जगन्नाथ भगवान जी की अवतार-कथा

पुरूषोत्तम भगवान श्री जगन्नाथ जी की अवतार-कथाउत्कल प्रदेश पुरूषोत्तम अवतार प्रभु श्री जगन्नाथ जी की पुण्यलीलायों की भूमि है। नित्य लीला से युक्त उत्कल प्रदेश अपनी विश्ववन्द्य पुरूषोत्तम – संस्कृति के निमित्त विश्व में प्रसिद्ध है।

पार्वती वल्लभ , श्री शंकर , गगनविलासी श्री सूर्य नारायण एवं वैकुण्ठ निवासी श्री विष्णु आदि अवतार जगत की सुरक्षा के लिये ही भुवनेश्वर , कोर्णाक (अर्कक्षेत्र) एवं श्री नीलांचल (श्री पुरीधाम) इत्यादि स्थानों में आविर्भूत हुए हैं।

उत्कल के परमाराध्य श्री जगन्नाथ – अवतार की महिमा कथा अनंत और अनिर्वचनीय है। प्रभु श्री जगन्नाथ सर्व व्यापक, सर्व शक्तिमान, सर्वज्ञ तथा सर्वान्तर्यामी भगवदवतार श्रेष्ठ हैं।

श्री जगन्नाथ जी अपनी सृष्टि की सुरक्षा के लिये , अधर्मनाश के लिये भिन्न-भिन्न अवतारों में बहुत कुछ कर चुके हैं , किंतु अपाणिपाद जगन्नाथ – अवतार में वह अपनी बड़ी – बड़ी आंखों से देख रहे हैं कि हम मानव उनकी प्रदत्त शिक्षा का कैसा उपयोग कर रहे हैं ?

अतः कर्मेन्द्रियविहीन दारूभूत जगन्नाथ – अवतार अब कुछ करना नहीं चाहते हैं। वे केवल नीरवद्रष्टा हैं , अपनी बड़ी – बड़ी आंखों से हमें देख रहे हैं –  अपने कार्यों के लिये (स्वधर्म पालन में) हम सक्षम हैं अथवा अक्षम (अनुपयुक्त) हैं।

श्री जगन्नाथ जी ने काष्ठ का विग्रह अवतार क्यों धारण किया ? इस विषय में ऐसी कथा सुनी जाती है कि एक बार भक्तों के अधीन होकर और भक्तों की श्रेष्ठता देखते हुए भगवान ने प्रतिज्ञा की थी कि मैं चित्र रथ गंधर्व को न मार डालूं तो मेरा कलियुग में काष्ठ का विग्रह हो जाये।

उस, ऋषि के प्रति अपराध करने वाले, गंधर्व को अर्जुन और सुभद्रा ने अभयदान दिया। भगवान ने भक्तों के सामने हार मानी और वे श्री जगन्नाथ में काष्ठ विग्रह के रूप में प्रतिष्ठित हो गए। इस संबंध में और भी कई कथाएं हैं।

भगवान जगन्नाथ अजन्मा और सर्व व्यापक होने पर भी दारूविग्रह अवतार के रूप में अपनी अदभुत लीला दर्शाते आ रहे हैं। भगवान ब्रह्म दारू की दिव्य अवतार कथा यहां संक्षेप में प्रस्तुत है –

ब्रह्म पुराण की कथा

सत्ययुग की बात है। इन्द्रद्युम्न नामक इन्द्रसदृश पराक्रमी , अर्थशास्त्र निपुण , ब्राह्मण भक्त , सत्यवादी, सर्व सदगुण सम्पन्न एक राजा थे। मालवा देश की अवन्ती नगरी उनकी राजधानी थी।

वे प्रजाओं का पुत्रवत पालन करते थे। एक दिन उनके मन में यह विचार उत्पन्न हुआ कि मैं किस प्रकार भोग मोक्षदाता योगेश्वर श्री हरि की आराधना करूं?

