पंचतन्त्र की कहानियाँ-शेर का मंत्री सियार और मूर्ख गधा

पंचतन्त्र की कहानियाँ-शेर का मंत्री सियार और मूर्ख गधाजंगल में एक शेर रहता था । शेर वृद्ध हो गया था, वह शिकार करने में असमर्थ हो गया था, अतः उसे कभी-कभी भूखा ही रह जाना पड़ता था । शेर ने सोचा, इस तरह कैसे निर्वाह होगा ? कोई ऐसा उपाय करना चाहिए, जिससे प्रतिदिन खाने के लिए शिकार मिल जाया करे । शेर ने किसी को अपना सहायक बनाने का निश्चय किया, पर वह सहायक बनाए, तो किसे बनाए ? शेर सोच-विचार करने लगा ।

शेर की दृष्टि चालाक सियार पर गई । उसने सोचा, इस जंगल के जानवरों में सियार ही सबसे अधिक बुद्धिमान है । अतः उसी को अपना सहायक बनाना चाहिए । शेर ने सियार को बुलाकर कहा, “मैं तुम्हारी बुद्धिमानी पर अधिक प्रसन्न हूं । तुम्हें अपना मंत्री बनाना चाहता हूं । क्या तुम मेरा मंत्री बनना स्वीकार करोगे ?” शेर की बात सुनकर सियार भयभीत हो उठा, क्योंकि वह शेर के स्वभाव से परिचित था ।

उसने सोचा, अवश्य कोई न कोई बात है । तभी शेर मुझे अपना मंत्री बना रहा है । यदि मैं इसकी बात नहीं मानता, तो यह क्रुद्ध हो जाएगा । इसे क्रुद्ध करना ठीक नहीं । इसे तो चालाकी से ही परास्त करना चाहिए । सियार बोला, “आप जंगल के राजा हैं । आप मुझे अपना मंत्री बनाएंगे, यह तो मेरे लिए गौरव की बात है । आपकी सेवा में मेरा जीवन व्यतीत हो, इससे बढ़कर हर्ष की बात मेरे लिए क्या हो सकती है ?”

शेर ने सियार को मंत्री बना लिया । सियार मंत्री के रूप में काम-काज करने लगा | शेर ने सियार से कहा, “मैं तुम्हें एक काम सुपुर्द करता हूं | तुम प्रतिदिन मेरे लिए भोजन का प्रबंध किया करो । जाओ, कहीं से भी ढूंढकर मेरे लिए भोजन ले आओ ।” सियार शेर को प्रणाम करके भोजन की खोज में निकल पड़ा |

कुछ दूरी पर एक हृष्ट-पुष्ट गधा घास चर रहा था । गधे को देखकर सियार ने सोचा बस, इसी को शेर के पास ले चलना चाहिए । यह बड़ा मूर्ख है । शीध्र ही मेरी बातों में आ जाएगा । सियार गधे के पास जा पहुंचा । बोला, “गधे भाई, मैं शेर का दूत हूं । तुम्हारे लिए एक शुभ समाचार लाया हूं । जंगल के राजा शेर तुम्हें अपना महामंत्री बनाना चाहते हैं । चलो, मेरे साथ शेर के पास चलो और उनके महामंत्री बनकर मौज उड़ाओ ।”

गधे ने आश्चर्य के साथ कहा, “जंगल के राजा मुझे महामंत्री बनाएंगे ! यह क्या कह रहे हो? मैं तो जाति का गधा हूं, मूर्खता के लिए प्रसिद्ध हूं । मैं भला महामंत्री कैसे बन सकता हूं?” सियार बोला, “यह तुम क्या कह रहे हो, गधेजी? तुम अपने को मूर्ख बता रहे हो ! अरे, तुम से बढ़कर बुद्धिमान और परिश्रमी तो कोई खोजने पर भी नहीं मिलेगा ।

जंगल के राजा ने तुम्हारी बुद्धिमानी पर प्रसन्न होकर ही तुम्हें महामंत्री बनाने का निश्चय किया है । मेरी बात मानो और चलो, शेर का महामंत्री बनकर सुख भोगो।” मूर्ख गधा अपनी प्रशंसा सुनकर फूल उठा । वह सियार की बात को सच मानकर, उसके साथ चल पड़ा । सियार जब गधे को लेकर शेर के पास पहुंचा, तो मोटे-ताजे गधे को देखकर शेर प्रसन्न हुआ ।

उसने मन ही मन सियार की प्रशंसा करके सोचा, इसका मांस खाने में बड़ा मजा आएगा । गधा शेर से कुछ दूर पर ही खड़ा हो गया था । भय के कारण उससे शेर के पास जाने का साहस नहीं हो रहा था । उधर शेर भूखा था । मोटे-ताजे गधे को देखकर उसके मुंह में पानी भी आ गया था । वह अपने को रोक नहीं सका, स्वयं गधे के पास जा पहुंचा । शेर भूख से व्याकुल हो रहा था । वह गधे पर झपटने के लिए तैयार हो गया ।

