मरे हुए प्राणी को जीवित करने वाली विद्या, मृत संजीवनी विद्या क्या आज भी अस्तित्व में है

lpoबहुत कम लोग जानते हैं कि महा मृत्युंजय मन्त्र साधना और मृत संजीवनी मन्त्र साधना दोनों अलग अलग साधनाएं है ! हमारे परम आदरणीय सनातन धर्म के दुर्लभ शास्त्र कहते हैं की महा मृत्युंजय मन्त्र साधना में जीवित मनुष्य की किसी भी कारण से हो सकने वाली मृत्यु को रोकने या टालने का प्रयास किया जाता है जबकि मृत संजीवनी मन्त्र साधना में किसी मर चुके हुए मनुष्य को फिर से जीवित करने का प्रयास किया जाता है ! ये दोनों ही साधनायें अत्यंत दुष्कर हैं, किन्तु असंभव नहीं |

महा मृत्युंजय मन्त्र साधना में मृत्यु चाहे जिस भी कारण (चाहे कैंसर, एड्स हो या कोई एक्सीडेंट या हार्ट अटैक) से पास आ रही हो, रुक जाती है और शरीर पहले की तरह धीरे धीरे स्वस्थ भी होने लग जाता है !

महा मृत्युंजय मन्त्र साधना से शरीर पहले अजर अर्थात जरावस्था से मुक्त होता है और फिर अमर यानी मृत्यु को जीत लेता है ! अजर का तात्पर्य होता है शरीर की सारी व्याधियों या बीमारियों का नाश हो जाना और अमर का मतलब होता है कभी ना मरना तथा हमेशा युवा भी बने रहना !

जब कोई साधक महा मृत्युंजय मन्त्र की साधना करता है तो उसे अजर बनने में ही कई वर्ष लग सकते है और अजर से अमर बनना तो बहुत ही लम्बी प्रकिया है ! महा मृत्युंजय मन्त्र साधना का लाभ कोई भी मनुष्य ले सकता है चाहे वो व्यक्ति कितना भी बूढ़ा आदमी हो, या बहुत छोटा बालक हो या कोई स्त्री हो !

किन्तु महा मृत्युंजय मन्त्र साधना के साथ जो सबसे विशिष्ट बात है वह यह है की इसकी साधना बेहद सावधानी से करना चाहिए क्योंकि कई बार इसमें गलत जप करने पर यह भी सुनने को मिलता है की कोई भारी नुकसान, कठिन रोग या अकाल मौत तक भी हो जाती है !

अतः जिस व्यक्ति के अन्दर संस्कृत के इस कठिन मन्त्र को पूरी शुद्धता पूर्वक और पूरे विधि विधान पूर्वक जप सकने की क्षमता और धैर्य हो सिर्फ उसे ही इस साधना को करना चाहिए, अन्यथा नहीं करना चाहिए !

सुनने में आता है कि रावण ने भी मृत्यु को जीता था और अमृत को अपने नाभि में धारण किया था ! दरअसल नाभि में ही एक बेहद सूक्ष्म कोटर (गह्वर) में हर व्यक्ति का मुख्य प्राण रहता है और जब उसकी मृत्यु होती है तो यही प्राण शरीर में स्थित 5 प्रत्यक्ष या 1 अप्रत्यक्ष रास्ते से बाहर निकल जाता है !

तो जब कोई साधक अमरत्व की साधना में सफलता प्राप्त कर लेता है तो वास्तव में उसकी नाभि में स्थित प्राण अपने चारो ओर स्थित अमृत के कुंड में डूब जाता है | इसका परिणाम यह होता है कि ऐसी स्थिति को प्राप्त हुआ साधक तब तक मर नहीं सकता या बूढ़ा नहीं हो सकता जब तक कि उसका प्राण जिस अमृत के कुंड में डूबा हुआ है, वह सूख नहीं जाता |

अपनी नाभि में स्थित इसी अमृत कुंड की वजह से रावण इस घमण्ड में था की उसे कोई मार नहीं सकता पर उसका महा अधर्म, उसके द्वारा जगत जननी माँ सीता के अपमान का महा पाप ही प्रभु श्री राम के बाण की नोक पर बैठ गया और उसकी नाभि में स्थित अमृत के कुंड को भी सुखा कर नाभि के प्राण को मुक्त कर दिया, और रावण की ईहलीला को समाप्त कर दिया !

