विक्रम बेताल की कहानियां, किसका पुण्य बड़ा, राजा का या सेवक का


विक्रम बेताल की कहानियां, किसका पुण्य बड़ा, राजा का या सेवक काराजा विक्रमादित्य जब बेताल को पीठ पर लाद कर ले चले तो मार्ग में बेताल ने उन्हें अगली कथा सुनायी | बेताल ने कहा मिथलावती नाम की एक नगरी थी । उसमें गुणधिप नाम का राजा राज्य करता था । उसकी सेवा करने के लिए दूर देश से एक राजकुमार आया। वह राजा से मिलने की बराबर कोशिश करता रहा, लेकिन राजा से उनकी भेंट न हुई । जो कुछ वह अपने साथ लाया था, वह सब बराबर हो गया।

एक दिन की बात है, राजा शिकार खेलने चला। राजकुमार भी साथ हो लिया । चलते-चलते राजा एक वन में पहुँचा । वहाँ उसके नौकर-चाकर बिछुड़ गये । राजा के साथ अकेला वह राजकुमार रह गया। उसने राजा को रोका। राजा ने उसकी ओर देखा तो पूछा, “तू इतना कमजोर क्यों हो रहा है।” उसने कहा, “इसमें मेरे कर्म का दोष है। मैं जिस राजा के पास रहता हूँ, वह हजारों को पालता है, पर उसकी निगाह मेरी और नहीं जाती।

राजन छह कार्य मनुष्य को निम्न स्तर का बनाती है, खोटे नर की प्रीति, बिना कारण हँसी, स्त्री से विवाद, असज्जन स्वामी की सेवा, गधे की सवारी और बिना संस्कृति की भाषा । और हे राजा, ये पाँच चीज़ें मनुष्य के पैदा होते ही विधाता उसके भाग्य में लिख देता है—आयु, कर्म, धन, विद्या और यश। राजन्, जब तक मनुष्य का पुण्य उदय रहता है, तब तक उसके बहुत-से दास रहते हैं।

जब पुण्य घट जाता है तो भाई भी बैरी हो जाते हैं। पर एक बात है, स्वामी की सेवा निष्फल नहीं जाती। कभी-न-कभी फल मिल ही जाता है।” यह सुन राजा के मन पर उसका बड़ा असर हुआ। कुछ समय घूमने-घामने के बाद वे नगर में लौट आये। राजा ने उसे अपनी नौकरी में रख लिया। उसे बढ़िया-बढ़िया कपड़े और गहने दिये।

एक दिन राजकुमार किसी काम से कहीं गया। रास्ते में उसे देवी का मन्दिर मिला। उसने अन्दर जाकर देवी की पूजा की। जब वह बाहर निकला तो देखता क्या है, उसके पीछे एक सुन्दर स्त्री चली आ रही है। राजकुमार उसे देखते ही उसकी ओर आकर्षित हो गया। स्त्री ने कहा, “पहले तुम कुण्ड में स्नान कर आओ। फिर जो कहोगे, सो करूँगी।”

इतना सुनकर राजकुमार कपड़े उतारकर जैसे ही कुण्ड में घुसा और गोता लगाया कि अपने नगर में पहुँच गया। उसने जाकर राजा को सारा हाल कह-सुनाया। राजा ने कहा, “यह अचरज मुझे भी दिखाओ।” दोनों घोड़ों पर सवार होकर देवी के मन्दिर पर आये। अन्दर जाकर दर्शन किये और जैसे ही बाहर निकले कि वह स्त्री प्रकट हो गयी। राजा को देखते ही बोली, “महाराज, मैं आपके रूप पर मुग्ध हूँ। आप जो कहेंगे, वही करुँगी।”

राजा ने कहा, “ऐसी बात है तो तू मेरे इस सेवक से विवाह कर ले।”

स्त्री बोली, “क्षमा करें राजन किन्तु मुझसे यह न हो पायेगा क्योंकि मै तो आपको चाहती हूँ|” राजा ने कहा, “सज्जन लोग जो कहते हैं, उसे निभाते हैं। तुम अपने वचन का पालन करो।” स्त्री की सहमति के बाद राजा ने उसका विवाह अपने सेवक से करा दिया। इतना कहकर बेताल बोला, “हे राजन्! यह बताओ कि राजा और सेवक, दोनों में से किसका काम बड़ा हुआ?”

राजा ने कहा, “नौकर का।” बेताल ने पूछा, “वह कैसे?” राजा बोला, “उपकार करना राजा का तो धर्म ही था। इसलिए उसके उपकार करने में कोई विशेष बात नहीं हुई। लेकिन जिसका धर्म नहीं था, उसने उपकार किया तो उसका काम बढ़कर हुआ?”

राजा विक्रमादित्य के मुख से इतना सुनकर बेताल फिर पेड़ पर जा लटका और राजा जब उसे पुन: लेकर चला तो उसने आठवीं कहानी सुनायी।