शेर की मंशा भांपकर गधा भाग खड़ा हुआ । सियार ने गधे को रोकने का बड़ा प्रयत्न किया, पर वह रुका नहीं । शेर बोला, “मंत्री जी, गधा तो भाग गया । मैं बड़ा भूखा हूं, किसी प्रकार उसे फिर लाओ ।” सियार ने उत्तर दिया, “महाराज, आपने जल्दबाजी करके सारा गुड़ गोबर कर दिया ।

आपको गधे के पास नहीं जाना चाहिए था । आप चुपचाप अपनी जगह पर बैठे रहते । मैं स्वयं गधे को आपके पास ले जाता । खैर, जो हो गया, सो हो गया । मैं आपकी आज्ञानुसार पुनः गधे को बुलाने जा रहा हूं । पर याद रखिए, इस बार जल्दबाजी मत कीजिएगा ।”

सियार गधे को बुलाने के लिए पुन: चल पड़ा । कुछ दूर पर उसे गधा चरता हुआ दिखाई पड़ा । सियार ने गधे के पास जाकर कहा, “गधेजी, आप भाग क्यों आए?” गधा बोला, “सियार भाई, भाग न आता तो क्या करता? शेर तो मुझे मारकर खा जाना चाहता था ।”

सियार बोला, “बिलकुल झूठ । यदि शेर तुमको मारना चाहता, तो तुम भागकर भी नहीं बच सकते थे । शेर तुम्हारे पीछे दौड़कर तुम्हें पकड़कर खा सकता था । सच बात तो यह है, शेर तुम पर बड़ा प्रसन्न था । वह तुम्हारा स्वागत करने के लिए तुम्हारे पास गया था |

मूर्ख गधे के मन मे प्रशसा से गर्व पैदा हो गया | उसने अपने-आपको भूलकर सियार की बात सच मान ली । वह सियार के साथ शेर के पास जाने के लिए फिर तैयार हो गया । सियार अपनी सफलता पर बड़ा प्रसन्न हुआ ।

वह गधे को साथ लेकर दूसरी बार शेर के पास पहुंचा | इस बार गधे को देखकर भी शेर चुपचाप अपने स्थान पर बैठा ही रह गया । सियार ने गधे से कहा, “गधेजी, आपको जंगल के राजा के पास जाकर उन्हें प्रणाम करना चाहिए और उनसे कहना चाहिए कि आप महामंत्री बनने के लिए तैयार हैं।”

सियार की बात मानकर गधा ज्यों ही शेर के पास गया, शेर ने उसे दबोच लिया । उसने पंजों से गला दबाकर गधे का काम तमाम कर दिया । गधा जमीन पर गिर पड़ा । सियार ने शेर से कहा, “महाराज, आप जंगल के राजा हैं । आपको स्नान-ध्यान करने के पश्चात् भोजन करना चाहिए ।”

शेर को अपने बल का बड़ा गर्व था । उसने सोच रखा था कि सियार उसका कुछ बिगाड़ नहीं सकता । अतः उसने सियार की बात सुनकर कहा, “अच्छी बात है । मैं स्नान करने जा रहा हूं । जब तक मैं लौट न आऊ, तुम गधे की लाश की रखवाली करते रहना ।”

सियार बोला. “आप निश्चिंत होकर जाइए महाराज ! मेरे रहते गधे की लाश को कोई छू तक नहीं सकेगा ।” शेर स्नान करने के लिए चला गया । सियार मन ही मन सोचने लगा, शेर को और भी अधिक मूर्ख बनाना चाहिए । उसे अपने बल का बड़ा गर्व है । वह भी क्या समझेगा कि किसी सियार से उसकी भेंट हुई थी ।

सियार ने मन ही मन कुछ सोचकर गधे का सिर तोड़कर उसके भीतर से उसका दिमाग निकाल कर खा लिया | शेर जब स्नान करने लौटा, तो भूख से व्याकुल हो रहा था वह | गधे की खोपड़ी पर ध्यान न देकर उसका मांस खाने लगा । जब पेट कुछ भर गया, तो उसका ध्यान खोपड़ी की ओर गया । वह सियार की ओर देखता हुआ बोला, “मंत्रीजी, गधे का दिमाग कहां गया? मैं तो उसके दिमाग को खाना चाहता था ।”

सियार ने उत्तर दिया, “महाराज, आप भी कितने भोले हैं ! गधे के सिर में दिमाग था ही नहीं । यदि उसके सिर में दिमाग होता, तो वह आपके पास आता क्यों ?” भूखे और बल के गर्व से चूर शेर ने सियार की यह बात सच मान ली कि गधे के सिर में दिमाग नहीं था । बात तो सच ही थी ।

गधे के सिर में दिमाग नहीं था । अर्थात् बुद्धि नहीं थी । यदि बुद्धि होती तो वह सियार की बात मानकर कदापि शेर के पास न जाता । मूर्ख और बुद्धिहीन मनुष्य इसी प्रकार लोभ में फंसकर हानि उठाते हैं |

कहानी से शिक्षा

मूर्ख मनुष्य शीघ्र ही दूसरों की बातों पर विश्वास कर लेते हैं । जिसके मन में घमंड होता है, उसे फंसाना कठिन नहीं होता, यदि बुद्धि का सहारा लिया जाए, तो उसके द्वारा बलवानों पर भी विजय प्राप्त की जा सकती है ।