आराधना के लिये मैं किस तीर्थ अथवा किस आश्रम में जाऊं? बहुत समय तक विचार कर राजा इन्द्रद्युम्न ने सर्वोत्तम तीर्थ पुरूषोत्तम क्षेत्र में जाने का निश्चय किया । राजा सैन्य – सामन्त – पुरोहित आदि के सहित ध्वजा पताकाओं से सुसज्जित रथों पर आरूढ़ हो दक्षिण समुद्र की ओर चल पड़े।

उस अनंतरंग कुलरमणीय समुद्र का दर्शन कर वह विस्मयाभिभूत हो गये और वहीं समुद्र तट पर एक मनोज्ञ दिव्य पवित्र स्थान में राजा ने विश्राम किया। त्रिभुवन प्रख्यात श्री क्षेत्र में महाराज इन्द्रद्युम्न ने विविध सुरम्य स्थानों के दर्शन किये।

अवतार श्रेष्ठ जगन्नाथ जी के उस मानस तीर्थ क्षेत्र में पहले इन्द्र नीलमणि निर्मित प्रतिमा विराजित थी , जिसे स्वयं भगवान ने छिपा दिया था । भगवान ने इन्द्र नीलमणि से बनी उस प्रतिमा को इसलिये तिरोहित कर दिया था क्योंकि कि उस प्रतिमा का दर्शन कर पृथ्वी के सभी मनुष्य भगवद्धाम में चले जाते थे।

सब लोगों को वैकुण्ठ धाम में जाते देख धर्मराज यमराज ने भगवान के पास आकर उनकी स्तुति की और कहा “हे प्रभु! इस विख्यात पुरूषोत्तम तीर्थ में इन्द्र नीलमणि से बनी आपकी जो श्रेष्ठ प्रतिमा है, वह सब कामनाओं से सभी मनुष्यों को मुक्त कर देने वाली है, उसका दर्शन कर सभी मनुष्य कामना रहित हो कर आपके श्वेतधाम में चले जाते हैं।

अतः मेरी धर्म मर्यादा जो आपने नियत की है , वह निष्ट हो गयी है। हे प्रभु! कृपा करके आप अपनी प्रतिमा को तिरोहित कर दें। तब भगवान ने चारों ओर से बालुका से उस प्रतिमा को आवृत कर लिया ।

राजा इन्द्रद्युम्न ने दृढ़ संकल्प किया कि मैं ऐसा प्रयत्न करूंगा, जिससे सत्य पराक्रमी भगवान विष्णु मुझे साक्षात दर्शन देंगे। अनन्य भाव से श्री जगदीश्वर के पदारविन्दों में सर्वस्व समर्पणपूर्वक यज्ञ , दान , तपस्या , उपासना और उपवासादि करने के लिये एवं अवतार कथा प्रसारार्थ भगवन्मंदिर निर्माण करने के लिये दृढ़ संकल्प होकर राजा अपने कर्तव्य में लग गये।

मंदिर निर्माण कार्य प्रारम्भ हुआ। अश्वमेध यज्ञ तथा दान – पुण्यादि कर्म सब कर लिये गये। पुरूषोत्तम प्रासाद निर्माण का कार्य भी विधिपूर्वक् सम्पन्न हो गया। अब राजा को दिन रात भगवत्प्रतिमा के लिये चिंता सताने लगी।

वह सोचने लगे ‘सृष्टि स्थिति प्रलयंकारी लोक पावन पुरूषोत्तम अवतार का मैं कैसे दर्शन कर सकूंगा ? कैसे विष्णु प्रतिमा का निर्माण किया जा सकेगा’ ? पांचरात्र की विधि से उन्होंने पुरूषोत्तम अवतार पूजन, कथा, कीर्तन करके अनेक भावमयी प्रार्थनाएं कीं।

स्तुति प्रार्थना के उपरान्त राजा ने सर्वकामप्रदात्ता सनातन पुरूष अवतार श्रेष्ठ जगन्नाथ वासुदेव को प्रणाम किया एवं वहां धरती पर कुश और वस्त्र बिछाकर चिन्तामग्न से हो गये।

अवतार कथा चिंतन ही राजा का जीवन व्रत था। देवाधिदेव भगवान ने राजा को स्वप्न जगत में अपने शंख – चक्र – गदा – पद्म सहित स्वरूप का दर्शन कराया एवं कहा “हे राजन! आप धन्य हो , आपके दिव्य यज्ञ, भक्ति और श्रद्धा – विश्वास से मैं संतुष्ट हूं।

