ब्रह्मप्रेत की मुक्ति

ब्रह्मप्रेतदिन के उजाले में जिनका ज़िक्र हमारे रोमांच को बढ़ा देता है, रात के अँधेरे में वही हमारे होश उड़ा सकती हैं | हम बात कर रहे हैं प्रेतात्माओं की, जिनका रहस्यमय संसार यहीं है, हमसे बहुत दूर नहीं | ईश्वर की बनायी सृष्टि को समझ सकने का अभिमान करना, मनुष्य ने बहुत पहले ही छोड़ दिया था लेकिन ये दुनिया अभी भी, न समझ में आने वाले विषय-वस्तु को ‘बकवास’ करार देने वाले मूर्खों से भरी पड़ी है |

हिन्दू-धर्म के आधारभूत सिद्धांतों में से एक है कर्म-फल का सिद्धांत | जिस प्रकार से मनुष्य के समस्त प्रकार के कर्मों में विभिन्नताओं की संभावनाएँ अनंत हैं, उसी प्रकार से उन कर्मों द्वारा उत्पन्न फलों के भोग के लिए लोक भी अनंत हैं | लेकिन इन सब में सबसे महत्वपूर्ण है इस बात का अहसास होना कि अपनी जीवन यात्रा में हम सही मार्ग पर जा रहे हैं या नहीं…|

आज की भागदौड़ भरी चकाचौंध वाली ज़िन्दगी में मिलने वाले दोस्तों से उलट, हमारी अन्तरात्मा हमारे हर ‘रॉंग टर्न’ (Wrong Turn) पर हमको चेतावनी देती है कि “रुक जाओ आगे डेड एंड (Dead End) है” लेकिन हमारी अनंत लिप्साएँ उसकी आवाज़ सुनने ही नहीं देती | जिस प्रकार से छोटे दिखने वाले पाप-कर्म भी, मृत्यु के बाद, भयंकर नैराश्य पूर्ण योनि में धकेल सकते हैं उसी प्रकार से किसी निर्बल, निःसहाय की सहायता के लिए किया गया छोटा सा पुण्य कर्म भी आश्चर्यजनक परिणाम उपस्थित कर सकता है |

प्रस्तुत घटना उसी कड़ी में एक प्रमाण है | बात बहुत पुरानी नहीं है, लेकिन बिलकुल सत्य है | पूर्वांचल, उत्तर प्रदेश के दिनेश साहू (गोपनीयता की वजह से सिर्फ़ नाम परिवर्तित किया गया है) जी का आसाम में व्यापार था | पहले वो वहाँ छोटा-मोटा व्यापार करते थे लेकिन अब उन्होंने वहाँ कपड़े का बड़ा व्यापार फैला लिया था | एक दिन वो अपने साथियों के साथ वहां की एक बड़ी और घनी बस्ती के लिए निकले |

दोपहर का समय था, सभी लोगों ने रास्ते में भोजन करने की सोची और मार्ग में पड़ने वाली एक नदी के किनारे सब लोग खाना खाने बैठ गए | इन सब लोगों में एक भोला नाम का आदमी भी था जो स्वभाव से भी भोला था | कुछ लोग उसके सीधेपन का मज़ाक भी उड़ाते थे | भोला अपना खाना थाली में रखकर नदी से पानी लेने गया |

लौटने पर उसने देखा की उसका खाना एक कुत्ता खा रहा था और उसके साथी देख-देख कर हँसे जा रहे थे | भोला ने मन में सोचा कि खाना तो अब कुत्ते ने जूठा कर ही दिया है तो उसे अब मारने या खदेड़ने से क्या फ़ायदा ? फिर उसने कुत्ते को ही अपना सारा खाना खिला दिया और थाली माँज कर रख ली |

इस तरह से पूरे दिन वो भूखा रहा | उसके साथियों ने उसके इस परमार्थिक भोलेपन का मजाक भी उड़ाया | सामान की खरीद-फ़रोख्त करके लौटते समय शाम हो गयी | उन लोगों ने रात, पास के ही गाँव में गुजारना उचित समझा | संयोग से वो लोग गाँव के जिस धनी आदमी के यहाँ ठहरे थे उसके परिवार का एक सदस्य ‘ब्रह्मप्रेत’ से पीड़ित था |

