जीव, प्रकृति और ब्रह्म के रहस्य

जीव, प्रकृति और ब्रह्म के रहस्यआरम्भ से ही मनुष्य जिज्ञासु प्रवृत्ति का रहा है | अज्ञात, अदृश्य, अनागत को जानने की उत्कट अभिलाषा, उनका विज्ञान समझने की प्रबल इच्छा आज मनुष्य को समय के उस दौर में ले कर आई है जहाँ से उसके लिए समय और स्थान दोनों सिकुड़ चुके है | लेकिन मनुष्य के लिए उसके मूल प्रश्न, जो उसके अस्तित्व से सम्बंधित हैं, आज भी अनुत्तरित है और वो प्रश्न हैं- “मै कौन हूँ ? और क्यों हूँ ?” प्रस्तुत लेख जीव ब्रह्म और प्रकृति के परस्पर सम्बन्धों और उनके रहस्यों पर प्रकाश डालता है |

चिदानंद स्वरुप ब्रह्म के प्रतिबिम्ब से युक्त, सत, रज और तम गुणों वाली जो शक्ति होती है, प्रकृति कहलाती है | ये प्रकृति दो प्रकार की होती है | सत्व की शुद्धि से उस प्रकृति को ‘माया’ और सत्व की अशुद्धि यानि मलिनता से उस प्रकृति को ‘अविद्या’ कहा जाता है | माया में पड़ा हुआ वो बिम्ब माया को अपने वश में रखता है और इस कारण से वो सर्वज्ञ ईश्वर बन बैठा है | प्रकृति, मूलतः शक्ति होने के कारण स्वभावतः अस्थिर होती है | इसमें ब्रह्म का बिम्ब होने से ये ब्रह्म के नियंत्रण में रहती है |

प्रकाशात्मक सत्व गुणों की शुद्धि से यानि जब वो सत्व गुण दूसरे गुणों से कलुषित नहीं हुआ होता तब वो प्रकृति माया कही जाती है | जब वो सत्व गुण दूसरे गुणों से कलुषित होकर अशुद्ध हो जाता है तब वही प्रकृति अविद्या कहलाने लगती है | यानि कुल मिलाकर यह समझा जा सकता है कि विशुद्ध सत्व प्रधान प्रकृति को माया तथा मलिन सत्व प्रधान प्रकृति को अविद्या कहते हैं |

माया में प्रतिबिम्बित उस आत्मा ने माया को अपने स्वाधीन कर रखा है और वही सर्वज्ञाता आदि गुणों वाला ईश्वर हो गया है | वही ब्रह्म (आत्मा) जब अविद्या में प्रतिबिम्बित होता है तो वो एक तरह से अविद्या के वश में फँस जाता है | वास्तव में अविद्या की विचित्रता के कारण वह एक से अनेक हो जाता है | इसी अविद्या को कारण शरीर कहते हैं और इस कारण शरीर कहलाने वाली अविद्या में अभिमान करने वाले को ‘प्राज्ञ’ कहा जाता है |

यहाँ अभिमान का अर्थ घमंड से नहीं लेना चाहिए | अभिमान का तात्पर्य यहाँ ‘स्वयं’ के अनुभव करने से है | अविद्या में प्रतिबिम्बित होकर उसके पराधीन हो जाने वाला आत्मा (ब्रह्म) ‘जीव’ कहलाने लगता है | वह जीव उस अविद्या रुपी उपाधि की विचित्रता (ये विचित्रता अशुद्धि की न्यूनाधिकता के अनुसार होती है) के कारण अनेक प्रकार का हो जाता है | उसके देवता, मनुष्य, पशु, पक्षी आदि अनेक भेद हो जाते हैं |

इस अविद्या को कारण शरीर इसलिए कहा जाता है क्योकि स्थूल और सूक्ष्म शरीर तथा स्थूल और सूक्ष्म भूतों का कारण वही मानी गयी है | उस कारण शरीर में अभिमान करने वाले अथवा उसी में “मै” की भावना करने वाले जीव को प्राज्ञ कहा जाता है | उन प्राज्ञों के भोग के लिए तम-प्रधान प्रकृति में से आकाश, वायु, अग्नि, जल तथा पृथ्वी नाम के पञ्च महाभूत (पञ्च तत्व) उत्पन्न हुए |

उन आकाश आदि पञ्च तत्वों के अलग-अलग पांच सत्व भागों से क्रमानुसार- श्रोत्र (कान), त्वचा (स्पर्श), चक्षु (आँखें), रसना (जिव्हा) तथा घ्राण (नासिका) नाम की पांच ज्ञानेन्द्रियाँ उत्पन्न हुई [अर्थात एक-एक तत्व के अलग-अलग सत्वांश से एक-एक ज्ञानेन्द्रिय की उत्पत्ति हुई] | उन पाँचों तत्वों के पाँचों सत्वांशों को मिलाकर एक अंतःकरण नाम का द्रव्य (तत्व) उत्पन्न हुआ |

