सिंघासन बत्तीसी की पहली पुतली रत्नमंजरी द्वारा कही गयी, सम्राट विक्रमादित्य के जन्म, शंख से युद्ध तथा स्वर्ण सिंहासन प्राप्त होने की कथा


सिंघासन बत्तीसी की पहली पुतली रत्नमंजरीअपने राज्य में खुदाई द्वारा प्राप्त हुए उस अद्भुत, दिव्य राज सिंहासन पर आरूढ़ होने के लिए राजा भोज जैसे ही, उस, सम्राट विक्रमादित्य के अद्भुत दैवीय, सिंहासन की ओर बढे, उस सिंहासन में जड़ी हुई बत्तीस पुतलियों ने उनका रास्ता रोक लिया | फिर राजा भोज के अनुरोध पर उन बत्तीस पुतलियों ने उन्हें सम्राट विक्रमादित्य के महान चरित्र की बत्तीस कहानियाँ, एक०एक करके सुनाई |

उनमे से पहली पुतली का नाम था रत्नमंजरी | उसने राजा भोज को राजा विक्रम के जन्म तथा इस दैवीय सिंहासन के प्राप्ति की कथा बताई | उस कथा के अनुसार किसी समय आर्यावर्त क्षेत्र में एक राज्य था जिसका नाम था अम्बावती । वहाँ के राजा गंधर्व सेन ने चारों वर्णों की स्त्रीयों से चार विवाह किये थे । उन चार रानियों से गन्धर्व सेन को कुल छह पुत्र हुए |

ब्राह्मण रानी के पुत्र का नाम ब्रह्मवीत था । क्षत्राणी रानी से गन्धर्व सेन को तीन पुत्र हुए | उनके नाम क्रमशः शंख, विक्रम तथा भर्तृहरि थे । वैश्य वर्ण की उनकी रानी ने चन्द्र नामक पुत्र को जन्म दिया तथा उनकी शूद्र पत्नी ने धन्वन्तरि नामक पुत्र को जन्म दिया । इस प्रकार गन्धर्व सेन के सभी पुत्र राजकीय शिक्षा-दीक्षा एवं वातावरण में बड़े होने लगे |

उनके बड़े होने पर गन्धर्व सेन ने ब्रह्मवीत को अपना दीवान बनाया, पर वह अपनी जिम्मेदारी अच्छी तरह से नहीं निभा सका और अंततः राज्य से पलायन कर गया । उसके आचार-विचार अच्छे नहीं थे |

कुछ समय इधर-उधर भटकने के बाद वह धारानगरी में पहुँचा और वहाँ ऊँचा ओहदा प्राप्त किया तथा एक दिन, धोखे से, वहाँ के राजा का वध करके ख़ुद राजा बन गया । काफी दिनों के बाद उसने अपनी गृह नगरी उज्जैन लौटने का विचार किया, लेकिन देव-दुर्योग से उज्जैन आते ही उसकी मृत्यु हो गई ।

गन्धर्व सेन की दूसरी पत्नी जो क्षत्रिय कुल की थी, उसके बड़े पुत्र शंख को एक दिन शंका हुई कि उसके पिता गन्धर्व सेन, विक्रम को योग्य समझकर उसे अपना उत्तराधिकारी घोषित कर सकते हैं और इसी आशंका में उसने एक दिन अपने सोए हुए पिता का वध कर डाला | पिता के वध के पश्चात् उसने स्वयं को वहां का राजा घोषित कर दिया ।

गन्धर्व सेन की हत्या का समाचार राज्य में दावानल की तरह फैला और उसके सभी भाई प्राण रक्षा के लिए भाग निकले । विक्रम तथा भर्तृहरि को छोड़कर बाकी सभी भाइयों का पता उसे चल गया और वे सभी मार डाले गए । विक्रम तथा भर्तृहरि के लिए दुष्ट शंख ने अपने गुप्तचरों को बहुत दूर तक दौड़ाया |

बहुत प्रयास के बाद आखिरकार शंख को पता चला कि एक घने जंगल में सरोवर के निकट में एक कुटिया में, साधुवेश में विक्रम रह रहा है तथा कंदमूल खाकर घनघोर तपस्या में रत है । शंख के अन्दर राज्य की लिप्सा में पाप सवार हो चुका था |

वह विक्रम को किसी भी हाल में मार डालना चाहता था इसलिए वह विक्रम मारने की योजना बनाने लगा तथा एक तांत्रिक को उसने अपने षडयंत्र में शामिल कर लिया । शंख को भर्तृहरि की तरफ से कोई विशेष चिंता न थी | भर्तृहरि साधू प्रवृत्ति के थे तथा सांसारिक भोग आदि से दूर ही रहते थे |