परिवार में मातम जैसा माहौल था | थोड़ी ही देर में यह बात उन परदेसी व्यापारियों को भी पता लग गयी | ब्रह्मप्रेत एक शक्तिशाली प्रेत होता है जिससे बिना ईश्वरीय कृपा के छूटना संभव नहीं | एक तो ये स्वयं अन्दर से बहुत पीड़ित होते हैं और जिस पर सवार होते हैं उसे भी कहीं का नहीं छोड़ते | घर के मालिक को उदास और निराश बैठा देखकर भी उन व्यापारियों में से कुछ लोग अपनी दुष्टता से बाज नहीं आये |

उन्होंने उससे उसकी निराशा का कारण पूछा (ये जताते हुए कि उन्हें कुछ पता नहीं है) | उसने उन लोगों से ब्रह्मप्रेत से पीड़ित होने की सारी बात बतायी | सारी बात सुनने के बाद उन लोगों ने उसे बताया कि उन लोगों के साथ एक महान तान्त्रिक भी आया है जिसका नाम है भोला उसने कई ब्रह्मप्रेतों को मुक्त किया है और वो उसके परिवार के उस सदस्य पर सवार ब्रह्मप्रेत को भी मुक्त कर देगा |

उन परदेसियों के मुख से ऐसा सुनकर उस गृहस्वामी के चेहरे पर प्रसन्नता लौटी और उसने तत्काल उस भोला नाम के ‘महान तान्त्रिक’ को बुलाने का आग्रह किया | भोला को जब सारी पता चली तो वो अपने साथियों पर बहुत नाराज़ हुआ और उसने वहाँ जाने से इनकार कर दिया |

थोड़ी देर में गृहस्वामी खुद आ कर उससे चलने की जिद करने लगा तो भोला ने उसे प्रेम से समझाया की ऐसा कुछ नहीं है और वो इस मामले में कुछ नहीं कर सकता लेकिन गृहस्वामी ने उससे केवल एक बार चल कर देख लेने का अनुरोध किया | गृहस्वामी ने सोचा होगा कि इतने महान तान्त्रिक…..केवल एक बार चल कर देख लेंगे तो शायद उनका भला हो जाय |

भोला बेचारा अपने भोलेपन में इसके लिए तैयार भी हो गया, शायद उससे गृहस्वामी का दुःख देखा न गया | घर के आँगन में कुर्सी पर बैठे उस ब्रह्मप्रेत से पीड़ित व्यक्ति ने जैसी हो भोला को अपने सामने देखा, जोर से हँस पड़ा और बोला “क्या जी…….तुम्ही आये हो ?….अच्छा ठीक है मै तो इसके घर से चला जाऊँगा लेकिन मेरी एक शर्त है और वो तुम्हे मानना होगा” भोला ने पूछा “कैसी शर्त?” दूसरी तरफ़ से आवाज़ आयी “तुम आज की अपनी कमाई मुझे दे दो तो मै इसे सदा के लिए छोड़कर अपने रास्ते चला जाऊँगा” |

Harry_priceभोला को कुछ समझ नहीं आया उसने अपनी अनभिज्ञता स्पष्ट की और उससे सारी बात समझाने को कहा | उस ब्रह्मप्रेत ने उसे, सबके सामने उस भूखे कुत्ते को खाना खिलाने वाली बात याद दिलाई और कहा “मनुष्य की वास्तविक कमाई यही है…इसका तुम्हे अक्षय पुण्य मिला है…ये कभी समाप्त नहीं होगा….यदि तुम मेरे नाम से इस पुण्य के अर्पण का संकल्प कर दो तो मै यहाँ से चला जाऊँगा” |

भोला ने वैसा ही किया जैसा उस ब्रह्मप्रेत ने उसे निर्देशित किया था | फिर उस घर में खुशियाँ लौट आयीं | मानवेतर प्राणियों के लोक और वहाँ के नियम विचित्र हो सकते हैं लकिन वहाँ भी वही कर्म-फल सिद्धांत लागू होता है जो यहाँ पर व्याप्त है क्योकि विभिन्न ब्रह्माण्डों में स्थित असंख्य लोकों में आत्माओं के आवागमन का आधार है ये |