आप चिंतित न हो , आपको यहां जो सनातनी प्रतिमा छिपी हुई है उसकी प्राप्ति का उपाय बताता हूं , ध्यानपूर्वक सुनिए – आज की रात बीतने पर सूर्योदय के समय समुद्र तट पर चले जाईये। वहां समुद्र प्रान्त में एक विशाल वृक्ष सुशोभित है , जिसका कुछ अंश जल में है और कुछ अंश स्थल पर है। उस वृक्ष की विशेषता ऐसी है की वह समुद्र की लहरों से आहत होने पर भी कम्पित नहीं होता है।

आप अपने हाथ में तीक्ष्ण अस्त्र लेकर अकेले ही वहां जाना और उस वृक्ष को काट डालना। वहां आपको कुछ अदभुत वस्तु दिखायी देगी। विमर्श कर उसी से दिव्य प्रतिमा का निर्माण करने का आग्रह करना। अतः आप अत्यधिक चिंता करना त्याग दे”।

तत्पश्चात श्री हरि वहाँ से अदृश्य हो गये और राजा विस्मित हो उठे। वह प्रातः उठकर समुद्र तट पर पहुंच गए एवं स्वप्नानुसार तेजस्वी वृक्षराज को देख कर अत्यन्त प्रसन्न हो उठे। उन्होंने उस वृक्ष को काट गिराया और फिर दो टुकड़े करने का विचार करने लगे।

काष्ठ के दो टुकड़े करते समय जब उन्होंने काष्ठ को भलीभांति निरीक्षण किया तो उन्हें एक अदभुत दृश्य दिखायी दिया। उन्हें सहसा दो ब्राह्मण वेशधारी दिव्य पुरूष दिखायी दिये जो  उनकी ओर आ रहे थे।

ब्राह्मणों ने राजा के समीप आकर पूछा “हे राजन आपने किस वजह से इस वनस्पति को काट गिराया है” ? राजा ने कहा “आद्यन्तहीन अवतार की आराधना के लिये मैं भगवान विष्णु की प्रतिमा का निर्माण करना चाहता हूं। इसके लिए स्वप्न में भगवान ने मुझे इस वनस्पति को काट गिराने के लिए प्रेरित किया है”।

यह सुनते ही विप्ररूपधारी भगवान जगन्नाथ ने सहर्ष कहा “हे राजन! आपका विचार अत्युत्तम है तथा मेरे ये साथी श्रेष्ठ शिल्पी विश्वकर्मा हैं , जो मेरे निदेशानुसार प्रतिमा निर्माण करेंगे”। तब विश्वकर्मा ने भगवदीय आज्ञा के अनुसार प्रतिमाओं का निर्माण कर दिया।

जिनमें पहली मूर्ति बलराम जी की , दूसरी श्री जगन्नाथ जी की एवं तीसरी भगवान वासुदेव की बहन सुभद्रा जी की थी। राजा ने उनसे पूछा की ‘इनमे आपकी मूर्ति क्यों नहीं है’ ? तब भगवान ने कहा “मैं देवता , यक्ष , दैत्य , इन्द्र , रूद्र , ब्रह्मा आदि में कोई भी नहीं हूं। मुझे बस पुरूषोत्तम अवतार ही समझो।

अनंत बलशाली, सर्वपीड़ाहारी मैं सभी का आराध्य हूं। मैं वही हूं जो वेदों में तथा धर्मशास्त्रों में जिसका उल्लेख हुआ है। संसार में जो कुछ वाणी द्वारा वर्णनीय है , वह मेरा ही स्वरूप है।

इस चराचर विश्व में मेरे सिवा कुछ भी नहीं है”। भगवत्साक्षात्कार से कृतकृत हो बुद्धिमान नरेश ने श्री बलराम , जगदगुरू जगन्नाथ एवं वरदात्री देवी सुभद्रा को मणिकांचनजटित विमान आकार कल्याणयान में बिठाकर बड़ी धूमधाम से मंत्रियों सहित पुण्य स्थान में प्रवेश कराया और यथासमय शुभ मुर्हूत में प्रतिष्ठा करायी।

सर्वोत्तम प्रासाद में राजा ने वेदोक्त विधि से प्रतिष्ठित कर सब विग्रहों को स्थापित किया एवं नियमित अवतार कथा – श्रवणपूर्वक सर्वस्व त्यागी होकर अंततः परम पद को प्राप्त किया।