मानवेतर योनियों में भटकाव

मानवेतर योनियों में भटकावमनुष्य जीवन रहस्यों से भरा है | और इसमें सबसे रहस्यमय है मानव मन जो हमें, हमारी चेतना के विस्तार की असीम संभावनायें प्रदान करता है | लेकिन वही मन, कई बार हमारे द्वारा किये जाने वाले रहस्यमय व्यवहार के लिए भी उत्तरदायी होता है | ऐसी ही विचित्र मानसिक परिस्थितियों में आश्चर्यजनक व्यवहार प्रदर्शित करने वाली ये घटना, प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक प्रोफेसर जेम्स की किताब -मनोविज्ञान के सिद्धान्त (प्रिन्सिपुल्स आफ साइकोलॉजी) में दी गयी है |

हैरानी इस बात की है कि ऐसी एक नहीं अनेक घटनायें डॉक्टरों, मनोवैज्ञानिकों और वैज्ञानिकों के सामने आती है पर इसे विदेशी विद्वानों का अन्ध-विश्वास ही कहना चाहिए कि जब भी ऐसी बातें आती है तो बजाय इसके कि कोई नई धारणा बनाई जाय या नए सिद्धांत पर काम हो और नई शोध की जाये, वे लोग वही घिसी-पिटी “विकासवाद के सिद्धान्त” की बातें करने लगते है और उसी के अनुसार ऐसी घटनाओं को तौलने परखने लगते हैं जिसके परिणामस्वरूप इन घटनाओं का कोई उचित निष्कर्ष और निराकरण किये बिना अध्याय जहाँ का तहां समाप्त कर देना पड़ता है । क्योंकि उस रास्ते पर आगे उन्हें डेड एन्ड (Dead End) ही मिलता है |

प्रस्तुत घटना “ब्रिजेट” नाम की एक महिला से सम्बंधित है | ब्रिजेट एक अच्छेऔर शिक्षित परिवार की महिला थी लेकिन उस पर अक्सर पागलपन का दौरा पड़ता था, या यूं कहे कि वह अक्सर अपने होश में ही नहीं रहती थी तो ज्यादा ठीक होगा । जब उसका ईलाज करने वाला डॉक्टर उससे इस बारे में कुछ जानना चाहता तो वह कहती थी ‘मैं तो चुहिया हूँ मुझे दफना दो’ |

इतना ही नहीं जब कभी विक्षिप्तता की स्थिति होती तो वो एकदम हू-बहू चूहे के समान दोनों हाथ पैरों से रेंगने लगती और किसी सूराख के पास जाकर, किसी सन्दूक के पास जाकर उसके नीचे छुपने का प्रयास करती | कभी-कभी तो वह सूराख ढूंढ़ने के लिए पूरी इमारत छान डालती और जब लोग उसके पास पहुँचते और कहते, ‘ब्रिजेट ये तुम क्या कर रही हो’ तो वह कहती “मैं तो चुहिया हूँ और मर जाना चाहती हूँ ।”

यहाँ गौर करने वाली बात ये है कि सामान्य स्थिति में ब्रिजेट खाना पकाती, घर वालों को खिलाती, कढ़ाई-बुनाई से लेकर घर के दूसरे काम-काज भी निबटाती थी लेकिन मस्तिष्क के किसी एक कोने में न जाने क्या भरा भगवान ने कि कभी-कभी एकदम से अजीब हरकत करने लगती वह ।

ब्रिजेट जैसी सभ्य और अच्छे घराने की महिला अपने आपको चुहिया कहती और एकबार नहीं जब भी वह पागलपन की स्थिति में होती है उसके सारे क्रिया-कलाप हाव-भाव मुँह का जल्दी-जल्दी चलाना आदि सारी क्रियायें ठीक चूहों की तरह होती थी, यह केवल आश्चर्य ही बल्कि कोई महत्व पूर्ण तथ्य है जो शायद अभी वैज्ञानिकों की दृष्टि में नहीं आया है |

ब्रिजेट के मानव शरीर में विकसित चेतना कभी चूहे जैसी निकृष्ट योनि में रही होगी । मस्तिष्क की किसी गड़बड़ या व्यतिक्रम से वह संस्कार जागते हैं और वह अपने आपको चूहा समझने लगती है । अवचेतन मन के यह संस्कार ही है जो निद्रा की स्थिति में या तन्द्रावस्था में विचित्र स्वप्न सृष्टि का सृजन करते हैं ।

सच्चाई यह है कि निद्रा की अवस्था का आभास कई बार जागृत अवस्था में भी हो सकता है और पागलपन (मष्तिष्क व्यतिक्रम) की स्थिति में मनुष्य के मन-मष्तिष्क में उन पुराने संस्कारों और पूर्व जन्मों की स्मृतियां हावी होने लगती है |

उस समय मन और वर्तमान शरीर का सम्बन्ध विच्छेद हो जाने से मनुष्य को अपनी वास्तविक स्थिति-परिस्थिति का ज्ञान नहीं रहता । इस सम्बन्ध में यम-नचिकेता सम्वाद, जिसका वर्णन कठोपनिषद में हुआ है, देखना दिलचस्प होगा | कठोपनिषद में लिखा है-

आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरं रथमेव तु। बुद्धिन्तु सारथिं विद्धि मनः प्रग्रहमेव च ॥ अर्थात

हे नचिकेता ! यह शरीर तो रथ रुपी वाहन है, उसका स्वामी जीवात्मा है | बुद्धि उस रथ को हांकने वाला सारथी और मन उस रथ की लगाम है जो इन्द्रिय रूपी घोड़ों को पकड़ कर रखती है ।

अगर बुद्धि रूपी सारथी सो गया, मन की लगाम ढीली पड़ गई तो उच्छृंखल इन्द्रियों के घोड़े शरीर रुपी रथ को ले जाकर किसी गड्ढे या खाई में गिरा देते हैं और तब जीवात्मा को अपनी विकास यात्रा को जारी रखने के लिए दूसरे रथ की खोज में चल देना पड़ता है और जब तक जीव अपनी पूर्णता को प्राप्त नहीं कर लेता यही क्रम चलता रहता है ।

इस तरह की घटनाएं ये बताती हैं कि मनुष्य एक नहीं हजारों, लाखों रथ तोड़ चुका होता है तब कहीं मनुष्य शरीर में आता है इसलिये “बड़े भाग्य मानुष तन पावा-सुर दुर्लभ सद्ग्रन्थनि गावा” का सिद्धान्त भारतीय आचार्यों ने दिया ।

इसी सम्बन्ध में एक अन्य दुर्लभ घटना का यहाँ वर्णन करना उचित होगा | इस घटना का विवरण समाचार पत्र ‘लैसेंट’ में छपा था जिसमे, हैच मेन्टल हॉस्पिटल के असिस्टेंट मेडिकल ऑफिसर डॉ0 अलेक्जेंडर कैनन ने एक लड़की की ज़िक्र किया था |

इस लड़की के मस्तिष्क में, जब वह 13 वर्ष की थी सूजन का रोग उत्पन्न हो गया । लगभग 3 वर्ष तक की काफ़ी कष्ट पूर्ण स्थिति के बाद उसमें एक नहीं अनेक नये व्यक्तित्व पैदा हो गये।

कभी वह अपने को एक वस्तु कहती और उस स्थिति में जैसे कोई ईंट-पत्थर या पेड़ पौधा निश्चेष्ट पड़ा होता है उसी प्रकार निश्चेष्ट हो जाती | कभी वह अपने आप को ‘मैमीवुड’ कहती और जैसे कोई 4-5 वर्ष की बच्ची बात करती है ठीक उसी टोन मुद्रा, हाव-भाव से बातचीत करती और बाल्यावस्था की अनेक बातों का वर्णन करती |

कभी-कभी वह अपने को “टाम्स् डार्लिंग” कहती और इस स्थिति में भी उसके भाव बच्चों जैसे ही होते पर क्रियायें और बोली बदल जाती थी | कभी वह अपने को एक शिक्षिका बताती, पढ़ाती और सामने बैठा हुआ कोई व्यक्ति उसके कहने के अनुसार पढ़ता नहीं तो उसको मारने लगती |

कभी-कभी वह अपने आपको एक मेमना कहती और मेमने की सी बोली और भाव भंगिमा व्यक्त करने लगती | उसकी योग्यता बिलकुल नहीं थी पर कभी-कभी वह अपने को चित्रकार कहती और उस समय वह बिना किसी पूर्वाभ्यास के ऐसे सुन्दर चित्र बनाती कि देखने वाले दंग रह जाते । 15 अगस्त 1932 के लीडर अखबार में भी इस घटना का समाचार छपा था ।

थोथे विकास वाद के सिद्धान्त के अनुसार मनुष्य के विकास क्रम में, निष्क्रिय जड़ पदार्थों की कोई अवस्था नहीं है जबकी यह लड़की कई अवस्थाओं में अपने आपको जड़ पदार्थ जैसा कहती ।

जड़ योनियों का वर्णन केवल एक मात्र भारतीय पुनर्जन्म सिद्धान्त में है और ये सिद्धांत हमें बताता है कि जीवात्मा विशुद्ध रूप से स्वतन्त्र अस्तित्व है वह कर्म वश ही योनियों में भ्रमण करता रहता है । यजुर्वेद इसकी सटीक व्याख्या करता है | वो कहता है-

पुनर्मनः पुनरायुर्म आगन्पुनः प्राणः पुनरात्मा। म आगन् पुनश्चक्षुः पुनः श्रौत्र म आगन्। वैश्वानरोऽदब्धस्तनूपा अग्निर्नः पातुः दुरितादवघात् ॥ अर्थात

मुझे यह मन फिर से प्राप्त हुआ है । प्राण फिर से मिला है । यह मनुष्य देह भी पुनः मिली है आंख और कान फिर से मिले है । मुझे पुनर्जीवन मिला है अतः, हे सर्वजन हितकारी अग्नि देव ! हमें दुराचार और पाप से बचाओ ताकि हम इस महान् जीवन का सदुपयोग कर सकें फिर मानवेत्तर योनियों में न भटकना पड़ें।