सिंहासन बत्तीसी की सातवीं पुतली कौमुदी ने, विक्रमादित्य की पिशाचिनी से मुलाकात और उसके दिव्य चमत्कारी, अन्नपूर्णा पात्र की कथा सुनायी


सिंहासन बत्तीसी की सातवीं पुतली कौमुदी ने, विक्रमादित्य की पिशाचिनी से मुलाकात विक्रमादित्य के स्वर्ण सिंहासन ने राजा भोज की नींद उड़ायी हुई थी | वे जल्द से जल्द उस पर विराजमान होना चाह रहे थे | लेकिन उस स्वर्ण सिंहासन की पुतलियाँ ऐसा होने नहीं दे रही थी | अब तक छह पुतलियों ने एक-एक करके उन्हें छह कहानियाँ, विक्रमादित्य की सुनाई थी |

उस दिन जैसे ही राजा भोज ने स्वर्ण सिंहासन की सीढ़ियों की तरफ अपना कदम बढ़ाया था, सातवीं पुतली ‘कौमुदी’ ने उनका रास्ता रोक लिया | राजा को रोकने उद्देश्य समझाते हुए उसने उन्हें सम्राट विक्रमादित्य की एक कहानी सुनायी | सभी दरबारियों समेत राजा भोज के इत्मिनान से बैठने के बाद, पुतली कौमुदी ने बताना प्रारम्भ किया |

एक दिन राजा विक्रमादित्य, रात्रि में, अपने शयन-कक्ष में सो रहे थे । अचानक उनकी नींद करुण-क्रन्दन सुनकर टूट गई । उन्होंने ध्यान लगाकर सुना तो रोने की आवाज, उनके महल के सामने बहने वाली नदी की तरफ से आ रही थी और कोई स्री रोए चली जा रही थी । सहसा विक्रम की समझ में नहीं आया कि कौन सा दुख उनके राज्य में किसी स्री को इतनी रात गए बिलख-बिलख कर रोने को विवश कर रहा है ।

उन्होंने तुरन्त अपना राजपरिधान पहना और कमर में अपना दिव्यास्त्र टांग कर आवाज़ की दिशा में चल पड़े । क्षिप्रा नदी के तट पर आकर उन्हें पता चला कि वह आवाज़ नदी के दूसरे किनारे पर बसे घने जंगल से आ रही है ।

उन्होंने तुरन्त निर्णय लेते हुए नदी में छलांग लगा दी तथा तैरकर दूसरे किनारे पर पहुँचे । फिर वह रहस्यमयी आवाज जिस दिशा से आ रही थी उसी दिशा में चलते-चलते उस जगह पर वह पहुँचे जहाँ से रोने की आवाज़ आ रही थी । उन्होंने देखा कि झाड़ियों में बैठी एक स्त्री रो रही है ।

उन्होंने उस स्त्री से रोने का कारण पूछा । स्त्री ने कहा कि वह कई लोगों को अपनी व्यथा सुना चुकी है, मगर कोई लाभ नहीं हुआ । विक्रम ने उसे विश्वास दिलाया कि वे उसकी मदद करने का हर संभव प्रयास करेंगे । तब उस रहस्यमयी स्त्री ने बताया कि वह एक चोर की पत्नी है और उसके पति के पकड़े जाने पर नगर कोतवाल ने उसके पति को वृक्ष पर उलटा टँगवा दिया है ।

राजा ने पूछा क्या वह इस निर्णय से खुश नहीं है । इस पर स्त्री ने कहा कि उसे इस निर्णय पर कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन वह अपने पति को भूखा-प्यासा लटकता नहीं देख सकती । चूँकि न्याय में इस बात की चर्चा नहीं कि वह भूखा-प्यासा रहे, इसलिए वह अपने पति को भोजन तथा पानी देना चाहती है ।

विक्रम ने उस स्त्री से पूछा कि अब तक उसने ऐसा किया क्यों नहीं । इस पर वह स्त्री बोली कि उसका पति इतनी ऊँचाई पर टँगा हुआ है कि वह बिना किसी की सहायता के उस तक नहीं पहुँच सकती और राजा के डर से कोई भी दण्डित व्यक्ति की सहायता को तैयार नहीं होता । तब विक्रम ने कहा कि वह उनके साथ चल सकती है ।

वास्तव वह कोई स्त्री नहीं बल्कि एक पिशाचिनी थी और वह पेड़ पर लटकने वाला व्यक्ति उसका पति नहीं बल्कि एक शव था । वह उस शव को राजा के कन्धे पर चढ़कर खाना चाहती थी । विक्रम ने जब घने जंगल में उसका रूप देखा और वाणी सुनी तभी वह समझ गए थे वो कोई मानवी स्त्री नहीं बल्कि एक पिशाचिनी है | लेकिन विक्रम ने उसकी सहायता का वचन दे दिया था इसलिए वह उसे ले कर आये |

जब विक्रम उस पेड़ के निकट आए तो वह पिशाचिनी, विक्रम के कंधे पर चढ़कर उस शव को चट कर गई । तृप्त होकर विक्रम को उसने मनचाही चीज़ मांगने को कहा । विक्रम ने कहा अगर वह प्रसन्न है उसे वह अन्नपूर्णा नाम का चमत्कारी पात्र प्रदान करे जिससे उनकी प्रजा कभी भूखी नहीं रहे ।

इस पर वह पिशाचिनी बोली कि वह अन्नपूर्णा पात्र देना उसके बस में नहीं है, लेकिन उसकी बहन उस चमत्कारी पात्र को प्रदान कर सकती है । उसके इशारे पर विक्रम उसके साथ चलकर नदी के किनारे आए जहाँ एक भयानक झोपड़ी नुमा महल था ।

पिशाचिनी के विचित्र आवाज़ देने पर मुख्य द्वार से उसकी बहन बाहर निकली । अपनी छोटी बहन को उसने राजा का परिचय दिया और कहा कि विक्रमादित्य अन्नपूर्णा पात्र के सच्चे अधिकारी है, अत: वह उन्हें वह चमत्कारी पात्र अन्नपूर्णा प्रदान करे । उसकी बहन ने सहर्ष अन्नपूर्णा उन्हें दे दिया ।

अन्नपूर्णा पात्र लेकर विक्रम अपने महल की ओर रवाना हुए । तब तक भोर हो चुकी थी । रास्ते में उन्हें एक ब्राह्मण मिला । उसने राजा से भिक्षा में भोजन माँगा । विक्रम ने अन्नपूर्णा पात्र से कहा कि ब्राह्मण को पेट भर भोजन कराए । फिर तो चमत्कारिक तरीके से तरह-तरह के व्यंजन ब्राह्मण के सामने आ गए ।

जब ब्राह्मण ने पेट भर खाना खा लिया तो राजा ने उसे दक्षिणा देना चाहा । ब्राह्मण अपनी आँखों से अन्नपूर्णा पात्र का चमत्कार देख चुका था, इसलिए उसने कहा “महाराज अगर आप दक्षिणा देना ही चाहते है तो मुझे दक्षिणास्वरुप यह पात्र दे दें, ताकि मुझे किसी के सामने भोजन के लिए हाथ नहीं फैलाना पड़े” । विक्रम ने बेहिचक उसी क्षण उसे वह पात्र दे दिया । ब्राह्मण राजा को आशीर्वाद देकर चला गया और वे अपने महल लौट गए ।