यह अंतःकरण अपने वृत्तिभेद के कारण दो प्रकार का होता है | किसी की स्वाभाविक (Natural) गति या चेष्टा को उसकी वृत्ति कहते हैं | जब यह अंतःकरण, विमर्श अर्थात संशयात्मक (यानि संशय से युक्त) वृत्ति करता है तो उसको ‘मन’ कहते हैं और जब यह निश्चयात्मक (यानी निश्चयपूर्वक) वृत्ति करता है तो वह ‘बुद्धि’ हो जाता है | यही अंतर है मन और बुद्धि में |

इसके बाद उन आकाश आदि पाँचों तत्वों के अलग-अलग पाँचों रजों भागों से क्रमानुसार- वाक् (वाणी), हांथ, पैर, पायु तथा उपस्थ (मल-मूत्र त्यागने के स्थान) नाम की पांच कर्मेन्द्रियाँ उत्पन्न हुई | अब जिस तरह से पाँचों तत्वों के सत्व भागों को मिलाकर अंतःकरण उत्पन्न हुआ उसी तरह से पाँचों तत्वों के रज भागों को मिलाकर एक ‘प्राण’ की रचना हुई | ये प्राण अपने वृत्ति-भेद से अर्थात अपने काम के अनुसार पांच प्रकार का होता है |

ये पांचो प्राण वायु रूप में भौतिक शरीर में उपस्थित होते हैं | ये पांचो प्राण हैं- प्राण (वायु), अपान (वायु), समान (वायु), उदान (वायु), तथा व्यान (वायु) | इन पञ्च प्राणों का वर्णन आपको योग-प्राणायाम की किसी भी अच्छी पुस्तक में मिल जायेगा |

इस प्रकार से पांच ज्ञानेन्द्रिय, पांच कर्मेन्द्रिय, पांच प्राण, मन तथा बुद्धि इन सत्रह पदार्थों से मिलकर सूक्ष्म-शरीर बनता है | इसी को वेदान्तों में लिंग शरीर कहा गया है | अंग्रेजी में इसको Cosmic Body या ब्रह्माण्डीय शरीर भी कहते हैं |

वह प्राज्ञ नाम का जीव उस लिंग शरीर में “मै” की भावना करने की वजह से [यानि की ये धारणा करना कि ये लिंग शरीर ही मै हूँ, ये ब्रह्मांडीय शरीर ही मेरा वास्तविक रूप है] ‘तैजस’ हो जाता है | इसी प्रकार से जब ब्रह्म (आत्मा) यानि ईश्वर उस लिंग देह में “मै” की भावना करता है तो वह “हिरण्यगर्भ” हो जाता है | इन दोनों (तैजस और हिरण्यगर्भ) में अंतर केवल इतना है कि तैजस व्यष्टि है और हिरण्यगर्भ समष्टि इसके अतिरिक्त दोनों में कोई भेद नहीं |

मलिन सत्व-प्रधान अविद्या रुपी उपाधि वाला जीव जब लिंग शरीर में “मै” की भावना करता है तब वह उसी को अपनी आत्मा मानने लगता है | इसी वजह से उसे तैजस कहते हैं | और विशुद्ध सत्व-प्रधान माया रुपी प्रकृति में प्रतिबिम्बित ब्रह्म जब उसी लिंग शरीर में “मै” की भावना करता है तो वो हिरण्यगर्भ हो जाता है |

विशुद्ध सत्व-प्रधान प्रकृति को नियंत्रित करने की वजह से वो सर्व-व्यापी होता होता है अतः वह समष्टि होता है | वह ईश्वर, जिसे हिरण्यगर्भ कहा गया है, लिंग शरीर उपाधि वाले सभी तैजसों के साथ अपनी आत्मा की एकता को समझता रहता है | वो जानता है कि ये सब मिलकर मै ही हूँ इसी वजह से वो समष्टि होता है | उस ब्रह्म से अन्य जो जीव हैं वो उस तादात्म्य के आभाव से [यानि उन सब के साथ एकत्व ज्ञान के न होने से] व्यष्टि कहलाते हैं |