किसी के मानने या न मानने से ये सिद्धांत बदल नहीं जायेंगे | दरअसल मनुष्य की मृत्यु और उसके पुनर्जन्म के बीच का समय बहुत ही रहस्यमय होता है | इस दौरान उसके, किसी एक निश्चित लोक में, निश्चित समय के दौरान होने की सम्भावना अनन्त है | इसको आप एक सामान्य गणितीय तथ्य से समझ सकते है कि वैसे तो 1 और 2 के बीच केवल 1 का अंतर है लेकिन सूक्ष्म दृष्टी से देखें तो 1 और 2 के बीच अनंत छोटी-छोटी संख्याएँ हो सकती है |

मृत्यु और पुनर्जन्म के बीच के रहस्यमय संसार को रेखांकित करती एक और घटना इस प्रकार है | ये घटना इंग्लैंड के विश्वविख्यात मनोवैज्ञानिक और ‘साइकिक रिसर्च सोसाइटी’ के विश्वप्रसिद्ध कार्यकर्ता श्री हैरी प्राइस (Harry Price) से सम्बंधित है |

उन्होंने इस सोसाइटी के पचास वर्ष के पूरे होने पर इसके कार्यों की समीक्षा करते हुए एक पुस्तक लिखी थी जिसका नाम था ‘Fifty Years of Psychic Research’ इस पुस्तक में उन्होंने एक छोटी सी बच्ची ‘रोसेली’ का बड़ा ही हृदयस्पर्शी वर्णन किया है | रोसेली एक धनी-मानी महिला की पुत्री थी |

उसके पिता की मृत्यु, प्रथम विश्वयुद्ध के शुरुआत में ही हो गयी थी | तब वह बहुत छोटी ही थी | पिता की मृत्यु के बाद उसकी माँ का एकमात्र सहारा रोसेली ही रह गयी थी | इतना महान दुःख पड़ने के बाद, एक रोसेली को देख कर ही उसकी माँ जी रही थी लेकिन क्रूर काल को यह भी सहन नहीं हुआ और पिता की मृत्यु के पांच साल बाद रोसेली का भी देहांत हो गया |

उसकी माँ को इससे कल्पनातीत दुःख हुआ | उसकी मृत्यु के समय उसकी माँ की छटपटाहट लोगों से देखी नहीं जा रही थी | सारा दिन उसकी माँ अपनी बेटी को याद करती और उसको देखने के लिए छटपटाती | इसी दौरान उसे एक ‘सियेंस’ (Séance) के बारे में पता चला जो मृत आत्माओं को बुलाने और उनसे वार्तालाप करने की एक मंडली थी |

इस संस्था में जाने पर उसको अच्छा लगा | थोड़े समय तक जाने के बाद उसको विश्वास हो गया की उसकी प्यारी बेटी, किसी और लोक में ही सही, लेकिन सूक्ष्म रूप से विद्यमान है लेकिन उसको देखा कैसे जाय ? इसके लिए उसने ध्यान का सहारा लिया | वर्षों बीत गए, लेकिन काफी समय तक ध्यान करने के बाद भी उसे कोई वास्तविक अनुभव नहीं हुआ |

लेकिन उसने हिम्मत नहीं हारी, अब उसे ध्यान के दौरान विचित्र अनुभव हो रहे थे और वो ध्यान की गहराइयों में उतर रही थी | वर्षों के स्मरण और ध्यान का फल ये हुआ कि, मृत्यु के चार साल बाद एक रात उसने अपनी प्यारी पुत्री रोसेली की मीठी आवाज़ में “माँ” शब्द सुना | उस रात उसकी ख़ुशी और रोमांच की कोई सीमा नहीं थी |