शंख और तान्त्रिक ने विक्रम को मारने की योजना बनायी | उस योजना के अनुसार सबसे पहले तांत्रिक विक्रम के पास जाता और उसे प्रभावित करके माँ भगवती की आराधना के लिए प्रेरित करता | विक्रम के मान जाने पर, तांत्रिक उसे नियत समय पर (एक अभिचार कर्म के लिए) माँ भगवती के आगे सर झुका कर पाठ करने के लिए कहता | उसी समय पीछे छुपा शंख, असावधान विक्रम पर हमला करके उसका सर गर्दन से उतर देता |

परन्तु विक्रम ने तांत्रिक के संदिग्ध आचरण को भांप लिया था | विक्रम ने बड़ी चतुराई से उस दिन तांत्रिक को अपने स्वयं के वस्त्र पहनने को विवश कर दिया था और खुद उसने एक फटा हुआ काला वस्त्र पहन लिया था | उस दिन विक्रम ने अनुमान लगा लिया था कि उसका शत्रु, उसके आस-पास ही कहीं छिपा था |

नियत समय पर जब तांत्रिक ने विक्रम से माँ भगवती के आगे सर झुका कर पाठ करने को कहा तो विक्रम ने उसे पहले खुद करके
दिखाने और पूरी विधि समझाने को कहा | विक्रम के द्वारा बार-बार, तांत्रिक से विधि को समझाने का आग्रह करने पर, उतावलेपन में तांत्रिक उसे ऐसा खुद करके समझाने लगा |

इसी समय पीछे की तरफ स्थित एक जीर्ण मंदिर के अहाते में छिपा शंख बाहर निकल आया और उसने धोखे में तांत्रिक को विक्रम समझकर उसकी हत्या कर दी | शंख इससे पहले कि पूरे घटनाक्रम को समझ पाता, विक्रम ने बड़ी फुर्ती से उसी की तलवार छीन कर उसकी गर्दन धड़ से अलग कर दी | आततायी राजा शंख की मृत्यु के समाचार से राज्य में हर्ष की लहर दौड़ गयी |

जब प्रजा को पता चला कि उनके प्रिय राजकुमार विक्रमार्क जीवित हैं और उन्होंने ने ही दुष्ट शंख का वध किया है तो उनकी ख़ुशी दो गुनी हो गयी | बाद में उनका राज्याभिषेक बड़े धूम-धाम से हुआ । राजा और प्रजा ने हर्षोल्लास में एक महीने तक उत्सव मनाया |

एक दिन हिंसक पशुओं के आखेट के लिए विक्रम जंगल गए । एक जंगली भेड़िये का पीछा करते-करते वो सबसे बिछुड़कर बहुत दूर चले आए । उस बियाबान जंगल में उन्हें एक महल दिखा और पास आकर पता चला कि वह महल तूतवरण का है जो कि राजा बाहुबल का दीवान है ।

तूतवरण ने राजा विक्रम को बताया कि विक्रम बड़े ही यशस्वी राजा बन सकते हैं, यदि राजा बाहुबल उनका राजतिलक करें । और उसने यह भी बताया कि भगवान शिव द्वारा प्रदत्त अपना स्वर्ण सिंहासन अगर बाहुबल विक्रम को दे दें तो विक्रम चक्रवर्ती सम्राट बन जांएगे ।

तूतवरण एक सदाचारी और दूरदर्शी विद्वान था | उसने विक्रम के मस्तक की रेखाएं पढ़ ली थी | उसे अनुमान हो चुका था कि आज का विक्रम कल का चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य होने वाला था |

तूतवरण ने ही विक्रम और बहुबल की मित्रता करायी | बाद में बाहुबल ने विक्रम का न केवल राजतिलक किया, बल्कि खुशी-खुशी उन्हें अपना स्वर्ण सिंहासन भी भेंट कर दिया । कालांतर में विक्रमादित्य चक्रवर्ती सम्राट बन गए और उनकी कीर्तिपताका सर्वत्र लहरा उठी ।

इस कहानी से मिलने वाली शिक्षा

इस कहानी द्वारा विक्रमादित्य के चरित्र से हमें यह शिक्षा मिलती है कि साधन हीन होते हुए भी हमें शत्रु को पास देखकर नहीं घबराना चाहिए बल्कि साहस और बुद्धि से काम लेते हुए उसका सामना करना चाहिए | हमें यह भी शिक्षा मिलती है कि आपत्ति काल में हमें सदैव सतर्क रहना चाहिए किसी भी अजनबी पर सहसा विश्वास नहीं करना चाहिए |





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