उसके बाद ब्रह्म की इच्छा से प्रकृति, उन प्राज्ञ जीवों के भोग के लिए ही ‘भोग्य’ (अन्न पान आदि) तथा भोगस्थानों (जरायुज, स्वेदज, उद्भिज, और अंडज आदि प्रकार के शरीरों) की उत्पत्ति करने के लिए आकाश आदि पञ्च तत्वों में से प्रत्येक तत्व को (जो की अभीतक अपन्चात्मक ही थे) पञ्चात्मक कर देती है जिससे कि उन जीवों के भोग के लिए भोग्य अन्न पान आदि तथा भोगस्थानों शरीर आदि का निर्माण हो सके |

उन पञ्च तत्वों को पञ्चात्मक करने का विधान इस प्रकार है- सर्व प्रथम प्रकृति आकाश आदि प्रत्येक तत्व के पहले दो बराबर भाग करती है | फिर उनमे से प्रत्येक तत्व के पहले आधे भाग को पूरा रखती है तथा दूसरे आधे भाग के चार-चार भाग करती है | फिर उन चारो भागों में अपने से भिन्न अन्य चारो तत्वों के भागों को मिलाकर उन तत्वों को पंचीकृत कर देती है | इसको निम्नांकित चित्र से भी समझा जा सकता है |

यानि पंचीकृत हुए प्रत्येक तत्व में आधा भाग उसका अपना है तथा आधे भाग में शेष अन्य चार तत्व हैं | इन्ही पंचीकृत तत्वों से ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति होती है | ब्रह्माण्ड में भुवन (इस ब्रह्माण्ड में 14 भुवन हैं), प्राणियों के भोगने योग्य भोग्य पदार्थ तथा उन लोकों के अनुकूल शरीर उत्पन्न होते हैं | इस सम्पूर्ण स्थूल (विराट) शरीर में अहम् भाव से बैठने वाला हिरण्यगर्भ, “वैश्वानर” कहलाने लगता है |

आकाश वायु अग्नि जल पृथ्वी
 

आकाश

 

 

वायु

 

अग्नि

 

जल

 

पृथ्वी

वायु

अग्नि

जल

पृथ्वी

आकाश

अग्नि

जल

पृथ्वी

आकाश

वायु

जल

पृथ्वी

आकाश

वायु

अग्नि

पृथ्वी

आकाश

वायु

अग्नि

जल

अपने स्थूल शरीर में आते ही तैजस ‘विश्व’ हो जाता है, [वास्तव में प्रत्येक जीव अपने आप में पूरा एक ब्रह्माण्ड है] जिनको देवता, तिर्यंक, तथा मनुष्य आदि कहा जाने लगता है |

किन्तु वे सभी बहिर्मुखी होते है | इन किसी को भी आत्म तत्व का बोध नहीं होता है | वास्तव में, इस स्थूल शरीर में अहम् भाव से निवास करने वाला तैजस ही विश्व कहलाता है | देवता, पशु-पक्षी, तथा मनुष्य आदि भेद इन विश्वों के ही होते हैं, तैजसों में इस तरह का कोई भेद नहीं होता | कारण शरीर और लिंग शरीर तो सब जीवों का एक समान ही होता है | इनके केवल स्थूल शरीर (भौतिक शरीर) ही भिन्न-भिन्न प्रकार के होते हैं

ये देव आदि सभी बाह्यदर्शी हैं यानि ये सभी बाहरी शब्दादि विषयों को ही देखा सुना करते हैं | अपने दुर्भाग्य के कारण ये अपनी आत्मा को देख नहीं पाते | इन सभी को आत्मतत्व का यथार्थ ज्ञान नहीं होता | यद्यपि तार्किक लोग इस देह से भिन्न आत्मा के अस्तित्व को मानते हैं लेकिन आत्मरूप का यथार्थ ज्ञान उनको भी नहीं होता | सुख आदि भोगने के लिए ये कर्म करते हैं और फिर उन कर्मों के फलस्वरूप पुनः सुख-दुःख भोगते हैं |

इस प्रकार से ये जीव नदी में बहने वाले उन कृमियों की तरह हैं जो एक आवर्त से निकल कर तुरंत दूसरे आवर्त में जा फसते हैं | ऐसे ही ये जीव भी एक जन्म से दूसरे जन्म को पाते रहते हैं | इन्हें कभी भी विश्राम का सुख नहीं मिलता | ऐसे हतभागियों को सुख का चिरस्थायी दर्शन कभी नहीं हो पाता | वास्तव में सुख चिरस्थायी हो ही नहीं सकता क्योकि सुख और दुःख सापेक्ष होते हैं | अगर चिरस्थायी कुछ होता है तो उसे ‘आनन्द’ कहते हैं | आनन्द सुख से अलग होता है | लेकिन उस चिरस्थायी आनन्द के आत्मबोध होना जरूरी है | और आत्मबोध के लिए, जीव प्रकृति और ब्रह्म के इस रहस्य को समझना जरूरी है !