हमारे सनातन धर्मी शास्त्र कहते हैं की इस अमृत साधना से व्यक्ति अपने खुद के कटे हुए अंगो को भी फिर से उगा सकता है या किसी बीमारी या विकलांगता से खराब हुए अंगों को फिर से सही कर सकता है तथा अपनी बूढ़ी, जर्जर और कमजोर हो चुकी काया को फिर से एकदम युवा  कर सकता है (अतीत में ऐसा होता भी था), लेकिन इसके लिए उसे इस महा मृत्युंजय साधना को एकदम शुद्धता पूर्वक और पूरे विधि विधान से करना होगा !

इससे अलग मृत संजीवनी विद्या, वही विद्या है जिससे देवासुर संग्राम में दैत्यों के गुरु शुक्राचार्य ने मरे हुए दैत्यों को फिर से जीवित कर दिया था ! ध्यान देने वाली बात यह है कि इस साधना में कई यौगिक, मान्त्रिक और भौतिक प्रक्रियाएं शामिल होती है !

इस साधना के लिए 6 अति दिव्य औषधियों का मिश्रण लेना होता है और पारे के साथ विशेष पात्र में पकाना पड़ता है ! इन 6 औषधियों में सिर्फ एक ही औषधि (जिसे सोम कहते है) आज पृथ्वी पर हिमालय के क्षेत्र में उपलब्ध है बाकी 5 औषधियाँ उच्च लोकों (स्वर्गादि लोकों) में ही मिलती है !

इस विद्या की प्रक्रिया के अनुसार इन औषधियों को पारे के साथ पकाने पर एक अग्नि के समान दहकता दिखायी देता हुआ, स्वर्णिम आभा लिए हुए एक महा दिव्य पेय तैयार होता है ! इसी दिव्य तरल को मरे हुए शरीर में डाला जाता है और जो डालता है उसे कुछ घंटे तक अपनी सांस रोक कर प्राणायाम की कुम्भक की स्थिति में बैठना पड़ता है जब तक की ये तरल मरे हुए शरीर के सभी कोशों का फिर से निर्माण न कर दे !

अगले कुछ घंटे में मरे हुए शरीर का फिर से नये स्वस्थ शरीर की तरह निर्माण हो जाता है (इस दौरान उस व्यक्ति को लगातार कुम्भक की स्थिति में ही, बिना हिले दुले, बैठे रहना पड़ता है), इसके बाद बस कमी रह जाती है तो उस प्राण की जिसके बिना ये शरीर जीवित नहीं कहा जा सकता है !

अब उस नव निर्मित शरीर में प्राण डालने के लिए, उस व्यक्ति को जिसने पिछले कुछ घंटे से अपनी सांस रोक कर रखी थी, उसे अपना सूक्ष्म शरीर प्राण के साथ, अपने स्थूल शरीर से बाहर निकाल कर उस नव निर्मित शरीर के अन्दर घुसना पड़ता है जिसे वास्तव में परकाया प्रवेश की एक विशिष्ट स्थिति भी कहते हैं !

फिर अन्दर घुस कर मृत संजीवनी मन्त्र के साथ कुछ विशिष्ट मन्त्रों का पूरे विधान से पाठ कर मरे हुए शरीर के प्राण का आवाहन करना पड़ता है जिससे उस मान्त्रिक घेरे से सुरक्षित शरीर में सिर्फ अभीष्ट जीवात्मा ही वापस आ पाये ना की कोई अवांछनीय जीवात्मा !

