।

सिंहासन बत्तीसी कीसिंहासन बत्तीसी की बत्तीसों पुतलियां अप्सराओं के समान सुन्दर थीं 

इतना कहकर उन अप्सराओं के समान पुतलियों ने राजा भोज से विदा ली और आकाश की ओर उड़ गईं । पलक झपकते ही सारी की सारी पुतलियाँ आकाश में विलीन हो गई । पुतलियों के जाने के बाद राजा भोज ने राज कर्मचारियों को बुलवाया तथा गड्ढा खुदवाने का निर्देश दिया । जब मजदूर बुलवाकर गड़ढा खोद डाला गया तो वेद मन्त्रों का पाठ करवाकर पूरी प्रजा की उपस्थिति में उस अद्भुत सिंहासन को गड्ढे में दबवा दिया ।

मिट्टी डालकर फिर वैसा ही टीला निर्मित करवाया गया जिस पर बैठकर वह चरवाहा अपने फैसले देता था । लेकिन नया टीला वह चमत्कार नहीं दिखा सका जो पुराने वाले टीले में था । सिंहासन बत्तीसी के कुछ संस्करणों में इसके बाद कि एक कथा मिलती है किन्तु उसमे सत्यता के अंश संदिग्ध हैं इसलिए हमने उनका उद्धरण यहाँ नहीं किया है |

सिंहासन बत्तीसी की रचना का इतिहास

मूल रूप से सिंहासन बत्तीसी संस्कृत की रचना मानी जाती है। सिंहासनद्वात्रिंशति का ही हिन्दी रूपांतर वास्तव में सिंहासन बत्तीसी है, जिसे संस्कृत में द्वात्रिंशत्पुत्तलिका के नाम से भी जाना जाता है। प्राचीन ग्रंथों की माने तो संस्कृत में भी इसके मुख्यतः दो संस्करण हैं। पहला संस्करण जिसे उत्तरी संस्करण के नाम से भी जाना जाता है, “सिंहासनद्वात्रिंशति” के नाम से प्रसिद्ध है।

दूसरा संस्करण जिसे दक्षिणी संस्करण के नाम से भी जाना जाता है, “विक्रमचरित” के नाम से उपलब्ध है। पहले संस्करण के रचयिता क्षेमेन्द्र मुनि कहे जाते हैं। बंगाल की संस्कृति में भट्टराव के द्वारा प्रस्तुत संस्करण भी इसी के समरूप माना जाता है। हांलाकि इसका दक्षिणी रूप ही जगत में अधिक लोकप्रिय हुआ।

सिंहासन बत्तीसी की लोकप्रियता बेमिसाल है 

प्राचीन भारतीय साहित्य में सिंहासन बत्तीसी भी वेताल पच्चीसी या वेतालपंचविंशति की भांति ही बहुत लोकप्रिय हुआ। भारतीय लोकभाषाओं में इसके बहुत पहले से ही अनुवाद होते रहे हैं और ये अत्यंत रोचक साहित्य, पौराणिक कथाओं की तरह भारतीय समाज में मौखिक परम्परा के रूप में रच-बस गए।

वैसे तो यही माना जाता है कि इन कथाओं की रचना “वेतालपंचविंशति” या “वेताल पच्चीसी” के बाद हुई, लेकिन निश्चित रूप से इनके रचनाकाल के बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता है। कुछ लोग यह भी मानते हैं कि यह कथा श्रंखला, राजा चंद्रगुप्त विक्रमादित्य के बारे में है जो कि गुप्त वंश के महान सम्राट थे। किन्तु यह सत्य नहीं है। दोनों सम्राटों के कालखंड के बीच में कम से कम 300 वर्षों का अंतर है।

सिंहासन बत्तीसी की अंतिम कथा में क्या था 

सिंहासन बत्तीसी के मूल संस्करण में अंतिम कथा यहीं तक वर्णित है | धरती में समाने के बाद उस रहस्यमय स्वर्ण सिंहासन का क्या हुआ, क्या फिर कभी वो किसी को प्राप्त हुआ, वो बत्तीस पुतलियाँ कौन थीं और उस अद्भुत सिंहासन से कैसे जुड़ीं, यह सब कुछ आज भी रहस्य के आगोश में है |

जनसामान्य इसे आज भी कथा, कहानी या गल्प समझता है लेकिन किसी को क्या पता कि यह स्वर्णिम भारत के इतिहास का वह पन्ना हो जिसके तथ्य, समय रुपी बारिश की बूँदें झुठलाने पर तुली हों | या कदाचित प्रतीक्षा कर रही हों उस शासक की जो आने वाले समय में, समूची धरती पर सनातन धर्म की कीर्ति पताका फहराए |