अब उसे ये निश्चित रूप से विश्वास हो गया था कि ‘यद्यपि उसकी पुत्री अदृश्य है लेकिन विद्यमान जरूर है’ | वो प्रतिदिन उसकी वाणी सुनने के लिए रात्रि में उसका ध्यान करती | धीरे-धीरे रोसेली का प्राकट्य भी होने लगा | पहले धुएँ के रूप में, फिर स्थूल शरीर की आकृति के जैसे रूप में और अंत में एक रात उसने प्रकट होकर अपनी माँ का हाँथ पकड़ लिया |

उस रात…उस वियोगिनी माँ के सुख और संतोष की कोई सीमा नहीं थी, सिर्फ अनुमान लगाया जा सकता है | अब रोसेली दिन के समय में भी ध्यान कर के बुलाने पर स-शरीर प्रगट हो जाती | रोसेली की माँ हैरी प्राइस से परिचित थी |

जब हैरी को इस विचित्र घटना का पता चला तो उन्होंने रोसेली की माँ से इस घटना के वैज्ञानिक जांच के लिए अनुमति मांगी तथा सहयोग के लिए प्रार्थना की जिसके स्वीकार किये जाने पर इसके लिए एक दिन निश्चित किया गया | उस दिन रोसेली की माँ के घर पर ही सियेंस की प्रणाली के अनुसार सब कुछ आयोजित किया गया |

हैरी प्राइस ने खुद दरवाज़े और सारी खिड़की के किवाड़ बंद कर दिए और उनमे बाहर से सील बंद मुहरे लगवा दी | कमरे के अन्दर का प्रकाश धीमा कर दिया गया और रोसेली का आवाहन करते ही वो वहां स-शरीर प्रकट हो गयी |

ब्रह्मप्रेत की मुक्तिहैरी के आश्चर्य का कोई ठिकाना नहीं था उन्होंने उसकी माँ से अनुमति लेकर रोसेली के शरीर को अपने हाँथों से स्पर्श किया, उन्होंने रोसेली के चेहरे और कंधे को स्पर्श किया तो किसी जीवित व्यक्ति के शरीर से निकलने वाली ऊष्मा का अहसास हुआ | उसकी श्वाँस चल रही थी | उन्होंने आश्चर्यमिश्रित भाव लिए उसके नाड़ी की परीक्षा की, जो की 80 के आस-पास ही निकली |

ह्रदय के स्पंदन को कान लगा कर सुना तो वो किसी जीवित व्यक्ति की भाँती ही धड़क रहा था | अब हैरी ने कन्या का रूप रंग देखने के लिए कमरे में फैले प्रकाश को थोड़ा तेज़ किया तो उसकी चमकती हुई आँखे, गोल कपोल और पतली नासिका से उसकी मुखाकृति बड़ी ही सुन्दर दिखी | हैरी ने रोसेली से कुछ सवाल किये जिसका उसने बालसुलभ अपरिचित से संकोच के कारण कोई उत्तर नहीं दिया |

हैरी ने स्थिति को समझते हुए तुरंत अपना सवाल बदलते हुए उससे पुछा कि “क्या तुम अपनी माँ से प्यार करती हो ?” तो उसने बड़े प्यार और मासूमियत से कहा “हाँ” तब उसकी माँ ने उसे अपनी छाती से चिपटा लिया | रोसेली लगभग पंद्रह मिनट तक वहां रही फिर अदृश्य हो गयी | अब प्रकाश यथावत कर दिया गया था |

खिड़की और दरवाज़ों के किवाड़ों पर लगी मोहरें ज्यों की त्यों थी…मानो कह रही हो कि हमने तो किसी को नहीं देखा ! लेकिन उस कमरे में उपस्थित लोग एक ऐसी घटना के गवाह बने जो ‘उसकी’ असीम और आशा से भरे हुए जीवन के सत्ता की अकाट्य प्रमाण थी |

माता के प्रगाढ़ प्रेम और नित्य-नियमित ध्यान-साधना के अभ्यास ने परलोकगत कन्या को स-शरीर प्रकट करा दिया था | ये घटना अभूतपूर्व हो सकती है लेकिन असंभव नहीं | ऐसा ही प्रगाढ़ प्रेम और ध्यान साधना जब पत्थर में भी उस सर्व-शक्तिमान को खींच कर प्रकट करा सकती है तो हम तो फिर भी मनुष्य हैं |

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