इस तरह की प्रक्रिया करने से कुछ ही क्षणों में मरे हुए मनुष्य के प्राण, सही में वापस उस देह में आ जाता है और मरा हुआ व्यक्ति पुनर्जीवित हो उठता है ! नव निर्मित शरीर के प्राण वापस आने पर आवाहन कर्ता को अपना सूक्ष्म शरीर और प्राण वापस अपने शरीर में लौटा लेना चाहिए ! अन्यथा अनर्थ हो सकता है | इस तरह से मृत संजीवनी की कठिन विद्या सफल होती है ! इस प्रकार से ये प्रक्रिया अत्यंत कठिन है !

मृत संजीवनी विद्या और महा मृत्युंजय साधना के अधिष्ठाता भगवान् शिव ही है ! असल में ईश्वर मुख्य रूप से निराकार है अर्थात उनका कोई आकार, रंग, रूप या कोई सीमा नहीं है ! पर जब जब ये ईश्वर आकार लेते हैं, चाहे राम, शिव, कृष्ण आदि के रूप में तो इनकी शक्ति भी आकार के समान ही सीमित होती है (पर इनकी सीमित शक्ति, साधारण मानवों के लिए कल्पना से परे मतलब असीमित है) |

वास्तव में  इन रूपों (राम, कृष्ण, शिव आदि रूपों में) में ईश्वर खुद अपने निराकार ईश्वर के सामर्थ्य का लगातार अनुसन्धान करते रहते हैं ! जैसे निराकार ईश्वर के ही साकार अवतार भगवान् ब्रह्मा जी ने अपने ही पिता निराकार ईश्वर पर अनुसन्धान करके या साधारण भाषा में कहें तो तप करके, अपने पिता से सभी जीवों को पैदा करने की शक्ति विकसित की पर वो उस समय, अपने ही पैदा किये हुए जीव के मरने पर उसे फिर से जीवित करने की कला नहीं जान पाए और इस कला को भगवान् शिव ने निराकार ईश्वर से सीखा और उसे सभी योग्य पात्रों में इस कला का ज्ञान बाटा भी ! इसीलिए आपने भगवान् शिव को हमेशा तप करते हुए देखा होगा क्योंकि वो अपने ही स्वरुप और असीमित ईश्वर से निरन्तर ज्ञान प्राप्त करते रहते हैं !

कुछ लोगों को यह भी सन्देह होता है कि देवाधिदेव भगवान शिव, भगवान् होने के बावजूद भी भांग का नशा करते है जो की एक गलत बात है ! पर उनको ऐसा सन्देह इसलिए होता हैं क्योंकि उन्हें पूरी सच्चाई पता नहीं होती है ! वास्तव में भगवान् शिव, सिर्फ भांग ही नहीं खाते हैं बल्कि भांग के साथ 5 और अन्य औषधियों का भी मिश्रण खाते हैं और इन 6 औषधियों के दुर्लभ मिश्रण को खाने से मस्तिष्क में एक गुप्त स्थान है जिसे मणि स्थान कहते हैं, वहां पर भयंकर मन्थन शुरू हो जाता है और फिर उस मन्थन से एक से बढ़कर एक दिव्य ज्ञान का प्रकटीकरण होता है ठीक उसी तरह से जैसे की देवासुर संग्राम में समुद्र मंथन से अमृत, श्री लक्ष्मी आदि महा रत्न पैदा हुए थे !

वास्तव में सच्चाई तो यह है कि हमारे परम आदरणीय हिन्दू धर्म में वर्णित सभी ज्ञान विज्ञान की बाते बहुत ही मूल्यवान हैं तथा इस ज्ञान विज्ञान के वास्तविक जानकार तो बहुत ही कम बचे हैं, पर इस ज्ञान विज्ञान के नाम पर अपनी दुकान चलाने वाले ढोंगी बहुत है हमारे देश में |

इन्ही ढोंगी और झूठे लोगों की वजह से ही पूरा सनातन धर्म बदनाम होता है, अतः ऐसे में समझदार लोगों को अपनी बुद्धिमानी का परिचय देते हुए अपने इस बेहद मूल्यवान धर्म की दुर्लभ जानकारियों को पूरी तरह से नष्ट होने से बचाने का लगातार प्रयास करना चाहिए !